कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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कल्याण भगवती उमा और इन्द्र
- केनोपनिषद् * १८१ वार्तालापका तो अवसर नहीं दिया । परन्तु इस एक दोषके अतिरिक्त अन्य सब प्रकारसे इन्द्र अधिकारी थे, अतः उन्हे ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान कराना आवश्यक समझकर इसीकी व्यवस्थाके लिये वे स्वयं अन्तर्धान हो गये ॥ ११ ॥ स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमा ँ हैमवतीं ताँ्होवाच किमेतद् यक्षमिति ॥१२॥ सः = वे इन्द्र; तस्मिन् एव = उसी, आकाशे = आकाशप्रदेशमे (यक्षके स्थानपर ही), बहुशोभमानाम् = अतिशय सुन्दरी, स्त्रियम् = देवी, हैमवतीम् = हिमाचलकुमारी; उमाम् = उमाके पास; आजगाम = आ पहुँचे ( और ), ताम् = उनमे; ह उवाच = ( सादर ) यह बोले ( देवि ! ), एतत् = यह; यक्षम् = दिव्य यक्ष; किम् इति = कौन था ॥ १२ ॥ व्याख्या—यक्षके अन्तर्धान हो जानेपर इन्द्र वहीं खड़े रहे, अग्नि-वायुकी भाँति वहाँसे लौटे नहीं। इतनेमे ही उन्होंने देखा कि जहाँ दिव्य यक्ष था, ठीक उसी जगह अत्यन्त शोभामयी हिमाचलकुमारी उमादेवी प्रकट हो गयी हैं। उन्हें देखकर इन्द्र उनके पास चले गये । इन्द्रपर कृपा करके करुणामय परब्रह्म पुरुषोत्तमने ही उमारूपा साक्षात् ब्रह्मविद्याको प्रकट किया था । इन्द्रने भक्तिपूर्वक उनसे कहा—'भगवती ! आप सर्वज्ञशिरोमणि ईश्वर श्रीशङ्करकी स्वरूपा-शक्ति हैं । अतः आपको अवश्य ही सब बातोका पता है । कृपापूर्वक मुझे बतलाइये कि यह दिव्य यक्ष, जो दर्शन देकर तुरत ही छिप गया, वस्तुतः कौन है और किस हेतुसे यहाँ प्रकट हुआ था' ॥ १२ ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ ❖ चतुर्थ खण्ड सा ब्रह्मेति होवाच । ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति, ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥१॥ सा = उस ( भगवती उमा देवी ) ने; ह उवाच = स्पष्ट उत्तर दिया कि; ब्रह्म इति = ( वे तो ) परब्रह्म परमात्मा हैं, ब्रह्मणः वै = उन परमात्माकी ही; एतद्विजये = इस विजयमे; महीयध्वम् इति = तुम अपनी महिमा मानने लगे थे ततः एव = उमाके इस कथनसे ही, ह = निश्चयपूर्वक; विदाञ्चकार = ( इन्द्रने ) समझ लिया ( कि ); ब्रह्म इति = ( यह ) ब्रह्म है ॥ १ ॥ व्याख्या—देवराज इन्द्रके पूछनेपर भगवती उमादेवीने इन्द्रसे कहा कि तुम जिन दिव्य यक्षको देख रहे थे और जो इस समय अन्तर्धान हो गये हैं, वे साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं । तुमलोगोंने जो असुरोंपर विजय प्राप्त की है, यह उन ब्रह्मकी शक्तिसे ही की है; अतएव वस्तुतः यह उन परब्रह्मकी ही विजय है । तुम तो इसमें निमित्तमात्र थे । परंतु तुमलोगोंने ब्रह्मकी इस विजयको अपनी विजय मान लिया और उनकी महिमाको अपनी महिमा समझने लगे । यह तुम्हारा मिथ्याभिमान था और जिन परम कारुणिक परमात्माने तुमलोगोंपर कृपा करके असुरोंपर तुम्हें विजय प्रदान करायी, उन्हीं परमात्माने तुम्हारे मिथ्याभिमानका नाश करके तुम्हारा कल्याण करनेके लिये यक्षके रूपमें प्रकट होकर अग्नि और वायुका गर्व चूर्ण किया एव तुम्हें वास्तविक ज्ञान देनेके लिये मुझे प्रेरित किया। अतएव तुम अपनी स्वतन्त्र शक्तिके सारे अभिमानका त्याग करके, जिन ब्रह्मकी महिमासे महिमान्वित और शक्तिमान् बने हो, उन्हींकी महिमा समझो । स्वप्नमें भी यह भावना मत करो कि ब्रह्मकी शक्तिके बिना अपनी स्वतन्त्र शक्तिसे कोई भी कुछ कर सकता है । उमाके इस उत्तरसे देवताओंमें सबसे पहले इन्द्रको यह निश्चय हुआ कि यक्षके रूपमें स्वयं ब्रह्म ही उन लोगोंके सामने प्रकट हुए थे ॥ १ ॥ तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत् विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥ तस्मात् वै = इसीलिये, एते देवाः = ये तीनों देवता, यत् = जो कि, अग्निः = अग्नि, वायुः = वायु ( और ), इन्द्रः = इन्द्रके नामसे प्रसिद्ध हैं, अन्यान् = दूसरे ( चन्द्रमा आदि ), देवान् = देवोंकी अपेक्षा, अतितराम् इव = मानो अतिशय श्रेष्ठ हैं, हि = क्योंकि, ते = उन्होंने ही; एनत् नेदिष्ठम् = इन अत्यन्त प्रिय और समीपस्थ परमेश्वरको, पस्पृशुः = ( दर्शनद्वारा ) स्पर्श किया है, ते हि = ( और ) उन्होंने ही; एनत् = इनको, प्रथमं = सबसे पहले, विदाञ्चकार = जाना है ( कि )' ब्रह्म इति = ये साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ २ ॥
१८२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—समस्त देवताओंमें अग्नि, वायु और इन्द्रको ही परम श्रेष्ठ मानना चाहिये, क्योंकि उन्हीं तीनोंने ब्रह्मका संस्पर्श प्राप्त किया है। परब्रह्म परमात्माके दर्शनका, उनका परिचय प्राप्त करनेके प्रयत्नमें प्रवृत्त होनेका और उनके साथ वार्तालापका परम सौभाग्य उन्हीं को प्राप्त हुआ और उन्होंने ही सबने पहले इस सत्यको समझा कि हमलोगोंने जिनका दर्शन प्राप्त किया है, जिनसे वार्तालाप किया है और जिनकी शक्तिसे असुरोंपर विजय प्राप्त की है, वे ही साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं। सारांश यह कि जिन सौभाग्यशाली महापुरुषोंको किसी भी कारणसे भगवान्के दिव्य संस्पर्शका सौभाग्य प्राप्त हो गया है, जो उनके दर्शन, स्पर्श और उनके साथ सदालाप करनेका सुअवसर पा चुके हैं, उनकी महिमा इस मन्त्रमें इन्द्रादि देवताओंका उदाहरण देकर की गयी है ॥ २ ॥ सम्बन्ध—अब यह कहते हैं कि इन तीनों देवताओंमें भी अग्नि और वायुकी अपेक्षा देवराज इन्द्र श्रेष्ठ हैं— तस्माद् वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान् देवान् स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श, स ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ३ ॥ तस्मात् वै = इसीलिये, इन्द्रः = इन्द्र, अन्यान् देवान् = दूसरे देवताओंकी अपेक्षा; अतितराम् इव = मानो अतिशय श्रेष्ठ है, हि = क्योंकि, स = उसने, एनत् नेदिष्ठम् = इन अत्यन्त प्रिय और समीपस्थ परमेश्वरको पस्पर्श = (उमादेवीसे सुनकर सबसे पहले) मनके द्वारा स्पर्श किया, स हि = (और) उसीने, एनत् = इनको; प्रथमः = अन्यान्य देवताओंमे पहले विदाञ्चकार = भलीभाँति जाना है (कि), ब्रह्म इति = ये साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या—अग्नि तथा वायुने दिव्य यक्षके रूपमे ब्रह्मका दर्शन और उसके साथ वार्तालापका सौभाग्य तो प्राप्त किया था, परन्तु उन्हें उसके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ था। भगवती उमाके द्वारा सबसे पहले देवराज इन्द्रको सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वका ज्ञान हुआ। तदनन्तर इन्द्रके बतलानेपर अग्नि और वायुको उनके स्वरूपका पता लगा और उसके बाद इनके द्वारा अन्य सब देवताओंने यह जाना कि हमें जो दिव्य यक्ष दिखलायी दे रहे थे, वे साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही हैं। इस प्रकार अन्यान्य देवताओने केवल सुनकर जाना, परंतु उन्हें परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ न तो वार्तालाप करनेका सौभाग्य मिला और न उनके तत्त्वको समझनेका ही। अतएव उन सब देवताओंसे तो अग्नि, वायु और इन्द्र श्रेष्ठ हैं, क्योंकि इन तीनोंको ब्रह्मका दर्शन और तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हुई। परंतु इन्द्रने सबसे पहले उनके तत्त्वको समझा, इसलिये इन्द्र सबसे श्रेष्ठ माने गये ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—अब उपर्युक्त ब्रह्मतत्त्वको आधिदैविक दृष्टान्तके द्वारा सङ्केतसे समझाते हैं— तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा इतीन्त्यमीमिपदा इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥ तस्य = उस ब्रह्मका, एष = यह, आदेशः = साङ्केतिक उपदेश है, यत् = जो कि, एतत् = यह, विद्युतः = बिजलीका, व्यद्युतत् आ = चमकना-सा है, इति = इस प्रकार (क्षणस्थायी है), इत् = तथा जो, न्यमीमिपत् आ = नेत्रोंका झपकना-सा है; इति = इस प्रकार, अधिदैवतम् = यह आधिदैविक उपदेश है ॥ ४ ॥ व्याख्या—जब साधकके हृदयमें ब्रह्मको साक्षात् करनेकी तीव्र अभिलाषा जाग उठती है, तब भगवान् उसकी उत्कण्ठाको और भी तीव्रतम तथा उत्कट बनानेके लिये बिजलीके चमकने और आँखोंके झपकनेकी भाँति अपने स्वरूपकी क्षणिक झाँकी दिखलाकर छिप जाया करते हैं। पूर्वोक्त आख्यायिकामें इसी प्रकार इन्द्रके सामनेसे दिव्य यक्षके अन्तर्धान हो जानेकी बात आयी है। देवर्षि नारदको भी उनके पूर्वजन्ममें क्षणभरके लिये अपनी दिव्य झाँकी दिखलाकर भगवान् अन्तर्धान हो गये थे। यह कथा श्रीमद्भागवत (स्क० १। ६। १९-२०) में आती है। जब साधकके नेत्रोंके सामने या उसके हृदय देशमें पहले-पहल भगवान्के साकार या निराकार स्वरूपका दर्शन या अनुभव होता है, तब वह आनन्दाश्चर्यसे चकित-सा हो जाता है। इससे उसके हृदयमें अपने आराध्यदेवको नित्य-निरन्तर देखते रहने या अनुभव करते रहनेकी अनिवार्य और परम उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है। फिर उसे क्षणभरके लिये भी इष्ट-साक्षात्कारके बिना शान्ति नहीं मिलती। यही बात इस मन्त्रमे आधिदैविक उदाहरणसे समझायी गयी है—ऐसा प्रतीत होता है। वस्तुतः यहाँ वही ही
