कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१८८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-साक्षात् अग्नि ही मानो तेजसे प्रज्वलित होकर ब्राह्मण-अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरपर पधारते हैं । साधुहृदय गृहस्थ अपने कल्याणके लिये उस अतिथिरूप अग्निके दाहकी शान्तिके लिये उसे जल (पाद्य-अर्घ्य आदि) दिया करते हैं, अतएव हे सूर्यपुत्र ! आप उस ब्राह्मण-बालकके पैर धोनेके लिये तुरत जल ले जाइये । वह अतिथि लगातार तीन दिनोंसे आपकी प्रतीक्षामें अनशन किये बैठा है, आप स्वयं उसकी सेवा करेंगे, तभी वह शान्त होगा ॥ ७ ॥ आशाप्रतीक्षे सङ्गतँ सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूॅंश्च सर्वान् । एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥ यस्य = जिसके; गृहे = घरमें; ब्राह्मणः = ब्राह्मण अतिथि; अनश्नन् = बिना भोजन किये; वसति = निवास करता है; [तस्य = उस;] अल्पमेधसः = मन्दबुद्धि; पुरुषस्य = मनुष्यकी आशाप्रतीक्षे = नाना प्रकारकी आशा और प्रतीक्षा; सङ्गतम् = उनकी पूर्तिसे होनेवाले सब प्रकारके सुख; सूनृताम् च = सुन्दर भाषणके फल एव; इष्टापूर्ते च = यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मोंके और कुआँ, बगीचा, तालाब आदि निर्माण करानेके फल तथा; सर्वान् पुत्रपशून् = समस्त पुत्र और पशु; एतद् वृङ्क्ते = इन सबको (वह) नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥ व्याख्या-जिसके घरपर अतिथि ब्राह्मण भूखा बैठा रहता है, उस मन्दबुद्धि मनुष्यको न तो वे इच्छित पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेकी उसे पूरी आशा थी; न वे ही पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेका निश्चय था और वह बाट ही देख रहा था, कभी कोई पदार्थ मिल भी गया तो उससे सुखकी प्राप्ति नहीं होती । उसकी वाणीमेंसे सौन्दर्य, सत्य और माधुर्य निकल जाते हैं, अतः सुन्दर वाणीसे प्राप्त होनेवाला सुख भी उसे नहीं मिलता, उसके यज्ञ दानादि इष्ट कर्म और कूप, तालाब, धर्मशाला आदिके निर्माणरूप पूर्तकर्म एव उनके फल नष्ट हो जाते हैं । इतना ही नहीं, अतिथिका अपकार उसके पूर्वपुण्यसे प्राप्त पुत्र और पशु आदि धनको भी नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध-पत्नीके वचन सुनकर धर्ममूर्ति यमराज तुरत नचिकेताके पास गये और पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा विधिवत् उसकी पूजा करके कहने लगे- तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ९ ॥ ब्रह्मन् = हे ब्राह्मणदेवता; नमस्यः अतिथिः = आप नमस्कार करनेयोग्य अतिथि हैं; ते = आपको; नमः अस्तु = नमस्कार हो; ब्रह्मन् = हे ब्राह्मण; मे स्वस्ति = मेरा कल्याण; अस्तु = हो, यत् = आपने जो; तिस्रः = तीन रात्रीः = रात्रियोंतक; मे = मेरे; गृहे = घरपर; अनश्नन् = बिना भोजन किये; अवात्सीः = निवास किया है; तस्मात् = इसलिये (आप मुझसे); प्रति = प्रत्येक रात्रिके बदले (एक-एक करके); त्रीन् वरान् = तीन वरदान; वृणीष्व = माँग लीजिये ॥ ९ ॥ व्याख्या-'ब्राह्मणदेवता ! आप नमस्कारादि सत्कारके योग्य मेरे माननीय अतिथि हैं, कहाँ तो मुझे चाहिये था कि मैं आपका यथायोग्य पूजन-सेवन करके आपको सन्तुष्ट करता, और कहाँ मेरे प्रमादसे आप लगातार तीन रात्रियोंमे भूखे बैठे हैं। मुझसे यह बड़ा अपराध हो गया है। आपको नमस्कार है । भगवन् ! इस मेरे दोषकी निवृत्ति होकर मेरा कल्याण हो । आप प्रत्येक रात्रिके बदले एक एक करके मुझसे अपनी इच्छाके अनुरूप तीन वर माँग लीजिये' ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-तपोमूर्ति अतिथि ब्राह्मण-बालकके अनशनसे भयभीत होकर धर्मज्ञ यमराजने जब इस प्रकार कहा तब पिताको सुख पहुँचानेकी इच्छासे नचिकेता बोला- शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो । त्वत्प्रसृष्टं मामभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥ मृत्यो = हे मृत्युदेव; यथा = जिस प्रकार, गौतमः = (मेरे पिता) गौतमवंशीय उद्दालक; मा अभि = मेरे प्रति; शान्तसंकल्पः = शान्त संकल्पवाले; सुमनाः = प्रसन्नचित्त (और); वीतमन्युः = क्रोध एव खेदसे रहित; स्यात् = हो जायं (तथा);
कल्याण नचिकेताको मृत्युके अर्पण करना और नचिकेता
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- कठोपनिषद् * १८९ त्वत्प्रसृष्टम्=आपके द्वारा वापस भेजा जानेपर जब मैं उनके पास जाऊँ तो; मा प्रतीतः=वे मुझपर विश्वास करके (यह वही मेरा पुत्र नचिकेता है, ऐसा भाव रखकर), अभिवदेत्=मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करें; एतत्=यह; त्रयाणाम्= अपने तीनों वरोंमेंसे प्रथमम् वरम्=पहला वर, वृणे=मैं माँगता हूँ ॥ १० ॥ व्याख्या-मृत्युदेव ! तीन वरोंमेंसे मैं प्रथम वर यही माँगता हूँ कि मेरे गौतमवंशीय पिता उद्दालक, जो क्रोधके आवेगमें मुझे आपके पास भेजकर अब अशान्त और दुखी हो रहे हैं, मेरे प्रति क्रोधरहित, शान्तचित्त और सर्वथा सन्तुष्ट हो जायें । और आपके द्वारा अनुमति पाकर जब मैं घर जाऊँ, तब वे मुझे अपने पुत्र नचिकेताके रूपमें पहचानकर मेरे साथ पूर्ववत् बड़े स्नेहसे बातचीत करें ॥ १० ॥ सम्बन्ध-यमराजने कहा- यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । सुखँ रात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥ त्वाम्=तुमको; मृत्युमुखात्=मृत्युके मुखसे, प्रमुक्तम्=छूटा हुआ, ददृशिवान्=देखकर, मत्प्रसृष्टः=मुझसे प्रेरित, आरुणिः=(तुम्हारे पिता) अरुण-पुत्र, औद्दालकिः=उद्दालक, यथा पुरस्तात्=पहलेकी भाँति ही; प्रतीतः=यह मेरा पुत्र नचिकेता ही है, ऐसा विश्वास करके, वीतमन्युः=दुःख और क्रोधसे रहित, भविता=हो जायेंगे; रात्रीः=(और वे अपनी आयुकी शेष) रात्रियोंमें, सुखम्=सुखपूर्वक, शयिता=शयन करेंगे ॥ ११ ॥ व्याख्या-तुमको मृत्युके मुखसे छूटकर घर लौटा हुआ देखकर मेरी प्रेरणासे तुम्हारे पिता अरुणपुत्र उद्दालक बड़े प्रसन्न होंगे, तुमको अपने पुत्ररूपमें पहचानकर तुमसे पूर्ववत् प्रेम करेंगे, तथा उनका दुःख और क्रोध सर्वथा शान्त हो जायगा । तुम्हें पाकर अब वे जीवनभर सुखकी नींद सोयेंगे ॥ ११ ॥ सम्बन्ध-इस वरदानको पाकर नचिकेता बोला, हे यमराज !- स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥ स्वर्गे लोके=स्वर्गलोकमें, किंचन भयम्=किंचिन्मात्र भी भय; न अस्ति=नहीं है, तत्र त्वम् न=वहाँ मृत्युरूप स्वय आप भी नहीं हैं, जरया न बिभेति=वहाँ कोई बुढ़ापेसे भी भय नहीं करता, स्वर्गलोके=स्वर्गलोकके निवासी; अशनायापिपासे=भूख और प्यास, उभे तीर्त्वा=इन दोनोंसे पार होकर, शोकातिगः=दुःखोंसे दूर रहकर, मोदते= आनन्द भोगते हैं ॥ १२ ॥ स त्वमग्निँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वँ श्रद्धानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥ मृत्यो=हे मृत्युदेव, सः त्वम्=वे आप, स्वर्ग्यम् अग्निम्=उपर्युक्त स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको; अध्येषि= जानते हैं (अतः), त्वम्=आप, मह्यम्=मुझ, श्रद्धानाय=श्रद्धालुको (वह अग्निविद्या), प्रब्रूहि=भलीभाँति समझा- कर कहिये, स्वर्गलोकाः=स्वर्गलोकके निवासी, अमृतत्वम्=अमरत्वको, भजन्ते=प्राप्त होते हैं (इसलिये), एतत्=यह (मैं); द्वितीयेन वरेण=दूसरे वरके रूपमे, वृणे=माँगता हूँ ॥ १३ ॥ व्याख्या-मैं जानता हूँ कि स्वर्गलोक बड़ा सुखकर है, वहाँ किसी प्रकारका भी भय नहीं है । स्वर्गमे न तो कोई वृद्धावस्थाको प्राप्त होता है और न, जैसे मर्त्यलोकमे आप (मृत्यु) के द्वारा लोग मारे जाते हैं वैसे, कोई मारा ही जाता है । वहाँ मृत्युकालीन सङ्कट नहीं है। यहाँ जैसे प्रत्येक प्राणी भूख और प्यास दोनोंकी ज्वालासे जलते हैं, वैसे वहाँ नहीं जलना पड़ता । वहाँके निवासी शोकसे तरकर सदा आनन्द भोगते हैं। परन्तु वह स्वर्ग अग्निविज्ञानको जाने बिना नहीं मिलता । हे मृत्युदेव ! आप उस स्वर्गके साधनभूत अग्निको यथार्थरूपसे जानते हैं। मेरी उस अग्निविद्यामें और आपमे श्रद्धा है,
