कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 219, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 219
- कठोपनिषद् * १९७ नचिकेतः = हे नचिकेता ! (उन्हीं मनुष्योंमें), सः त्वम् = तुम ( ऐसे निःस्पृह हो कि ), प्रियान् च=प्रिय लगनेवाले और, प्रियरूपान् = अत्यन्त सुन्दर रूपवाले, कामान् = इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंको, अभिध्यायन्= भलीभाँति सोच-समझकर, अत्यस्राक्षीः = तुमने छोड़ दिया,, एताम् वित्तमयीम् सृङ्काम् = इस सम्पत्तिरूप शृङ्खला (बेड़ी) को, न अवाप्तः = (तुम ) नहीं प्राप्त हुए (इसके बन्धनमें नहीं फँसे) यस्याम् = जिसमें, बहवः मनुष्याः = बहुत-से मनुष्य, मज्जन्ति= फँस जाते हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या-यमराज कहते हैं- 'हे नचिकेता ! तुम्हारी परीक्षा करके मैंने अच्छी तरह देख लिया कि तुम बडे बुद्धिमान्, विवेकी तथा वैराग्यसम्पन्न हो । अपनेको बहुत बड़े चतुर, विवेकी और तार्किक माननेवाले लोग भी जिस चमक-दमकवाली सम्पत्तिके मोहजालमे फँस जाया करते हैं, उसे भी तु ने स्वीकार नहीं किया। मैंने बड़ी ही लुभावनी भाषामे तुम्हें बार-बार पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, गौएँ, वन, सम्पत्ति, भूमि आदि अनेकों दुष्प्राप्य और लोभनीय भोगोंका प्रलोभन दिया, इतना ही नहीं, स्वर्गके दिव्य भोगों और अप्रतिम सुन्दरी स्वर्गीय रमणियोंके चिर-भोगसुखका लालच दिया, परंतु तुमने सहज ही उन सबकी उपेक्षा कर दी। अतः तुम अवश्य ही परमात्मतत्त्वका श्रवण करनेके सर्वोत्तम अधिकारी हो ॥ ३ ॥ दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता । विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४॥ या अविद्या=जो कि अविद्या; च विद्या इति ज्ञाता = और विद्या नामसे विख्यात हैं, एते= ये दोनों, दूरम् विपरीते= परस्पर अत्यन्त विपरीत (और), विषूची=भिन्न-भिन्न फल देनेवाली हैं, नचिकेतसम्= तुम नचिकेताको, विद्याभीप्सिनम् मन्ये=मैं विद्याका ही अभिलाषी मानता हूँ, (क्योंकि), त्वा बहवः कामाः= तुमको बहुत-से भोग, न अलोलुपन्त= (किसी प्रकार भी) नहीं लुभा सके ॥ ४ ॥ व्याख्या-ये अविद्या और विद्या नामसे प्रसिद्ध दो साधन पृथक्-पृथक् फल देनेवाले हैं और परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं। जिसकी भोगोंमें आसक्ति है, वह कल्याण-साधनमे आगे नहीं बढ़ सकता और जो कल्याण-मार्गका पथिक है, वह भोगोंकी ओर दृष्टि नहीं डालता । वह सब प्रकारके भोगोंको दु.खरूप मानकर उनका परित्याग कर देता है। हे नचिकेता ! मैं मानता हूँ कि तुम विद्याके ही अभिलाषी हो, क्योंकि बहुत-से बड़े-बड़े भोग भी तुम्हारे मनमें किञ्चिन्मात्र भी लोभ नहीं उत्पन्न कर सके ॥ ४ ॥ अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः । दन्दम्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५॥ अविद्यायाम् अन्तरे वर्तमानाः=अविद्याके भीतर स्थित होकर (भी), स्वयं धीराः=अपने-आपको बुद्धिमान् (और); पण्डितम् मन्यमानाः=विद्वान् माननेवाले, मूढाः=(भोगकी इच्छा करनेवाले) वे मूर्खलोग, दन्दम्यमानाः =नाना योनियोंमें चारो ओर भटकते हुए, (तथा) परियन्ति=ठीक वैसे ही ठोकरें खाते भटकते रहते हैं, यथा = जैसे, अन्धेन एव नीयमानाः = अन्धे मनुष्यके द्वारा चलाये जानेवाले, अन्धाः = अन्धे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते हैं) ॥५॥ व्याख्या-जब अन्धे मनुष्यको मार्ग दिखलानेवाला भी अन्धा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थान- पर नहीं पहुँच पाता, बीचमे ही ठोकरें खाता भटकता है और काँटे-कंकड़ोंसे विंधकर या गहरे गढ्ढे आदिमें गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है। वैसे ही उस मूर्खको भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विचित्र दु खपूर्ण योनियोंमें एव नरकादिमे प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पड़ता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझता है, विद्या बुद्धिके मिथ्याभिमानमें शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करता और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंको भोग करनेमें तथा उनके उपार्जनमें ही निरन्तर सलग्न रहकर मनुष्यजीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करता रहता है ॥ ५ ॥ न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६॥