भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
  • कठोपनिषद् * १९५ व्याख्या-आप जानते ही हैं, धनसे मनुष्य कभी तृप्त नहीं हो सकता । आगमें घी-ईंधन डालनेसे जैसे आग जोरोंसे भड़कती है, उसी प्रकार धन और भोगोंकी प्राप्तिसे भोग-कामनाका और भी विस्तार होता है। वहाँ तृप्ति कैसी ? वहाँ तो दिन-रात अपूर्णता और अभावकी अग्निमें ही जलना पड़ता है । ऐसे दुःखमय धन और भोगोंको कोई भी बुद्धिमान् पुरुष नहीं माँग सकता । मुझे अपने जीवननिर्वाहके लिये जितने धनकी आवश्यकता होगी, उतना तो आपके दर्शनसे ही प्राप्त हो जायगा । रही दीर्घजीवनकी बात, सो जबतक मृत्युके पदपर आपका शासन है, तबतक मुझे मरनेका भी भय क्यों होने लगा । अतएव किसी भी दृष्टिसे दूसरा वर माँगना उचित नहीं मालूम होता । इसलिये मेरा प्रार्थनीय तो वह आत्मतत्त्व-विषयक वर ही है । मैं उसे लौटा नहीं सकता ॥ २७ ॥ सम्बन्ध-इस प्रकार भोगोंकी तुच्छताका वर्णन करके अब नचिकेता अपने वरका महत्त्व बतलाता हुआ उसीको प्रदान करनेके लिये दृढतापूर्वक निवेदन करता है- अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥ जीर्यन् मर्त्यः = यह मनुष्य जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है, प्रजानन् = इस तत्त्वको भलीभाँति समझनेवाला, क्वधःस्थः = मनुष्यलोकका निवासी, कः = कौन ( ऐसा ) मनुष्य है ( जो कि ), अजीर्यताम् = बुढ़ापेसे रहित, अमृतानाम् = न मरनेवाले ( आप-सदृश ) महात्माओंका, उपेत्य = सङ्ग पाकर भी, वर्णरतिप्रमोदान् = ( स्त्रियोंके ) सौन्दर्य, क्रीड़ा और आमोद-प्रमोदका, अभिध्यायन् = बार-बार चिन्तन करता हुआ, अतिदीर्घे = बहुत कालतक, जीविते = जीवित रहनेमें, रमेत = प्रेम करेगा ॥ २८ ॥ व्याख्या-हे यमराज ! आप ही बताइये, भला आप-सरीखे अजर-अमर महात्मा देवताओंका दुर्लभ एवं अमोघ सङ्ग प्राप्त करके मृत्युलोकका जरामरणशील ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य होगा जो स्त्रियोंके सौन्दर्य, क्रीड़ा और आमोद-प्रमोदमें आसक्त होकर उनकी ओर दृष्टिपात करेगा और इस लोकमें दीर्घकालतक जीवित रहनेमें आनन्द मानेगा ? ॥ २८ ॥ यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥ मृत्यो = हे यमराज, यस्मिन् = जिस, महति साम्पराये = महान् आश्चर्यमय परलोकसम्बन्धी आत्मज्ञानके विषयमें; इदम् विचिकित्सन्ति = ( लोग ) यह शङ्का करते हैं कि यह आत्मा मरनेके बाद रहता है या नहीं, ( तत्र ) यत् = उसमें जो निर्णय है, तत् नः ब्रूहि = वह आप हमें बतलाइये, यः अयम् = जो यह, गूढम् अनुप्रविष्टः वरः = अत्यन्त गम्भीरताको प्राप्त हुआ वर है, तस्मात् = इससे, अन्यम् = दूसरा वर, नचिकेताः = नचिकेता, न वृणीते = नहीं माँगता ॥ २९ ॥ व्याख्या-नचिकेता कहता है-हे यमराज ! जिस आत्मतत्त्व-सम्बन्धी महान् ज्ञानके विषयमें लोग यह शङ्का करते हैं कि मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व रहता है या नहीं, उसके सम्बन्धमें निर्णयात्मक जो आपका अनुभूत ज्ञान हो, मुझे कृपापूर्वक उसीका उपदेश कीजिये। यह आत्मतत्त्वसम्बन्धी वर अत्यन्त गूढ है-यह सत्य है, पर आपका शिष्य यह नचिकेता इसके अतिरिक्त दूसरा कोई वर नहीं चाहता ! ॥ २९ ॥ ॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥ ❖ द्वितीय वल्ली सम्बन्ध-इस प्रकार परीक्षा करके जब यमराजने समझ लिया कि नचिकेता दृढ़निश्चयी, परम वैराग्यवान् एव निर्भीक है, अतः ब्रह्मविद्याका उत्तम अधिकारी है, तब ब्रह्मविद्याका उपदेश आरम्भ करनेके पहले उसका महत्त्व प्रकट करते हुए यमराज बोले- अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः । तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ श्रेयः = कल्याणका साधन; अन्यत् = अलग है, उत = और, प्रेयः = प्रिय लगनेवाले भोगोंका साधन- अन्यत् एव =

