कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 221, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 221
- कठोपनिषद् * १९९ बहुत प्रकारसे चिन्तन किये जानेपर भी; एषः = यह आत्मतत्त्व, सुविज्ञेयः = सहज ही समझमें आ जाय, न = ऐसा नहीं है; अनन्यप्रोक्ते = किमी दूसरे ज्ञानी पुरुषके द्वारा उपदेश न किये जानेपर; अत्र गतिः न अस्ति = इस विषयमें मनुष्यका प्रवेश नहीं होता, हि अणुप्रमाणात् = क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुसे भी; अणीयान् = अधिक सूक्ष्म है, अतर्क्यम् = ( इसलिये ) तर्कसे अतीत है ॥ ८ ॥ व्याख्या-प्रकृतिपर्यन्त जो भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्त्व है, यह आत्मतत्त्व उससे भी सूक्ष्म है। यह इतना गहन है कि जबतक इसे यथार्थरूपसे समझानेवाले कोई महापुरुष नहीं मिलते, तबतक मनुष्यका इसमे प्रवेश पाना अत्यन्त ही कठिन है। अल्पज्ञ—साधारण ज्ञानवाले मनुष्य यदि इसे बतलाते हैं और उसके अनुसार यदि कोई विविध प्रकारसे इसके चिन्तनका अभ्यास करता है, तो उसका आत्मज्ञानरूपी फल नहीं होता। आत्मतत्त्व तनिक-सा भी समझमे नहीं आता। न यह ऐसा ही है कि दूसरेसे सुने बिना केवल अपने आप तर्क-वितर्कयुक्त विचार करनेसे समझमें आ जाय। सुनना आवश्यक है, पर सुनना उनसे है, जो इसे भलीभाँति जाननेवाले महापुरुष हों। तभी इस तर्कसे सर्वथा अतीत विषयमे जानकारी हो सकती है ॥ ८ ॥ नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९॥ प्रेष्ठ = हे प्रियतम !, याम् त्वम् आपः = जिसको तुमने पाया है, एषा मतिः = यह बुद्धि, तर्केण न आपनेया = तर्कसे नहीं मिल सकती ( यह तो ); अन्येन प्रोक्ता एव = दूसरेके द्वारा कही हुई ही, सुज्ञानाय = आत्मज्ञानमें निमित्त, [ भवति = होती है;] बत = सचमुच ही; (तुम) सत्यधृतिः = उत्तम धैर्यवाले; असि = हो, नचिकेतः = हे नचिकेता ! (हम चाहते हैं कि); = तुम्हारे-जैसे ही, प्रष्टा = पूछनेवाले; नः भूयात् = हमें मिला करें ॥ ९॥ व्याख्या-नचिकेताकी प्रशंसा करते हुए यमराज फिर कहते है कि हे प्रियतम ! तुम्हारी इस पवित्र मति—निर्मल निष्ठाको देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। ऐसी निष्ठा तर्कसे कभी नहीं मिल सकती। यह तो तभी उत्पन्न होती है, जब भगवत्कृपासे किसी महापुरुषका सङ्ग प्राप्त होता है और उनके द्वारा लगातार परमात्माके महत्त्वका विशद विवेचन सुननेका सौभाग्य मिलता है। ऐसी निष्ठा ही मनुष्यको आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करनेमें प्रवृत्त करती है। इतना प्रलोभन दिये जानेपर तुम अपनी निष्ठापर दृढ रहे—इससे यह सिद्ध है कि वस्तुतः तुम सच्ची धारणासे सम्पन्न हो। नचिकेता ! हमें तुम-जैसे ही पूछनेवाले जिज्ञासु मिला करें ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-अब यमराज अपने उदाहरणसे निष्काम भावकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं— जानाम्यहँ शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥१०॥ अहम् जानामि = मैं जानता हूँ कि; शेवधिः = कर्मफलरूप निधि; अनित्यम् इति = अनित्य है, हि अध्रुवैः = क्योंकि अनित्य (विनाशशील) वस्तुओंसे; तत् ध्रुवम् = वह नित्य पदार्थ (परमात्मा), न हि प्राप्यते = नहीं मिल सकता, ततः = इसलिये; मया = मेरे द्वारा (कर्तव्यबुद्धिसे), अनित्यैः द्रव्यैः = अनित्य पदार्थोंके द्वारा, नाचिकेतः = नाचिकेत नामक, अग्निः चितः = अग्निका चयन किया गया (अनित्य भोगोंकी प्राप्तिके लिये नहीं, अतः उस निष्काम भावकी अपूर्व शक्तिसे मै ), नित्यम् = नित्य वस्तु परमात्माको; प्राप्तवान् = प्राप्त हो गया, अस्मि = हूँ ॥ १० ॥ व्याख्या-नचिकेता ! मैं इस बातको भलीभाँति जानता हूँ कि कर्मोंके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके भोगसमूहकी जो निधि मिलती है, वह चाहे कितनी ही महान् क्यों न हो, एक दिन उसका विनाश निश्चित है, अतएव वह अनित्य है। और यह सिद्ध है कि अनित्य साधनोंसे नित्य पदार्थकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस रहस्यको जानकर ही मैने नाचिकेत अग्निके चयनादिरूपसे जो कुछ यज्ञादि कर्म अनित्य वस्तुओंके द्वारा किये, सब-के-सब कामना और आसक्तिसे रहित होकर केवल कर्तव्यबुद्धिसे किये। इस निष्काम भावकी ही यह महिमा है कि अनित्य पदार्थोंके द्वारा यजन करके भी मैंने नित्य सुखरूप परमात्माको प्राप्त कर लिया* ॥ १० ॥
- कुछ आदरणीय महानुभावोंने इसका यह अर्थ किया है—