कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 218, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१९६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अलग ही है, ते=वे, नानार्थे=भिन्न भिन्न फल देनेवाले; उभे=दोनों साधन; पुरुषम्=मनुष्यको, सिनीतः=बाँधते हैं— अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं, तयोः=उन दोनोंमेंसे, श्रेयः=कल्याणके साधनको, आददानस्य=ग्रहण करनेवालेका; साधु भवति=कल्याण होता है, उ यः=परन्तु जो, प्रेयः वृणीते=सांसारिक उन्नतिके साधनको स्वीकार करता है, [ सः=वह, ] अर्थात्=यथार्थ लाभसे, हीयते=भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ व्याख्या—मनुष्य-शरीर अन्यान्य योनियोंकी भाँति केवल कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही नहीं मिला है। इसमें मनुष्य भविष्यमे सुख देनेवाले साधनका अनुष्ठान भी कर सकता है। वेदोंमें सुखके साधन दो बताये गये हैं—(१) श्रेय अर्थात् सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर नित्य आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका उपाय और (२) प्रेय अर्थात् स्त्री, पुत्र, धन, मकान, सम्मान, यश आदि इस लोककी और स्वर्गलोककी जितनी भी प्राकृत सुख- भोगकी सामग्रियाँ हैं, उनकी प्राप्तिका उपाय। इस प्रकार अपने अपने ढंगसे मनुष्यको सुख पहुँचा सकनेवाले ये दोनो साधन मनुष्यको बाँधते हैं—उसे अपनी अपनी ओर खींचते हैं। अधिकांश लोग तो 'भोगोंमे प्रत्यक्ष और तत्काल सुख मिलता है' इस प्रतीतिके कारण उसका परिणाम सोचे-समझे बिना ही प्रेयकी ओर खिंच जाते ह। परन्तु कोई-कोई भाग्यवान् मनुष्य भगवान्की दयासे प्राकृत भोगोंकी आपातरमणीयता एव परिणामदुःखताका रहस्य जानकर उनकी ओरसे विरक्त हो श्रेयकी ओर आकर्षित हो जाता है। इन दोनो प्रकारके मनुष्योंमेसे जो भगवान्की कृपाका पात्र होकर श्रेयको अपना लेता है और तत्परताके साथ उसके साधनमें लग जाता है, उसका तो सब प्रकारसे कल्याण हो जाता है। वह सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर अनन्त असीम आनन्दस्वरूप परमात्माको पा लेता है। परन्तु जो सांसारिक सुखके साधनोंमे लग जाता है, वह अपने मानव जीवनके परम लक्ष्य परमात्माकी प्राप्तिरूप यथार्थ प्रयोजनको सिद्ध नहीं कर पाता, इसलिये उसे आत्यन्तिक और नित्य सुख नहीं मिलता। उसे तो भ्रमवश सुखरूप प्रतीत होनेवाले वे अनित्य भोग मिलते हैं, जो वास्तवमे दुःखरूप ही हैं। अतः वह वास्तविक सुखसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥ २॥ श्रेयः च प्रेयः च=श्रेय और प्रेय—ये दोनो ही, मनुष्यम् एतः=मनुष्यके सामने आते हैं, धीरः=बुद्धिमान् मनुष्य, तौ=उन दोनोंके स्वरूपपर, सम्परीत्य=भलीभाँति विचार करके, विविनक्ति=उनको पृथक्-पृथक् समझ लेता है, (और) धीरः=वह श्रेष्ठबुद्धि मनुष्य, श्रेयः हि=परम कल्याणके साधनको ही, प्रेयसः=भोग-साधनकी अपेक्षा, अभिवृणीते=श्रेष्ठ समझकर ग्रहण करता है (परन्तु), मन्दः=मन्दबुद्धिवाला मनुष्य, योगक्षेमात्=लौकिक योगक्षेमकी इच्छासे, प्रेयः वृणीते=भोगोंके साधनरूप प्रेयको अपनाता है ॥ २ ॥ व्याख्या—अधिकांश मनुष्य तो पुनर्जन्ममें विश्वास न होनेके कारण इस विषयमे विचार ही नहीं करते, वे भोगोंमे आसक्त होकर अपने देवदुर्लभ मनुष्य-जीवनको पशुवत् भोगोंके भोगनेमें ही समाप्त कर देते हैं। किंतु जिनका पुनर्जन्ममे और परलोकमे विश्वास है, उन विचारशील मनुष्योंके सामने जब ये श्रेय और प्रेय दोनो आते हे, तब वे इन दोनोंके गुण- दोषोंपर विचार करके दोनोंको पृथक्-पृथक् समझनेकी चेष्टा करते है। इनमे जो श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न होता है, वह तो दोनोंके तत्त्वको पूर्णतया समझकर नीर-क्षीर-विवेकी इस की तरह प्रेयकी उपेक्षा करके श्रेयको ही ग्रहण करता है। परंतु जो मनुष्य अल्पबुद्धि है, जिसकी बुद्धिमें विवेकशक्तिका अभाव है, वह श्रेयके फलमें अविश्वास करके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले लौकिक योगक्षेमकी सिद्धिके लिये प्रेयको अपनाता है, वह इतना ही समझता है कि जो कुछ भोगपदार्थ प्राप्त हैं, वे सुरक्षित बने रहें और जो अप्राप्त है, वे प्रचुर मात्रामे मिल जायँ। यही योगक्षेम है ॥ २ ॥ सम्बन्ध—परमात्माकी प्राप्तिके साधनरूप श्रेयकी प्रशंसा करके अब यमराज साधारण मनुष्यसे नचिकेताकी विशेषता दिखलाते हुए उसके वैराग्यकी प्रशंसा करते हैं— स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