कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 216, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१९४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ये ये कामाः=जो-जो भोग; मर्त्यलोके=मनुष्यलोकमे, दुर्लभाः=दुर्लभ हैं, सर्वान् कामान्=उन सम्पूर्ण भोगोंको, छन्दतः प्रार्थयस्व=इच्छानुसार माँग लो, सरथाः सतूर्याः इमाः रामाः=रथ और नाना प्रकारके बाजोंके सहित इन स्वर्गकी अप्सराओंको ( अपने साथ ले जाओ ), मनुष्यैः ईदृशाः=मनुष्योंको ऐसी स्त्रियाँ, न हि लम्भनीयाः=अलभ्य हैं; मत्प्रत्ताभिः=मेरे द्वारा दी हुई, आभिः=इन स्त्रियोंसे; परिचारयस्व=तुम अपनी सेवा कराओ; नचिकेताः=हे नचिकेता; मरणम्=मरनेके बाद आत्माका क्या होता है, मा अनुप्राक्षीः=इस बातको मत पूछो ! ॥ २५ ॥ व्याख्या-नचिकेता ! जो-जो भोग मृत्युलोकमें दुर्लभ हैं, उन सबको तुम अपने इच्छानुसार माँग लो । ये रथों और विविध प्रकारके वाद्योंसहित जो स्वर्गकी सुन्दरी रमणियाँ हैं, ऐसी रमणियाँ मनुष्योंमें कहीं नहीं मिल सकतीं । बड़े- बड़े ऋषि मुनि इनके लिये ललचाते रहते हैं । मैं इन सबको तुम्हें सहज ही दे रहा हूँ । तुम इन्हें ले जाओ और इनसे अपनी सेवा कराओ, परन्तु नचिकेता ! आत्मतत्त्व-विषयक प्रश्न मत पूछो ॥ २५ ॥ सम्बन्ध-यमराज शिष्यपर स्वाभाविक ही दया करनेवाले महान् अनुभवी आचार्य ह । इन्होंने अधिकारी-परीक्षाके साथ ही इस प्रकार भय और एकके बाद एक उत्तम भोगोंका प्रलोभन दिखाकर, जैसे खम्भेको हिला-हिलाकर दृढ़ किया जाता है वैसे ही नचिकेताके वैराग्यसम्पन्न निश्चयको और भी दृढ़ किया ! पहले कठिनताका भय दिखाया, फिर इस लोकके एक-से-एक बढ़कर भोगोंके चित्र उसके सामने रक्खे और अन्तमें स्वर्गलोकमें भी उसका वैराग्य करा देनेके लिये स्वर्गके दैवी भोगोंका चित्र उपस्थित किया और कहा कि इनको यदि तुम अपने उस आत्मतत्त्वसम्बन्धी वरके समान समझते हो तो इन्हें माँग लो । परंतु नचिकेता तो दृढ़निश्चयी और सच्चा अधिकारी था । वह जानता था कि इस लोक और परलोकके बड़े-से-बड़े भोग-सुखोंकी आत्मज्ञानके सुखके किसी क्षुद्रतम अंशके साथ भी तुलना नहीं की जा सकती । अतएव उसने अपने निश्चयका युक्तिपूर्वक समर्थन करते हुए पूर्ण वैराग्ययुक्त वचनोंमें यमराजसे कहा- श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥ अन्तक=हे यमराज ( जिन भोगोंका आपने वर्णन किया वे ), श्वोभावा=क्षणभङ्गुर भोग ( और उनसे प्राप्त होने- वाले सुख ), मर्त्यस्य=मनुष्यके, सर्वेन्द्रियाणाम्=अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंका; यत् तेजः=जो तेज है; एतत्= उसको, जरयन्ति=क्षीण कर डालते हैं, अपि सर्वम्=( इसके सिवा ) समस्त, जीवितम्=आयु, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अल्पम् एव=अल्प ही है, इसलिये, तव वाहाः=ये आपके रथ आदि वाहन ओर, नृत्यगीते=ये अप्सराओंके नाच-गान, तव एव=आपके ही पास रहें ( मुझे नहीं चाहिये ) ॥ २६ ॥ व्याख्या-हे सबका अन्त करनेवाले यमराज ! आपने जिन भोग्य वस्तुओंकी महिमाके पुल बाँधे हैं, ये सभी क्षणभङ्गुर हैं । कलतक रहेंगी या नहीं, इसमें भी सन्देह है । इनके संयोगसे प्राप्त होनेवाला सुख वास्तवमें सुख ही नहीं है, वह तो दुःख ही है ( गीता ५ । २२ ) । ये भोग्यवस्तुएँ कोई लाभ तो देती ही नहीं, वर मनुष्यकी इन्द्रियोंके तेज और धर्मको हरण कर लेती हैं । आपने जो दीर्घजीवन देना चाहा है, वह भी अनन्तकालकी तुलनामें अत्यन्त अल्प ही है । जब ब्रह्मा आदि देवताओंका जीवन भी अल्पकालका है-एक दिन उन्हें भी मरना पड़ता है, तब औरोंकी तो बात ही क्या है ? अतएव मैं यह सब नहीं चाहता । ये आपके रथ, हाथी, घोड़े, ये रमणियाँ और इनके नाच-गान आप अपने ही पास रक्खें ॥ २६ ॥ न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥ मनुष्यः=मनुष्य, वित्तेन=धनसे, तर्पणीयः न=कभी भी तृप्त किये जाने योग्य नहीं है, चेत्=जब कि ( हमने ); त्वां अद्राक्ष्म=आपके दर्शन पा लिये हैं, (तब), वित्तम्=धनको, लप्स्यामहे=(तो हम) पा ही लेंगे; (और)त्वम् यावत्= आप जबतक; ईशिष्यसि=शासन करते रहेंगे, तबतक तो, जीविष्यामः=हम जीते ही रहेंगे ( इन सबको भी क्या माँगना है, अतः ); मे वरणीयः वरः तु= मेरे माँगने लायक वर तो; सः एव=वह ( आत्मज्ञान ) ही है ॥ २७ ॥