- केनोपनिषद् * १८३ गोपनीय रीतिसे ऐसे शब्दोंमें ब्रह्मतत्त्वका संकेत किया गया है कि जिसे कोई अनुभवी सन्त-महात्मा ही बतला सकते हैं । शब्दोंका अर्थ तो अपनी-अपनी भावनाके अनुसार विभिन्न प्रकारसे लगाया जा सकता है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध- अब इसी बातको आध्यात्मिक भावसे समझाते हैं— अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णं संकल्पः ॥ ५ ॥ अथ = अब; अध्यात्मम् = आध्यात्मिक (उदाहरण दिया जाता है), यत् = जो कि, मनः = (हमारा) मन, एतत् = इस (ब्रह्म) के समीप, गच्छति इव = जाता हुआ-सा प्रतीत होता है, च = तथा, एतत् = इस ब्रह्मको, अभीक्ष्णम् = निरन्तर, उपस्मरति = अतिशय प्रेमपूर्वक स्मरण करता है, अनेन = इस मनके द्वारा (ही), संकल्पः च = संकल्प अर्थात् उस ब्रह्मके साक्षात्कारकी उत्कट अभिलाषा भी (होती है) ॥ ५ ॥ व्याख्या- जब साधकको अपना मन आराध्यदेव श्रीभगवान्के समीपतक पहुँचता हुआ-सा दीखता है, वह अपने मनसे भगवान्के निर्गुण या सगुण—जिस स्वरूपका भी चिन्तन करता है, उसकी जब प्रत्यक्ष अनुभूति सी होती है, तब स्वाभाविक ही उसका अपने उस इष्टमें अत्यन्त प्रेम हो जाता है । फिर वह क्षणभरके लिये भी अपने इष्टदेवकी विस्मृतिको सहन नहीं कर सकता । उस समय वह अतिशय व्याकुल हो जाता है ('तद्विस्मरणे परमव्याकुलता'—नारदभक्तिसूत्र १९) । वह नित्य-निरन्तर प्रेमपूर्वक उसका स्मरण करता रहता है और उसके मनमें अपने इष्टको प्राप्त करनेकी अनिवार्य और परम उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है । पिछले मन्त्रमें जो बात आधिदैविक दृष्टिसे कही गयी थी, वही इसमें आध्यात्मिक दृष्टिसे कही गयी है ॥ ५ ॥ सम्बन्ध- अब उस ब्रह्मकी उपासनाका प्रकार और उसका फल बतलाते हैं— तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैन सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥६॥ तत् = वह परब्रह्म परमात्मा, तद्वनम् = (प्राणिमात्रका प्रापणीय होनेके कारण) 'तद्वन', नाम ह = नामसे प्रसिद्ध है, (अतः) तद्वनम् = वह आनन्दघन परमात्मा प्राणिमात्रकी अभिलाषाका विषय और सबका परम प्रिय है, इति = इस भावसे, उपासितव्यम् = उसकी उपासना करनी चाहिये; सः यः = वह जो भी साधक, एतत् = उस ब्रह्मको, एवम् = इस प्रकार (उपासनाके द्वारा), वेद = जान लेता है, एनम् ह = उसको निस्सन्देह, सर्वाणि = सम्पूर्ण, भूतानि = प्राणी; अभि = सब ओरसे, संवाञ्छन्ति = हृदयसे चाहते हैं अर्थात् वह प्राणिमात्रका प्रिय हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या- वह आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वर सभीका अत्यन्त प्रिय है। सभी प्राणी किसी न-किसी प्रकारसे उसी को चाहते हैं, परंतु पहचानते नहीं; इसीलिये वे सुखके रूपमें उसे खोजते हुए दुःखरूप विषयोंमें भटकते रहते हैं, उसे पा नहीं सकते । इस रहस्यको समझकर साधकको चाहिये कि उस परब्रह्म परमात्माको प्राणिमात्रका प्रिय समझकर उसके नित्य अचल अमल अनन्त परम आनन्दस्वरूपका नित्य-निरन्तर चिन्तन करता रहे । ऐसा करते-करते जब वह आनन्दस्वरूप सर्वप्रिय परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है, तब वह स्वयं भी आनन्दमय हो जाता है । अतः जगत्के सभी प्राणी उसे अपना परम आत्मीय समझकर उसके साथ हृदयसे प्रेम करने लगते हैं ॥ ६ ॥ उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद् ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ७ ॥ भोः = हे गुरुदेव; उपनिषदम् = ब्रह्मसम्बन्धी रहस्यमयी विद्याका, ब्रूहि = उपदेश कीजिये, इति = इस प्रकार (शिष्यके प्रार्थना करनेपर गुरुदेव कहते हैं कि), ते = तुझको (हमने), उपनिषत् = रहस्यमयी ब्रह्मविद्या, उक्ता = बतला दी, ते = तुझको (हम), वाव = निश्चय ही, ब्राह्मीम् = ब्रह्मविषयक, उपनिषदम् = रहस्यमयी विद्या, अब्रूम = बतला चुके हैं। इति = इस प्रकार (तुम्हें समझना चाहिये) ॥ ७ ॥ व्याख्या- गुरुदेवसे सांकेतिक भाषामें ब्रह्मविद्याका श्रेष्ठ उपदेश सुनकर शिष्य उसको पूर्णरूपसे हृदयङ्गम नहीं कर सका, इसलिये उसने प्रार्थना की कि 'भगवन् ! मुझे उपनिषद्—रहस्यमयी ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये ।' इसपर गुरुदेवने कहा—'वत्स ! हम तुम्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश कर चुके हैं । तुम्हारे प्रश्नके उत्तरमें 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' से लेकर उपर्युक्त मन्त्रतक
१८४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जो कुछ उपदेश किया है, तुम यह दृढरूपसे समझ लो कि वह सुनिश्चित रहस्यमयी ब्रह्मविद्याका ही उपदेश है ॥ ७ ॥ सम्बन्ध - ब्रह्मविद्याके सुननेमात्रसे ही ब्रह्मके स्वरूपका रहस्य समझमें नहीं आता, इसके लिये विशेष साधनोंकी आवश्यकता होती है, इसलिये अब उन प्रधान साधनोंका वर्णन करते हैं- तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥ तस्यै=उस रहस्यमयी ब्रह्मविद्याके; तपः=तपस्या; दमः=मन इन्द्रियोंका नियन्त्रण; कर्म=निष्काम कर्म, इति=ये तीनों, प्रतिष्ठाः=आधार हैं; वेदाः=वेद; सर्वाङ्गानि =उस विद्याके सम्पूर्ण अङ्ग हैं अर्थात् वेदमे उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंका सविस्तर वर्णन है; सत्यम् = सत्यस्वरूप परमेश्वर, आयतनम् = उसका अधिष्ठान - प्राप्तव्य है ॥ ८ ॥ व्याख्या-सुन-पढकर रट लिया और ब्रह्मज्ञानी हो गये । यह तो ब्रह्मविद्याका उपहास है और अपने-आपको धोखा देना है । ब्रह्मविद्यारूपी प्रासादकी नींव है - तप, दम और कर्म आदि साधन । इन्हींपर वह रहस्यमयी ब्रह्मविद्या स्थिर हो सकती है। जो साधक साधन-सम्पत्तिकी रक्षा, वृद्धि तथा स्वधर्मपालनके लिये कठिन-से कठिन कष्टको सहर्ष स्वीकार नहीं करते, जो मन और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमे नहीं कर लेते और जो निष्कामभावसे अनासक्त होकर वर्णाश्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मका अनुष्ठान नहीं करते, वे ब्रह्मविद्याका यथार्थ रहस्य नहीं जान पाते; क्योंकि ये ही उसे जाननेके प्रधान आधार हैं । साथ ही यह भी जानना चाहिये कि वेद उस ब्रह्मविद्याके समस्त अङ्ग हैं। वेदमे ही ब्रह्मविद्याके समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गोंकी विशद व्याख्या है, अतएव वेदोंका उसके अङ्गोंसहित अध्ययन करना चाहिये । और सत्यस्वरूप परमेश्वर अर्थात् त्रिकालाबाधित सच्चिदानन्दघन परमेश्वर ही उस ब्रह्मविद्याका परम अधिष्ठान, आश्रयस्थल और परम लक्ष्य है। अतएव उस ब्रह्मको लक्ष्य करके जो वेदानुसार उसके तत्त्वका अनुशीलन करते हुए तप, दम और निष्काम कर्म आदिका आचरण करते हुए साधन करते हैं, वे ही ब्रह्मविद्याके सार रहस्य परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त कर सकते हैं ॥ ८ ॥ यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्टति प्रतितिष्ठति ॥ ९॥ यः=जो कोई भी, एताम् वै=इस प्रसिद्ध ब्रह्मविद्याको; एवम्=पूर्वोक्त प्रकारसे भलीभाँति; वेद=जान लेता है; [सः=वह,] पाप्मानम् = समस्त पापसमूहको; अपहत्य=नष्ट करके, अनन्ते=अविनाशी, असीम, ज्येये=सर्वश्रेष्ठ, स्वर्गे लोके=परम धाममें' प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित हो जाता है, प्रतितिष्ठति =सदाके लिये स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥ व्याख्या- ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे जो उपनिषद्रूपा ब्रह्मविद्याके रहस्यको जान लेता है अर्थात् तदनुसार साधनमें प्रवृत्त हो जाता है, वह समस्त पापोंका - परमात्म-साक्षात्कारमें प्रतिबन्धकरूप समस्त शुभाशुभ कर्मोंका अशेषरूपमे नाश करके नित्य-सत्य सर्वश्रेष्ठ परमधाममे स्थित हो जाता है, कभी वहाँसे लौटता नहीं, सदाके लिये वहाँ प्रतिष्ठित हो जाता है । यहाँ 'प्रतितिष्ठति'पदका पुनः उच्चारण ग्रन्थ-समाप्तिका सूचक तो है ही, साथ ही उपदेशकी निश्चितताका प्रतिपादक भी है ॥ ९ ॥ ॥ चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥ ४ ॥ ॥ सामवेदीय केनोपनिषद् समाप्त ॥ +---०००---+ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः इसका अर्थ केनोपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कठोपनिषद् कठोपनिषद् उपनिषदोंमें बहुत प्रसिद्ध है । यह कृष्णयजुर्वेदकी कठ-शाखाके अन्तर्गत है । इसमें नचिकेता और यमके संवादरूपमें परमात्माके रहस्यमय तत्त्वका बड़ा ही उपयोगी और विशद वर्णन है । इसमें दो अध्याय हैं और प्रत्येक अध्यायमें तीन-तीन वल्लियाँ हैं । शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॐ=पूर्णब्रह्म परमात्मन्; (आप) नौ=हम दोनों (गुरु शिष्य) की, सह=साथ-साथ, अवतु=रक्षा करें, नौ=हम दोनोंका, सह=साथ साथ, भुनक्तु=पालन करें; सह=(हम दोनों) साथ-साथ ही, वीर्यम्=शक्ति; करवावहै=प्राप्त करें; नौ=हम दोनोंकी; अधीतम्=पढ़ी हुई विद्या; तेजस्वि=तेजोमयी, अस्तु=हो, मा विद्विषावहै=हम दोनों परस्पर द्वेष न करें । व्याख्या—हे परमात्मन् ! आप हम गुरु-शिष्य दोनोंकी साथ-साथ सब प्रकारसे रक्षा करें, हम दोनोंका आप साथ-साथ समुचितरूपसे पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-ही-साथ सब प्रकारसे बल प्राप्त करें, हम दोनोंकी अध्ययन की हुई विद्या तेजपूर्ण हो—कहीं किसीसे हम विद्यामें परास्त न हों और हम दोनों जीवनभर परस्पर स्नेह-सूत्रसे बँधे रहें, हमारे अदर परस्पर कभी द्वेष न हो । हे परमात्मन् ! तीनों तापोंकी निवृत्ति हो । प्रथम अध्याय ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १ ॥ ॐ=सच्चिदानन्दघन परमात्माका एक नाम, ह वै=प्रसिद्ध है कि; उशन्=यज्ञका फल चाहनेवाले; वाजश्रवसः= वाजश्रवाके पुत्र (उद्दालक) ने; सर्ववेदसम्=(विश्वजित् यज्ञमें) अपना सारा धन; ददौ=(ब्राह्मणोंको) दे दिया; तस्य=उसका, नचिकेता=नचिकेता; नाम ह=नामसे प्रसिद्ध, पुत्रः=एक पुत्र, आस=था ॥ १ ॥ व्याख्या—ग्रन्थके आरम्भमें परमात्माका स्मरण मङ्गलकारक है, इसलिये यहाँ सर्वप्रथम 'ॐ' कारका उच्चारण करके उपनिषद्का आरम्भ हुआ है। जिस समय भारतवर्षका पवित्र आकाश यज्ञधूम और उसके पवित्र सौरभसे परिपूर्ण रहता था, त्यागमूर्ति ऋषि महर्षियोंके द्वारा गाये हुए वेद-मन्त्रोंकी दिव्य ध्वनिसे सभी दिशाएँ गूँजती रहती थीं, उसी समयका यह प्रसिद्ध इतिहास है । गौतमवंशीय वाजश्रवात्मज महर्षि अरुणके पुत्र अथवा अन्नके प्रचुर दानसे महान् कीर्ति पाये हुए (वाज= अन्न, श्रव=उसके दानसे प्राप्त यश) महर्षि अरुणके पुत्र उद्दालक ऋषिंने फलकी कामनासे विश्वजित् नामक एक महान् यज्ञ किया । इस यज्ञमें सर्वस्व दान करना पड़ता है । अतएव उद्दालकने भी अपना सारा धन ऋत्विजों और सदस्योंको दक्षिणामें दे दिया । उद्दालकजीके नचिकेता नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र था ॥ १ ॥ तꣳह कुमारꣳसन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाऽऽविवेश सोऽमन्यत ॥ २ ॥ दक्षिणासु नीयमानासु=(जिस समय ब्राह्मणोंको) दक्षिणाके रूपमें देनेके लिये (गौएँ) लायी जा रही थीं, उस समय; कुमारम्=छोटा बालक, सन्तम्=होनेपर भी, तम् ह्=उस (नचिकेता) में; श्रद्धा=श्रद्धा (आस्तिक बुद्धि) का, आविवेश=आवेश हो गया (और), सः=(उन जराजीर्ण गायोंको देखकर) वह; अमन्यत=विचार करने लगा ॥ २ ॥ व्याख्या—उस समय गो-धन ही प्रधान धन था और वाजश्रवस उद्दालकके घरमें इस धनकी प्रचुरता थी । ऐसा माना गया है कि होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा और उद्गाता—ये चार प्रधान ऋत्विज होते हैं, इनको सबसे अधिक गौएँ दी जाती हैं; प्रशास्ता, उ० अं० २४—९५—
१८६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * प्रतिप्रस्थाता, ब्राह्मणाच्छंसी और प्रस्तोता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा आधी; अच्छावाक, नेष्टा, आग्नीध्र और प्रतिहर्त्ता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा तिहाई एवं ग्रावस्तुत्, नेता, होता और सुब्रह्मण्य—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा चौथाई गौएँ दी जाती हैं। नियमानुसार जब इन सबको दक्षिणाके रूपमें देनेके लिये गौएँ लायी जा रही थीं; उस समय बालक नचिकेताने उनको देख लिया। उनकी दयनीय दशा देखते ही उसके निर्मल अन्तःकरणमे श्रद्धा—आस्तिकताने प्रवेश किया और वह सोचने लगा—॥ २ ॥ पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः। अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ ३॥ पीतोदकाः=जो (अन्तिम बार) जल पी चुकी हैं; जग्धतृणाः=जिनका घास खाना समाप्त हो गया है; दुग्धदोहाः=जिनका दूध (अन्तिम बार) दुह लिया गया है; निरिन्द्रियाः=जिनकी इन्द्रियाँ नष्ट हो चुकी हैं; ताः=ऐसी (निरर्थक मरणासन्न) गौओंको; ददत्=देनेवाला; सः=वह दाता (तो), ते लोकाः=वे (शूकर-कूकरादि नीच योनियाँ और नरकादि) लोक; अनन्दाः=जो सब प्रकारके सुखोंसे शून्य; नाम=प्रसिद्ध हैं; तान्=उनको; गच्छति=प्राप्त होता है (अतः पिताजीको सावधान करना चाहिये) ॥ ३ ॥ स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति। द्वितीयं तृतीयं तँहोवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४ ॥ सः ह=यह सोचकर वह; पितरम्=अपने पितासे; उवाच=बोला कि; तत (तात)=हे प्यारे पिताजी !; माम्=मुझे; कस्मै=(आप) किसको; दास्यसि इति=देंगे ?; (उत्तर न मिलनेपर उसने वही बात) द्वितीयम्=दुबारा; तृतीयम्=तिबारा (कही); तम् ह=(तब पिताने) उससे; उवाच=(इस प्रकार क्रोधपूर्वक) कहा; त्वा=तुझे (मैं); मृत्यवे=मृत्युको; ददामि इति=देता हूँ ॥ ४ ॥ व्याख्या—पिताजी ये कैसी गौएँ दक्षिणामें दे रहे हैं। अब इनमें न तो झुककर जल पीनेकी शक्ति रही है, न इनके मुखमें घास चबानेके लिये दाँत ही रह गये हैं और न इनके स्तनोंमें तनिक-सा दूध ही बचा है। अधिक क्या, इनकी तो इन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट हो चुकी हैं—इनमें गर्भधारण करनेतककी भी सामर्थ्य नहीं है! भला, ऐसी निरर्थक और मृत्युके समीप पहुँची हुई गौएँ जिन ब्राह्मणोंके घर जायँगी, उनको दुःखके सिवा ये और क्या देंगी ? दान तो उसी वस्तुका करना चाहिये, जो अपनेको सुख देनेवाली हो, प्रिय हो और उपयोगी हो तथा वह जिनको दी जाय उन्हें भी सुख और लाभ पहुँचानेवाली हो। दुःखदायिनी अनुपयोगी वस्तुओको दानके नामपर देना तो दानके व्याजसे अपनी विपद् टालना है और दान ग्रहण करनेवालोको धोखा देना है। इस प्रकारके दानसे दाताको वे नीच योनियाँ और नरकादि लोक मिलते हैं, जिनमें सुखका कहीं लेश भी नहीं है। पिताजी इस दानसे क्या सुख पायेंगे ? यह तो यज्ञमें वैगुण्य है, जो इन्होंने सर्वस्व-दानरूपी यज्ञ करके भी उपयोगी गौओंको मेरे नामपर रख लिया है; और सर्वस्वमे तो मैं भी हूँ, मुझको तो इन्होंने दानमे दिया नहीं। पर मैं इनका पुत्र हूँ, अतएव मैं पिताजीको इस अनिष्टकारी परिणामसे बचानेके लिये अपना बलिदान कर दूँगा। यही मेरा धर्म है। यह निश्चय करके उसने अपने पितासे कहा—'पिताजी ! मैं भी तो आपका धन हूँ, आप मुझे किसको देते हैं ?' पिताने कोई उत्तर नहीं दिया, तब नचिकेताने फिर कहा—'पिताजी ! मुझे किसको देते हैं ?' पिताने इस बार भी उपेक्षा की। पर धर्मभीरु और पुत्रका कर्तव्य जाननेवाले नचिकेतासे नहीं रहा गया। उसने तीसरी बार फिर वही कहा—'पिताजी ! आप मुझे किसको देते हैं ?' अब ऋषिको क्रोध आ गया और उन्होंने आवेशमें आकर कहा—'तुझे देता हूँ मृत्युको !' ॥ ३-४ ॥ सम्बन्ध—यह सुनकर नचिकेता मन-ही-मन विचारने लगा कि— बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः। किँस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५॥ बहूनाम्=मैं बहुत-से शिष्योंमें तो; प्रथमः=प्रथम श्रेणीके आचरणपर; एमि=चलता आया हूँ (और); बहूनाम्= *, मध्यमः=मध्यम श्रेणीके आचारपर; एमि=चलता हूँ (कभी भी नीची श्रेणीके आचरणको मैंने नहीं अपनाया, फिर
