कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 225, कुल 832 में से
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- कठोपनिषद् * ९०३ सम्बन्ध—इस प्रकार ॐकारको ब्रह्म और परब्रह्म इन दोनोंका प्रतीक बताकर अब नचिकेताके प्रश्नानुसार यमराज पहले आत्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं— न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥ विपश्चित्=नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा, न जायते=न तो जन्मता है, वा न म्रियते=और न मरता ही है, अयम् न=यह न तो स्वय, कुतश्चित्=किसीसे हुआ है, [ न=न (इससे),] कश्चित्=कोई भी, बभूव=हुआ है अर्थात् यह न तो किसीका कार्य है और न कारण ही है, अयम्=यह, अजः=अजन्मा, नित्यः=नित्य, शाश्वतः=सदा एकरस रहनेवाला (और), पुराणः=पुरातन है अर्थात् क्षय और वृद्धिसे रहित है, शरीरे हन्यमाने=शरीरके नाश किये जानेपर भी (इसका); न हन्यते=नाश नहीं किया जा सकता* ॥ १८ ॥ हन्ता चेन्मन्यते हन्तुग् हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायग् हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ चेत्=यदि कोई, हन्ता=मारनेवाला व्यक्ति, हन्तुम्=अपनेको मारनेमें समर्थ, मन्यते=मानता है (और), चेत्=यदि, हतः=(कोई) मारा जानेवाला व्यक्ति, हतम्=अपनेको मारा गया, मन्यते=समझता है (तो), तौ उभौ=वे दोनों ही; न विजानीतः=(आत्मस्वरूपको) नहीं जानते (क्योंकि), अयम्=यह आत्मा, न हन्ति=न तो (किसीको) मारता है (और), न हन्यते=न मारा (ही) जाता है† ॥ १९ ॥ व्याख्या—यमराज यहाँ आत्माके शुद्ध स्वरूपका और उसकी नित्यताका निरूपण करते हैं, क्योंकि जबतक साधक को अपनी नित्यता और निर्विकारताका अनुभव नहीं हो जाता एव वह जबतक अपनेको शरीर आदि अनित्य वस्तुओंसे भिन्न नहीं समझ लेता, तबतक इन अनित्य पदार्थोंसे उसका वैराग्य होकर उसके अन्तःकरणमे नित्य तत्त्वकी अभिलाषा उत्पन्न नहीं होती । उसको यह दृढ अनुभूति होनी चाहिये कि जीवात्मा नित्य चेतन ज्ञानस्वरूप है, अनित्य, विनाशी, जड शरीर और भोगोंसे वास्तवमें इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह अनादि और अनन्त है, न तो इसका कोई कारण है और न कार्य ही; अतः यह जन्म-मरणसे सर्वथा रहित, सदा एकरस, सर्वथा निर्विकार है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता। जो लोग इसको मारनेवाला या मरनेवाला मानते है, वे वस्तुतः आत्मस्वरूपको जानते ही नहीं, वे सर्वथा भ्रान्त हैं। उनकी बातोंपर ध्यान नहीं देना चाहिये । वस्तुतः आत्मा न तो किसीको मारता है और न इसे कोई मार ही सकता है। साधकको शरीर और भोगोंकी अनित्यता और अपने आत्माकी नित्यतापर विचार करके, इन अनित्य भोगोंके सुखकी आशाका त्याग करके सदा अपने साथ रहनेवाले नित्य सुखस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका अभिलाषी बनना चाहिये ॥ १८-१९ ॥
- गीतामें इस मन्त्रके भावको इस प्रकार समझाया गया है— न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ (२।२०) ‘यह आत्मा किसी भी कालमें न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है। क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता ।’ † गीतामें इस मन्त्रके भावको और भी स्पष्टरूपसे व्यक्त किया गया है— य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ (२।१९) ‘जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मारा गया मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते, क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको मारता है, न किसीके द्वारा मारा जाता है ।’