- १६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * श्रद्धावान् तत्त्वका अधिकारी होता है; अतः आप कृपया मुझको उस अग्निविद्याका उपदेश कीजिये, जिसे जानकर लोग स्वर्गलोकमे रहकर अमृतत्वको—देवत्वको प्राप्त होते हैं। यह मैं आपसे दूसरा वर माँगता हूँ ॥ १२-१३ ॥ सम्बन्ध—तब यमराज बोले— प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता, स्वर्ग्यम् अग्निम्=स्वर्गदायिनी अग्निविद्याको, प्रजानन्=अच्छी तरह जाननेवाला मैं, प्रब्रवीमि=तुम्हारे लिये उसे भलीभाँति बतलाता हूँ, तत् उ मे निबोध=(तुम) उसे मुझसे भलीभाँति समझ लो, त्वम् एतम्=तुम इस विद्याको; अनन्तलोकाप्तिमू=अविनाशी लोककी प्राप्ति करानेवाली, प्रतिष्ठाम्=उसकी आधारस्वरूपा; अथो=और, गुहायाम् निहितम्=बुद्धिरूप गुफामें छिपी हुई विद्धि=समझो ॥ १४ ॥ व्याख्या—नचिकेता ! मैं उस स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याको भलीभाँति जानता हूँ और तुमको यथार्थरूपसे बतलाता हूँ। तुम इसको अच्छी तरहसे सुनो। यह अग्निविद्या अनन्त—विनाशरहित लोककी प्राप्ति करानेवाली है और उसकी आधारस्वरूपा है। पर तुम ऐसा समझो कि यह है अत्यन्त गुप्त। विद्वानोंकी हृदय-गुफामें छिपी रहती है ॥ १४ ॥ सम्बन्ध=इतना कहकर यमराजने— लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५ ॥ तम् लोकादिम्=उस स्वर्गलोककी कारणरूपा; अग्निम्=अग्निविद्याका, तस्मै उवाच=उस नचिकेताको उपदेश दिया; याः वा यावतीः=उसमे कुण्डनिर्माण आदिके लिये जो-जो और जितनी, इष्टकाः=ईंटें आदि आवश्यक होती हैं, वा यथा= तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है (वे सब बातें भी बतायीं), च सः अपि=तथा उस नचिकेताने भी, तत् यथोक्तम्=नेह जैसा सुना था, ठीक उसी प्रकार समझकर, प्रत्यवदत्=यमराजको पुनः सुना दिया, अथ=उसके बाद, मृत्युः अस्य तुष्टः=यमराज उसपर सन्तुष्ट होकर, पुनः एव आह=फिर बोले-॥ १५ ॥ व्याख्या—उपर्युक्त प्रकारसे अग्निविद्याकी महत्ता और गोपनीयता बतलाकर यमराजने स्वर्गलोककी कारणरूपा अग्निविद्याका रहस्य नचिकेताको समझाया। अग्निके लिये कुण्ड-निर्माणादिमे किस आकारकी, कैसी और कितनी ईंटें चाहिये एव अग्निका चयन किस प्रकार किया जाना चाहिये—यह सब भलीभाँति समझाया। तदनन्तर नचिकेताकी बुद्धि तथा स्मृतिकी परीक्षाके लिये यमराजने नचिकेतासे पूछा कि तुमने जो कुछ समझा हो, वह मुझे सुनाओ। तीक्ष्णबुद्धि नचिकेताने सुनकर जैसा यथार्थ समझा था, सब ज्यों-का-त्यों सुना दिया। यमराज उसकी विलक्षण स्मृति और प्रतिभाको देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और बोले—॥ १५ ॥ तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः । तवैव नाम्ना भवितायमग्निः सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६ ॥ प्रीयमाणः= (उसकी अलौकिक बुद्धि देखकर) प्रसन्न हुए, महात्मा =महात्मा यमराज, तम्=उस नचिकेतासे, अब्रवीत्=बोले, अद्य=अब मैं; तव=तुमको, इह=यहाँ; भूयः वरम्=पुनः यह (अतिरिक्त) वर, ददामि= देता हूँ कि, अयम् अग्निः=यह अग्निविद्या, तव एव नाम्ना=तुम्हारे ही नामसे; भविता=प्रसिद्ध होगी, च इमाम्=तथा इस, अनेकरूपाम् सृङ्काम्=अनेक रूपोंवाली रत्नोंकी मालाको भी; गृहाण=तुम स्वीकार करो ॥ १६ ॥ व्याख्या—महात्मा यमराजने प्रसन्न होकर नचिकेतासे कहा—तुम्हारी अप्रतिम योग्यता देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, इससे अब मैं तुम्हें एक वर और तुम्हारे बिना माँगे ही देता हूँ। वह यह कि यह अग्नि, जिसका मैने तुमको उपदेश किया है, तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी। और साथ ही, यह लो, मैं तुम्हें तुम्हारे देवत्वकी सिद्धिके लिये यह अनेक रूपोंवाली विविध यज्ञ विज्ञानरूपी रत्नोंकी माला देता हूँ। इसे स्वीकार करो ॥ १६ ॥
ॐ कठोपनिषद् * १९१ सम्बन्ध-उस अग्निविद्याका फल बतलाते हुए यमराज कहते हैं- त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य संधिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू । ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमा२ शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥ त्रिणाचिकेतः=इस अग्निका ( शास्त्रोक्त रीतिसे ) तीन बार अनुष्ठान करनेवाला, त्रिभिः सन्धिम् एत्य= तीनों ( ऋक्, साम, यजुर्वेद ) के साथ सम्बन्ध जोडकर, त्रिकर्मकृत्=यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको निष्कामभावसे करता रहनेवाला मनुष्य; जन्ममृत्यू तरति=जन्म-मृत्युसे तर जाता है, ब्रह्मजज्ञम् =( वह ) ब्रह्मासे उत्पन्न सृष्टिके जाननेवाले; ईड्यम् देवम्=स्तवनीय इस अग्निदेवको, विदित्वा=जानकर तथा; निचाय्य=इसका निष्कामभावसे चयन करके; इमाम् अत्यन्तम् शान्तिम् एति=इस अनन्त शान्तिको पा जाता है ( जो मुझको प्राप्त है ) ॥ १७ ॥ व्याख्या-इस अग्निका तीन बार अनुष्ठान करनेवाला पुरुष ऋक्, यजु', साम-तीनों वेदोंसे सम्बन्ध जोड़कर, तीनों वेदोंके तत्त्व-रहस्यमे निष्णात होकर, निष्कामभावसे यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको करता हुआ जन्म-मृत्युसे तर जाता है । वह ब्रह्मासे उत्पन्न सृष्टिको जाननेवाले स्तवनीय इस अग्निदेवको भलीभाँति जानकर इसका निष्कामभावसे चयन करके उस अनन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है, जो मुझको प्राप्त है ॥ १७ ॥ त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८ ॥ एतत् त्रयम्=ईंटोंके स्वरूप, सख्या और अग्नि-चयन-विधि-इन तीनों बातोंको, विदित्वा=जानकर; त्रिणाचिकेतः= तीन बार नाचिकेत-अग्निविद्याका अनुष्ठान करनेवाला तथा, यः एवम्=जो कोई भी इस प्रकार, विद्वान्=जाननेवाला पुरुष; नाचिकेतम्=इस नाचिकेत-अग्निका, चिनुते=चयन करता है, सः मृत्युपाशान्=वह मृत्युके पाशको, पुरतः प्रणोद्य= अपने सामने ही ( मनुष्य-शरीरमे ही ) काटकर, शोकातिगः=शोकसे पार होकर, स्वर्गलोके मोदते=स्वर्गलोकमे आनन्द- का अनुभव करता है ॥ १८ ॥ व्याख्या-किस आकारकी कैसी ईंटें हों और कितनी सख्यामें हों एव किस प्रकारसे अग्निका चयन किया जाय-इन तीनों बातोंको जानकर जो विद्वान् तीन बार नाचिकेत अग्निविद्याका निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है-अग्निका चयन करता है, वह देहपातसे पहले ही ( जन्म-) मृत्युके पाशको तोड़कर शोकरहित होकर अन्तमें स्वर्गलोकके ( अविनाशी ऊर्ध्वलोकके ) आनन्दका अनुभव करता है ॥ १८ ॥ एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता; एषः ते=यह तुम्हें बतलायी हुई, स्वर्ग्यः अग्निः=स्वर्ग प्रदान करनेवाली अग्निविद्या है, यम् द्वितीयेन वरेण अवृणीथाः=जिसको तुमने दूसरे वरसे माँगा था, एतम् अग्निम्=इस अग्निको ( अबसे ), जनासः= लोग, तव एव=तुम्हारे ही नामसे, प्रवक्ष्यन्ति=कहा करेंगे, नचिकेतः=हे नचिकेता, तृतीयम् वरम् वृणीष्व= ( अबतुम ) तीसरा वर माँगो ॥ १९ ॥ व्याख्या-यमराज कहते हैं-नचिकेता ! तुम्हें यह उसी स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याका उपदेश दिया गया है, जिसके लिये तुमने दूसरे वरमें याचना की थी । अबसे लोग तुम्हारे ही नामसे इस अग्निको पुकारा करेंगे । नचिकेता ! अब तुम तीसरा वर माँगो ॥ १९ ॥ सम्बन्ध-नचिकेता तीसरा वर माँगता है- येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २० ॥
१९२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * प्रेते मनुष्ये=मरे हुए मनुष्यके विषयमें; या इयम्=जो यह, विचिकित्सा=संशय है, एके (आहुः) अयम् अस्ति इति=कोई तो ऐसा कहते हैं कि मरनेके बाद यह आत्मा रहता है, च एके (आहुः) न अस्ति इति=और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता, त्वया अनुशिष्टः=आपके द्वारा उपदेश पाया हुआ, अहम् एतत् विद्याम्=मैं इसका निर्णय भलीभाँति समझ लूँ; एषः वराणाम्=यही तीनों वरोंमेंसे, तृतीयः वरः=तीसरा वर है ॥ २० ॥ व्याख्या-इस लोकके कल्याणके लिये पिताकी सन्तुष्टिका वर और परलोकके लिये स्वर्गके साधनरूप अग्निविज्ञानका वर प्राप्त करके अब नचिकेता आत्माके यथार्थ स्वरूप और उसकी प्राप्तिका उपाय जाननेके लिये यमराजके सामने दूसरे लोगोंके दो मत उपस्थित करके उसपर उनका अनुभूत विचार सुनना चाहता है। इसलिये नचिकेता कहता है कि भगवन् ! मृत मनुष्यके सम्बन्धमे यह एक बड़ा सन्देह फैला हुआ है। कुछ लोग तो कहते हैं कि मृत्युके बाद भी आत्माका अस्तित्व रहता है और कुछ लोग कहते हैं, नहीं रहता। इस विषयमें आपका जो अनुभव हो, वह मुझे बतलाइये ।* आप मुझे अपना अनुभूत विचार बतलायेंगे, तभी मैं इस रहस्यको भलीभाँति समझ पाऊँगा। बस, तीनो वरोंमेंमे यही मेरा अभीष्ट तीसरा वर है ॥२०॥ सम्बन्ध-नचिकेताका महत्त्वपूर्ण प्रश्न सुनकर यमराजने मन-ही-मन उसकी प्रशंसा की। सोचा कि ऋषिकुमार बालक होनेपर भी बड़ा प्रतिभाशाली है, कैसे गोपनीय विषयको जानना चाहता है, परंतु आत्मतत्त्व उपयुक्त अधिकारीको ही बतलाना चाहिये। अनधिकारीके प्रति आत्मतत्त्वका उपदेश करना हानिकर होता है, अतएव पहले पात्र-परीक्षाकी आवश्यकता है। यों विचारकर यमराजने इस तत्त्वका कठिनताका वर्णन करके नचिकेताको टालना चाहा और कहा- देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः। अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता !, अत्र पुरा=इस विषयमें पहले, देवैः अपि=देवताओंने भी, विचिकित्सितम्=संदेह किया था (परन्तु उनकी भी समझमे नहीं आया), हि एषः धर्मः अणुः न सुविज्ञेयम्=क्योंकि यह विषय बड़ा सूक्ष्म है, सहज ही समझमे आनेवाला नहीं है (इसलिये), अन्यम् वरम् वृणीष्व=तुम दूसरा वर माँग लो, मा मा उपरोत्सीः= मुझपर दबाव मत डालो, एनम् मा=इस आत्मज्ञानसम्बन्धी वरको मुझे, अतिसृज=लौटा दो ॥ २१ ॥ व्याख्या-नचिकेता ! यह आत्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म विषय है। इसका समझना सहज नहीं है। पहले देवताओंको भी इस विषयमें सन्देह हुआ था। उनमे भी बहुत विचार-विनिमय हुआ था; परन्तु वे भी इसको जान नहीं पाये। अतएव तुम दूसरा वर माँग लो। मैं तुम्हें तीन वर देनेका वचन दे चुका हूँ, अतएव तुम्हारा ऋणी हूँ, पर तुम इस वरके लिये, जैसे महाजन ऋणीको दबाता है वैसे, मुझको मत दबाओ। इस आत्मतत्त्वविषयक वरको मुझे लौटा दो। इसके लिये मुझे छोड़ दो ॥ २१ ॥ सम्बन्ध-नचिकेता आत्मतत्त्वकी कठिनताका नाम सुनकर तनिक भी घबराया नहीं, न उसका उत्साह ही मन्द हुआ, वर उसने और भी दृढताके साथ कहा- देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२ ॥
