भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 217
  • कठोपनिषद् * १९५ व्याख्या-आप जानते ही हैं, धनसे मनुष्य कभी तृप्त नहीं हो सकता । आगमें घी-ईंधन डालनेसे जैसे आग जोरोंसे भड़कती है, उसी प्रकार धन और भोगोंकी प्राप्तिसे भोग-कामनाका और भी विस्तार होता है। वहाँ तृप्ति कैसी ? वहाँ तो दिन-रात अपूर्णता और अभावकी अग्निमें ही जलना पड़ता है । ऐसे दुःखमय धन और भोगोंको कोई भी बुद्धिमान् पुरुष नहीं माँग सकता । मुझे अपने जीवननिर्वाहके लिये जितने धनकी आवश्यकता होगी, उतना तो आपके दर्शनसे ही प्राप्त हो जायगा । रही दीर्घजीवनकी बात, सो जबतक मृत्युके पदपर आपका शासन है, तबतक मुझे मरनेका भी भय क्यों होने लगा । अतएव किसी भी दृष्टिसे दूसरा वर माँगना उचित नहीं मालूम होता । इसलिये मेरा प्रार्थनीय तो वह आत्मतत्त्व-विषयक वर ही है । मैं उसे लौटा नहीं सकता ॥ २७ ॥ सम्बन्ध-इस प्रकार भोगोंकी तुच्छताका वर्णन करके अब नचिकेता अपने वरका महत्त्व बतलाता हुआ उसीको प्रदान करनेके लिये दृढतापूर्वक निवेदन करता है- अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥ जीर्यन् मर्त्यः = यह मनुष्य जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है, प्रजानन् = इस तत्त्वको भलीभाँति समझनेवाला, क्वधःस्थः = मनुष्यलोकका निवासी, कः = कौन ( ऐसा ) मनुष्य है ( जो कि ), अजीर्यताम् = बुढ़ापेसे रहित, अमृतानाम् = न मरनेवाले ( आप-सदृश ) महात्माओंका, उपेत्य = सङ्ग पाकर भी, वर्णरतिप्रमोदान् = ( स्त्रियोंके ) सौन्दर्य, क्रीड़ा और आमोद-प्रमोदका, अभिध्यायन् = बार-बार चिन्तन करता हुआ, अतिदीर्घे = बहुत कालतक, जीविते = जीवित रहनेमें, रमेत = प्रेम करेगा ॥ २८ ॥ व्याख्या-हे यमराज ! आप ही बताइये, भला आप-सरीखे अजर-अमर महात्मा देवताओंका दुर्लभ एवं अमोघ सङ्ग प्राप्त करके मृत्युलोकका जरामरणशील ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य होगा जो स्त्रियोंके सौन्दर्य, क्रीड़ा और आमोद-प्रमोदमें आसक्त होकर उनकी ओर दृष्टिपात करेगा और इस लोकमें दीर्घकालतक जीवित रहनेमें आनन्द मानेगा ? ॥ २८ ॥ यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥ मृत्यो = हे यमराज, यस्मिन् = जिस, महति साम्पराये = महान् आश्चर्यमय परलोकसम्बन्धी आत्मज्ञानके विषयमें; इदम् विचिकित्सन्ति = ( लोग ) यह शङ्का करते हैं कि यह आत्मा मरनेके बाद रहता है या नहीं, ( तत्र ) यत् = उसमें जो निर्णय है, तत् नः ब्रूहि = वह आप हमें बतलाइये, यः अयम् = जो यह, गूढम् अनुप्रविष्टः वरः = अत्यन्त गम्भीरताको प्राप्त हुआ वर है, तस्मात् = इससे, अन्यम् = दूसरा वर, नचिकेताः = नचिकेता, न वृणीते = नहीं माँगता ॥ २९ ॥ व्याख्या-नचिकेता कहता है-हे यमराज ! जिस आत्मतत्त्व-सम्बन्धी महान् ज्ञानके विषयमें लोग यह शङ्का करते हैं कि मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व रहता है या नहीं, उसके सम्बन्धमें निर्णयात्मक जो आपका अनुभूत ज्ञान हो, मुझे कृपापूर्वक उसीका उपदेश कीजिये। यह आत्मतत्त्वसम्बन्धी वर अत्यन्त गूढ है-यह सत्य है, पर आपका शिष्य यह नचिकेता इसके अतिरिक्त दूसरा कोई वर नहीं चाहता ! ॥ २९ ॥ ॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥ ❖ द्वितीय वल्ली सम्बन्ध-इस प्रकार परीक्षा करके जब यमराजने समझ लिया कि नचिकेता दृढ़निश्चयी, परम वैराग्यवान् एव निर्भीक है, अतः ब्रह्मविद्याका उत्तम अधिकारी है, तब ब्रह्मविद्याका उपदेश आरम्भ करनेके पहले उसका महत्त्व प्रकट करते हुए यमराज बोले- अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः । तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ श्रेयः = कल्याणका साधन; अन्यत् = अलग है, उत = और, प्रेयः = प्रिय लगनेवाले भोगोंका साधन- अन्यत् एव =