भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 832 में से

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पृष्ठ 214

१९२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * प्रेते मनुष्ये=मरे हुए मनुष्यके विषयमें; या इयम्=जो यह, विचिकित्सा=संशय है, एके (आहुः) अयम् अस्ति इति=कोई तो ऐसा कहते हैं कि मरनेके बाद यह आत्मा रहता है, च एके (आहुः) न अस्ति इति=और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता, त्वया अनुशिष्टः=आपके द्वारा उपदेश पाया हुआ, अहम् एतत् विद्याम्=मैं इसका निर्णय भलीभाँति समझ लूँ; एषः वराणाम्=यही तीनों वरोंमेंसे, तृतीयः वरः=तीसरा वर है ॥ २० ॥ व्याख्या-इस लोकके कल्याणके लिये पिताकी सन्तुष्टिका वर और परलोकके लिये स्वर्गके साधनरूप अग्निविज्ञानका वर प्राप्त करके अब नचिकेता आत्माके यथार्थ स्वरूप और उसकी प्राप्तिका उपाय जाननेके लिये यमराजके सामने दूसरे लोगोंके दो मत उपस्थित करके उसपर उनका अनुभूत विचार सुनना चाहता है। इसलिये नचिकेता कहता है कि भगवन् ! मृत मनुष्यके सम्बन्धमे यह एक बड़ा सन्देह फैला हुआ है। कुछ लोग तो कहते हैं कि मृत्युके बाद भी आत्माका अस्तित्व रहता है और कुछ लोग कहते हैं, नहीं रहता। इस विषयमें आपका जो अनुभव हो, वह मुझे बतलाइये ।* आप मुझे अपना अनुभूत विचार बतलायेंगे, तभी मैं इस रहस्यको भलीभाँति समझ पाऊँगा। बस, तीनो वरोंमेंमे यही मेरा अभीष्ट तीसरा वर है ॥२०॥ सम्बन्ध-नचिकेताका महत्त्वपूर्ण प्रश्न सुनकर यमराजने मन-ही-मन उसकी प्रशंसा की। सोचा कि ऋषिकुमार बालक होनेपर भी बड़ा प्रतिभाशाली है, कैसे गोपनीय विषयको जानना चाहता है, परंतु आत्मतत्त्व उपयुक्त अधिकारीको ही बतलाना चाहिये। अनधिकारीके प्रति आत्मतत्त्वका उपदेश करना हानिकर होता है, अतएव पहले पात्र-परीक्षाकी आवश्यकता है। यों विचारकर यमराजने इस तत्त्वका कठिनताका वर्णन करके नचिकेताको टालना चाहा और कहा- देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः। अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता !, अत्र पुरा=इस विषयमें पहले, देवैः अपि=देवताओंने भी, विचिकित्सितम्=संदेह किया था (परन्तु उनकी भी समझमे नहीं आया), हि एषः धर्मः अणुः न सुविज्ञेयम्=क्योंकि यह विषय बड़ा सूक्ष्म है, सहज ही समझमे आनेवाला नहीं है (इसलिये), अन्यम् वरम् वृणीष्व=तुम दूसरा वर माँग लो, मा मा उपरोत्सीः= मुझपर दबाव मत डालो, एनम् मा=इस आत्मज्ञानसम्बन्धी वरको मुझे, अतिसृज=लौटा दो ॥ २१ ॥ व्याख्या-नचिकेता ! यह आत्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म विषय है। इसका समझना सहज नहीं है। पहले देवताओंको भी इस विषयमें सन्देह हुआ था। उनमे भी बहुत विचार-विनिमय हुआ था; परन्तु वे भी इसको जान नहीं पाये। अतएव तुम दूसरा वर माँग लो। मैं तुम्हें तीन वर देनेका वचन दे चुका हूँ, अतएव तुम्हारा ऋणी हूँ, पर तुम इस वरके लिये, जैसे महाजन ऋणीको दबाता है वैसे, मुझको मत दबाओ। इस आत्मतत्त्वविषयक वरको मुझे लौटा दो। इसके लिये मुझे छोड़ दो ॥ २१ ॥ सम्बन्ध-नचिकेता आत्मतत्त्वकी कठिनताका नाम सुनकर तनिक भी घबराया नहीं, न उसका उत्साह ही मन्द हुआ, वर उसने और भी दृढताके साथ कहा- देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२ ॥

  • मृत्युके पश्चात् आत्माका अस्तित्व रहता है या नही, इस सम्बन्धमें नचिकेताको स्वयं कोई सन्देह नहीं है। पिताको दक्षिणामें जराजीर्ण गौएँ देते देखकर नचिकेताने स्पष्ट कहा था कि ऐसी गौओंका दान करनेवाले आनन्दरहित (अनन्दा) नरकादि लोकोंको प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार दूसरे वरमें नचिकेताने स्वर्गसुखोंका वरण करके स्वर्गप्राप्तिके साधनरूप अग्निविद्याके उपदेशकी प्रार्थना की थी। इससे सिद्ध है कि वह स्वयं और नरकमें विश्वास करता था। स्वर्ग-नरकादि लोकोंकी प्राप्ति मरनेके पश्चात् ही होती है। आत्माका अस्तित्व न हो तो ये लोक किसको प्राप्त हों। यहाँ इसलिये नचिकेताने अपना मत न बताकर कहा है कि कुछ लोग मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व मानते हैं और कुछ लोग नहीं मानते। यह प्रश्नका एक ऐसा सुन्दर प्रकार है कि जिसके उत्तरमें आत्माकी नित्य सत्ता, उसके स्वरूप, गुण और परमलक्ष्य परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंका विवरण अपने-आप ही आ जाता है। अत यह प्रश्न आत्मज्ञान- विषयक है, न कि आत्माके अस्तित्वमें सन्देहविषयक। तैत्तिरीय ब्राह्मणमें नचिकेताका जो इतिहास मिलता है, उसमें तो नचिकेताने तीसरे वरमें पुनर्मृत्यु (जन्म-मृत्यु) पर विजय पानेका-मुक्तिका साधन जानना चाहा है (तृतीयं वृणीष्वेति । पुनर्मृत्योर्मेऽपचितिं ब्रूहि )।