- मृत्युके पश्चात् आत्माका अस्तित्व रहता है या नही, इस सम्बन्धमें नचिकेताको स्वयं कोई सन्देह नहीं है। पिताको दक्षिणामें जराजीर्ण गौएँ देते देखकर नचिकेताने स्पष्ट कहा था कि ऐसी गौओंका दान करनेवाले आनन्दरहित (अनन्दा) नरकादि लोकोंको प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार दूसरे वरमें नचिकेताने स्वर्गसुखोंका वरण करके स्वर्गप्राप्तिके साधनरूप अग्निविद्याके उपदेशकी प्रार्थना की थी। इससे सिद्ध है कि वह स्वयं और नरकमें विश्वास करता था। स्वर्ग-नरकादि लोकोंकी प्राप्ति मरनेके पश्चात् ही होती है। आत्माका अस्तित्व न हो तो ये लोक किसको प्राप्त हों। यहाँ इसलिये नचिकेताने अपना मत न बताकर कहा है कि कुछ लोग मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व मानते हैं और कुछ लोग नहीं मानते। यह प्रश्नका एक ऐसा सुन्दर प्रकार है कि जिसके उत्तरमें आत्माकी नित्य सत्ता, उसके स्वरूप, गुण और परमलक्ष्य परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंका विवरण अपने-आप ही आ जाता है। अत यह प्रश्न आत्मज्ञान- विषयक है, न कि आत्माके अस्तित्वमें सन्देहविषयक। तैत्तिरीय ब्राह्मणमें नचिकेताका जो इतिहास मिलता है, उसमें तो नचिकेताने तीसरे वरमें पुनर्मृत्यु (जन्म-मृत्यु) पर विजय पानेका-मुक्तिका साधन जानना चाहा है (तृतीयं वृणीष्वेति । पुनर्मृत्योर्मेऽपचितिं ब्रूहि )।
- कठोपनिषद् * १९३ मृत्यो=हे यमराज; त्वम् यत् आत्थ=आपने जो यह कहा कि, अत्र किल देवैः अपि=इस विषयपर देवताओंने भी; विचिकित्सितम्=विचार किया था (परंतु वे निर्णय नहीं कर पाये), च न सुविज्ञेयम्=और यह सुविज्ञेय भी नहीं है, च त्वादृक्=इसके सिवा आपके-जैसा; अस्य वक्ता=इस विषयका कहनेवाला भी, अन्यः न लभ्यः=दूसरा नहीं मिल सकता; [ अतः=इसलिये मेरी समझमें तो, ] एतस्य तुल्यः=इसके समान, अन्यः कश्चित्=दूसरा कोई भी; वरः न=वर नहीं है ॥२२॥ व्याख्या-हे मृत्यो ! पूर्वकालमें देवताओंने भी जब इस विषयपर विचार-विनिमय किया था तथा वे भी इसे जान नहीं पाये थे और आप भी कहते हैं कि यह विषय सहज नहीं है, बड़ा ही सूक्ष्म है, तब यह तो सिद्ध ही है कि यह बड़े ही महत्त्वका विषय है और ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयको समझानेवाला आपके समान अनुभवी वक्ता मुझे ढूँढनेपर भी कोई नहीं मिल सकता । आप कहते हैं, इसे छोड़कर दूसरा वर माँग लो । परन्तु मैं तो समझता हूँ कि इसकी तुलनाका दूसरा कोई वर है ही नहीं । अतएव कृपापूर्वक मुझे इसीका उपदेश कीजिये ॥ २२ ॥ सम्बन्ध-विषयकी कठिनतासे नचिकेता नहीं घबराया, वह अपने निश्चयपर ज्यों-का-त्यों दृढ़ रहा । इस एक परीक्षामें वह उत्तीर्ण हो गया । अब यमराजने दूसरी परीक्षाके रूपमें उसके सामने विभिन्न प्रकारके प्रलोभन रखनेकी बात सोचकर उससे कहते हैं- शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् । भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३ ॥ शतायुषः=सैकड़ों वर्षोंकी आयुवाले, पुत्रपौत्रान्=बेटे और पोतोंको ( तथा ); बहून् पशून्=बहुत-से गौ आदि पशुओंको ( एव ), हस्तिहिरण्यम्=हाथी, सुवर्ण और, अश्वान् वृणीष्व=घोड़ोंको माँग लो, भूमेः महत् आयतनम्= भूमिके बड़े विस्तारवाले मण्डल ( साम्राज्य ) को, वृणीष्व=माँग लो, स्वयं च=तुम स्वयं भी, यावत् शरदः=जितने वर्षोंतक, इच्छसि=चाहो, जीव=जीते रहो ॥ २३ ॥ व्याख्या-नचिकेता ! तुम बड़े भोले हो । क्या करोगे इस वरको लेकर । तुम ग्रहण करो इन सुखकी विशाल सामग्रियोंको । इस सौ-सौ वर्ष जीनेवाले पुत्र-पौत्रादि बड़े परिवारको माँग लो । गौ आदि बहुत से उपयोगी पशु, हाथी, सुवर्ण, घोड़े और विशाल भूमण्डलके महान् साम्राज्यको माँग लो और इन सबको भोगनेके लिये जितने वर्षोंतक जीनेकी इच्छा हो, उतने ही वर्षोंतक जीते रहो ॥ २३ ॥ एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥ नचिकेता=हे नचिकेता, वित्तम् चिरजीविकाम्=धन, सम्पत्ति और अनन्त कालतक जीनेके साधनोंको; यदि त्वम्=यदि तुम, एतत्तुल्यम्=इस आत्मज्ञानविषयक वरदानके समान, वरम् मन्यसे वृणीष्व=वर मानते हो तो माँग लो, च महाभूमौ=और तुम इस पृथिवीलोकमें, एधि=बड़े भारी सम्राट् बन जाओ, त्वा कामानाम्=( मैं ) तुम्हें सम्पूर्ण भोगोंमेंसे, कामभाजम्=अति उत्तम भोगोंका पात्र, करोमि=बना देता हूँ ॥ २४ ॥ व्याख्या-'नचिकेता ! यदि तुम प्रचुर धन-सम्पत्ति, दीर्घजीवनके लिये उपयोगी सुख-सामग्रियों अथवा और भी जितने भोग मनुष्य भोग सकता है, उन सबको मिलाकर उस आत्मतत्त्व-विषयक वरके समान समझते हो तो इन सबको माँग लो । तुम इस विशाल भूमिके सम्राट् बन जाओ । मैं तुम्हें समस्त भोगोंको इच्छानुसार भोगनेवाला बनाये देता हूँ ।' इस प्रकार यहाँ यमराजने वाक्चातुर्यसे आत्मतत्त्वका महत्त्व बढ़ाते हुए नचिकेताको विशाल भोगोंका प्रलोभन दिया ॥ २४ ॥ सम्बन्ध-इतनेपर भी नचिकेता अपने निश्चयपर अटल रहा, तब स्वर्गके दैवी भोगोंका प्रलोभन देते हुए यमराजने कहा- ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामाँ२श्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ २५ ॥
१९४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ये ये कामाः=जो-जो भोग; मर्त्यलोके=मनुष्यलोकमे, दुर्लभाः=दुर्लभ हैं, सर्वान् कामान्=उन सम्पूर्ण भोगोंको, छन्दतः प्रार्थयस्व=इच्छानुसार माँग लो, सरथाः सतूर्याः इमाः रामाः=रथ और नाना प्रकारके बाजोंके सहित इन स्वर्गकी अप्सराओंको ( अपने साथ ले जाओ ), मनुष्यैः ईदृशाः=मनुष्योंको ऐसी स्त्रियाँ, न हि लम्भनीयाः=अलभ्य हैं; मत्प्रत्ताभिः=मेरे द्वारा दी हुई, आभिः=इन स्त्रियोंसे; परिचारयस्व=तुम अपनी सेवा कराओ; नचिकेताः=हे नचिकेता; मरणम्=मरनेके बाद आत्माका क्या होता है, मा अनुप्राक्षीः=इस बातको मत पूछो ! ॥ २५ ॥ व्याख्या-नचिकेता ! जो-जो भोग मृत्युलोकमें दुर्लभ हैं, उन सबको तुम अपने इच्छानुसार माँग लो । ये रथों और विविध प्रकारके वाद्योंसहित जो स्वर्गकी सुन्दरी रमणियाँ हैं, ऐसी रमणियाँ मनुष्योंमें कहीं नहीं मिल सकतीं । बड़े- बड़े ऋषि मुनि इनके लिये ललचाते रहते हैं । मैं इन सबको तुम्हें सहज ही दे रहा हूँ । तुम इन्हें ले जाओ और इनसे अपनी सेवा कराओ, परन्तु नचिकेता ! आत्मतत्त्व-विषयक प्रश्न मत पूछो ॥ २५ ॥ सम्बन्ध-यमराज शिष्यपर स्वाभाविक ही दया करनेवाले महान् अनुभवी आचार्य ह । इन्होंने अधिकारी-परीक्षाके साथ ही इस प्रकार भय और एकके बाद एक उत्तम भोगोंका प्रलोभन दिखाकर, जैसे खम्भेको हिला-हिलाकर दृढ़ किया जाता है वैसे ही नचिकेताके वैराग्यसम्पन्न निश्चयको और भी दृढ़ किया ! पहले कठिनताका भय दिखाया, फिर इस लोकके एक-से-एक बढ़कर भोगोंके चित्र उसके सामने रक्खे और अन्तमें स्वर्गलोकमें भी उसका वैराग्य करा देनेके लिये स्वर्गके दैवी भोगोंका चित्र उपस्थित किया और कहा कि इनको यदि तुम अपने उस आत्मतत्त्वसम्बन्धी वरके समान समझते हो तो इन्हें माँग लो । परंतु नचिकेता तो दृढ़निश्चयी और सच्चा अधिकारी था । वह जानता था कि इस लोक और परलोकके बड़े-से-बड़े भोग-सुखोंकी आत्मज्ञानके सुखके किसी क्षुद्रतम अंशके साथ भी तुलना नहीं की जा सकती । अतएव उसने अपने निश्चयका युक्तिपूर्वक समर्थन करते हुए पूर्ण वैराग्ययुक्त वचनोंमें यमराजसे कहा- श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥ अन्तक=हे यमराज ( जिन भोगोंका आपने वर्णन किया वे ), श्वोभावा=क्षणभङ्गुर भोग ( और उनसे प्राप्त होने- वाले सुख ), मर्त्यस्य=मनुष्यके, सर्वेन्द्रियाणाम्=अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंका; यत् तेजः=जो तेज है; एतत्= उसको, जरयन्ति=क्षीण कर डालते हैं, अपि सर्वम्=( इसके सिवा ) समस्त, जीवितम्=आयु, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अल्पम् एव=अल्प ही है, इसलिये, तव वाहाः=ये आपके रथ आदि वाहन ओर, नृत्यगीते=ये अप्सराओंके नाच-गान, तव एव=आपके ही पास रहें ( मुझे नहीं चाहिये ) ॥ २६ ॥ व्याख्या-हे सबका अन्त करनेवाले यमराज ! आपने जिन भोग्य वस्तुओंकी महिमाके पुल बाँधे हैं, ये सभी क्षणभङ्गुर हैं । कलतक रहेंगी या नहीं, इसमें भी सन्देह है । इनके संयोगसे प्राप्त होनेवाला सुख वास्तवमें सुख ही नहीं है, वह तो दुःख ही है ( गीता ५ । २२ ) । ये भोग्यवस्तुएँ कोई लाभ तो देती ही नहीं, वर मनुष्यकी इन्द्रियोंके तेज और धर्मको हरण कर लेती हैं । आपने जो दीर्घजीवन देना चाहा है, वह भी अनन्तकालकी तुलनामें अत्यन्त अल्प ही है । जब ब्रह्मा आदि देवताओंका जीवन भी अल्पकालका है-एक दिन उन्हें भी मरना पड़ता है, तब औरोंकी तो बात ही क्या है ? अतएव मैं यह सब नहीं चाहता । ये आपके रथ, हाथी, घोड़े, ये रमणियाँ और इनके नाच-गान आप अपने ही पास रक्खें ॥ २६ ॥ न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥ मनुष्यः=मनुष्य, वित्तेन=धनसे, तर्पणीयः न=कभी भी तृप्त किये जाने योग्य नहीं है, चेत्=जब कि ( हमने ); त्वां अद्राक्ष्म=आपके दर्शन पा लिये हैं, (तब), वित्तम्=धनको, लप्स्यामहे=(तो हम) पा ही लेंगे; (और)त्वम् यावत्= आप जबतक; ईशिष्यसि=शासन करते रहेंगे, तबतक तो, जीविष्यामः=हम जीते ही रहेंगे ( इन सबको भी क्या माँगना है, अतः ); मे वरणीयः वरः तु= मेरे माँगने लायक वर तो; सः एव=वह ( आत्मज्ञान ) ही है ॥ २७ ॥