- कठोपनिषद् * १८७ पिताजीने ऐसा क्यों कहा ! ), यमस्य = यमका, किम् स्वित् कर्तव्यम् = ऐसा कौन-सा कार्य हो सकता है, यत् अद्य = जिसे आज, मया = मेरेद्वारा ( मुझे देकर ); करिष्यति = ( पिताजी ) पूरा करेंगे ॥ ५ ॥ व्याख्या--शिष्यों और पुत्रोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं--उत्तम, मध्यम और अधम । जो गुरु या पिताका मनोरथ समझकर उनकी आज्ञाकी प्रतीक्षा किये बिना ही उनकी रुचिके अनुसार कार्य करने लगते हैं, वे उत्तम हैं। जो आज्ञा पानेपर कार्य करते हैं, वे मध्यम हैं और जो मनोरथ जान लेने और स्पष्ट आदेश सुन लेनेपर भी तदनुसार कार्य नहीं करते, वे अधम हैं । मै बहुत से शिष्योंमे तो प्रथम श्रेणीका हूँ, प्रथम श्रेणीके आचरणपर चलनेवाला हूँ, क्योंकि उनमे पहले ही मनोरथ समझकर कार्य कर देता हूँ बहुत-से शिष्योमे मध्यम श्रेणीका भी हूँ, मध्यम श्रेणीके आचारपर भी चलता आया हूँ, परतु अधम श्रेणीका तो हूँ ही नहीं। आज्ञा मिले और सेवा न करूँ, ऐसा तो मैने कभी किया ही नहीं। फिर, पता नही, पिताजीने मुझे ऐसा क्यों कहा ? मृत्युदेवताका भी ऐसा कौन-सा प्रयोजन है, जिसको पिताजी आज मुझे उनको देकर पूरा करना चाहते हैं ? ॥ ५ ॥ सम्बन्ध--सम्भव है, पिताजीने क्रोधके आवेशमें ही ऐसा कह दिया हो, परतु जो कुछ भी हो, पिताजीका वचन तो सत्य करना ही है। इधर ऐसा दीख रहा है कि पिताजी अब पश्चात्ताप कर रहे हैं, अतएव उन्हें सान्त्वना देना भी आवश्यक है। यह विचारकर नचिकेता एकान्तमें पिताके पास जाकर उनकी शोकनिवृत्तिके लिय इस प्रकार आश्वासनपूर्ण वचन बोला— अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६॥ पूर्वे = आपके पूर्वज पितामह आदि, यथा = जिस प्रकारका आचरण करते आये हैं; अनुपश्य = उसपर विचार कीजिये (और); अपरे = ( वर्तमानमे भी ) दूसरे श्रेष्ठ लोग, [ यथा = जैसा आचरण कर रहे हैं; ] तथा प्रतिपश्य = उसपर भी दृष्टिपात कर लीजिये ( फिर आप अपने कर्तव्यका निश्चय कीजिये ), मर्त्यः = ( यह ) मरणधर्मा मनुष्य, सस्यम् इव = अनाजकी तरह, पच्यते = पकता है अर्थात् जराजीर्ण होकर मर जाता है ( तथा ), सस्यम् इव = अनाजकी भाँति ही, पुनः = फिर; आजायते = उत्पन्न हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या-पिताजी ! अपने पितामहादि पूर्वजोंका आचरण देखिये और इस समयके दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंका आचरण देखिये। उनके चरित्रमे न कभी पहले असत्य था, न अब है। असाधु मनुष्य ही असत्यका आचरण किया करते हैं, परन्तु उस असत्यसे कोई अजर-अमर नहीं हो सकता । मनुष्य मरणधर्मा है। यह अनाजकी भाँति जरा-जीर्ण होकर मर जाता है और अनाजकी भाँति ही कर्मवश पुनः जन्म ले लेता है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध—अतएव इस अनित्य जीवनके लिये मनुष्यको कभी कर्तव्यका त्याग करके मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिये । आप शोकका त्याग कीजिये और अपने सत्यका पालन कर मुझे मृत्यु ( यमराज ) के पास जानेकी अनुमति दीजिये । पुत्रके वचन सुनकर उद्दालकको दुःख हुआ, परतु नचिकेताकी सत्यपरायणता देखकर उन्होंने उसे यमराजके पास भेज दिया । नचिकेताको यमसदन पहुँचनेपर पता लगा कि यमराज कहीं बाहर गये हुए हैं, अतएव नचिकेता तीन दिनोंतक अन्न-जल ग्रहण किय बिना ही यमराजकी प्रतीक्षा करता रहा। यमराजके लौटनेपर उनकी पत्नीने कहा— वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । तस्यैताᳪशान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७ ॥ वैवस्वत = हे सूर्यपुत्र; वैश्वानरः = स्वय अग्निदेवता ( ही ), ब्राह्मणः अतिथिः = ब्राह्मण अतिथिके रूपमे; गृहान् = ( गृहस्थके ) घरोंमें, प्रविशति = पधारते हैं; तस्य = उनकी; (साधुपुरुष ) एताम् = ऐसी ( अर्थात् अर्घ्य-पाद-आसन आदिके द्वारा ); शान्तिम् = शान्ति; कुर्वन्ति = किया करते हैं, ( अतः आप) उदकम् हर = ( उनके पाद-प्रक्षालनादिके लिये ) जल ले जाइये ॥ ७ ॥
१८८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-साक्षात् अग्नि ही मानो तेजसे प्रज्वलित होकर ब्राह्मण-अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरपर पधारते हैं । साधुहृदय गृहस्थ अपने कल्याणके लिये उस अतिथिरूप अग्निके दाहकी शान्तिके लिये उसे जल (पाद्य-अर्घ्य आदि) दिया करते हैं, अतएव हे सूर्यपुत्र ! आप उस ब्राह्मण-बालकके पैर धोनेके लिये तुरत जल ले जाइये । वह अतिथि लगातार तीन दिनोंसे आपकी प्रतीक्षामें अनशन किये बैठा है, आप स्वयं उसकी सेवा करेंगे, तभी वह शान्त होगा ॥ ७ ॥ आशाप्रतीक्षे सङ्गतँ सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूॅंश्च सर्वान् । एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥ यस्य = जिसके; गृहे = घरमें; ब्राह्मणः = ब्राह्मण अतिथि; अनश्नन् = बिना भोजन किये; वसति = निवास करता है; [तस्य = उस;] अल्पमेधसः = मन्दबुद्धि; पुरुषस्य = मनुष्यकी आशाप्रतीक्षे = नाना प्रकारकी आशा और प्रतीक्षा; सङ्गतम् = उनकी पूर्तिसे होनेवाले सब प्रकारके सुख; सूनृताम् च = सुन्दर भाषणके फल एव; इष्टापूर्ते च = यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मोंके और कुआँ, बगीचा, तालाब आदि निर्माण करानेके फल तथा; सर्वान् पुत्रपशून् = समस्त पुत्र और पशु; एतद् वृङ्क्ते = इन सबको (वह) नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥ व्याख्या-जिसके घरपर अतिथि ब्राह्मण भूखा बैठा रहता है, उस मन्दबुद्धि मनुष्यको न तो वे इच्छित पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेकी उसे पूरी आशा थी; न वे ही पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेका निश्चय था और वह बाट ही देख रहा था, कभी कोई पदार्थ मिल भी गया तो उससे सुखकी प्राप्ति नहीं होती । उसकी वाणीमेंसे सौन्दर्य, सत्य और माधुर्य निकल जाते हैं, अतः सुन्दर वाणीसे प्राप्त होनेवाला सुख भी उसे नहीं मिलता, उसके यज्ञ दानादि इष्ट कर्म और कूप, तालाब, धर्मशाला आदिके निर्माणरूप पूर्तकर्म एव उनके फल नष्ट हो जाते हैं । इतना ही नहीं, अतिथिका अपकार उसके पूर्वपुण्यसे प्राप्त पुत्र और पशु आदि धनको भी नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध-पत्नीके वचन सुनकर धर्ममूर्ति यमराज तुरत नचिकेताके पास गये और पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा विधिवत् उसकी पूजा करके कहने लगे- तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ९ ॥ ब्रह्मन् = हे ब्राह्मणदेवता; नमस्यः अतिथिः = आप नमस्कार करनेयोग्य अतिथि हैं; ते = आपको; नमः अस्तु = नमस्कार हो; ब्रह्मन् = हे ब्राह्मण; मे स्वस्ति = मेरा कल्याण; अस्तु = हो, यत् = आपने जो; तिस्रः = तीन रात्रीः = रात्रियोंतक; मे = मेरे; गृहे = घरपर; अनश्नन् = बिना भोजन किये; अवात्सीः = निवास किया है; तस्मात् = इसलिये (आप मुझसे); प्रति = प्रत्येक रात्रिके बदले (एक-एक करके); त्रीन् वरान् = तीन वरदान; वृणीष्व = माँग लीजिये ॥ ९ ॥ व्याख्या-'ब्राह्मणदेवता ! आप नमस्कारादि सत्कारके योग्य मेरे माननीय अतिथि हैं, कहाँ तो मुझे चाहिये था कि मैं आपका यथायोग्य पूजन-सेवन करके आपको सन्तुष्ट करता, और कहाँ मेरे प्रमादसे आप लगातार तीन रात्रियोंमे भूखे बैठे हैं। मुझसे यह बड़ा अपराध हो गया है। आपको नमस्कार है । भगवन् ! इस मेरे दोषकी निवृत्ति होकर मेरा कल्याण हो । आप प्रत्येक रात्रिके बदले एक एक करके मुझसे अपनी इच्छाके अनुरूप तीन वर माँग लीजिये' ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-तपोमूर्ति अतिथि ब्राह्मण-बालकके अनशनसे भयभीत होकर धर्मज्ञ यमराजने जब इस प्रकार कहा तब पिताको सुख पहुँचानेकी इच्छासे नचिकेता बोला- शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो । त्वत्प्रसृष्टं मामभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥ मृत्यो = हे मृत्युदेव; यथा = जिस प्रकार, गौतमः = (मेरे पिता) गौतमवंशीय उद्दालक; मा अभि = मेरे प्रति; शान्तसंकल्पः = शान्त संकल्पवाले; सुमनाः = प्रसन्नचित्त (और); वीतमन्युः = क्रोध एव खेदसे रहित; स्यात् = हो जायं (तथा);
