कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 208, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१८८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-साक्षात् अग्नि ही मानो तेजसे प्रज्वलित होकर ब्राह्मण-अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरपर पधारते हैं । साधुहृदय गृहस्थ अपने कल्याणके लिये उस अतिथिरूप अग्निके दाहकी शान्तिके लिये उसे जल (पाद्य-अर्घ्य आदि) दिया करते हैं, अतएव हे सूर्यपुत्र ! आप उस ब्राह्मण-बालकके पैर धोनेके लिये तुरत जल ले जाइये । वह अतिथि लगातार तीन दिनोंसे आपकी प्रतीक्षामें अनशन किये बैठा है, आप स्वयं उसकी सेवा करेंगे, तभी वह शान्त होगा ॥ ७ ॥ आशाप्रतीक्षे सङ्गतँ सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूॅंश्च सर्वान् । एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥ यस्य = जिसके; गृहे = घरमें; ब्राह्मणः = ब्राह्मण अतिथि; अनश्नन् = बिना भोजन किये; वसति = निवास करता है; [तस्य = उस;] अल्पमेधसः = मन्दबुद्धि; पुरुषस्य = मनुष्यकी आशाप्रतीक्षे = नाना प्रकारकी आशा और प्रतीक्षा; सङ्गतम् = उनकी पूर्तिसे होनेवाले सब प्रकारके सुख; सूनृताम् च = सुन्दर भाषणके फल एव; इष्टापूर्ते च = यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मोंके और कुआँ, बगीचा, तालाब आदि निर्माण करानेके फल तथा; सर्वान् पुत्रपशून् = समस्त पुत्र और पशु; एतद् वृङ्क्ते = इन सबको (वह) नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥ व्याख्या-जिसके घरपर अतिथि ब्राह्मण भूखा बैठा रहता है, उस मन्दबुद्धि मनुष्यको न तो वे इच्छित पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेकी उसे पूरी आशा थी; न वे ही पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेका निश्चय था और वह बाट ही देख रहा था, कभी कोई पदार्थ मिल भी गया तो उससे सुखकी प्राप्ति नहीं होती । उसकी वाणीमेंसे सौन्दर्य, सत्य और माधुर्य निकल जाते हैं, अतः सुन्दर वाणीसे प्राप्त होनेवाला सुख भी उसे नहीं मिलता, उसके यज्ञ दानादि इष्ट कर्म और कूप, तालाब, धर्मशाला आदिके निर्माणरूप पूर्तकर्म एव उनके फल नष्ट हो जाते हैं । इतना ही नहीं, अतिथिका अपकार उसके पूर्वपुण्यसे प्राप्त पुत्र और पशु आदि धनको भी नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध-पत्नीके वचन सुनकर धर्ममूर्ति यमराज तुरत नचिकेताके पास गये और पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा विधिवत् उसकी पूजा करके कहने लगे- तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ९ ॥ ब्रह्मन् = हे ब्राह्मणदेवता; नमस्यः अतिथिः = आप नमस्कार करनेयोग्य अतिथि हैं; ते = आपको; नमः अस्तु = नमस्कार हो; ब्रह्मन् = हे ब्राह्मण; मे स्वस्ति = मेरा कल्याण; अस्तु = हो, यत् = आपने जो; तिस्रः = तीन रात्रीः = रात्रियोंतक; मे = मेरे; गृहे = घरपर; अनश्नन् = बिना भोजन किये; अवात्सीः = निवास किया है; तस्मात् = इसलिये (आप मुझसे); प्रति = प्रत्येक रात्रिके बदले (एक-एक करके); त्रीन् वरान् = तीन वरदान; वृणीष्व = माँग लीजिये ॥ ९ ॥ व्याख्या-'ब्राह्मणदेवता ! आप नमस्कारादि सत्कारके योग्य मेरे माननीय अतिथि हैं, कहाँ तो मुझे चाहिये था कि मैं आपका यथायोग्य पूजन-सेवन करके आपको सन्तुष्ट करता, और कहाँ मेरे प्रमादसे आप लगातार तीन रात्रियोंमे भूखे बैठे हैं। मुझसे यह बड़ा अपराध हो गया है। आपको नमस्कार है । भगवन् ! इस मेरे दोषकी निवृत्ति होकर मेरा कल्याण हो । आप प्रत्येक रात्रिके बदले एक एक करके मुझसे अपनी इच्छाके अनुरूप तीन वर माँग लीजिये' ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-तपोमूर्ति अतिथि ब्राह्मण-बालकके अनशनसे भयभीत होकर धर्मज्ञ यमराजने जब इस प्रकार कहा तब पिताको सुख पहुँचानेकी इच्छासे नचिकेता बोला- शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो । त्वत्प्रसृष्टं मामभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥ मृत्यो = हे मृत्युदेव; यथा = जिस प्रकार, गौतमः = (मेरे पिता) गौतमवंशीय उद्दालक; मा अभि = मेरे प्रति; शान्तसंकल्पः = शान्त संकल्पवाले; सुमनाः = प्रसन्नचित्त (और); वीतमन्युः = क्रोध एव खेदसे रहित; स्यात् = हो जायं (तथा);