भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 223
  • कठोपनिषद् * २०१ १८ । ६१) । इस प्रकार नित्य साथ रहनेपर भी लोग उसे सहजमें देख नहीं पाते; क्योंकि वह अपनी योगमायाके पर्देमें छिपा है (गीता ७ । २५), इसलिये अत्यन्त गुप्त है। उसके दर्शन बहुत ही दुर्लभ हैं। जो शुद्ध-बुद्धिसम्पन्न साधक अपने मन-बुद्धिको नित्य निरन्तर उसके चिन्तनमे संलग्न रखता है, वह उस सनातन देवको प्राप्त करके सदाके लिये हर्ष शोकसे रहित हो जाता है। उसके अन्त:करणमेसे हर्ष-शोकादिके विकार समूल नष्ट हो जाते हैं* ॥ १२ ॥ एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृद्ध्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥ मर्त्यः = मनुष्य (जब); एतत् = इस, धर्म्यम् = धर्ममय (उपदेश) को, श्रुत्वा = सुनकर; सम्परिगृह्य = भलीभाँति ग्रहण करके, प्रवृद्ध्य = (और) उसपर विवेकपूर्वक विचार करके; एतम् = इस; अणुम् = सूक्ष्म आत्मतत्त्वको; आप्य = जानकर अनुभव कर लेता है; (तब), सः = वह, मोदनीयम् = आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; लब्ध्वा = पाकर, मोदते हि = आनन्दमें ही मग्न हो जाता है; नचिकेतसम् = तुम नचिकेताके लिये; विवृतम् सद्म मन्ये = (मैं) परमधामका द्वार खुला हुआ मानता हूँ ॥ १३ ॥ व्याख्या—इस अध्यात्मविषयक धर्ममय उपदेशको पहले तो अनुभवी महापुरुषके द्वारा अतिशय श्रद्धापूर्वक सुनना चाहिये, सुनकर उसका मनन करना चाहिये। तदनन्तर एकान्तमे उसपर विचार करके बुद्धिमे उसको स्थिर करना चाहिये । इस प्रकार साधन करनेपर जब मनुष्यको आत्मस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् जब वह आत्माको तत्त्वसे समझ लेता है, तब आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। उस आनन्दके महान् समुद्रको पाकर वह उसमें निमग्न हो जाता है। हे नचिकेता ! तुम्हारे लिये उस परमधामका द्वार खुला हुआ है। तुमको वहाँ जानेसे कोई रोक नहीं सकता। तुम ब्रह्म- प्राप्तिके उत्तम अधिकारी हो, ऐसा मैं मानता हूँ ॥ १३ ॥ सम्बन्ध—यमराजके मुखसे परब्रह्म पुरुषोत्तमकी महिमा सुनकर और अपनेको उसका अधिकारी जानकर नचिकेताके मनमें परमात्मतत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी। साथ ही उसे यमराजके द्वारा अपनी प्रशंसा सुनकर साधु-सम्मत सङ्कोच भी हुआ। इसलिये उसने यमराजसे बीचमें ही पूछा— अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥ यत् तत् = जिस उस परमेश्वरको, धर्मात् अन्यत्र = धर्मसे अतीत; अधर्मात् अन्यत्र = अधर्मसे भी अतीत; च = तथा; अस्मात् कृताकृतात् = इस कार्य और कारणरूप सम्पूर्ण जगत्से भी; अन्यत्र च = भिन्न और; भूतात् भव्यात् = भूत, वर्तमान एव भविष्यत्—तीनों कालोंसे तथा इनसे सम्बन्धित पदाथसेि भी; अन्यत्र = पृथक्; पश्यसि = (आप) जानते हैं; तत् = उसे; वद = बतलाइये ॥ १४ ॥ व्याख्या—नचिकेता कहता है—भगवन् ! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो धर्म और अधर्मके सम्बन्धसे रहित, कार्य कारणरूप प्रकृतिसे पृथक् एव भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन सबसे भिन्न जिस परमात्मतत्त्वको आप जानते हैं, उसे मुझको बतलाइये† ॥ १४ ॥
  • १-कुछ आदरणीय महानुभावोंने इसका अर्थ यों किया है कि— 'उस दुर्दर्श, शब्दादि प्राकृत विषयविकाररूप विषानसे छिपे हुए, बुद्धिमें स्थित, अनेक अनर्थोंसे व्याप्त देहमें स्थित, चिरन्तन— पुरातन देवको जो अध्यात्मयोगकी प्राप्तिके द्वारा जान लेता है, वह धीर पुरुष हर्ष-शोकका परित्याग कर देता है। २-प्रात स्मरणीय भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने भी ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें इस प्रकरणको परमात्मविषयक माना है ('प्रकरणं चेदं परमात्मन '—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा०२, के १२ वें सूत्रका भाष्य ) । † भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने इस प्रकरणको भी अपने ब्रह्मसूत्रभाष्यमें परमेश्वरविषयक ही माना है ( 'पृष्टं चेह ब्रह्म'—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० ३ के २४ वें सूत्रका भाष्य ) । उ० अं० २६—२७—