कल्याण नचिकेताको मृत्युके अर्पण करना और नचिकेता
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- कठोपनिषद् * १८९ त्वत्प्रसृष्टम्=आपके द्वारा वापस भेजा जानेपर जब मैं उनके पास जाऊँ तो; मा प्रतीतः=वे मुझपर विश्वास करके (यह वही मेरा पुत्र नचिकेता है, ऐसा भाव रखकर), अभिवदेत्=मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करें; एतत्=यह; त्रयाणाम्= अपने तीनों वरोंमेंसे प्रथमम् वरम्=पहला वर, वृणे=मैं माँगता हूँ ॥ १० ॥ व्याख्या-मृत्युदेव ! तीन वरोंमेंसे मैं प्रथम वर यही माँगता हूँ कि मेरे गौतमवंशीय पिता उद्दालक, जो क्रोधके आवेगमें मुझे आपके पास भेजकर अब अशान्त और दुखी हो रहे हैं, मेरे प्रति क्रोधरहित, शान्तचित्त और सर्वथा सन्तुष्ट हो जायें । और आपके द्वारा अनुमति पाकर जब मैं घर जाऊँ, तब वे मुझे अपने पुत्र नचिकेताके रूपमें पहचानकर मेरे साथ पूर्ववत् बड़े स्नेहसे बातचीत करें ॥ १० ॥ सम्बन्ध-यमराजने कहा- यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । सुखँ रात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥ त्वाम्=तुमको; मृत्युमुखात्=मृत्युके मुखसे, प्रमुक्तम्=छूटा हुआ, ददृशिवान्=देखकर, मत्प्रसृष्टः=मुझसे प्रेरित, आरुणिः=(तुम्हारे पिता) अरुण-पुत्र, औद्दालकिः=उद्दालक, यथा पुरस्तात्=पहलेकी भाँति ही; प्रतीतः=यह मेरा पुत्र नचिकेता ही है, ऐसा विश्वास करके, वीतमन्युः=दुःख और क्रोधसे रहित, भविता=हो जायेंगे; रात्रीः=(और वे अपनी आयुकी शेष) रात्रियोंमें, सुखम्=सुखपूर्वक, शयिता=शयन करेंगे ॥ ११ ॥ व्याख्या-तुमको मृत्युके मुखसे छूटकर घर लौटा हुआ देखकर मेरी प्रेरणासे तुम्हारे पिता अरुणपुत्र उद्दालक बड़े प्रसन्न होंगे, तुमको अपने पुत्ररूपमें पहचानकर तुमसे पूर्ववत् प्रेम करेंगे, तथा उनका दुःख और क्रोध सर्वथा शान्त हो जायगा । तुम्हें पाकर अब वे जीवनभर सुखकी नींद सोयेंगे ॥ ११ ॥ सम्बन्ध-इस वरदानको पाकर नचिकेता बोला, हे यमराज !- स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥ स्वर्गे लोके=स्वर्गलोकमें, किंचन भयम्=किंचिन्मात्र भी भय; न अस्ति=नहीं है, तत्र त्वम् न=वहाँ मृत्युरूप स्वय आप भी नहीं हैं, जरया न बिभेति=वहाँ कोई बुढ़ापेसे भी भय नहीं करता, स्वर्गलोके=स्वर्गलोकके निवासी; अशनायापिपासे=भूख और प्यास, उभे तीर्त्वा=इन दोनोंसे पार होकर, शोकातिगः=दुःखोंसे दूर रहकर, मोदते= आनन्द भोगते हैं ॥ १२ ॥ स त्वमग्निँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वँ श्रद्धानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥ मृत्यो=हे मृत्युदेव, सः त्वम्=वे आप, स्वर्ग्यम् अग्निम्=उपर्युक्त स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको; अध्येषि= जानते हैं (अतः), त्वम्=आप, मह्यम्=मुझ, श्रद्धानाय=श्रद्धालुको (वह अग्निविद्या), प्रब्रूहि=भलीभाँति समझा- कर कहिये, स्वर्गलोकाः=स्वर्गलोकके निवासी, अमृतत्वम्=अमरत्वको, भजन्ते=प्राप्त होते हैं (इसलिये), एतत्=यह (मैं); द्वितीयेन वरेण=दूसरे वरके रूपमे, वृणे=माँगता हूँ ॥ १३ ॥ व्याख्या-मैं जानता हूँ कि स्वर्गलोक बड़ा सुखकर है, वहाँ किसी प्रकारका भी भय नहीं है । स्वर्गमे न तो कोई वृद्धावस्थाको प्राप्त होता है और न, जैसे मर्त्यलोकमे आप (मृत्यु) के द्वारा लोग मारे जाते हैं वैसे, कोई मारा ही जाता है । वहाँ मृत्युकालीन सङ्कट नहीं है। यहाँ जैसे प्रत्येक प्राणी भूख और प्यास दोनोंकी ज्वालासे जलते हैं, वैसे वहाँ नहीं जलना पड़ता । वहाँके निवासी शोकसे तरकर सदा आनन्द भोगते हैं। परन्तु वह स्वर्ग अग्निविज्ञानको जाने बिना नहीं मिलता । हे मृत्युदेव ! आप उस स्वर्गके साधनभूत अग्निको यथार्थरूपसे जानते हैं। मेरी उस अग्निविद्यामें और आपमे श्रद्धा है,
- १६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * श्रद्धावान् तत्त्वका अधिकारी होता है; अतः आप कृपया मुझको उस अग्निविद्याका उपदेश कीजिये, जिसे जानकर लोग स्वर्गलोकमे रहकर अमृतत्वको—देवत्वको प्राप्त होते हैं। यह मैं आपसे दूसरा वर माँगता हूँ ॥ १२-१३ ॥ सम्बन्ध—तब यमराज बोले— प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता, स्वर्ग्यम् अग्निम्=स्वर्गदायिनी अग्निविद्याको, प्रजानन्=अच्छी तरह जाननेवाला मैं, प्रब्रवीमि=तुम्हारे लिये उसे भलीभाँति बतलाता हूँ, तत् उ मे निबोध=(तुम) उसे मुझसे भलीभाँति समझ लो, त्वम् एतम्=तुम इस विद्याको; अनन्तलोकाप्तिमू=अविनाशी लोककी प्राप्ति करानेवाली, प्रतिष्ठाम्=उसकी आधारस्वरूपा; अथो=और, गुहायाम् निहितम्=बुद्धिरूप गुफामें छिपी हुई विद्धि=समझो ॥ १४ ॥ व्याख्या—नचिकेता ! मैं उस स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याको भलीभाँति जानता हूँ और तुमको यथार्थरूपसे बतलाता हूँ। तुम इसको अच्छी तरहसे सुनो। यह अग्निविद्या अनन्त—विनाशरहित लोककी प्राप्ति करानेवाली है और उसकी आधारस्वरूपा है। पर तुम ऐसा समझो कि यह है अत्यन्त गुप्त। विद्वानोंकी हृदय-गुफामें छिपी रहती है ॥ १४ ॥ सम्बन्ध=इतना कहकर यमराजने— लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५ ॥ तम् लोकादिम्=उस स्वर्गलोककी कारणरूपा; अग्निम्=अग्निविद्याका, तस्मै उवाच=उस नचिकेताको उपदेश दिया; याः वा यावतीः=उसमे कुण्डनिर्माण आदिके लिये जो-जो और जितनी, इष्टकाः=ईंटें आदि आवश्यक होती हैं, वा यथा= तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है (वे सब बातें भी बतायीं), च सः अपि=तथा उस नचिकेताने भी, तत् यथोक्तम्=नेह जैसा सुना था, ठीक उसी प्रकार समझकर, प्रत्यवदत्=यमराजको पुनः सुना दिया, अथ=उसके बाद, मृत्युः अस्य तुष्टः=यमराज उसपर सन्तुष्ट होकर, पुनः एव आह=फिर बोले-॥ १५ ॥ व्याख्या—उपर्युक्त प्रकारसे अग्निविद्याकी महत्ता और गोपनीयता बतलाकर यमराजने स्वर्गलोककी कारणरूपा अग्निविद्याका रहस्य नचिकेताको समझाया। अग्निके लिये कुण्ड-निर्माणादिमे किस आकारकी, कैसी और कितनी ईंटें चाहिये एव अग्निका चयन किस प्रकार किया जाना चाहिये—यह सब भलीभाँति समझाया। तदनन्तर नचिकेताकी बुद्धि तथा स्मृतिकी परीक्षाके लिये यमराजने नचिकेतासे पूछा कि तुमने जो कुछ समझा हो, वह मुझे सुनाओ। तीक्ष्णबुद्धि नचिकेताने सुनकर जैसा यथार्थ समझा था, सब ज्यों-का-त्यों सुना दिया। यमराज उसकी विलक्षण स्मृति और प्रतिभाको देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और बोले—॥ १५ ॥ तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः । तवैव नाम्ना भवितायमग्निः सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६ ॥ प्रीयमाणः= (उसकी अलौकिक बुद्धि देखकर) प्रसन्न हुए, महात्मा =महात्मा यमराज, तम्=उस नचिकेतासे, अब्रवीत्=बोले, अद्य=अब मैं; तव=तुमको, इह=यहाँ; भूयः वरम्=पुनः यह (अतिरिक्त) वर, ददामि= देता हूँ कि, अयम् अग्निः=यह अग्निविद्या, तव एव नाम्ना=तुम्हारे ही नामसे; भविता=प्रसिद्ध होगी, च इमाम्=तथा इस, अनेकरूपाम् सृङ्काम्=अनेक रूपोंवाली रत्नोंकी मालाको भी; गृहाण=तुम स्वीकार करो ॥ १६ ॥ व्याख्या—महात्मा यमराजने प्रसन्न होकर नचिकेतासे कहा—तुम्हारी अप्रतिम योग्यता देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, इससे अब मैं तुम्हें एक वर और तुम्हारे बिना माँगे ही देता हूँ। वह यह कि यह अग्नि, जिसका मैने तुमको उपदेश किया है, तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी। और साथ ही, यह लो, मैं तुम्हें तुम्हारे देवत्वकी सिद्धिके लिये यह अनेक रूपोंवाली विविध यज्ञ विज्ञानरूपी रत्नोंकी माला देता हूँ। इसे स्वीकार करो ॥ १६ ॥