- कठोपनिषद् * १९५ व्याख्या-आप जानते ही हैं, धनसे मनुष्य कभी तृप्त नहीं हो सकता । आगमें घी-ईंधन डालनेसे जैसे आग जोरोंसे भड़कती है, उसी प्रकार धन और भोगोंकी प्राप्तिसे भोग-कामनाका और भी विस्तार होता है। वहाँ तृप्ति कैसी ? वहाँ तो दिन-रात अपूर्णता और अभावकी अग्निमें ही जलना पड़ता है । ऐसे दुःखमय धन और भोगोंको कोई भी बुद्धिमान् पुरुष नहीं माँग सकता । मुझे अपने जीवननिर्वाहके लिये जितने धनकी आवश्यकता होगी, उतना तो आपके दर्शनसे ही प्राप्त हो जायगा । रही दीर्घजीवनकी बात, सो जबतक मृत्युके पदपर आपका शासन है, तबतक मुझे मरनेका भी भय क्यों होने लगा । अतएव किसी भी दृष्टिसे दूसरा वर माँगना उचित नहीं मालूम होता । इसलिये मेरा प्रार्थनीय तो वह आत्मतत्त्व-विषयक वर ही है । मैं उसे लौटा नहीं सकता ॥ २७ ॥ सम्बन्ध-इस प्रकार भोगोंकी तुच्छताका वर्णन करके अब नचिकेता अपने वरका महत्त्व बतलाता हुआ उसीको प्रदान करनेके लिये दृढतापूर्वक निवेदन करता है- अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥ जीर्यन् मर्त्यः = यह मनुष्य जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है, प्रजानन् = इस तत्त्वको भलीभाँति समझनेवाला, क्वधःस्थः = मनुष्यलोकका निवासी, कः = कौन ( ऐसा ) मनुष्य है ( जो कि ), अजीर्यताम् = बुढ़ापेसे रहित, अमृतानाम् = न मरनेवाले ( आप-सदृश ) महात्माओंका, उपेत्य = सङ्ग पाकर भी, वर्णरतिप्रमोदान् = ( स्त्रियोंके ) सौन्दर्य, क्रीड़ा और आमोद-प्रमोदका, अभिध्यायन् = बार-बार चिन्तन करता हुआ, अतिदीर्घे = बहुत कालतक, जीविते = जीवित रहनेमें, रमेत = प्रेम करेगा ॥ २८ ॥ व्याख्या-हे यमराज ! आप ही बताइये, भला आप-सरीखे अजर-अमर महात्मा देवताओंका दुर्लभ एवं अमोघ सङ्ग प्राप्त करके मृत्युलोकका जरामरणशील ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य होगा जो स्त्रियोंके सौन्दर्य, क्रीड़ा और आमोद-प्रमोदमें आसक्त होकर उनकी ओर दृष्टिपात करेगा और इस लोकमें दीर्घकालतक जीवित रहनेमें आनन्द मानेगा ? ॥ २८ ॥ यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥ मृत्यो = हे यमराज, यस्मिन् = जिस, महति साम्पराये = महान् आश्चर्यमय परलोकसम्बन्धी आत्मज्ञानके विषयमें; इदम् विचिकित्सन्ति = ( लोग ) यह शङ्का करते हैं कि यह आत्मा मरनेके बाद रहता है या नहीं, ( तत्र ) यत् = उसमें जो निर्णय है, तत् नः ब्रूहि = वह आप हमें बतलाइये, यः अयम् = जो यह, गूढम् अनुप्रविष्टः वरः = अत्यन्त गम्भीरताको प्राप्त हुआ वर है, तस्मात् = इससे, अन्यम् = दूसरा वर, नचिकेताः = नचिकेता, न वृणीते = नहीं माँगता ॥ २९ ॥ व्याख्या-नचिकेता कहता है-हे यमराज ! जिस आत्मतत्त्व-सम्बन्धी महान् ज्ञानके विषयमें लोग यह शङ्का करते हैं कि मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व रहता है या नहीं, उसके सम्बन्धमें निर्णयात्मक जो आपका अनुभूत ज्ञान हो, मुझे कृपापूर्वक उसीका उपदेश कीजिये। यह आत्मतत्त्वसम्बन्धी वर अत्यन्त गूढ है-यह सत्य है, पर आपका शिष्य यह नचिकेता इसके अतिरिक्त दूसरा कोई वर नहीं चाहता ! ॥ २९ ॥ ॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥ ❖ द्वितीय वल्ली सम्बन्ध-इस प्रकार परीक्षा करके जब यमराजने समझ लिया कि नचिकेता दृढ़निश्चयी, परम वैराग्यवान् एव निर्भीक है, अतः ब्रह्मविद्याका उत्तम अधिकारी है, तब ब्रह्मविद्याका उपदेश आरम्भ करनेके पहले उसका महत्त्व प्रकट करते हुए यमराज बोले- अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः । तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ श्रेयः = कल्याणका साधन; अन्यत् = अलग है, उत = और, प्रेयः = प्रिय लगनेवाले भोगोंका साधन- अन्यत् एव =
१९६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अलग ही है, ते=वे, नानार्थे=भिन्न भिन्न फल देनेवाले; उभे=दोनों साधन; पुरुषम्=मनुष्यको, सिनीतः=बाँधते हैं— अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं, तयोः=उन दोनोंमेंसे, श्रेयः=कल्याणके साधनको, आददानस्य=ग्रहण करनेवालेका; साधु भवति=कल्याण होता है, उ यः=परन्तु जो, प्रेयः वृणीते=सांसारिक उन्नतिके साधनको स्वीकार करता है, [ सः=वह, ] अर्थात्=यथार्थ लाभसे, हीयते=भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ व्याख्या—मनुष्य-शरीर अन्यान्य योनियोंकी भाँति केवल कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही नहीं मिला है। इसमें मनुष्य भविष्यमे सुख देनेवाले साधनका अनुष्ठान भी कर सकता है। वेदोंमें सुखके साधन दो बताये गये हैं—(१) श्रेय अर्थात् सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर नित्य आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका उपाय और (२) प्रेय अर्थात् स्त्री, पुत्र, धन, मकान, सम्मान, यश आदि इस लोककी और स्वर्गलोककी जितनी भी प्राकृत सुख- भोगकी सामग्रियाँ हैं, उनकी प्राप्तिका उपाय। इस प्रकार अपने अपने ढंगसे मनुष्यको सुख पहुँचा सकनेवाले ये दोनो साधन मनुष्यको बाँधते हैं—उसे अपनी अपनी ओर खींचते हैं। अधिकांश लोग तो 'भोगोंमे प्रत्यक्ष और तत्काल सुख मिलता है' इस प्रतीतिके कारण उसका परिणाम सोचे-समझे बिना ही प्रेयकी ओर खिंच जाते ह। परन्तु कोई-कोई भाग्यवान् मनुष्य भगवान्की दयासे प्राकृत भोगोंकी आपातरमणीयता एव परिणामदुःखताका रहस्य जानकर उनकी ओरसे विरक्त हो श्रेयकी ओर आकर्षित हो जाता है। इन दोनो प्रकारके मनुष्योंमेसे जो भगवान्की कृपाका पात्र होकर श्रेयको अपना लेता है और तत्परताके साथ उसके साधनमें लग जाता है, उसका तो सब प्रकारसे कल्याण हो जाता है। वह सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर अनन्त असीम आनन्दस्वरूप परमात्माको पा लेता है। परन्तु जो सांसारिक सुखके साधनोंमे लग जाता है, वह अपने मानव जीवनके परम लक्ष्य परमात्माकी प्राप्तिरूप यथार्थ प्रयोजनको सिद्ध नहीं कर पाता, इसलिये उसे आत्यन्तिक और नित्य सुख नहीं मिलता। उसे तो भ्रमवश सुखरूप प्रतीत होनेवाले वे अनित्य भोग मिलते हैं, जो वास्तवमे दुःखरूप ही हैं। अतः वह वास्तविक सुखसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥ २॥ श्रेयः च प्रेयः च=श्रेय और प्रेय—ये दोनो ही, मनुष्यम् एतः=मनुष्यके सामने आते हैं, धीरः=बुद्धिमान् मनुष्य, तौ=उन दोनोंके स्वरूपपर, सम्परीत्य=भलीभाँति विचार करके, विविनक्ति=उनको पृथक्-पृथक् समझ लेता है, (और) धीरः=वह श्रेष्ठबुद्धि मनुष्य, श्रेयः हि=परम कल्याणके साधनको ही, प्रेयसः=भोग-साधनकी अपेक्षा, अभिवृणीते=श्रेष्ठ समझकर ग्रहण करता है (परन्तु), मन्दः=मन्दबुद्धिवाला मनुष्य, योगक्षेमात्=लौकिक योगक्षेमकी इच्छासे, प्रेयः वृणीते=भोगोंके साधनरूप प्रेयको अपनाता है ॥ २ ॥ व्याख्या—अधिकांश मनुष्य तो पुनर्जन्ममें विश्वास न होनेके कारण इस विषयमे विचार ही नहीं करते, वे भोगोंमे आसक्त होकर अपने देवदुर्लभ मनुष्य-जीवनको पशुवत् भोगोंके भोगनेमें ही समाप्त कर देते हैं। किंतु जिनका पुनर्जन्ममे और परलोकमे विश्वास है, उन विचारशील मनुष्योंके सामने जब ये श्रेय और प्रेय दोनो आते हे, तब वे इन दोनोंके गुण- दोषोंपर विचार करके दोनोंको पृथक्-पृथक् समझनेकी चेष्टा करते है। इनमे जो श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न होता है, वह तो दोनोंके तत्त्वको पूर्णतया समझकर नीर-क्षीर-विवेकी इस की तरह प्रेयकी उपेक्षा करके श्रेयको ही ग्रहण करता है। परंतु जो मनुष्य अल्पबुद्धि है, जिसकी बुद्धिमें विवेकशक्तिका अभाव है, वह श्रेयके फलमें अविश्वास करके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले लौकिक योगक्षेमकी सिद्धिके लिये प्रेयको अपनाता है, वह इतना ही समझता है कि जो कुछ भोगपदार्थ प्राप्त हैं, वे सुरक्षित बने रहें और जो अप्राप्त है, वे प्रचुर मात्रामे मिल जायँ। यही योगक्षेम है ॥ २ ॥ सम्बन्ध—परमात्माकी प्राप्तिके साधनरूप श्रेयकी प्रशंसा करके अब यमराज साधारण मनुष्यसे नचिकेताकी विशेषता दिखलाते हुए उसके वैराग्यकी प्रशंसा करते हैं— स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥
