कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२०० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध—नचिकेतामें वह निष्कामभाव पूर्णरूपसे है, इसलिये यमराज उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं— कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम् । स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता !, कामस्य आप्तिम्=जिसमें सब प्रकारके भोग मिल सकते हैं, जगतः प्रतिष्ठाम्=जो जगत्का आधार, क्रतोः अनन्त्यम्=यज्ञका चिरस्थायी फल, अभयस्य पारम्=निर्भयताकी अवधि और; स्तोममहत्= स्तुति करनेयोग्य एव महत्त्वपूर्ण है (तथा), उरुगायम्=वेदोंमें जिसके गुण नाना प्रकारसे गाये गये हैं, प्रतिष्ठाम्=(और ) जो दीर्घकालतककी स्थितिसे सम्पन्न है, ऐसे स्वर्गलोकको, दृष्ट्वा धृत्या=देखकर भी तुमने धैर्यपूर्वक; अत्यस्राक्षीः=उसका त्याग कर दिया, [ अतः=इसलिये मैं समझता हूँ कि ], धीरः (असि)=तुम बहुत ही बुद्धिमान् हो ॥ ११ ॥ व्याख्या—नचिकेता ! तुम सब प्रकारसे श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न और निष्काम हो । मैंने तुम्हारे सामने वरदानके रूपमें उस स्वर्गलोकको रक्खा, जो सब प्रकारके भोगोंसे परिपूर्ण, जगत्का आधारस्वरूप, यज्ञादि शुभकर्मोंका अन्तरहित फल, सब प्रकारके दुःख और भयसे रहित, स्तुति करनेयोग्य और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । वेदोंने भाँति भाँतिमें उसकी शोभाके गुणगान किये हैं और वह दीर्घकालतक स्थित रहनेवाला है, तुमने उसके महत्त्वको समझकर भी बड़े धैर्यके साथ उसका परित्याग कर दिया, तुम्हारा मन तनिक भी उसमें आसक्त नहीं हुआ, तुम अपने निश्चयपर दृढ और अटल रहे । यह साधारण बात नहीं है । इसलिये मैं यह मानता हूँ कि तुम बड़े ही बुद्धिमान्, अनासक्त और आत्मतत्त्वको जाननेके अधिकारी हो* ॥११॥ सम्बन्ध—इस प्रकार नचिकेताके निष्कामभावको देखकर यमराजने निश्चय कर लिया कि यह परमात्माके तत्त्वज्ञानका यथार्थ अधिकारी है, अत उसके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करनेके लिये यमराज अब दो मन्त्रोंमें परब्रह्म परमात्माकी महिमाका वर्णन करते हैं— तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥ गूढम्=जो योगमायाके पर्देमें छिपा हुआ, अनुप्रविष्टम्=सर्वव्यापी, गुहाहितम्=सबके हृदयरूप गुफामे स्थित (अतएव ), गह्वरेष्ठम्=संसाररूप गहन वनमें रहनेवाला, पुराणम्=सनातन है, ऐसे, तम् दुर्दर्शम् देवम्=उस कठिनतासे देखे जानेवाले परमात्मदेवको, धीरः=शुद्ध बुद्धियुक्त साधक, अध्यात्मयोगाधिगमेन=अध्यात्मयोगकी प्राप्तिके द्वारा; मत्वा=समझकर, हर्षशोकौ जहाति=हर्ष और शोकको त्याग देता है ॥ १२ ॥ व्याख्या—यह सम्पूर्ण जगत् एक अत्यन्त दुर्गम गहन वनके सदृश है, परंतु यह परब्रह्म परमेश्वरसे परिपूर्ण है । वह सर्वव्यापी इसमें सर्वत्र प्रविष्ट है ( गीता ९ । ४ )। वह सबके हृदयरूपी गुफामे स्थित है । ( गीता १३ । १८, १५ । १५; मैं जानता हूँ कि कर्मफलरूप निधि अनित्य है, क्योंकि अनित्य साधनोंसे परमात्मारूपी नित्य निधि नहीं मिल सकती । यह जानते हुए भी मैंने स्वर्गके साधनभूत नाचिकेत अग्निका अनित्य पदार्थोंके द्वारा चयन किया था, उसीसे मैंने अधिकारसम्पन्न होकर यह आपेक्षिक नित्य ( दूसरे पदोंकी अपेक्षा अधिक कालतक रहनेवाला तथा श्रेष्ठ ) यमराजका पद प्राप्त किया ।
- १-इसका अर्थ एक आदरणीय महानुभाव इस प्रकार करते हैं— नचिकेता ! तुमने उस परमपदार्थ परमात्माके सम्मुख जगत्की चरम सीमाके भोग, प्रतिष्ठा, यज्ञका अनन्त फलरूप हिरण्यगर्भका पद, अभयकी मर्यादा (चिरकालस्थायी दीर्घजीवन ), स्तुत्य और महान् अणिमादि ऐश्वर्य, शुभफल और अत्युत्तम गति—इन सभीको हेय समझकर धैर्यके द्वारा त्याग दिया है । इसलिये तुम बड़े ही बुद्धिमान् हो । २-एक दूसरे महानुभावने इसका अर्थ यों किया है— जहाँ कामनाकी परिसमाप्ति हो जाती है, जो जगत्का आधार है, जहाँ ज्ञानकी अनन्तता है, जो अभयकी सीमा है, जो सबके द्वारा स्तुतिके योग्य है, जो सबसे महान् है, जिसकी सब स्तुति करते हैं और जो आप ही अपनी प्रतिष्ठा है, उस परमात्माको देखकर— उसको सामने रखकर बड़े धैर्यके साथ तुमने इस अनित्य निधिका त्याग कर दिया है, इसलिये तुम बड़े बुद्धिमान् हो ।