कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 220, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१९८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * वित्तमोहेन मूढम् = इस प्रकार सम्पत्तिके मोहसे मोहित, प्रमाद्यन्तम् बालम् = निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको, साम्परायः = परलोक, न प्रतिभाति = नहीं सूझता; अयम् लोकः = वह समझता है कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही सत्य है' परः न अस्ति = इसके सिवा दूसरा (स्वर्ग नरक आदि लोक) कुछ भी नहीं है; इति मानी = इस प्रकार माननेवाला अभिमानी मनुष्य' पुनः पुनः = बार-बार, मे वशम् = मेरे ( यमराजके ) वशमे, आपद्यते = आता है ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस प्रकार मनुष्य-जीवनके महत्त्वको नहीं समझनेवाला अभिमानी मनुष्य सासारिक भोग सम्पत्तिकी प्राप्तिके साधनरूप धनादिके मोहमे मोहित हुआ रहता है, अतएव भोगोंमे आसक्त होकर वह प्रमादपूर्वक मनमाना आचरण करने लगता है । उसे परलोक नहीं सूझता । उसके अन्तःकरणमे इस प्रकारके विचार उत्पन्न ही नहीं होते कि मरनेके बाद मुझे अपने समस्त कर्मोंका फल भोगनेके लिये बाध्य होकर बार-बार विविध योनियोमे जन्म लेना पडेगा । वह मूर्ख समझता है कि बस, जो कुछ यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता है, यही लोक है । इसीकी सत्ता है । यहाँ जितना विषय-सुख भोग लिया जाय, उतनी ही बुद्धिमानी है । इसके आगे क्या हैं? परलोकको किसने देखा है ? परलोक तो लोगोंकी कल्पनामात्र है, इत्यादि । इस प्रकारकी मान्यता रखनेवाला मनुष्य बार-बार यमराजके चगुलमें पड़ता है और वे उसके कर्मानुसार उसे नाना योनियोमे ढकेलते रहते हैं । उसके जन्म मरणका चक्र नहीं टूटता ॥ ६ ॥ सम्बन्ध - इस प्रकार विषयासक्त, प्रत्यक्षवादी मूर्खोकी निन्दा करके अब उस आत्मतत्त्वकी और उसको जानने, समझने तथा वर्णन करनेवाले पुरुषकी दुर्लभताका वर्णन करते हैं- श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाऽऽश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥७॥ यः बहुभिः = जो (आत्मतत्त्व ) बहुतोको तो, श्रवणाय अपि = सुननेके लिये भी, न लभ्यः = नहीं मिलता, यम्= जिसको, बहवः = बहुत से लोग, शृण्वन्तः अपि = सुनकर भी, न विद्युः = नहीं समझ सकते, अस्य = ऐसे इस गूढ आत्मतत्त्वका; वक्ता आश्चर्यः = वर्णन करनेवाला महापुरुष आश्चर्यमय है (बड़ा दुर्लभ है), लब्धा कुशलः = उसे प्राप्त करनेवाला भी बड़ा कुशल (सफलजीवन) कोई एक ही होता है; कुशलानुशिष्टः = और जिसे तत्त्वकी उपलब्धि हो गयी है, ऐसे ज्ञानी महापुरुषके द्वारा शिक्षा प्राप्त किया हुआ, ज्ञाता = आत्मतत्त्वका ज्ञाता भी, आश्चर्यः = आश्चर्यमय है (परम दुर्लभ है) ॥ ७ ॥ व्याख्या-आत्मतत्त्वकी दुर्लभता बतलानेके हेतुसे यमराजने कहा-नचिकेता ! आत्मतत्त्व कोई साधारण-सी बात नहीं है । जगत्मे अधिकांश मनुष्य तो ऐसे ह--जिनको आत्मऋल्याणकी चर्चातक सुननेको नहीं मिलती । वे ऐसे वातावरणमे रहते हैं कि जहाँ प्रात काल जागनेसे लेकर रात्रिको सोनेतक केवल विषय चर्चा ही हुआ करती है, जिसमे उनका मन आठो पहर विषय चिन्तनमे डूबा रहता है । उनके मनमे आत्मतत्त्व सुनने समझनेकी कभी कल्पना ही नहीं आती, और भूले-भटके यदि ऐसा कोई प्रसङ्ग आ जाता है तो उन्हें विषय-सेवनसे अवकाश नहीं मिलता । कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो सुनना-समझना उत्तम समझकर सुनते तो ह, परतु उनके विषयाभिभूत मनमे उसकी धारणा नहीं हो पाती अथवा मन्दबुद्धिके कारण वे उसे समझ नहीं पाते । जो तीक्ष्णबुद्धि पुरुष समझ लेते है, उनमें भी ऐसे आश्चर्यमय महापुरुष कोई विरले ही होते हैं, जो उस आत्म- तत्त्वका यथार्थरूपसे वर्णन करनेवाले समर्थ वक्ता हो। एव ऐसे पुरुष भी कोई एक ही होते हैं जिन्होने आत्मतत्त्वको प्राप्त करके जीवनकी सफलता सम्पन्न की हो; और भलीभाँति समझाकर वर्णन करनेवाले सफलजीवन अनुभवी आत्मदर्शी आचार्यके द्वारा उपदेश प्राप्त करके उसके अनुसार मनन निदिध्यासन करते करते तत्त्वका साक्षात्कार करनेवाले पुरुष भी जगत्मे कोई विरले ही होते हैं । अतः इसमे सर्वत्र ही दुर्लभता है ॥ ७ ॥ सम्बन्ध-अब आत्मज्ञानकी दुर्लभताका कारण बताते हैं- न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥८॥ अवरेण नरेण प्रोक्तः = अल्पज्ञ मनुष्यके द्वारा बतलाये जानेपर; बहुधा चिन्त्यमानः = ( और उसके अनुसार )