- कठोपनिषद् * १९७ नचिकेतः = हे नचिकेता ! (उन्हीं मनुष्योंमें), सः त्वम् = तुम ( ऐसे निःस्पृह हो कि ), प्रियान् च=प्रिय लगनेवाले और, प्रियरूपान् = अत्यन्त सुन्दर रूपवाले, कामान् = इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंको, अभिध्यायन्= भलीभाँति सोच-समझकर, अत्यस्राक्षीः = तुमने छोड़ दिया,, एताम् वित्तमयीम् सृङ्काम् = इस सम्पत्तिरूप शृङ्खला (बेड़ी) को, न अवाप्तः = (तुम ) नहीं प्राप्त हुए (इसके बन्धनमें नहीं फँसे) यस्याम् = जिसमें, बहवः मनुष्याः = बहुत-से मनुष्य, मज्जन्ति= फँस जाते हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या-यमराज कहते हैं- 'हे नचिकेता ! तुम्हारी परीक्षा करके मैंने अच्छी तरह देख लिया कि तुम बडे बुद्धिमान्, विवेकी तथा वैराग्यसम्पन्न हो । अपनेको बहुत बड़े चतुर, विवेकी और तार्किक माननेवाले लोग भी जिस चमक-दमकवाली सम्पत्तिके मोहजालमे फँस जाया करते हैं, उसे भी तु ने स्वीकार नहीं किया। मैंने बड़ी ही लुभावनी भाषामे तुम्हें बार-बार पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, गौएँ, वन, सम्पत्ति, भूमि आदि अनेकों दुष्प्राप्य और लोभनीय भोगोंका प्रलोभन दिया, इतना ही नहीं, स्वर्गके दिव्य भोगों और अप्रतिम सुन्दरी स्वर्गीय रमणियोंके चिर-भोगसुखका लालच दिया, परंतु तुमने सहज ही उन सबकी उपेक्षा कर दी। अतः तुम अवश्य ही परमात्मतत्त्वका श्रवण करनेके सर्वोत्तम अधिकारी हो ॥ ३ ॥ दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता । विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४॥ या अविद्या=जो कि अविद्या; च विद्या इति ज्ञाता = और विद्या नामसे विख्यात हैं, एते= ये दोनों, दूरम् विपरीते= परस्पर अत्यन्त विपरीत (और), विषूची=भिन्न-भिन्न फल देनेवाली हैं, नचिकेतसम्= तुम नचिकेताको, विद्याभीप्सिनम् मन्ये=मैं विद्याका ही अभिलाषी मानता हूँ, (क्योंकि), त्वा बहवः कामाः= तुमको बहुत-से भोग, न अलोलुपन्त= (किसी प्रकार भी) नहीं लुभा सके ॥ ४ ॥ व्याख्या-ये अविद्या और विद्या नामसे प्रसिद्ध दो साधन पृथक्-पृथक् फल देनेवाले हैं और परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं। जिसकी भोगोंमें आसक्ति है, वह कल्याण-साधनमे आगे नहीं बढ़ सकता और जो कल्याण-मार्गका पथिक है, वह भोगोंकी ओर दृष्टि नहीं डालता । वह सब प्रकारके भोगोंको दु.खरूप मानकर उनका परित्याग कर देता है। हे नचिकेता ! मैं मानता हूँ कि तुम विद्याके ही अभिलाषी हो, क्योंकि बहुत-से बड़े-बड़े भोग भी तुम्हारे मनमें किञ्चिन्मात्र भी लोभ नहीं उत्पन्न कर सके ॥ ४ ॥ अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः । दन्दम्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५॥ अविद्यायाम् अन्तरे वर्तमानाः=अविद्याके भीतर स्थित होकर (भी), स्वयं धीराः=अपने-आपको बुद्धिमान् (और); पण्डितम् मन्यमानाः=विद्वान् माननेवाले, मूढाः=(भोगकी इच्छा करनेवाले) वे मूर्खलोग, दन्दम्यमानाः =नाना योनियोंमें चारो ओर भटकते हुए, (तथा) परियन्ति=ठीक वैसे ही ठोकरें खाते भटकते रहते हैं, यथा = जैसे, अन्धेन एव नीयमानाः = अन्धे मनुष्यके द्वारा चलाये जानेवाले, अन्धाः = अन्धे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते हैं) ॥५॥ व्याख्या-जब अन्धे मनुष्यको मार्ग दिखलानेवाला भी अन्धा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थान- पर नहीं पहुँच पाता, बीचमे ही ठोकरें खाता भटकता है और काँटे-कंकड़ोंसे विंधकर या गहरे गढ्ढे आदिमें गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है। वैसे ही उस मूर्खको भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विचित्र दु खपूर्ण योनियोंमें एव नरकादिमे प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पड़ता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझता है, विद्या बुद्धिके मिथ्याभिमानमें शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करता और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंको भोग करनेमें तथा उनके उपार्जनमें ही निरन्तर सलग्न रहकर मनुष्यजीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करता रहता है ॥ ५ ॥ न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६॥
१९८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * वित्तमोहेन मूढम् = इस प्रकार सम्पत्तिके मोहसे मोहित, प्रमाद्यन्तम् बालम् = निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको, साम्परायः = परलोक, न प्रतिभाति = नहीं सूझता; अयम् लोकः = वह समझता है कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही सत्य है' परः न अस्ति = इसके सिवा दूसरा (स्वर्ग नरक आदि लोक) कुछ भी नहीं है; इति मानी = इस प्रकार माननेवाला अभिमानी मनुष्य' पुनः पुनः = बार-बार, मे वशम् = मेरे ( यमराजके ) वशमे, आपद्यते = आता है ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस प्रकार मनुष्य-जीवनके महत्त्वको नहीं समझनेवाला अभिमानी मनुष्य सासारिक भोग सम्पत्तिकी प्राप्तिके साधनरूप धनादिके मोहमे मोहित हुआ रहता है, अतएव भोगोंमे आसक्त होकर वह प्रमादपूर्वक मनमाना आचरण करने लगता है । उसे परलोक नहीं सूझता । उसके अन्तःकरणमे इस प्रकारके विचार उत्पन्न ही नहीं होते कि मरनेके बाद मुझे अपने समस्त कर्मोंका फल भोगनेके लिये बाध्य होकर बार-बार विविध योनियोमे जन्म लेना पडेगा । वह मूर्ख समझता है कि बस, जो कुछ यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता है, यही लोक है । इसीकी सत्ता है । यहाँ जितना विषय-सुख भोग लिया जाय, उतनी ही बुद्धिमानी है । इसके आगे क्या हैं? परलोकको किसने देखा है ? परलोक तो लोगोंकी कल्पनामात्र है, इत्यादि । इस प्रकारकी मान्यता रखनेवाला मनुष्य बार-बार यमराजके चगुलमें पड़ता है और वे उसके कर्मानुसार उसे नाना योनियोमे ढकेलते रहते हैं । उसके जन्म मरणका चक्र नहीं टूटता ॥ ६ ॥ सम्बन्ध - इस प्रकार विषयासक्त, प्रत्यक्षवादी मूर्खोकी निन्दा करके अब उस आत्मतत्त्वकी और उसको जानने, समझने तथा वर्णन करनेवाले पुरुषकी दुर्लभताका वर्णन करते हैं- श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाऽऽश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥७॥ यः बहुभिः = जो (आत्मतत्त्व ) बहुतोको तो, श्रवणाय अपि = सुननेके लिये भी, न लभ्यः = नहीं मिलता, यम्= जिसको, बहवः = बहुत से लोग, शृण्वन्तः अपि = सुनकर भी, न विद्युः = नहीं समझ सकते, अस्य = ऐसे इस गूढ आत्मतत्त्वका; वक्ता आश्चर्यः = वर्णन करनेवाला महापुरुष आश्चर्यमय है (बड़ा दुर्लभ है), लब्धा कुशलः = उसे प्राप्त करनेवाला भी बड़ा कुशल (सफलजीवन) कोई एक ही होता है; कुशलानुशिष्टः = और जिसे तत्त्वकी उपलब्धि हो गयी है, ऐसे ज्ञानी महापुरुषके द्वारा शिक्षा प्राप्त किया हुआ, ज्ञाता = आत्मतत्त्वका ज्ञाता भी, आश्चर्यः = आश्चर्यमय है (परम दुर्लभ है) ॥ ७ ॥ व्याख्या-आत्मतत्त्वकी दुर्लभता बतलानेके हेतुसे यमराजने कहा-नचिकेता ! आत्मतत्त्व कोई साधारण-सी बात नहीं है । जगत्मे अधिकांश मनुष्य तो ऐसे ह--जिनको आत्मऋल्याणकी चर्चातक सुननेको नहीं मिलती । वे ऐसे वातावरणमे रहते हैं कि जहाँ प्रात काल जागनेसे लेकर रात्रिको सोनेतक केवल विषय चर्चा ही हुआ करती है, जिसमे उनका मन आठो पहर विषय चिन्तनमे डूबा रहता है । उनके मनमे आत्मतत्त्व सुनने समझनेकी कभी कल्पना ही नहीं आती, और भूले-भटके यदि ऐसा कोई प्रसङ्ग आ जाता है तो उन्हें विषय-सेवनसे अवकाश नहीं मिलता । कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो सुनना-समझना उत्तम समझकर सुनते तो ह, परतु उनके विषयाभिभूत मनमे उसकी धारणा नहीं हो पाती अथवा मन्दबुद्धिके कारण वे उसे समझ नहीं पाते । जो तीक्ष्णबुद्धि पुरुष समझ लेते है, उनमें भी ऐसे आश्चर्यमय महापुरुष कोई विरले ही होते हैं, जो उस आत्म- तत्त्वका यथार्थरूपसे वर्णन करनेवाले समर्थ वक्ता हो। एव ऐसे पुरुष भी कोई एक ही होते हैं जिन्होने आत्मतत्त्वको प्राप्त करके जीवनकी सफलता सम्पन्न की हो; और भलीभाँति समझाकर वर्णन करनेवाले सफलजीवन अनुभवी आत्मदर्शी आचार्यके द्वारा उपदेश प्राप्त करके उसके अनुसार मनन निदिध्यासन करते करते तत्त्वका साक्षात्कार करनेवाले पुरुष भी जगत्मे कोई विरले ही होते हैं । अतः इसमे सर्वत्र ही दुर्लभता है ॥ ७ ॥ सम्बन्ध-अब आत्मज्ञानकी दुर्लभताका कारण बताते हैं- न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥८॥ अवरेण नरेण प्रोक्तः = अल्पज्ञ मनुष्यके द्वारा बतलाये जानेपर; बहुधा चिन्त्यमानः = ( और उसके अनुसार )
