भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 224

२७२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध-नचिकेताके इस प्रकार पूछनेपर यमराज उस ब्रह्मतत्त्वके वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं- सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाꣳसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदꣳ सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ सर्वे वेदाः = सम्पूर्ण वेद; यत् पदम् = जिस परम पदको; आमनन्ति = बारंबार प्रतिपादन करते हैं; च = और सर्वाणि = सम्पूर्ण; तपांसि = तप; यत् = जिस पदका; वदन्ति = लक्ष्य कराते हैं अर्थात् वे जिसके साधन हैं; यत् इच्छन्तः = जिसको चाहनेवाले साधकगण; ब्रह्मचर्यम् = ब्रह्मचर्यका; चरन्ति = पालन करते हैं; तत् पदम् = वह पद; ते = तुम्हें; संग्रहेण = संक्षेपसे; ब्रवीमि = (मैं) बतलाता हूँ; (वह है) ओम् = ओम्; इति = ऐसा; एतत् = यह (एक अक्षर-) ॥ १५ ॥ व्याख्या-यमराज यहाँ परब्रह्म पुरुषोत्तमको परमप्राप्य बतलाकर, उसके वाचक ॐकारको प्रतीकरूपसे उसका स्वरूप बतलाते हैं। वे कहते हैं कि समस्त वेद नोंनों प्रकार और नाना छन्दोंसे जिसका प्रतिपादन करते हैं, सम्पूर्ण तप आदि साधनों- का जो एकमात्र परम और चरम लक्ष्य है तथा जिसको प्राप्त करनेकी इच्छासे साधक निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्यका अनुष्ठान किया करते हैं, उस पुरुषोत्तम भगवान्‌का परमतत्त्व मैं तुम्हें संक्षेपमें बतलाता हूँ। वह है 'ॐ' यह एक अक्षर ॥ १५ ॥ सम्बन्ध-नामरहित होनेपर भी परमात्मा अनेक नामोंसे पुकारे जाते हैं। उनके सब नामोंमेंसे 'ओम्' सर्वश्रेष्ठ माना गया है, अतः यहाँ नाम और नामीका अभेद मानकर 'प्रणव'को परब्रह्म पुरुषोत्तमके स्थानमें वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं- एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् । एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥ एतत् = यह; अक्षरम् एव हि ब्रह्म = अक्षर ही तो ब्रह्म है (और); एतत् = यह; अक्षरम् एव हि = अक्षर ही; परम् = परब्रह्म है; एतत् एव हि = इसी; अक्षरम् = अक्षरको; ज्ञात्वा = जानकर; यः = जो; यत् = जिसको; इच्छति = चाहता है; तस्य = उसको; तत् = वही (मिल जाता है) ॥ १६ ॥ व्याख्या-यह अविनाशी प्रणव्-ॐकार ही तो ब्रह्म (परमात्मा) का निर्विशेष स्वरूप है और यही स्वयं समग्र ब्रह्म परम पुरुष पुरुषोत्तम है,अर्थात् उस ब्रह्म और परब्रह्म दोनोंका ही नाम ॐकार है। अतः इस तत्त्वको समझकर साधक इसके द्वारा दोनोंमेंसे किसी भी अभीष्ट रूपको प्राप्त कर सकता है * ॥ १६ ॥ एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥ एतत् = यही; श्रेष्ठम् = अत्युत्तम; आलम्बनम् = आलम्बन है; एतत् = यही (सबका); परम् आलम्बनम् = अन्तिम आश्रय है; एतत् = इस; आलम्बनम् = आलम्बनको; ज्ञात्वा = भलीभाँति जानकर; ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोकमें; महीयते = (साधक) महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥ व्याख्या-यह ॐकार ही परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये सब प्रकारके आलम्बनोंमेंसे सबसे श्रेष्ठ आलम्बन है और यहीं चरम आलम्बन है। इससे परे और कोई आलम्बन नहीं है अर्थात् परमात्माके श्रेष्ठ नामकी शरण हो जाना ही उनकी प्राप्तिका सर्वोत्तम एव अमोघ साधन है। इस रहस्यको समझकर जो साधक श्रद्धा और प्रेमपूर्वक इसपर निर्भर करता है, वह निस्सन्देह परमात्माकी प्राप्तिका परम गौरव लाभ करता है ॥ १७ ॥

  • इस मन्त्रका यह अर्थ भी किया गया है-- यह अक्षर ही अपर ब्रह्म है और यह अक्षर ही परब्रह्म है। यह दोनोंका ही प्रतीक है। इसीको उपास्य ब्रह्म जानकर जो पर अथवा-'अपर' जिस ब्रह्मकी इच्छा करता है वह उसीको प्राप्त हो जाता है। यदि उसका उपास्य परब्रह्म (निर्विशेष आत्मा) हो तो वह केवल जाना जा सकता है और यदि अपरब्रह्म (सविशेष सगुण) हो तो प्राप्त किया जा सकता है।