कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 226, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२०४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध—इस प्रकार आत्मतत्त्वके वर्णनद्वारा नचिकेताके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके यमराज अब परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं— अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥ अस्य=इस, जन्तोः=जीवात्माके, गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें, निहितः=रहनेवाला, आत्मा=परमात्मा, अणोः अणीयान्=सूक्ष्मसे अति सूक्ष्म (और), महतः महीयान्=महान्से भी महान् है; आत्मनः तम् महिमानम्=परमात्माकी उस महिमाको, अक्रतुः=कामनारहित (और), वीतशोकः=चिन्तारहित कोई विरला साधक, धातुप्रसादात्=सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वरकी कृपासे ही, पश्यति=देख पाता है ॥ २० ॥ व्याख्या—इससे पहले जीवात्माके शुद्ध स्वरूपका वर्णन किया गया है, उसीको इस मन्त्रमें 'जन्तु' नाम देकर उसकी बद्धावस्था व्यक्त की गयी है । भाव यह कि यद्यपि परब्रह्म पुरुषोत्तम उस जीवात्माके अत्यन्त समीप—जहाँ यह स्वयं रहता है, वहीं हृदयमे छिपे हुए हैं, तो भी यह उनकी ओर नहीं देखता । मोहवश भोगोंमे भूला रहता है । इसी कारण यह 'जन्तु' है—मनुष्य-शरीर पाकर भी कीट-पतङ्ग आदि तुच्छ प्राणियोंकी भाँति अपना दुर्लभ जीवन व्यर्थ नष्ट कर रहा है । जो साधक पूर्वोक्त विवेचनके अनुसार अपने-आपको नित्य चेतनस्वरूप समझकर सब प्रकारके भोगोंकी कामनासे रहित और शोकरहित हो जाता है, वह परमात्माकी कृपासे यह अनुभव करता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम अणुसे भी अणु और महान्- से भी महान्—सर्वव्यापी हैं और इस प्रकार उनकी महिमाको समझकर उनका साक्षात्कार कर लेता है । ( यहाँ 'धातु- प्रसादान्'का अर्थ 'परमेश्वरकी कृपा' किया गया है । 'धातु' शब्दका अर्थ सर्वधारक परमात्मा माना गया है। विष्णुसहस्र- नाममें भी 'अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तम '- 'धातु' को भगवान्का एक नाम माना गया है* ॥ २० ॥ आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥ आसीनः=(वह परमेश्वर) बैठा हुआ ही, दूरम् व्रजति=दूर पहुँच जाता है, शयानः=सोता हुआ (भी), सर्वतः=सब ओर, याति=चलता रहता है, तम् मदामदम् देवम्=उस ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त न होनेवाले देवको; मदन्यः कः=मुझसे भिन्न दूसरा कौन; ज्ञातुम्=जाननेमें, अर्हति=समर्थ है ॥ २१ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमात्मा अचिन्त्यशक्ति हैं और विरुद्धधर्माश्रय हैं । एक ही समयमे उनमें विरुद्ध धर्मोंकी लीला होती है । इसीसे वे एक ही साथ सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और महान्-से-महान् बताये गये हैं । यहाँ यह कहते हैं कि वे परमेश्वर अपने नित्य परमधाममें विराजमान रहते हुए ही भक्ताधीनतावश उनकी पुकार सुनते ही दूर-से-दूर चले जाते हैं । परम धाममें निवास करनेवाले पार्षद भक्तोंकी दृष्टिमें वहाँ शयन करते हुए ही वे सब ओर चलते रहते हैं । अथवा वे परमात्मा सदा-सर्वदा सर्वत्र स्थित हैं । उनकी सर्वव्यापकता ऐसी है कि बैठे भी वही हैं, दूर देशमें चलते भी वही हैं, सोते भी वही हैं और सब ओर जाते-आते भी वही हैं । वे सर्वत्र सब रूपोंमें नित्य अपनी महिमामें स्थित हैं । इस प्रकार अलौकिक परमैश्वर्य- स्वरूप होनेपर भी उन्हें अपने ऐश्वर्यका तनिक भी अभिमान नहीं है । उन परमदेवको जाननेका अधिकारी उनका कृपापात्र मेरे (आत्मतत्त्वज्ञ यमराजके सदृश अधिकारियोंके) सिवा दूसरा कौन हो सकता है ?† ॥ २१ ॥
- एक आदरणीय महानुभावने इसका निम्नलिखित अर्थ करते हुए 'धातुप्रसादात्'का अर्थ 'इन्द्रियोंको निर्मलता' माना है— ' यह आत्मा ही सूक्ष्म-से-सूक्ष्मतर और महान्-से-महान् है, क्योंकि नाम रूपवाली सभी वस्तुएँ इसकी उपाधि हैं। बाह्य विषयोंसे उपरत दृष्टिवाला निष्काम साधक अपनी इन्द्रियों—जो शरीरको धारण करनेके कारण 'धातु' कहलाती हैं—के प्रसाद— निर्मलतासे उस आत्माकी कर्मनिमित्तक वृद्धि और क्षयमे रहित महिमाको देखता है, अर्थात् इस बातको साक्षात् जानता है कि यह मैं हूँ, तदनन्तर वह शोकरहित हो जाता है। † कुछ आदरणीय महानुभावोंने ऐसा अर्थ किया है— वह अचल होकर भी दूर चला जाता है तथा शयन करता हुआ भी सब ओर पहुँचता है, इस प्रकार वह आत्मा समग्र और