भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 832 में से

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पृष्ठ 215
  • कठोपनिषद् * १९३ मृत्यो=हे यमराज; त्वम् यत् आत्थ=आपने जो यह कहा कि, अत्र किल देवैः अपि=इस विषयपर देवताओंने भी; विचिकित्सितम्=विचार किया था (परंतु वे निर्णय नहीं कर पाये), च न सुविज्ञेयम्=और यह सुविज्ञेय भी नहीं है, च त्वादृक्=इसके सिवा आपके-जैसा; अस्य वक्ता=इस विषयका कहनेवाला भी, अन्यः न लभ्यः=दूसरा नहीं मिल सकता; [ अतः=इसलिये मेरी समझमें तो, ] एतस्य तुल्यः=इसके समान, अन्यः कश्चित्=दूसरा कोई भी; वरः न=वर नहीं है ॥२२॥ व्याख्या-हे मृत्यो ! पूर्वकालमें देवताओंने भी जब इस विषयपर विचार-विनिमय किया था तथा वे भी इसे जान नहीं पाये थे और आप भी कहते हैं कि यह विषय सहज नहीं है, बड़ा ही सूक्ष्म है, तब यह तो सिद्ध ही है कि यह बड़े ही महत्त्वका विषय है और ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयको समझानेवाला आपके समान अनुभवी वक्ता मुझे ढूँढनेपर भी कोई नहीं मिल सकता । आप कहते हैं, इसे छोड़कर दूसरा वर माँग लो । परन्तु मैं तो समझता हूँ कि इसकी तुलनाका दूसरा कोई वर है ही नहीं । अतएव कृपापूर्वक मुझे इसीका उपदेश कीजिये ॥ २२ ॥ सम्बन्ध-विषयकी कठिनतासे नचिकेता नहीं घबराया, वह अपने निश्चयपर ज्यों-का-त्यों दृढ़ रहा । इस एक परीक्षामें वह उत्तीर्ण हो गया । अब यमराजने दूसरी परीक्षाके रूपमें उसके सामने विभिन्न प्रकारके प्रलोभन रखनेकी बात सोचकर उससे कहते हैं- शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् । भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३ ॥ शतायुषः=सैकड़ों वर्षोंकी आयुवाले, पुत्रपौत्रान्=बेटे और पोतोंको ( तथा ); बहून् पशून्=बहुत-से गौ आदि पशुओंको ( एव ), हस्तिहिरण्यम्=हाथी, सुवर्ण और, अश्वान् वृणीष्व=घोड़ोंको माँग लो, भूमेः महत् आयतनम्= भूमिके बड़े विस्तारवाले मण्डल ( साम्राज्य ) को, वृणीष्व=माँग लो, स्वयं च=तुम स्वयं भी, यावत् शरदः=जितने वर्षोंतक, इच्छसि=चाहो, जीव=जीते रहो ॥ २३ ॥ व्याख्या-नचिकेता ! तुम बड़े भोले हो । क्या करोगे इस वरको लेकर । तुम ग्रहण करो इन सुखकी विशाल सामग्रियोंको । इस सौ-सौ वर्ष जीनेवाले पुत्र-पौत्रादि बड़े परिवारको माँग लो । गौ आदि बहुत से उपयोगी पशु, हाथी, सुवर्ण, घोड़े और विशाल भूमण्डलके महान् साम्राज्यको माँग लो और इन सबको भोगनेके लिये जितने वर्षोंतक जीनेकी इच्छा हो, उतने ही वर्षोंतक जीते रहो ॥ २३ ॥ एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥ नचिकेता=हे नचिकेता, वित्तम् चिरजीविकाम्=धन, सम्पत्ति और अनन्त कालतक जीनेके साधनोंको; यदि त्वम्=यदि तुम, एतत्तुल्यम्=इस आत्मज्ञानविषयक वरदानके समान, वरम् मन्यसे वृणीष्व=वर मानते हो तो माँग लो, च महाभूमौ=और तुम इस पृथिवीलोकमें, एधि=बड़े भारी सम्राट् बन जाओ, त्वा कामानाम्=( मैं ) तुम्हें सम्पूर्ण भोगोंमेंसे, कामभाजम्=अति उत्तम भोगोंका पात्र, करोमि=बना देता हूँ ॥ २४ ॥ व्याख्या-'नचिकेता ! यदि तुम प्रचुर धन-सम्पत्ति, दीर्घजीवनके लिये उपयोगी सुख-सामग्रियों अथवा और भी जितने भोग मनुष्य भोग सकता है, उन सबको मिलाकर उस आत्मतत्त्व-विषयक वरके समान समझते हो तो इन सबको माँग लो । तुम इस विशाल भूमिके सम्राट् बन जाओ । मैं तुम्हें समस्त भोगोंको इच्छानुसार भोगनेवाला बनाये देता हूँ ।' इस प्रकार यहाँ यमराजने वाक्चातुर्यसे आत्मतत्त्वका महत्त्व बढ़ाते हुए नचिकेताको विशाल भोगोंका प्रलोभन दिया ॥ २४ ॥ सम्बन्ध-इतनेपर भी नचिकेता अपने निश्चयपर अटल रहा, तब स्वर्गके दैवी भोगोंका प्रलोभन देते हुए यमराजने कहा- ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामाँ२श्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ २५ ॥