ॐ कठोपनिषद् * १९१ सम्बन्ध-उस अग्निविद्याका फल बतलाते हुए यमराज कहते हैं- त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य संधिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू । ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमा२ शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥ त्रिणाचिकेतः=इस अग्निका ( शास्त्रोक्त रीतिसे ) तीन बार अनुष्ठान करनेवाला, त्रिभिः सन्धिम् एत्य= तीनों ( ऋक्, साम, यजुर्वेद ) के साथ सम्बन्ध जोडकर, त्रिकर्मकृत्=यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको निष्कामभावसे करता रहनेवाला मनुष्य; जन्ममृत्यू तरति=जन्म-मृत्युसे तर जाता है, ब्रह्मजज्ञम् =( वह ) ब्रह्मासे उत्पन्न सृष्टिके जाननेवाले; ईड्यम् देवम्=स्तवनीय इस अग्निदेवको, विदित्वा=जानकर तथा; निचाय्य=इसका निष्कामभावसे चयन करके; इमाम् अत्यन्तम् शान्तिम् एति=इस अनन्त शान्तिको पा जाता है ( जो मुझको प्राप्त है ) ॥ १७ ॥ व्याख्या-इस अग्निका तीन बार अनुष्ठान करनेवाला पुरुष ऋक्, यजु', साम-तीनों वेदोंसे सम्बन्ध जोड़कर, तीनों वेदोंके तत्त्व-रहस्यमे निष्णात होकर, निष्कामभावसे यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको करता हुआ जन्म-मृत्युसे तर जाता है । वह ब्रह्मासे उत्पन्न सृष्टिको जाननेवाले स्तवनीय इस अग्निदेवको भलीभाँति जानकर इसका निष्कामभावसे चयन करके उस अनन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है, जो मुझको प्राप्त है ॥ १७ ॥ त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८ ॥ एतत् त्रयम्=ईंटोंके स्वरूप, सख्या और अग्नि-चयन-विधि-इन तीनों बातोंको, विदित्वा=जानकर; त्रिणाचिकेतः= तीन बार नाचिकेत-अग्निविद्याका अनुष्ठान करनेवाला तथा, यः एवम्=जो कोई भी इस प्रकार, विद्वान्=जाननेवाला पुरुष; नाचिकेतम्=इस नाचिकेत-अग्निका, चिनुते=चयन करता है, सः मृत्युपाशान्=वह मृत्युके पाशको, पुरतः प्रणोद्य= अपने सामने ही ( मनुष्य-शरीरमे ही ) काटकर, शोकातिगः=शोकसे पार होकर, स्वर्गलोके मोदते=स्वर्गलोकमे आनन्द- का अनुभव करता है ॥ १८ ॥ व्याख्या-किस आकारकी कैसी ईंटें हों और कितनी सख्यामें हों एव किस प्रकारसे अग्निका चयन किया जाय-इन तीनों बातोंको जानकर जो विद्वान् तीन बार नाचिकेत अग्निविद्याका निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है-अग्निका चयन करता है, वह देहपातसे पहले ही ( जन्म-) मृत्युके पाशको तोड़कर शोकरहित होकर अन्तमें स्वर्गलोकके ( अविनाशी ऊर्ध्वलोकके ) आनन्दका अनुभव करता है ॥ १८ ॥ एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता; एषः ते=यह तुम्हें बतलायी हुई, स्वर्ग्यः अग्निः=स्वर्ग प्रदान करनेवाली अग्निविद्या है, यम् द्वितीयेन वरेण अवृणीथाः=जिसको तुमने दूसरे वरसे माँगा था, एतम् अग्निम्=इस अग्निको ( अबसे ), जनासः= लोग, तव एव=तुम्हारे ही नामसे, प्रवक्ष्यन्ति=कहा करेंगे, नचिकेतः=हे नचिकेता, तृतीयम् वरम् वृणीष्व= ( अबतुम ) तीसरा वर माँगो ॥ १९ ॥ व्याख्या-यमराज कहते हैं-नचिकेता ! तुम्हें यह उसी स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याका उपदेश दिया गया है, जिसके लिये तुमने दूसरे वरमें याचना की थी । अबसे लोग तुम्हारे ही नामसे इस अग्निको पुकारा करेंगे । नचिकेता ! अब तुम तीसरा वर माँगो ॥ १९ ॥ सम्बन्ध-नचिकेता तीसरा वर माँगता है- येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २० ॥
१९२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * प्रेते मनुष्ये=मरे हुए मनुष्यके विषयमें; या इयम्=जो यह, विचिकित्सा=संशय है, एके (आहुः) अयम् अस्ति इति=कोई तो ऐसा कहते हैं कि मरनेके बाद यह आत्मा रहता है, च एके (आहुः) न अस्ति इति=और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता, त्वया अनुशिष्टः=आपके द्वारा उपदेश पाया हुआ, अहम् एतत् विद्याम्=मैं इसका निर्णय भलीभाँति समझ लूँ; एषः वराणाम्=यही तीनों वरोंमेंसे, तृतीयः वरः=तीसरा वर है ॥ २० ॥ व्याख्या-इस लोकके कल्याणके लिये पिताकी सन्तुष्टिका वर और परलोकके लिये स्वर्गके साधनरूप अग्निविज्ञानका वर प्राप्त करके अब नचिकेता आत्माके यथार्थ स्वरूप और उसकी प्राप्तिका उपाय जाननेके लिये यमराजके सामने दूसरे लोगोंके दो मत उपस्थित करके उसपर उनका अनुभूत विचार सुनना चाहता है। इसलिये नचिकेता कहता है कि भगवन् ! मृत मनुष्यके सम्बन्धमे यह एक बड़ा सन्देह फैला हुआ है। कुछ लोग तो कहते हैं कि मृत्युके बाद भी आत्माका अस्तित्व रहता है और कुछ लोग कहते हैं, नहीं रहता। इस विषयमें आपका जो अनुभव हो, वह मुझे बतलाइये ।* आप मुझे अपना अनुभूत विचार बतलायेंगे, तभी मैं इस रहस्यको भलीभाँति समझ पाऊँगा। बस, तीनो वरोंमेंमे यही मेरा अभीष्ट तीसरा वर है ॥२०॥ सम्बन्ध-नचिकेताका महत्त्वपूर्ण प्रश्न सुनकर यमराजने मन-ही-मन उसकी प्रशंसा की। सोचा कि ऋषिकुमार बालक होनेपर भी बड़ा प्रतिभाशाली है, कैसे गोपनीय विषयको जानना चाहता है, परंतु आत्मतत्त्व उपयुक्त अधिकारीको ही बतलाना चाहिये। अनधिकारीके प्रति आत्मतत्त्वका उपदेश करना हानिकर होता है, अतएव पहले पात्र-परीक्षाकी आवश्यकता है। यों विचारकर यमराजने इस तत्त्वका कठिनताका वर्णन करके नचिकेताको टालना चाहा और कहा- देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः। अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता !, अत्र पुरा=इस विषयमें पहले, देवैः अपि=देवताओंने भी, विचिकित्सितम्=संदेह किया था (परन्तु उनकी भी समझमे नहीं आया), हि एषः धर्मः अणुः न सुविज्ञेयम्=क्योंकि यह विषय बड़ा सूक्ष्म है, सहज ही समझमे आनेवाला नहीं है (इसलिये), अन्यम् वरम् वृणीष्व=तुम दूसरा वर माँग लो, मा मा उपरोत्सीः= मुझपर दबाव मत डालो, एनम् मा=इस आत्मज्ञानसम्बन्धी वरको मुझे, अतिसृज=लौटा दो ॥ २१ ॥ व्याख्या-नचिकेता ! यह आत्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म विषय है। इसका समझना सहज नहीं है। पहले देवताओंको भी इस विषयमें सन्देह हुआ था। उनमे भी बहुत विचार-विनिमय हुआ था; परन्तु वे भी इसको जान नहीं पाये। अतएव तुम दूसरा वर माँग लो। मैं तुम्हें तीन वर देनेका वचन दे चुका हूँ, अतएव तुम्हारा ऋणी हूँ, पर तुम इस वरके लिये, जैसे महाजन ऋणीको दबाता है वैसे, मुझको मत दबाओ। इस आत्मतत्त्वविषयक वरको मुझे लौटा दो। इसके लिये मुझे छोड़ दो ॥ २१ ॥ सम्बन्ध-नचिकेता आत्मतत्त्वकी कठिनताका नाम सुनकर तनिक भी घबराया नहीं, न उसका उत्साह ही मन्द हुआ, वर उसने और भी दृढताके साथ कहा- देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२ ॥
- मृत्युके पश्चात् आत्माका अस्तित्व रहता है या नही, इस सम्बन्धमें नचिकेताको स्वयं कोई सन्देह नहीं है। पिताको दक्षिणामें जराजीर्ण गौएँ देते देखकर नचिकेताने स्पष्ट कहा था कि ऐसी गौओंका दान करनेवाले आनन्दरहित (अनन्दा) नरकादि लोकोंको प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार दूसरे वरमें नचिकेताने स्वर्गसुखोंका वरण करके स्वर्गप्राप्तिके साधनरूप अग्निविद्याके उपदेशकी प्रार्थना की थी। इससे सिद्ध है कि वह स्वयं और नरकमें विश्वास करता था। स्वर्ग-नरकादि लोकोंकी प्राप्ति मरनेके पश्चात् ही होती है। आत्माका अस्तित्व न हो तो ये लोक किसको प्राप्त हों। यहाँ इसलिये नचिकेताने अपना मत न बताकर कहा है कि कुछ लोग मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व मानते हैं और कुछ लोग नहीं मानते। यह प्रश्नका एक ऐसा सुन्दर प्रकार है कि जिसके उत्तरमें आत्माकी नित्य सत्ता, उसके स्वरूप, गुण और परमलक्ष्य परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंका विवरण अपने-आप ही आ जाता है। अत यह प्रश्न आत्मज्ञान- विषयक है, न कि आत्माके अस्तित्वमें सन्देहविषयक। तैत्तिरीय ब्राह्मणमें नचिकेताका जो इतिहास मिलता है, उसमें तो नचिकेताने तीसरे वरमें पुनर्मृत्यु (जन्म-मृत्यु) पर विजय पानेका-मुक्तिका साधन जानना चाहा है (तृतीयं वृणीष्वेति । पुनर्मृत्योर्मेऽपचितिं ब्रूहि )।
