भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 832 में से

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पृष्ठ 207
  • कठोपनिषद् * १८७ पिताजीने ऐसा क्यों कहा ! ), यमस्य = यमका, किम् स्वित् कर्तव्यम् = ऐसा कौन-सा कार्य हो सकता है, यत् अद्य = जिसे आज, मया = मेरेद्वारा ( मुझे देकर ); करिष्यति = ( पिताजी ) पूरा करेंगे ॥ ५ ॥ व्याख्या--शिष्यों और पुत्रोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं--उत्तम, मध्यम और अधम । जो गुरु या पिताका मनोरथ समझकर उनकी आज्ञाकी प्रतीक्षा किये बिना ही उनकी रुचिके अनुसार कार्य करने लगते हैं, वे उत्तम हैं। जो आज्ञा पानेपर कार्य करते हैं, वे मध्यम हैं और जो मनोरथ जान लेने और स्पष्ट आदेश सुन लेनेपर भी तदनुसार कार्य नहीं करते, वे अधम हैं । मै बहुत से शिष्योंमे तो प्रथम श्रेणीका हूँ, प्रथम श्रेणीके आचरणपर चलनेवाला हूँ, क्योंकि उनमे पहले ही मनोरथ समझकर कार्य कर देता हूँ बहुत-से शिष्योमे मध्यम श्रेणीका भी हूँ, मध्यम श्रेणीके आचारपर भी चलता आया हूँ, परतु अधम श्रेणीका तो हूँ ही नहीं। आज्ञा मिले और सेवा न करूँ, ऐसा तो मैने कभी किया ही नहीं। फिर, पता नही, पिताजीने मुझे ऐसा क्यों कहा ? मृत्युदेवताका भी ऐसा कौन-सा प्रयोजन है, जिसको पिताजी आज मुझे उनको देकर पूरा करना चाहते हैं ? ॥ ५ ॥ सम्बन्ध--सम्भव है, पिताजीने क्रोधके आवेशमें ही ऐसा कह दिया हो, परतु जो कुछ भी हो, पिताजीका वचन तो सत्य करना ही है। इधर ऐसा दीख रहा है कि पिताजी अब पश्चात्ताप कर रहे हैं, अतएव उन्हें सान्त्वना देना भी आवश्यक है। यह विचारकर नचिकेता एकान्तमें पिताके पास जाकर उनकी शोकनिवृत्तिके लिय इस प्रकार आश्वासनपूर्ण वचन बोला— अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६॥ पूर्वे = आपके पूर्वज पितामह आदि, यथा = जिस प्रकारका आचरण करते आये हैं; अनुपश्य = उसपर विचार कीजिये (और); अपरे = ( वर्तमानमे भी ) दूसरे श्रेष्ठ लोग, [ यथा = जैसा आचरण कर रहे हैं; ] तथा प्रतिपश्य = उसपर भी दृष्टिपात कर लीजिये ( फिर आप अपने कर्तव्यका निश्चय कीजिये ), मर्त्यः = ( यह ) मरणधर्मा मनुष्य, सस्यम् इव = अनाजकी तरह, पच्यते = पकता है अर्थात् जराजीर्ण होकर मर जाता है ( तथा ), सस्यम् इव = अनाजकी भाँति ही, पुनः = फिर; आजायते = उत्पन्न हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या-पिताजी ! अपने पितामहादि पूर्वजोंका आचरण देखिये और इस समयके दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंका आचरण देखिये। उनके चरित्रमे न कभी पहले असत्य था, न अब है। असाधु मनुष्य ही असत्यका आचरण किया करते हैं, परन्तु उस असत्यसे कोई अजर-अमर नहीं हो सकता । मनुष्य मरणधर्मा है। यह अनाजकी भाँति जरा-जीर्ण होकर मर जाता है और अनाजकी भाँति ही कर्मवश पुनः जन्म ले लेता है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध—अतएव इस अनित्य जीवनके लिये मनुष्यको कभी कर्तव्यका त्याग करके मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिये । आप शोकका त्याग कीजिये और अपने सत्यका पालन कर मुझे मृत्यु ( यमराज ) के पास जानेकी अनुमति दीजिये । पुत्रके वचन सुनकर उद्दालकको दुःख हुआ, परतु नचिकेताकी सत्यपरायणता देखकर उन्होंने उसे यमराजके पास भेज दिया । नचिकेताको यमसदन पहुँचनेपर पता लगा कि यमराज कहीं बाहर गये हुए हैं, अतएव नचिकेता तीन दिनोंतक अन्न-जल ग्रहण किय बिना ही यमराजकी प्रतीक्षा करता रहा। यमराजके लौटनेपर उनकी पत्नीने कहा— वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । तस्यैताᳪशान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७ ॥ वैवस्वत = हे सूर्यपुत्र; वैश्वानरः = स्वय अग्निदेवता ( ही ), ब्राह्मणः अतिथिः = ब्राह्मण अतिथिके रूपमे; गृहान् = ( गृहस्थके ) घरोंमें, प्रविशति = पधारते हैं; तस्य = उनकी; (साधुपुरुष ) एताम् = ऐसी ( अर्थात् अर्घ्य-पाद-आसन आदिके द्वारा ); शान्तिम् = शान्ति; कुर्वन्ति = किया करते हैं, ( अतः आप) उदकम् हर = ( उनके पाद-प्रक्षालनादिके लिये ) जल ले जाइये ॥ ७ ॥