- कठोपनिषद् * १९९ बहुत प्रकारसे चिन्तन किये जानेपर भी; एषः = यह आत्मतत्त्व, सुविज्ञेयः = सहज ही समझमें आ जाय, न = ऐसा नहीं है; अनन्यप्रोक्ते = किमी दूसरे ज्ञानी पुरुषके द्वारा उपदेश न किये जानेपर; अत्र गतिः न अस्ति = इस विषयमें मनुष्यका प्रवेश नहीं होता, हि अणुप्रमाणात् = क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुसे भी; अणीयान् = अधिक सूक्ष्म है, अतर्क्यम् = ( इसलिये ) तर्कसे अतीत है ॥ ८ ॥ व्याख्या-प्रकृतिपर्यन्त जो भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्त्व है, यह आत्मतत्त्व उससे भी सूक्ष्म है। यह इतना गहन है कि जबतक इसे यथार्थरूपसे समझानेवाले कोई महापुरुष नहीं मिलते, तबतक मनुष्यका इसमे प्रवेश पाना अत्यन्त ही कठिन है। अल्पज्ञ—साधारण ज्ञानवाले मनुष्य यदि इसे बतलाते हैं और उसके अनुसार यदि कोई विविध प्रकारसे इसके चिन्तनका अभ्यास करता है, तो उसका आत्मज्ञानरूपी फल नहीं होता। आत्मतत्त्व तनिक-सा भी समझमे नहीं आता। न यह ऐसा ही है कि दूसरेसे सुने बिना केवल अपने आप तर्क-वितर्कयुक्त विचार करनेसे समझमें आ जाय। सुनना आवश्यक है, पर सुनना उनसे है, जो इसे भलीभाँति जाननेवाले महापुरुष हों। तभी इस तर्कसे सर्वथा अतीत विषयमे जानकारी हो सकती है ॥ ८ ॥ नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९॥ प्रेष्ठ = हे प्रियतम !, याम् त्वम् आपः = जिसको तुमने पाया है, एषा मतिः = यह बुद्धि, तर्केण न आपनेया = तर्कसे नहीं मिल सकती ( यह तो ); अन्येन प्रोक्ता एव = दूसरेके द्वारा कही हुई ही, सुज्ञानाय = आत्मज्ञानमें निमित्त, [ भवति = होती है;] बत = सचमुच ही; (तुम) सत्यधृतिः = उत्तम धैर्यवाले; असि = हो, नचिकेतः = हे नचिकेता ! (हम चाहते हैं कि); = तुम्हारे-जैसे ही, प्रष्टा = पूछनेवाले; नः भूयात् = हमें मिला करें ॥ ९॥ व्याख्या-नचिकेताकी प्रशंसा करते हुए यमराज फिर कहते है कि हे प्रियतम ! तुम्हारी इस पवित्र मति—निर्मल निष्ठाको देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। ऐसी निष्ठा तर्कसे कभी नहीं मिल सकती। यह तो तभी उत्पन्न होती है, जब भगवत्कृपासे किसी महापुरुषका सङ्ग प्राप्त होता है और उनके द्वारा लगातार परमात्माके महत्त्वका विशद विवेचन सुननेका सौभाग्य मिलता है। ऐसी निष्ठा ही मनुष्यको आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करनेमें प्रवृत्त करती है। इतना प्रलोभन दिये जानेपर तुम अपनी निष्ठापर दृढ रहे—इससे यह सिद्ध है कि वस्तुतः तुम सच्ची धारणासे सम्पन्न हो। नचिकेता ! हमें तुम-जैसे ही पूछनेवाले जिज्ञासु मिला करें ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-अब यमराज अपने उदाहरणसे निष्काम भावकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं— जानाम्यहँ शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥१०॥ अहम् जानामि = मैं जानता हूँ कि; शेवधिः = कर्मफलरूप निधि; अनित्यम् इति = अनित्य है, हि अध्रुवैः = क्योंकि अनित्य (विनाशशील) वस्तुओंसे; तत् ध्रुवम् = वह नित्य पदार्थ (परमात्मा), न हि प्राप्यते = नहीं मिल सकता, ततः = इसलिये; मया = मेरे द्वारा (कर्तव्यबुद्धिसे), अनित्यैः द्रव्यैः = अनित्य पदार्थोंके द्वारा, नाचिकेतः = नाचिकेत नामक, अग्निः चितः = अग्निका चयन किया गया (अनित्य भोगोंकी प्राप्तिके लिये नहीं, अतः उस निष्काम भावकी अपूर्व शक्तिसे मै ), नित्यम् = नित्य वस्तु परमात्माको; प्राप्तवान् = प्राप्त हो गया, अस्मि = हूँ ॥ १० ॥ व्याख्या-नचिकेता ! मैं इस बातको भलीभाँति जानता हूँ कि कर्मोंके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके भोगसमूहकी जो निधि मिलती है, वह चाहे कितनी ही महान् क्यों न हो, एक दिन उसका विनाश निश्चित है, अतएव वह अनित्य है। और यह सिद्ध है कि अनित्य साधनोंसे नित्य पदार्थकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस रहस्यको जानकर ही मैने नाचिकेत अग्निके चयनादिरूपसे जो कुछ यज्ञादि कर्म अनित्य वस्तुओंके द्वारा किये, सब-के-सब कामना और आसक्तिसे रहित होकर केवल कर्तव्यबुद्धिसे किये। इस निष्काम भावकी ही यह महिमा है कि अनित्य पदार्थोंके द्वारा यजन करके भी मैंने नित्य सुखरूप परमात्माको प्राप्त कर लिया* ॥ १० ॥
- कुछ आदरणीय महानुभावोंने इसका यह अर्थ किया है—
२०० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध—नचिकेतामें वह निष्कामभाव पूर्णरूपसे है, इसलिये यमराज उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं— कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम् । स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता !, कामस्य आप्तिम्=जिसमें सब प्रकारके भोग मिल सकते हैं, जगतः प्रतिष्ठाम्=जो जगत्का आधार, क्रतोः अनन्त्यम्=यज्ञका चिरस्थायी फल, अभयस्य पारम्=निर्भयताकी अवधि और; स्तोममहत्= स्तुति करनेयोग्य एव महत्त्वपूर्ण है (तथा), उरुगायम्=वेदोंमें जिसके गुण नाना प्रकारसे गाये गये हैं, प्रतिष्ठाम्=(और ) जो दीर्घकालतककी स्थितिसे सम्पन्न है, ऐसे स्वर्गलोकको, दृष्ट्वा धृत्या=देखकर भी तुमने धैर्यपूर्वक; अत्यस्राक्षीः=उसका त्याग कर दिया, [ अतः=इसलिये मैं समझता हूँ कि ], धीरः (असि)=तुम बहुत ही बुद्धिमान् हो ॥ ११ ॥ व्याख्या—नचिकेता ! तुम सब प्रकारसे श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न और निष्काम हो । मैंने तुम्हारे सामने वरदानके रूपमें उस स्वर्गलोकको रक्खा, जो सब प्रकारके भोगोंसे परिपूर्ण, जगत्का आधारस्वरूप, यज्ञादि शुभकर्मोंका अन्तरहित फल, सब प्रकारके दुःख और भयसे रहित, स्तुति करनेयोग्य और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । वेदोंने भाँति भाँतिमें उसकी शोभाके गुणगान किये हैं और वह दीर्घकालतक स्थित रहनेवाला है, तुमने उसके महत्त्वको समझकर भी बड़े धैर्यके साथ उसका परित्याग कर दिया, तुम्हारा मन तनिक भी उसमें आसक्त नहीं हुआ, तुम अपने निश्चयपर दृढ और अटल रहे । यह साधारण बात नहीं है । इसलिये मैं यह मानता हूँ कि तुम बड़े ही बुद्धिमान्, अनासक्त और आत्मतत्त्वको जाननेके अधिकारी हो* ॥११॥ सम्बन्ध—इस प्रकार नचिकेताके निष्कामभावको देखकर यमराजने निश्चय कर लिया कि यह परमात्माके तत्त्वज्ञानका यथार्थ अधिकारी है, अत उसके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करनेके लिये यमराज अब दो मन्त्रोंमें परब्रह्म परमात्माकी महिमाका वर्णन करते हैं— तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥ गूढम्=जो योगमायाके पर्देमें छिपा हुआ, अनुप्रविष्टम्=सर्वव्यापी, गुहाहितम्=सबके हृदयरूप गुफामे स्थित (अतएव ), गह्वरेष्ठम्=संसाररूप गहन वनमें रहनेवाला, पुराणम्=सनातन है, ऐसे, तम् दुर्दर्शम् देवम्=उस कठिनतासे देखे जानेवाले परमात्मदेवको, धीरः=शुद्ध बुद्धियुक्त साधक, अध्यात्मयोगाधिगमेन=अध्यात्मयोगकी प्राप्तिके द्वारा; मत्वा=समझकर, हर्षशोकौ जहाति=हर्ष और शोकको त्याग देता है ॥ १२ ॥ व्याख्या—यह सम्पूर्ण जगत् एक अत्यन्त दुर्गम गहन वनके सदृश है, परंतु यह परब्रह्म परमेश्वरसे परिपूर्ण है । वह सर्वव्यापी इसमें सर्वत्र प्रविष्ट है ( गीता ९ । ४ )। वह सबके हृदयरूपी गुफामे स्थित है । ( गीता १३ । १८, १५ । १५; मैं जानता हूँ कि कर्मफलरूप निधि अनित्य है, क्योंकि अनित्य साधनोंसे परमात्मारूपी नित्य निधि नहीं मिल सकती । यह जानते हुए भी मैंने स्वर्गके साधनभूत नाचिकेत अग्निका अनित्य पदार्थोंके द्वारा चयन किया था, उसीसे मैंने अधिकारसम्पन्न होकर यह आपेक्षिक नित्य ( दूसरे पदोंकी अपेक्षा अधिक कालतक रहनेवाला तथा श्रेष्ठ ) यमराजका पद प्राप्त किया ।
- १-इसका अर्थ एक आदरणीय महानुभाव इस प्रकार करते हैं— नचिकेता ! तुमने उस परमपदार्थ परमात्माके सम्मुख जगत्की चरम सीमाके भोग, प्रतिष्ठा, यज्ञका अनन्त फलरूप हिरण्यगर्भका पद, अभयकी मर्यादा (चिरकालस्थायी दीर्घजीवन ), स्तुत्य और महान् अणिमादि ऐश्वर्य, शुभफल और अत्युत्तम गति—इन सभीको हेय समझकर धैर्यके द्वारा त्याग दिया है । इसलिये तुम बड़े ही बुद्धिमान् हो । २-एक दूसरे महानुभावने इसका अर्थ यों किया है— जहाँ कामनाकी परिसमाप्ति हो जाती है, जो जगत्का आधार है, जहाँ ज्ञानकी अनन्तता है, जो अभयकी सीमा है, जो सबके द्वारा स्तुतिके योग्य है, जो सबसे महान् है, जिसकी सब स्तुति करते हैं और जो आप ही अपनी प्रतिष्ठा है, उस परमात्माको देखकर— उसको सामने रखकर बड़े धैर्यके साथ तुमने इस अनित्य निधिका त्याग कर दिया है, इसलिये तुम बड़े बुद्धिमान् हो ।
