कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 213, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ कठोपनिषद् * १९१ सम्बन्ध-उस अग्निविद्याका फल बतलाते हुए यमराज कहते हैं- त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य संधिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू । ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमा२ शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥ त्रिणाचिकेतः=इस अग्निका ( शास्त्रोक्त रीतिसे ) तीन बार अनुष्ठान करनेवाला, त्रिभिः सन्धिम् एत्य= तीनों ( ऋक्, साम, यजुर्वेद ) के साथ सम्बन्ध जोडकर, त्रिकर्मकृत्=यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको निष्कामभावसे करता रहनेवाला मनुष्य; जन्ममृत्यू तरति=जन्म-मृत्युसे तर जाता है, ब्रह्मजज्ञम् =( वह ) ब्रह्मासे उत्पन्न सृष्टिके जाननेवाले; ईड्यम् देवम्=स्तवनीय इस अग्निदेवको, विदित्वा=जानकर तथा; निचाय्य=इसका निष्कामभावसे चयन करके; इमाम् अत्यन्तम् शान्तिम् एति=इस अनन्त शान्तिको पा जाता है ( जो मुझको प्राप्त है ) ॥ १७ ॥ व्याख्या-इस अग्निका तीन बार अनुष्ठान करनेवाला पुरुष ऋक्, यजु', साम-तीनों वेदोंसे सम्बन्ध जोड़कर, तीनों वेदोंके तत्त्व-रहस्यमे निष्णात होकर, निष्कामभावसे यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको करता हुआ जन्म-मृत्युसे तर जाता है । वह ब्रह्मासे उत्पन्न सृष्टिको जाननेवाले स्तवनीय इस अग्निदेवको भलीभाँति जानकर इसका निष्कामभावसे चयन करके उस अनन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है, जो मुझको प्राप्त है ॥ १७ ॥ त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८ ॥ एतत् त्रयम्=ईंटोंके स्वरूप, सख्या और अग्नि-चयन-विधि-इन तीनों बातोंको, विदित्वा=जानकर; त्रिणाचिकेतः= तीन बार नाचिकेत-अग्निविद्याका अनुष्ठान करनेवाला तथा, यः एवम्=जो कोई भी इस प्रकार, विद्वान्=जाननेवाला पुरुष; नाचिकेतम्=इस नाचिकेत-अग्निका, चिनुते=चयन करता है, सः मृत्युपाशान्=वह मृत्युके पाशको, पुरतः प्रणोद्य= अपने सामने ही ( मनुष्य-शरीरमे ही ) काटकर, शोकातिगः=शोकसे पार होकर, स्वर्गलोके मोदते=स्वर्गलोकमे आनन्द- का अनुभव करता है ॥ १८ ॥ व्याख्या-किस आकारकी कैसी ईंटें हों और कितनी सख्यामें हों एव किस प्रकारसे अग्निका चयन किया जाय-इन तीनों बातोंको जानकर जो विद्वान् तीन बार नाचिकेत अग्निविद्याका निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है-अग्निका चयन करता है, वह देहपातसे पहले ही ( जन्म-) मृत्युके पाशको तोड़कर शोकरहित होकर अन्तमें स्वर्गलोकके ( अविनाशी ऊर्ध्वलोकके ) आनन्दका अनुभव करता है ॥ १८ ॥ एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता; एषः ते=यह तुम्हें बतलायी हुई, स्वर्ग्यः अग्निः=स्वर्ग प्रदान करनेवाली अग्निविद्या है, यम् द्वितीयेन वरेण अवृणीथाः=जिसको तुमने दूसरे वरसे माँगा था, एतम् अग्निम्=इस अग्निको ( अबसे ), जनासः= लोग, तव एव=तुम्हारे ही नामसे, प्रवक्ष्यन्ति=कहा करेंगे, नचिकेतः=हे नचिकेता, तृतीयम् वरम् वृणीष्व= ( अबतुम ) तीसरा वर माँगो ॥ १९ ॥ व्याख्या-यमराज कहते हैं-नचिकेता ! तुम्हें यह उसी स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याका उपदेश दिया गया है, जिसके लिये तुमने दूसरे वरमें याचना की थी । अबसे लोग तुम्हारे ही नामसे इस अग्निको पुकारा करेंगे । नचिकेता ! अब तुम तीसरा वर माँगो ॥ १९ ॥ सम्बन्ध-नचिकेता तीसरा वर माँगता है- येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २० ॥