कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- १६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * श्रद्धावान् तत्त्वका अधिकारी होता है; अतः आप कृपया मुझको उस अग्निविद्याका उपदेश कीजिये, जिसे जानकर लोग स्वर्गलोकमे रहकर अमृतत्वको—देवत्वको प्राप्त होते हैं। यह मैं आपसे दूसरा वर माँगता हूँ ॥ १२-१३ ॥ सम्बन्ध—तब यमराज बोले— प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता, स्वर्ग्यम् अग्निम्=स्वर्गदायिनी अग्निविद्याको, प्रजानन्=अच्छी तरह जाननेवाला मैं, प्रब्रवीमि=तुम्हारे लिये उसे भलीभाँति बतलाता हूँ, तत् उ मे निबोध=(तुम) उसे मुझसे भलीभाँति समझ लो, त्वम् एतम्=तुम इस विद्याको; अनन्तलोकाप्तिमू=अविनाशी लोककी प्राप्ति करानेवाली, प्रतिष्ठाम्=उसकी आधारस्वरूपा; अथो=और, गुहायाम् निहितम्=बुद्धिरूप गुफामें छिपी हुई विद्धि=समझो ॥ १४ ॥ व्याख्या—नचिकेता ! मैं उस स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याको भलीभाँति जानता हूँ और तुमको यथार्थरूपसे बतलाता हूँ। तुम इसको अच्छी तरहसे सुनो। यह अग्निविद्या अनन्त—विनाशरहित लोककी प्राप्ति करानेवाली है और उसकी आधारस्वरूपा है। पर तुम ऐसा समझो कि यह है अत्यन्त गुप्त। विद्वानोंकी हृदय-गुफामें छिपी रहती है ॥ १४ ॥ सम्बन्ध=इतना कहकर यमराजने— लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५ ॥ तम् लोकादिम्=उस स्वर्गलोककी कारणरूपा; अग्निम्=अग्निविद्याका, तस्मै उवाच=उस नचिकेताको उपदेश दिया; याः वा यावतीः=उसमे कुण्डनिर्माण आदिके लिये जो-जो और जितनी, इष्टकाः=ईंटें आदि आवश्यक होती हैं, वा यथा= तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है (वे सब बातें भी बतायीं), च सः अपि=तथा उस नचिकेताने भी, तत् यथोक्तम्=नेह जैसा सुना था, ठीक उसी प्रकार समझकर, प्रत्यवदत्=यमराजको पुनः सुना दिया, अथ=उसके बाद, मृत्युः अस्य तुष्टः=यमराज उसपर सन्तुष्ट होकर, पुनः एव आह=फिर बोले-॥ १५ ॥ व्याख्या—उपर्युक्त प्रकारसे अग्निविद्याकी महत्ता और गोपनीयता बतलाकर यमराजने स्वर्गलोककी कारणरूपा अग्निविद्याका रहस्य नचिकेताको समझाया। अग्निके लिये कुण्ड-निर्माणादिमे किस आकारकी, कैसी और कितनी ईंटें चाहिये एव अग्निका चयन किस प्रकार किया जाना चाहिये—यह सब भलीभाँति समझाया। तदनन्तर नचिकेताकी बुद्धि तथा स्मृतिकी परीक्षाके लिये यमराजने नचिकेतासे पूछा कि तुमने जो कुछ समझा हो, वह मुझे सुनाओ। तीक्ष्णबुद्धि नचिकेताने सुनकर जैसा यथार्थ समझा था, सब ज्यों-का-त्यों सुना दिया। यमराज उसकी विलक्षण स्मृति और प्रतिभाको देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और बोले—॥ १५ ॥ तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः । तवैव नाम्ना भवितायमग्निः सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६ ॥ प्रीयमाणः= (उसकी अलौकिक बुद्धि देखकर) प्रसन्न हुए, महात्मा =महात्मा यमराज, तम्=उस नचिकेतासे, अब्रवीत्=बोले, अद्य=अब मैं; तव=तुमको, इह=यहाँ; भूयः वरम्=पुनः यह (अतिरिक्त) वर, ददामि= देता हूँ कि, अयम् अग्निः=यह अग्निविद्या, तव एव नाम्ना=तुम्हारे ही नामसे; भविता=प्रसिद्ध होगी, च इमाम्=तथा इस, अनेकरूपाम् सृङ्काम्=अनेक रूपोंवाली रत्नोंकी मालाको भी; गृहाण=तुम स्वीकार करो ॥ १६ ॥ व्याख्या—महात्मा यमराजने प्रसन्न होकर नचिकेतासे कहा—तुम्हारी अप्रतिम योग्यता देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, इससे अब मैं तुम्हें एक वर और तुम्हारे बिना माँगे ही देता हूँ। वह यह कि यह अग्नि, जिसका मैने तुमको उपदेश किया है, तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी। और साथ ही, यह लो, मैं तुम्हें तुम्हारे देवत्वकी सिद्धिके लिये यह अनेक रूपोंवाली विविध यज्ञ विज्ञानरूपी रत्नोंकी माला देता हूँ। इसे स्वीकार करो ॥ १६ ॥