- कठोपनिषद् * २०१ १८ । ६१) । इस प्रकार नित्य साथ रहनेपर भी लोग उसे सहजमें देख नहीं पाते; क्योंकि वह अपनी योगमायाके पर्देमें छिपा है (गीता ७ । २५), इसलिये अत्यन्त गुप्त है। उसके दर्शन बहुत ही दुर्लभ हैं। जो शुद्ध-बुद्धिसम्पन्न साधक अपने मन-बुद्धिको नित्य निरन्तर उसके चिन्तनमे संलग्न रखता है, वह उस सनातन देवको प्राप्त करके सदाके लिये हर्ष शोकसे रहित हो जाता है। उसके अन्त:करणमेसे हर्ष-शोकादिके विकार समूल नष्ट हो जाते हैं* ॥ १२ ॥ एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृद्ध्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥ मर्त्यः = मनुष्य (जब); एतत् = इस, धर्म्यम् = धर्ममय (उपदेश) को, श्रुत्वा = सुनकर; सम्परिगृह्य = भलीभाँति ग्रहण करके, प्रवृद्ध्य = (और) उसपर विवेकपूर्वक विचार करके; एतम् = इस; अणुम् = सूक्ष्म आत्मतत्त्वको; आप्य = जानकर अनुभव कर लेता है; (तब), सः = वह, मोदनीयम् = आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; लब्ध्वा = पाकर, मोदते हि = आनन्दमें ही मग्न हो जाता है; नचिकेतसम् = तुम नचिकेताके लिये; विवृतम् सद्म मन्ये = (मैं) परमधामका द्वार खुला हुआ मानता हूँ ॥ १३ ॥ व्याख्या—इस अध्यात्मविषयक धर्ममय उपदेशको पहले तो अनुभवी महापुरुषके द्वारा अतिशय श्रद्धापूर्वक सुनना चाहिये, सुनकर उसका मनन करना चाहिये। तदनन्तर एकान्तमे उसपर विचार करके बुद्धिमे उसको स्थिर करना चाहिये । इस प्रकार साधन करनेपर जब मनुष्यको आत्मस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् जब वह आत्माको तत्त्वसे समझ लेता है, तब आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। उस आनन्दके महान् समुद्रको पाकर वह उसमें निमग्न हो जाता है। हे नचिकेता ! तुम्हारे लिये उस परमधामका द्वार खुला हुआ है। तुमको वहाँ जानेसे कोई रोक नहीं सकता। तुम ब्रह्म- प्राप्तिके उत्तम अधिकारी हो, ऐसा मैं मानता हूँ ॥ १३ ॥ सम्बन्ध—यमराजके मुखसे परब्रह्म पुरुषोत्तमकी महिमा सुनकर और अपनेको उसका अधिकारी जानकर नचिकेताके मनमें परमात्मतत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी। साथ ही उसे यमराजके द्वारा अपनी प्रशंसा सुनकर साधु-सम्मत सङ्कोच भी हुआ। इसलिये उसने यमराजसे बीचमें ही पूछा— अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥ यत् तत् = जिस उस परमेश्वरको, धर्मात् अन्यत्र = धर्मसे अतीत; अधर्मात् अन्यत्र = अधर्मसे भी अतीत; च = तथा; अस्मात् कृताकृतात् = इस कार्य और कारणरूप सम्पूर्ण जगत्से भी; अन्यत्र च = भिन्न और; भूतात् भव्यात् = भूत, वर्तमान एव भविष्यत्—तीनों कालोंसे तथा इनसे सम्बन्धित पदाथसेि भी; अन्यत्र = पृथक्; पश्यसि = (आप) जानते हैं; तत् = उसे; वद = बतलाइये ॥ १४ ॥ व्याख्या—नचिकेता कहता है—भगवन् ! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो धर्म और अधर्मके सम्बन्धसे रहित, कार्य कारणरूप प्रकृतिसे पृथक् एव भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन सबसे भिन्न जिस परमात्मतत्त्वको आप जानते हैं, उसे मुझको बतलाइये† ॥ १४ ॥
- १-कुछ आदरणीय महानुभावोंने इसका अर्थ यों किया है कि— 'उस दुर्दर्श, शब्दादि प्राकृत विषयविकाररूप विषानसे छिपे हुए, बुद्धिमें स्थित, अनेक अनर्थोंसे व्याप्त देहमें स्थित, चिरन्तन— पुरातन देवको जो अध्यात्मयोगकी प्राप्तिके द्वारा जान लेता है, वह धीर पुरुष हर्ष-शोकका परित्याग कर देता है। २-प्रात स्मरणीय भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने भी ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें इस प्रकरणको परमात्मविषयक माना है ('प्रकरणं चेदं परमात्मन '—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा०२, के १२ वें सूत्रका भाष्य ) । † भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने इस प्रकरणको भी अपने ब्रह्मसूत्रभाष्यमें परमेश्वरविषयक ही माना है ( 'पृष्टं चेह ब्रह्म'—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० ३ के २४ वें सूत्रका भाष्य ) । उ० अं० २६—२७—
२७२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध-नचिकेताके इस प्रकार पूछनेपर यमराज उस ब्रह्मतत्त्वके वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं- सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाꣳसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदꣳ सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ सर्वे वेदाः = सम्पूर्ण वेद; यत् पदम् = जिस परम पदको; आमनन्ति = बारंबार प्रतिपादन करते हैं; च = और सर्वाणि = सम्पूर्ण; तपांसि = तप; यत् = जिस पदका; वदन्ति = लक्ष्य कराते हैं अर्थात् वे जिसके साधन हैं; यत् इच्छन्तः = जिसको चाहनेवाले साधकगण; ब्रह्मचर्यम् = ब्रह्मचर्यका; चरन्ति = पालन करते हैं; तत् पदम् = वह पद; ते = तुम्हें; संग्रहेण = संक्षेपसे; ब्रवीमि = (मैं) बतलाता हूँ; (वह है) ओम् = ओम्; इति = ऐसा; एतत् = यह (एक अक्षर-) ॥ १५ ॥ व्याख्या-यमराज यहाँ परब्रह्म पुरुषोत्तमको परमप्राप्य बतलाकर, उसके वाचक ॐकारको प्रतीकरूपसे उसका स्वरूप बतलाते हैं। वे कहते हैं कि समस्त वेद नोंनों प्रकार और नाना छन्दोंसे जिसका प्रतिपादन करते हैं, सम्पूर्ण तप आदि साधनों- का जो एकमात्र परम और चरम लक्ष्य है तथा जिसको प्राप्त करनेकी इच्छासे साधक निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्यका अनुष्ठान किया करते हैं, उस पुरुषोत्तम भगवान्का परमतत्त्व मैं तुम्हें संक्षेपमें बतलाता हूँ। वह है 'ॐ' यह एक अक्षर ॥ १५ ॥ सम्बन्ध-नामरहित होनेपर भी परमात्मा अनेक नामोंसे पुकारे जाते हैं। उनके सब नामोंमेंसे 'ओम्' सर्वश्रेष्ठ माना गया है, अतः यहाँ नाम और नामीका अभेद मानकर 'प्रणव'को परब्रह्म पुरुषोत्तमके स्थानमें वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं- एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् । एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥ एतत् = यह; अक्षरम् एव हि ब्रह्म = अक्षर ही तो ब्रह्म है (और); एतत् = यह; अक्षरम् एव हि = अक्षर ही; परम् = परब्रह्म है; एतत् एव हि = इसी; अक्षरम् = अक्षरको; ज्ञात्वा = जानकर; यः = जो; यत् = जिसको; इच्छति = चाहता है; तस्य = उसको; तत् = वही (मिल जाता है) ॥ १६ ॥ व्याख्या-यह अविनाशी प्रणव्-ॐकार ही तो ब्रह्म (परमात्मा) का निर्विशेष स्वरूप है और यही स्वयं समग्र ब्रह्म परम पुरुष पुरुषोत्तम है,अर्थात् उस ब्रह्म और परब्रह्म दोनोंका ही नाम ॐकार है। अतः इस तत्त्वको समझकर साधक इसके द्वारा दोनोंमेंसे किसी भी अभीष्ट रूपको प्राप्त कर सकता है * ॥ १६ ॥ एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥ एतत् = यही; श्रेष्ठम् = अत्युत्तम; आलम्बनम् = आलम्बन है; एतत् = यही (सबका); परम् आलम्बनम् = अन्तिम आश्रय है; एतत् = इस; आलम्बनम् = आलम्बनको; ज्ञात्वा = भलीभाँति जानकर; ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोकमें; महीयते = (साधक) महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥ व्याख्या-यह ॐकार ही परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये सब प्रकारके आलम्बनोंमेंसे सबसे श्रेष्ठ आलम्बन है और यहीं चरम आलम्बन है। इससे परे और कोई आलम्बन नहीं है अर्थात् परमात्माके श्रेष्ठ नामकी शरण हो जाना ही उनकी प्राप्तिका सर्वोत्तम एव अमोघ साधन है। इस रहस्यको समझकर जो साधक श्रद्धा और प्रेमपूर्वक इसपर निर्भर करता है, वह निस्सन्देह परमात्माकी प्राप्तिका परम गौरव लाभ करता है ॥ १७ ॥
- इस मन्त्रका यह अर्थ भी किया गया है-- यह अक्षर ही अपर ब्रह्म है और यह अक्षर ही परब्रह्म है। यह दोनोंका ही प्रतीक है। इसीको उपास्य ब्रह्म जानकर जो पर अथवा-'अपर' जिस ब्रह्मकी इच्छा करता है वह उसीको प्राप्त हो जाता है। यदि उसका उपास्य परब्रह्म (निर्विशेष आत्मा) हो तो वह केवल जाना जा सकता है और यदि अपरब्रह्म (सविशेष सगुण) हो तो प्राप्त किया जा सकता है।
- कठोपनिषद् * ९०३ सम्बन्ध—इस प्रकार ॐकारको ब्रह्म और परब्रह्म इन दोनोंका प्रतीक बताकर अब नचिकेताके प्रश्नानुसार यमराज पहले आत्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं— न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥ विपश्चित्=नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा, न जायते=न तो जन्मता है, वा न म्रियते=और न मरता ही है, अयम् न=यह न तो स्वय, कुतश्चित्=किसीसे हुआ है, [ न=न (इससे),] कश्चित्=कोई भी, बभूव=हुआ है अर्थात् यह न तो किसीका कार्य है और न कारण ही है, अयम्=यह, अजः=अजन्मा, नित्यः=नित्य, शाश्वतः=सदा एकरस रहनेवाला (और), पुराणः=पुरातन है अर्थात् क्षय और वृद्धिसे रहित है, शरीरे हन्यमाने=शरीरके नाश किये जानेपर भी (इसका); न हन्यते=नाश नहीं किया जा सकता* ॥ १८ ॥ हन्ता चेन्मन्यते हन्तुग् हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायग् हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ चेत्=यदि कोई, हन्ता=मारनेवाला व्यक्ति, हन्तुम्=अपनेको मारनेमें समर्थ, मन्यते=मानता है (और), चेत्=यदि, हतः=(कोई) मारा जानेवाला व्यक्ति, हतम्=अपनेको मारा गया, मन्यते=समझता है (तो), तौ उभौ=वे दोनों ही; न विजानीतः=(आत्मस्वरूपको) नहीं जानते (क्योंकि), अयम्=यह आत्मा, न हन्ति=न तो (किसीको) मारता है (और), न हन्यते=न मारा (ही) जाता है† ॥ १९ ॥ व्याख्या—यमराज यहाँ आत्माके शुद्ध स्वरूपका और उसकी नित्यताका निरूपण करते हैं, क्योंकि जबतक साधक को अपनी नित्यता और निर्विकारताका अनुभव नहीं हो जाता एव वह जबतक अपनेको शरीर आदि अनित्य वस्तुओंसे भिन्न नहीं समझ लेता, तबतक इन अनित्य पदार्थोंसे उसका वैराग्य होकर उसके अन्तःकरणमे नित्य तत्त्वकी अभिलाषा उत्पन्न नहीं होती । उसको यह दृढ अनुभूति होनी चाहिये कि जीवात्मा नित्य चेतन ज्ञानस्वरूप है, अनित्य, विनाशी, जड शरीर और भोगोंसे वास्तवमें इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह अनादि और अनन्त है, न तो इसका कोई कारण है और न कार्य ही; अतः यह जन्म-मरणसे सर्वथा रहित, सदा एकरस, सर्वथा निर्विकार है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता। जो लोग इसको मारनेवाला या मरनेवाला मानते है, वे वस्तुतः आत्मस्वरूपको जानते ही नहीं, वे सर्वथा भ्रान्त हैं। उनकी बातोंपर ध्यान नहीं देना चाहिये । वस्तुतः आत्मा न तो किसीको मारता है और न इसे कोई मार ही सकता है। साधकको शरीर और भोगोंकी अनित्यता और अपने आत्माकी नित्यतापर विचार करके, इन अनित्य भोगोंके सुखकी आशाका त्याग करके सदा अपने साथ रहनेवाले नित्य सुखस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका अभिलाषी बनना चाहिये ॥ १८-१९ ॥