- कठोपनिषद् * १९३ मृत्यो=हे यमराज; त्वम् यत् आत्थ=आपने जो यह कहा कि, अत्र किल देवैः अपि=इस विषयपर देवताओंने भी; विचिकित्सितम्=विचार किया था (परंतु वे निर्णय नहीं कर पाये), च न सुविज्ञेयम्=और यह सुविज्ञेय भी नहीं है, च त्वादृक्=इसके सिवा आपके-जैसा; अस्य वक्ता=इस विषयका कहनेवाला भी, अन्यः न लभ्यः=दूसरा नहीं मिल सकता; [ अतः=इसलिये मेरी समझमें तो, ] एतस्य तुल्यः=इसके समान, अन्यः कश्चित्=दूसरा कोई भी; वरः न=वर नहीं है ॥२२॥ व्याख्या-हे मृत्यो ! पूर्वकालमें देवताओंने भी जब इस विषयपर विचार-विनिमय किया था तथा वे भी इसे जान नहीं पाये थे और आप भी कहते हैं कि यह विषय सहज नहीं है, बड़ा ही सूक्ष्म है, तब यह तो सिद्ध ही है कि यह बड़े ही महत्त्वका विषय है और ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयको समझानेवाला आपके समान अनुभवी वक्ता मुझे ढूँढनेपर भी कोई नहीं मिल सकता । आप कहते हैं, इसे छोड़कर दूसरा वर माँग लो । परन्तु मैं तो समझता हूँ कि इसकी तुलनाका दूसरा कोई वर है ही नहीं । अतएव कृपापूर्वक मुझे इसीका उपदेश कीजिये ॥ २२ ॥ सम्बन्ध-विषयकी कठिनतासे नचिकेता नहीं घबराया, वह अपने निश्चयपर ज्यों-का-त्यों दृढ़ रहा । इस एक परीक्षामें वह उत्तीर्ण हो गया । अब यमराजने दूसरी परीक्षाके रूपमें उसके सामने विभिन्न प्रकारके प्रलोभन रखनेकी बात सोचकर उससे कहते हैं- शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् । भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३ ॥ शतायुषः=सैकड़ों वर्षोंकी आयुवाले, पुत्रपौत्रान्=बेटे और पोतोंको ( तथा ); बहून् पशून्=बहुत-से गौ आदि पशुओंको ( एव ), हस्तिहिरण्यम्=हाथी, सुवर्ण और, अश्वान् वृणीष्व=घोड़ोंको माँग लो, भूमेः महत् आयतनम्= भूमिके बड़े विस्तारवाले मण्डल ( साम्राज्य ) को, वृणीष्व=माँग लो, स्वयं च=तुम स्वयं भी, यावत् शरदः=जितने वर्षोंतक, इच्छसि=चाहो, जीव=जीते रहो ॥ २३ ॥ व्याख्या-नचिकेता ! तुम बड़े भोले हो । क्या करोगे इस वरको लेकर । तुम ग्रहण करो इन सुखकी विशाल सामग्रियोंको । इस सौ-सौ वर्ष जीनेवाले पुत्र-पौत्रादि बड़े परिवारको माँग लो । गौ आदि बहुत से उपयोगी पशु, हाथी, सुवर्ण, घोड़े और विशाल भूमण्डलके महान् साम्राज्यको माँग लो और इन सबको भोगनेके लिये जितने वर्षोंतक जीनेकी इच्छा हो, उतने ही वर्षोंतक जीते रहो ॥ २३ ॥ एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥ नचिकेता=हे नचिकेता, वित्तम् चिरजीविकाम्=धन, सम्पत्ति और अनन्त कालतक जीनेके साधनोंको; यदि त्वम्=यदि तुम, एतत्तुल्यम्=इस आत्मज्ञानविषयक वरदानके समान, वरम् मन्यसे वृणीष्व=वर मानते हो तो माँग लो, च महाभूमौ=और तुम इस पृथिवीलोकमें, एधि=बड़े भारी सम्राट् बन जाओ, त्वा कामानाम्=( मैं ) तुम्हें सम्पूर्ण भोगोंमेंसे, कामभाजम्=अति उत्तम भोगोंका पात्र, करोमि=बना देता हूँ ॥ २४ ॥ व्याख्या-'नचिकेता ! यदि तुम प्रचुर धन-सम्पत्ति, दीर्घजीवनके लिये उपयोगी सुख-सामग्रियों अथवा और भी जितने भोग मनुष्य भोग सकता है, उन सबको मिलाकर उस आत्मतत्त्व-विषयक वरके समान समझते हो तो इन सबको माँग लो । तुम इस विशाल भूमिके सम्राट् बन जाओ । मैं तुम्हें समस्त भोगोंको इच्छानुसार भोगनेवाला बनाये देता हूँ ।' इस प्रकार यहाँ यमराजने वाक्चातुर्यसे आत्मतत्त्वका महत्त्व बढ़ाते हुए नचिकेताको विशाल भोगोंका प्रलोभन दिया ॥ २४ ॥ सम्बन्ध-इतनेपर भी नचिकेता अपने निश्चयपर अटल रहा, तब स्वर्गके दैवी भोगोंका प्रलोभन देते हुए यमराजने कहा- ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामाँ२श्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ २५ ॥
१९४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ये ये कामाः=जो-जो भोग; मर्त्यलोके=मनुष्यलोकमे, दुर्लभाः=दुर्लभ हैं, सर्वान् कामान्=उन सम्पूर्ण भोगोंको, छन्दतः प्रार्थयस्व=इच्छानुसार माँग लो, सरथाः सतूर्याः इमाः रामाः=रथ और नाना प्रकारके बाजोंके सहित इन स्वर्गकी अप्सराओंको ( अपने साथ ले जाओ ), मनुष्यैः ईदृशाः=मनुष्योंको ऐसी स्त्रियाँ, न हि लम्भनीयाः=अलभ्य हैं; मत्प्रत्ताभिः=मेरे द्वारा दी हुई, आभिः=इन स्त्रियोंसे; परिचारयस्व=तुम अपनी सेवा कराओ; नचिकेताः=हे नचिकेता; मरणम्=मरनेके बाद आत्माका क्या होता है, मा अनुप्राक्षीः=इस बातको मत पूछो ! ॥ २५ ॥ व्याख्या-नचिकेता ! जो-जो भोग मृत्युलोकमें दुर्लभ हैं, उन सबको तुम अपने इच्छानुसार माँग लो । ये रथों और विविध प्रकारके वाद्योंसहित जो स्वर्गकी सुन्दरी रमणियाँ हैं, ऐसी रमणियाँ मनुष्योंमें कहीं नहीं मिल सकतीं । बड़े- बड़े ऋषि मुनि इनके लिये ललचाते रहते हैं । मैं इन सबको तुम्हें सहज ही दे रहा हूँ । तुम इन्हें ले जाओ और इनसे अपनी सेवा कराओ, परन्तु नचिकेता ! आत्मतत्त्व-विषयक प्रश्न मत पूछो ॥ २५ ॥ सम्बन्ध-यमराज शिष्यपर स्वाभाविक ही दया करनेवाले महान् अनुभवी आचार्य ह । इन्होंने अधिकारी-परीक्षाके साथ ही इस प्रकार भय और एकके बाद एक उत्तम भोगोंका प्रलोभन दिखाकर, जैसे खम्भेको हिला-हिलाकर दृढ़ किया जाता है वैसे ही नचिकेताके वैराग्यसम्पन्न निश्चयको और भी दृढ़ किया ! पहले कठिनताका भय दिखाया, फिर इस लोकके एक-से-एक बढ़कर भोगोंके चित्र उसके सामने रक्खे और अन्तमें स्वर्गलोकमें भी उसका वैराग्य करा देनेके लिये स्वर्गके दैवी भोगोंका चित्र उपस्थित किया और कहा कि इनको यदि तुम अपने उस आत्मतत्त्वसम्बन्धी वरके समान समझते हो तो इन्हें माँग लो । परंतु नचिकेता तो दृढ़निश्चयी और सच्चा अधिकारी था । वह जानता था कि इस लोक और परलोकके बड़े-से-बड़े भोग-सुखोंकी आत्मज्ञानके सुखके किसी क्षुद्रतम अंशके साथ भी तुलना नहीं की जा सकती । अतएव उसने अपने निश्चयका युक्तिपूर्वक समर्थन करते हुए पूर्ण वैराग्ययुक्त वचनोंमें यमराजसे कहा- श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥ अन्तक=हे यमराज ( जिन भोगोंका आपने वर्णन किया वे ), श्वोभावा=क्षणभङ्गुर भोग ( और उनसे प्राप्त होने- वाले सुख ), मर्त्यस्य=मनुष्यके, सर्वेन्द्रियाणाम्=अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंका; यत् तेजः=जो तेज है; एतत्= उसको, जरयन्ति=क्षीण कर डालते हैं, अपि सर्वम्=( इसके सिवा ) समस्त, जीवितम्=आयु, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अल्पम् एव=अल्प ही है, इसलिये, तव वाहाः=ये आपके रथ आदि वाहन ओर, नृत्यगीते=ये अप्सराओंके नाच-गान, तव एव=आपके ही पास रहें ( मुझे नहीं चाहिये ) ॥ २६ ॥ व्याख्या-हे सबका अन्त करनेवाले यमराज ! आपने जिन भोग्य वस्तुओंकी महिमाके पुल बाँधे हैं, ये सभी क्षणभङ्गुर हैं । कलतक रहेंगी या नहीं, इसमें भी सन्देह है । इनके संयोगसे प्राप्त होनेवाला सुख वास्तवमें सुख ही नहीं है, वह तो दुःख ही है ( गीता ५ । २२ ) । ये भोग्यवस्तुएँ कोई लाभ तो देती ही नहीं, वर मनुष्यकी इन्द्रियोंके तेज और धर्मको हरण कर लेती हैं । आपने जो दीर्घजीवन देना चाहा है, वह भी अनन्तकालकी तुलनामें अत्यन्त अल्प ही है । जब ब्रह्मा आदि देवताओंका जीवन भी अल्पकालका है-एक दिन उन्हें भी मरना पड़ता है, तब औरोंकी तो बात ही क्या है ? अतएव मैं यह सब नहीं चाहता । ये आपके रथ, हाथी, घोड़े, ये रमणियाँ और इनके नाच-गान आप अपने ही पास रक्खें ॥ २६ ॥ न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥ मनुष्यः=मनुष्य, वित्तेन=धनसे, तर्पणीयः न=कभी भी तृप्त किये जाने योग्य नहीं है, चेत्=जब कि ( हमने ); त्वां अद्राक्ष्म=आपके दर्शन पा लिये हैं, (तब), वित्तम्=धनको, लप्स्यामहे=(तो हम) पा ही लेंगे; (और)त्वम् यावत्= आप जबतक; ईशिष्यसि=शासन करते रहेंगे, तबतक तो, जीविष्यामः=हम जीते ही रहेंगे ( इन सबको भी क्या माँगना है, अतः ); मे वरणीयः वरः तु= मेरे माँगने लायक वर तो; सः एव=वह ( आत्मज्ञान ) ही है ॥ २७ ॥