- गीतामें इस मन्त्रके भावको इस प्रकार समझाया गया है— न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ (२।२०) ‘यह आत्मा किसी भी कालमें न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है। क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता ।’ † गीतामें इस मन्त्रके भावको और भी स्पष्टरूपसे व्यक्त किया गया है— य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ (२।१९) ‘जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मारा गया मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते, क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको मारता है, न किसीके द्वारा मारा जाता है ।’
२०४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध—इस प्रकार आत्मतत्त्वके वर्णनद्वारा नचिकेताके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके यमराज अब परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं— अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥ अस्य=इस, जन्तोः=जीवात्माके, गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें, निहितः=रहनेवाला, आत्मा=परमात्मा, अणोः अणीयान्=सूक्ष्मसे अति सूक्ष्म (और), महतः महीयान्=महान्से भी महान् है; आत्मनः तम् महिमानम्=परमात्माकी उस महिमाको, अक्रतुः=कामनारहित (और), वीतशोकः=चिन्तारहित कोई विरला साधक, धातुप्रसादात्=सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वरकी कृपासे ही, पश्यति=देख पाता है ॥ २० ॥ व्याख्या—इससे पहले जीवात्माके शुद्ध स्वरूपका वर्णन किया गया है, उसीको इस मन्त्रमें 'जन्तु' नाम देकर उसकी बद्धावस्था व्यक्त की गयी है । भाव यह कि यद्यपि परब्रह्म पुरुषोत्तम उस जीवात्माके अत्यन्त समीप—जहाँ यह स्वयं रहता है, वहीं हृदयमे छिपे हुए हैं, तो भी यह उनकी ओर नहीं देखता । मोहवश भोगोंमे भूला रहता है । इसी कारण यह 'जन्तु' है—मनुष्य-शरीर पाकर भी कीट-पतङ्ग आदि तुच्छ प्राणियोंकी भाँति अपना दुर्लभ जीवन व्यर्थ नष्ट कर रहा है । जो साधक पूर्वोक्त विवेचनके अनुसार अपने-आपको नित्य चेतनस्वरूप समझकर सब प्रकारके भोगोंकी कामनासे रहित और शोकरहित हो जाता है, वह परमात्माकी कृपासे यह अनुभव करता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम अणुसे भी अणु और महान्- से भी महान्—सर्वव्यापी हैं और इस प्रकार उनकी महिमाको समझकर उनका साक्षात्कार कर लेता है । ( यहाँ 'धातु- प्रसादान्'का अर्थ 'परमेश्वरकी कृपा' किया गया है । 'धातु' शब्दका अर्थ सर्वधारक परमात्मा माना गया है। विष्णुसहस्र- नाममें भी 'अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तम '- 'धातु' को भगवान्का एक नाम माना गया है* ॥ २० ॥ आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥ आसीनः=(वह परमेश्वर) बैठा हुआ ही, दूरम् व्रजति=दूर पहुँच जाता है, शयानः=सोता हुआ (भी), सर्वतः=सब ओर, याति=चलता रहता है, तम् मदामदम् देवम्=उस ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त न होनेवाले देवको; मदन्यः कः=मुझसे भिन्न दूसरा कौन; ज्ञातुम्=जाननेमें, अर्हति=समर्थ है ॥ २१ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमात्मा अचिन्त्यशक्ति हैं और विरुद्धधर्माश्रय हैं । एक ही समयमे उनमें विरुद्ध धर्मोंकी लीला होती है । इसीसे वे एक ही साथ सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और महान्-से-महान् बताये गये हैं । यहाँ यह कहते हैं कि वे परमेश्वर अपने नित्य परमधाममें विराजमान रहते हुए ही भक्ताधीनतावश उनकी पुकार सुनते ही दूर-से-दूर चले जाते हैं । परम धाममें निवास करनेवाले पार्षद भक्तोंकी दृष्टिमें वहाँ शयन करते हुए ही वे सब ओर चलते रहते हैं । अथवा वे परमात्मा सदा-सर्वदा सर्वत्र स्थित हैं । उनकी सर्वव्यापकता ऐसी है कि बैठे भी वही हैं, दूर देशमें चलते भी वही हैं, सोते भी वही हैं और सब ओर जाते-आते भी वही हैं । वे सर्वत्र सब रूपोंमें नित्य अपनी महिमामें स्थित हैं । इस प्रकार अलौकिक परमैश्वर्य- स्वरूप होनेपर भी उन्हें अपने ऐश्वर्यका तनिक भी अभिमान नहीं है । उन परमदेवको जाननेका अधिकारी उनका कृपापात्र मेरे (आत्मतत्त्वज्ञ यमराजके सदृश अधिकारियोंके) सिवा दूसरा कौन हो सकता है ?† ॥ २१ ॥
- एक आदरणीय महानुभावने इसका निम्नलिखित अर्थ करते हुए 'धातुप्रसादात्'का अर्थ 'इन्द्रियोंको निर्मलता' माना है— ' यह आत्मा ही सूक्ष्म-से-सूक्ष्मतर और महान्-से-महान् है, क्योंकि नाम रूपवाली सभी वस्तुएँ इसकी उपाधि हैं। बाह्य विषयोंसे उपरत दृष्टिवाला निष्काम साधक अपनी इन्द्रियों—जो शरीरको धारण करनेके कारण 'धातु' कहलाती हैं—के प्रसाद— निर्मलतासे उस आत्माकी कर्मनिमित्तक वृद्धि और क्षयमे रहित महिमाको देखता है, अर्थात् इस बातको साक्षात् जानता है कि यह मैं हूँ, तदनन्तर वह शोकरहित हो जाता है। † कुछ आदरणीय महानुभावोंने ऐसा अर्थ किया है— वह अचल होकर भी दूर चला जाता है तथा शयन करता हुआ भी सब ओर पहुँचता है, इस प्रकार वह आत्मा समग्र और
- कठोपनिषद् * २०५ सम्बन्ध—अब इस प्रकार उन परमेश्वरकी महिमाको समझनेवाले पुरुषकी पहचान बताते हैं— अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥ अनवस्थेषु=(जो) स्थिर न रहनेवाले (विनाशशील), शरीरेषु=शरीरोंमें, अशरीरम्=शरीररहित (एव); अव- स्थितम्=अविचलभावसे स्थित है, महान्तम्=(उस) महान्, विभुम्=सर्वव्यापी, आत्मानम्=परमात्माको, मत्वा=जानकर; धीरः=बुद्धिमान् महापुरुष, न शोचति=(कभी किसी भी कारणसे) शोक नहीं करता ॥ २२ ॥ व्याख्या—प्राणियोंके शरीर अनित्य और विनाशशील हैं, इनमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। इन सबमें सम- भावसे स्थित परब्रह्म पुरुषोत्तम इन शरीरोंसे सर्वथा रहित, अशरीरी हैं। इसी कारण वे नित्य और अचल हैं। प्राकृत देश-काल-गुणादिसे अपरिच्छिन्न उन महान्, सर्वव्यापी, सबके आत्मरूप परमेश्वरको जान लेनेके बाद वह ज्ञानी महापुरुष कभी किसी भी कारणसे किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता। यही उसकी पहचान है* ॥ २२ ॥ सम्बन्ध—अब यह बतलाते हैं कि वे परमात्मा अपने पुरुषार्थसे नहीं मिलते, वर उसीको मिलते हैं, जिसको वे स्वीकार कर लेते हैं— नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ २३ ॥ अयम्=यह; आत्मा न=परब्रह्म परमात्मा न तो, प्रवचनेन=प्रवचनसे, न मेधया=न बुद्धिसे (और), न बहुना श्रुतेन=न बहुत सुननेसे ही, लभ्यः=प्राप्त हो सकता है, यम्=जिसको, एषः=यह, वृणुते=स्वीकार कर लेता है, तेन एव लभ्यः=उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि), एषः आत्मा=यह परमात्मा, तस्य=उसके लिये, स्वाम् तनूम्=अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते=प्रकट कर देता है ॥ २३ ॥ व्याख्या—जिन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन मैं कर रहा हूँ, वे न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्म-तत्त्वका नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं, न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं, जो बुद्धि- के अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं, और न उनको ही मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनतेरहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है, जो उनके बिना रह नहीं सकता। परंतु जो अपनी बुद्धि या साधनपर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमाया- का परदा हटाकर उसके सामने अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूपमें प्रकट हो जाते हैं† ॥ २३ ॥ सम्बन्ध—अब यह बतलाते हैं कि परमात्मा किसको प्राप्त नहीं होते— नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ अमद—हर्षसहित और हर्षरहित—इस प्रकार विरुद्ध धर्मवाला है। उस मदयुक्त और मदरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है ?
- इस मन्त्रका यह अर्थ भी माना गया है— आत्मा अपने स्वरूपसे आकाशके समान है, अतः देव, पितृ और मनुष्यादि शरीरोंमें शरीररहित है, अवस्थितिरहित—अनित्योंमें अवस्थित नित्य अविकारी है, उस महान् और सर्वव्यापक आत्माको 'यही मैं हूँ' ऐसा जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता। † इस मन्त्रका यह अर्थ भी माना गया है— यह आत्मा वेदोंके प्रवचनसे विदित होने योग्य नहीं है, न मेधा—ग्रन्थ-धारणकी शक्तिसे ही, और न केवल बहुत श्रवण करनेसे