- कठोपनिषद् * १९५ व्याख्या-आप जानते ही हैं, धनसे मनुष्य कभी तृप्त नहीं हो सकता । आगमें घी-ईंधन डालनेसे जैसे आग जोरोंसे भड़कती है, उसी प्रकार धन और भोगोंकी प्राप्तिसे भोग-कामनाका और भी विस्तार होता है। वहाँ तृप्ति कैसी ? वहाँ तो दिन-रात अपूर्णता और अभावकी अग्निमें ही जलना पड़ता है । ऐसे दुःखमय धन और भोगोंको कोई भी बुद्धिमान् पुरुष नहीं माँग सकता । मुझे अपने जीवननिर्वाहके लिये जितने धनकी आवश्यकता होगी, उतना तो आपके दर्शनसे ही प्राप्त हो जायगा । रही दीर्घजीवनकी बात, सो जबतक मृत्युके पदपर आपका शासन है, तबतक मुझे मरनेका भी भय क्यों होने लगा । अतएव किसी भी दृष्टिसे दूसरा वर माँगना उचित नहीं मालूम होता । इसलिये मेरा प्रार्थनीय तो वह आत्मतत्त्व-विषयक वर ही है । मैं उसे लौटा नहीं सकता ॥ २७ ॥ सम्बन्ध-इस प्रकार भोगोंकी तुच्छताका वर्णन करके अब नचिकेता अपने वरका महत्त्व बतलाता हुआ उसीको प्रदान करनेके लिये दृढतापूर्वक निवेदन करता है- अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥ जीर्यन् मर्त्यः = यह मनुष्य जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है, प्रजानन् = इस तत्त्वको भलीभाँति समझनेवाला, क्वधःस्थः = मनुष्यलोकका निवासी, कः = कौन ( ऐसा ) मनुष्य है ( जो कि ), अजीर्यताम् = बुढ़ापेसे रहित, अमृतानाम् = न मरनेवाले ( आप-सदृश ) महात्माओंका, उपेत्य = सङ्ग पाकर भी, वर्णरतिप्रमोदान् = ( स्त्रियोंके ) सौन्दर्य, क्रीड़ा और आमोद-प्रमोदका, अभिध्यायन् = बार-बार चिन्तन करता हुआ, अतिदीर्घे = बहुत कालतक, जीविते = जीवित रहनेमें, रमेत = प्रेम करेगा ॥ २८ ॥ व्याख्या-हे यमराज ! आप ही बताइये, भला आप-सरीखे अजर-अमर महात्मा देवताओंका दुर्लभ एवं अमोघ सङ्ग प्राप्त करके मृत्युलोकका जरामरणशील ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य होगा जो स्त्रियोंके सौन्दर्य, क्रीड़ा और आमोद-प्रमोदमें आसक्त होकर उनकी ओर दृष्टिपात करेगा और इस लोकमें दीर्घकालतक जीवित रहनेमें आनन्द मानेगा ? ॥ २८ ॥ यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥ मृत्यो = हे यमराज, यस्मिन् = जिस, महति साम्पराये = महान् आश्चर्यमय परलोकसम्बन्धी आत्मज्ञानके विषयमें; इदम् विचिकित्सन्ति = ( लोग ) यह शङ्का करते हैं कि यह आत्मा मरनेके बाद रहता है या नहीं, ( तत्र ) यत् = उसमें जो निर्णय है, तत् नः ब्रूहि = वह आप हमें बतलाइये, यः अयम् = जो यह, गूढम् अनुप्रविष्टः वरः = अत्यन्त गम्भीरताको प्राप्त हुआ वर है, तस्मात् = इससे, अन्यम् = दूसरा वर, नचिकेताः = नचिकेता, न वृणीते = नहीं माँगता ॥ २९ ॥ व्याख्या-नचिकेता कहता है-हे यमराज ! जिस आत्मतत्त्व-सम्बन्धी महान् ज्ञानके विषयमें लोग यह शङ्का करते हैं कि मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व रहता है या नहीं, उसके सम्बन्धमें निर्णयात्मक जो आपका अनुभूत ज्ञान हो, मुझे कृपापूर्वक उसीका उपदेश कीजिये। यह आत्मतत्त्वसम्बन्धी वर अत्यन्त गूढ है-यह सत्य है, पर आपका शिष्य यह नचिकेता इसके अतिरिक्त दूसरा कोई वर नहीं चाहता ! ॥ २९ ॥ ॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥ ❖ द्वितीय वल्ली सम्बन्ध-इस प्रकार परीक्षा करके जब यमराजने समझ लिया कि नचिकेता दृढ़निश्चयी, परम वैराग्यवान् एव निर्भीक है, अतः ब्रह्मविद्याका उत्तम अधिकारी है, तब ब्रह्मविद्याका उपदेश आरम्भ करनेके पहले उसका महत्त्व प्रकट करते हुए यमराज बोले- अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः । तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ श्रेयः = कल्याणका साधन; अन्यत् = अलग है, उत = और, प्रेयः = प्रिय लगनेवाले भोगोंका साधन- अन्यत् एव =
१९६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अलग ही है, ते=वे, नानार्थे=भिन्न भिन्न फल देनेवाले; उभे=दोनों साधन; पुरुषम्=मनुष्यको, सिनीतः=बाँधते हैं— अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं, तयोः=उन दोनोंमेंसे, श्रेयः=कल्याणके साधनको, आददानस्य=ग्रहण करनेवालेका; साधु भवति=कल्याण होता है, उ यः=परन्तु जो, प्रेयः वृणीते=सांसारिक उन्नतिके साधनको स्वीकार करता है, [ सः=वह, ] अर्थात्=यथार्थ लाभसे, हीयते=भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ व्याख्या—मनुष्य-शरीर अन्यान्य योनियोंकी भाँति केवल कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही नहीं मिला है। इसमें मनुष्य भविष्यमे सुख देनेवाले साधनका अनुष्ठान भी कर सकता है। वेदोंमें सुखके साधन दो बताये गये हैं—(१) श्रेय अर्थात् सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर नित्य आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका उपाय और (२) प्रेय अर्थात् स्त्री, पुत्र, धन, मकान, सम्मान, यश आदि इस लोककी और स्वर्गलोककी जितनी भी प्राकृत सुख- भोगकी सामग्रियाँ हैं, उनकी प्राप्तिका उपाय। इस प्रकार अपने अपने ढंगसे मनुष्यको सुख पहुँचा सकनेवाले ये दोनो साधन मनुष्यको बाँधते हैं—उसे अपनी अपनी ओर खींचते हैं। अधिकांश लोग तो 'भोगोंमे प्रत्यक्ष और तत्काल सुख मिलता है' इस प्रतीतिके कारण उसका परिणाम सोचे-समझे बिना ही प्रेयकी ओर खिंच जाते ह। परन्तु कोई-कोई भाग्यवान् मनुष्य भगवान्की दयासे प्राकृत भोगोंकी आपातरमणीयता एव परिणामदुःखताका रहस्य जानकर उनकी ओरसे विरक्त हो श्रेयकी ओर आकर्षित हो जाता है। इन दोनो प्रकारके मनुष्योंमेसे जो भगवान्की कृपाका पात्र होकर श्रेयको अपना लेता है और तत्परताके साथ उसके साधनमें लग जाता है, उसका तो सब प्रकारसे कल्याण हो जाता है। वह सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर अनन्त असीम आनन्दस्वरूप परमात्माको पा लेता है। परन्तु जो सांसारिक सुखके साधनोंमे लग जाता है, वह अपने मानव जीवनके परम लक्ष्य परमात्माकी प्राप्तिरूप यथार्थ प्रयोजनको सिद्ध नहीं कर पाता, इसलिये उसे आत्यन्तिक और नित्य सुख नहीं मिलता। उसे तो भ्रमवश सुखरूप प्रतीत होनेवाले वे अनित्य भोग मिलते हैं, जो वास्तवमे दुःखरूप ही हैं। अतः वह वास्तविक सुखसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥ २॥ श्रेयः च प्रेयः च=श्रेय और प्रेय—ये दोनो ही, मनुष्यम् एतः=मनुष्यके सामने आते हैं, धीरः=बुद्धिमान् मनुष्य, तौ=उन दोनोंके स्वरूपपर, सम्परीत्य=भलीभाँति विचार करके, विविनक्ति=उनको पृथक्-पृथक् समझ लेता है, (और) धीरः=वह श्रेष्ठबुद्धि मनुष्य, श्रेयः हि=परम कल्याणके साधनको ही, प्रेयसः=भोग-साधनकी अपेक्षा, अभिवृणीते=श्रेष्ठ समझकर ग्रहण करता है (परन्तु), मन्दः=मन्दबुद्धिवाला मनुष्य, योगक्षेमात्=लौकिक योगक्षेमकी इच्छासे, प्रेयः वृणीते=भोगोंके साधनरूप प्रेयको अपनाता है ॥ २ ॥ व्याख्या—अधिकांश मनुष्य तो पुनर्जन्ममें विश्वास न होनेके कारण इस विषयमे विचार ही नहीं करते, वे भोगोंमे आसक्त होकर अपने देवदुर्लभ मनुष्य-जीवनको पशुवत् भोगोंके भोगनेमें ही समाप्त कर देते हैं। किंतु जिनका पुनर्जन्ममे और परलोकमे विश्वास है, उन विचारशील मनुष्योंके सामने जब ये श्रेय और प्रेय दोनो आते हे, तब वे इन दोनोंके गुण- दोषोंपर विचार करके दोनोंको पृथक्-पृथक् समझनेकी चेष्टा करते है। इनमे जो श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न होता है, वह तो दोनोंके तत्त्वको पूर्णतया समझकर नीर-क्षीर-विवेकी इस की तरह प्रेयकी उपेक्षा करके श्रेयको ही ग्रहण करता है। परंतु जो मनुष्य अल्पबुद्धि है, जिसकी बुद्धिमें विवेकशक्तिका अभाव है, वह श्रेयके फलमें अविश्वास करके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले लौकिक योगक्षेमकी सिद्धिके लिये प्रेयको अपनाता है, वह इतना ही समझता है कि जो कुछ भोगपदार्थ प्राप्त हैं, वे सुरक्षित बने रहें और जो अप्राप्त है, वे प्रचुर मात्रामे मिल जायँ। यही योगक्षेम है ॥ २ ॥ सम्बन्ध—परमात्माकी प्राप्तिके साधनरूप श्रेयकी प्रशंसा करके अब यमराज साधारण मनुष्यसे नचिकेताकी विशेषता दिखलाते हुए उसके वैराग्यकी प्रशंसा करते हैं— स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