१९६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अलग ही है, ते=वे, नानार्थे=भिन्न भिन्न फल देनेवाले; उभे=दोनों साधन; पुरुषम्=मनुष्यको, सिनीतः=बाँधते हैं— अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं, तयोः=उन दोनोंमेंसे, श्रेयः=कल्याणके साधनको, आददानस्य=ग्रहण करनेवालेका; साधु भवति=कल्याण होता है, उ यः=परन्तु जो, प्रेयः वृणीते=सांसारिक उन्नतिके साधनको स्वीकार करता है, [ सः=वह, ] अर्थात्=यथार्थ लाभसे, हीयते=भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ व्याख्या—मनुष्य-शरीर अन्यान्य योनियोंकी भाँति केवल कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही नहीं मिला है। इसमें मनुष्य भविष्यमे सुख देनेवाले साधनका अनुष्ठान भी कर सकता है। वेदोंमें सुखके साधन दो बताये गये हैं—(१) श्रेय अर्थात् सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर नित्य आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका उपाय और (२) प्रेय अर्थात् स्त्री, पुत्र, धन, मकान, सम्मान, यश आदि इस लोककी और स्वर्गलोककी जितनी भी प्राकृत सुख- भोगकी सामग्रियाँ हैं, उनकी प्राप्तिका उपाय। इस प्रकार अपने अपने ढंगसे मनुष्यको सुख पहुँचा सकनेवाले ये दोनो साधन मनुष्यको बाँधते हैं—उसे अपनी अपनी ओर खींचते हैं। अधिकांश लोग तो 'भोगोंमे प्रत्यक्ष और तत्काल सुख मिलता है' इस प्रतीतिके कारण उसका परिणाम सोचे-समझे बिना ही प्रेयकी ओर खिंच जाते ह। परन्तु कोई-कोई भाग्यवान् मनुष्य भगवान्‌की दयासे प्राकृत भोगोंकी आपातरमणीयता एव परिणामदुःखताका रहस्य जानकर उनकी ओरसे विरक्त हो श्रेयकी ओर आकर्षित हो जाता है। इन दोनो प्रकारके मनुष्योंमेसे जो भगवान्‌की कृपाका पात्र होकर श्रेयको अपना लेता है और तत्परताके साथ उसके साधनमें लग जाता है, उसका तो सब प्रकारसे कल्याण हो जाता है। वह सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे सर्वथा छूटकर अनन्त असीम आनन्दस्वरूप परमात्माको पा लेता है। परन्तु जो सांसारिक सुखके साधनोंमे लग जाता है, वह अपने मानव जीवनके परम लक्ष्य परमात्माकी प्राप्तिरूप यथार्थ प्रयोजनको सिद्ध नहीं कर पाता, इसलिये उसे आत्यन्तिक और नित्य सुख नहीं मिलता। उसे तो भ्रमवश सुखरूप प्रतीत होनेवाले वे अनित्य भोग मिलते हैं, जो वास्तवमे दुःखरूप ही हैं। अतः वह वास्तविक सुखसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥ २॥ श्रेयः च प्रेयः च=श्रेय और प्रेय—ये दोनो ही, मनुष्यम् एतः=मनुष्यके सामने आते हैं, धीरः=बुद्धिमान् मनुष्य, तौ=उन दोनोंके स्वरूपपर, सम्परीत्य=भलीभाँति विचार करके, विविनक्ति=उनको पृथक्-पृथक् समझ लेता है, (और) धीरः=वह श्रेष्ठबुद्धि मनुष्य, श्रेयः हि=परम कल्याणके साधनको ही, प्रेयसः=भोग-साधनकी अपेक्षा, अभिवृणीते=श्रेष्ठ समझकर ग्रहण करता है (परन्तु), मन्दः=मन्दबुद्धिवाला मनुष्य, योगक्षेमात्=लौकिक योगक्षेमकी इच्छासे, प्रेयः वृणीते=भोगोंके साधनरूप प्रेयको अपनाता है ॥ २ ॥ व्याख्या—अधिकांश मनुष्य तो पुनर्जन्ममें विश्वास न होनेके कारण इस विषयमे विचार ही नहीं करते, वे भोगोंमे आसक्त होकर अपने देवदुर्लभ मनुष्य-जीवनको पशुवत् भोगोंके भोगनेमें ही समाप्त कर देते हैं। किंतु जिनका पुनर्जन्ममे और परलोकमे विश्वास है, उन विचारशील मनुष्योंके सामने जब ये श्रेय और प्रेय दोनो आते हे, तब वे इन दोनोंके गुण- दोषोंपर विचार करके दोनोंको पृथक्-पृथक् समझनेकी चेष्टा करते है। इनमे जो श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न होता है, वह तो दोनोंके तत्त्वको पूर्णतया समझकर नीर-क्षीर-विवेकी इस की तरह प्रेयकी उपेक्षा करके श्रेयको ही ग्रहण करता है। परंतु जो मनुष्य अल्पबुद्धि है, जिसकी बुद्धिमें विवेकशक्तिका अभाव है, वह श्रेयके फलमें अविश्वास करके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले लौकिक योगक्षेमकी सिद्धिके लिये प्रेयको अपनाता है, वह इतना ही समझता है कि जो कुछ भोगपदार्थ प्राप्त हैं, वे सुरक्षित बने रहें और जो अप्राप्त है, वे प्रचुर मात्रामे मिल जायँ। यही योगक्षेम है ॥ २ ॥ सम्बन्ध—परमात्माकी प्राप्तिके साधनरूप श्रेयकी प्रशंसा करके अब यमराज साधारण मनुष्यसे नचिकेताकी विशेषता दिखलाते हुए उसके वैराग्यकी प्रशंसा करते हैं— स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥

  • कठोपनिषद् * १९७ नचिकेतः = हे नचिकेता ! (उन्हीं मनुष्योंमें), सः त्वम् = तुम ( ऐसे निःस्पृह हो कि ), प्रियान् च=प्रिय लगनेवाले और, प्रियरूपान् = अत्यन्त सुन्दर रूपवाले, कामान् = इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंको, अभिध्यायन्= भलीभाँति सोच-समझकर, अत्यस्राक्षीः = तुमने छोड़ दिया,, एताम् वित्तमयीम् सृङ्काम् = इस सम्पत्तिरूप शृङ्खला (बेड़ी) को, न अवाप्तः = (तुम ) नहीं प्राप्त हुए (इसके बन्धनमें नहीं फँसे) यस्याम् = जिसमें, बहवः मनुष्याः = बहुत-से मनुष्य, मज्जन्ति= फँस जाते हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या-यमराज कहते हैं- 'हे नचिकेता ! तुम्हारी परीक्षा करके मैंने अच्छी तरह देख लिया कि तुम बडे बुद्धिमान्, विवेकी तथा वैराग्यसम्पन्न हो । अपनेको बहुत बड़े चतुर, विवेकी और तार्किक माननेवाले लोग भी जिस चमक-दमकवाली सम्पत्तिके मोहजालमे फँस जाया करते हैं, उसे भी तु ने स्वीकार नहीं किया। मैंने बड़ी ही लुभावनी भाषामे तुम्हें बार-बार पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, गौएँ, वन, सम्पत्ति, भूमि आदि अनेकों दुष्प्राप्य और लोभनीय भोगोंका प्रलोभन दिया, इतना ही नहीं, स्वर्गके दिव्य भोगों और अप्रतिम सुन्दरी स्वर्गीय रमणियोंके चिर-भोगसुखका लालच दिया, परंतु तुमने सहज ही उन सबकी उपेक्षा कर दी। अतः तुम अवश्य ही परमात्मतत्त्वका श्रवण करनेके सर्वोत्तम अधिकारी हो ॥ ३ ॥ दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता । विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४॥ या अविद्या=जो कि अविद्या; च विद्या इति ज्ञाता = और विद्या नामसे विख्यात हैं, एते= ये दोनों, दूरम् विपरीते= परस्पर अत्यन्त विपरीत (और), विषूची=भिन्न-भिन्न फल देनेवाली हैं, नचिकेतसम्= तुम नचिकेताको, विद्याभीप्सिनम् मन्ये=मैं विद्याका ही अभिलाषी मानता हूँ, (क्योंकि), त्वा बहवः कामाः= तुमको बहुत-से भोग, न अलोलुपन्त= (किसी प्रकार भी) नहीं लुभा सके ॥ ४ ॥ व्याख्या-ये अविद्या और विद्या नामसे प्रसिद्ध दो साधन पृथक्-पृथक् फल देनेवाले हैं और परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं। जिसकी भोगोंमें आसक्ति है, वह कल्याण-साधनमे आगे नहीं बढ़ सकता और जो कल्याण-मार्गका पथिक है, वह भोगोंकी ओर दृष्टि नहीं डालता । वह सब प्रकारके भोगोंको दु.खरूप मानकर उनका परित्याग कर देता है। हे नचिकेता ! मैं मानता हूँ कि तुम विद्याके ही अभिलाषी हो, क्योंकि बहुत-से बड़े-बड़े भोग भी तुम्हारे मनमें किञ्चिन्मात्र भी लोभ नहीं उत्पन्न कर सके ॥ ४ ॥ अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः । दन्दम्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५॥ अविद्यायाम् अन्तरे वर्तमानाः=अविद्याके भीतर स्थित होकर (भी), स्वयं धीराः=अपने-आपको बुद्धिमान् (और); पण्डितम् मन्यमानाः=विद्वान् माननेवाले, मूढाः=(भोगकी इच्छा करनेवाले) वे मूर्खलोग, दन्दम्यमानाः =नाना योनियोंमें चारो ओर भटकते हुए, (तथा) परियन्ति=ठीक वैसे ही ठोकरें खाते भटकते रहते हैं, यथा = जैसे, अन्धेन एव नीयमानाः = अन्धे मनुष्यके द्वारा चलाये जानेवाले, अन्धाः = अन्धे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते हैं) ॥५॥ व्याख्या-जब अन्धे मनुष्यको मार्ग दिखलानेवाला भी अन्धा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थान- पर नहीं पहुँच पाता, बीचमे ही ठोकरें खाता भटकता है और काँटे-कंकड़ोंसे विंधकर या गहरे गढ्ढे आदिमें गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है। वैसे ही उस मूर्खको भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विचित्र दु खपूर्ण योनियोंमें एव नरकादिमे प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पड़ता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझता है, विद्या बुद्धिके मिथ्याभिमानमें शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करता और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंको भोग करनेमें तथा उनके उपार्जनमें ही निरन्तर सलग्न रहकर मनुष्यजीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करता रहता है ॥ ५ ॥ न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६॥

१९८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * वित्तमोहेन मूढम् = इस प्रकार सम्पत्तिके मोहसे मोहित, प्रमाद्यन्तम् बालम् = निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको, साम्परायः = परलोक, न प्रतिभाति = नहीं सूझता; अयम् लोकः = वह समझता है कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही सत्य है' परः न अस्ति = इसके सिवा दूसरा (स्वर्ग नरक आदि लोक) कुछ भी नहीं है; इति मानी = इस प्रकार माननेवाला अभिमानी मनुष्य' पुनः पुनः = बार-बार, मे वशम् = मेरे ( यमराजके ) वशमे, आपद्यते = आता है ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस प्रकार मनुष्य-जीवनके महत्त्वको नहीं समझनेवाला अभिमानी मनुष्य सासारिक भोग सम्पत्तिकी प्राप्तिके साधनरूप धनादिके मोहमे मोहित हुआ रहता है, अतएव भोगोंमे आसक्त होकर वह प्रमादपूर्वक मनमाना आचरण करने लगता है । उसे परलोक नहीं सूझता । उसके अन्तःकरणमे इस प्रकारके विचार उत्पन्न ही नहीं होते कि मरनेके बाद मुझे अपने समस्त कर्मोंका फल भोगनेके लिये बाध्य होकर बार-बार विविध योनियोमे जन्म लेना पडेगा । वह मूर्ख समझता है कि बस, जो कुछ यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता है, यही लोक है । इसीकी सत्ता है । यहाँ जितना विषय-सुख भोग लिया जाय, उतनी ही बुद्धिमानी है । इसके आगे क्या हैं? परलोकको किसने देखा है ? परलोक तो लोगोंकी कल्पनामात्र है, इत्यादि । इस प्रकारकी मान्यता रखनेवाला मनुष्य बार-बार यमराजके चगुलमें पड़ता है और वे उसके कर्मानुसार उसे नाना योनियोमे ढकेलते रहते हैं । उसके जन्म मरणका चक्र नहीं टूटता ॥ ६ ॥ सम्बन्ध - इस प्रकार विषयासक्त, प्रत्यक्षवादी मूर्खोकी निन्दा करके अब उस आत्मतत्त्वकी और उसको जानने, समझने तथा वर्णन करनेवाले पुरुषकी दुर्लभताका वर्णन करते हैं- श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाऽऽश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥७॥ यः बहुभिः = जो (आत्मतत्त्व ) बहुतोको तो, श्रवणाय अपि = सुननेके लिये भी, न लभ्यः = नहीं मिलता, यम्= जिसको, बहवः = बहुत से लोग, शृण्वन्तः अपि = सुनकर भी, न विद्युः = नहीं समझ सकते, अस्य = ऐसे इस गूढ आत्मतत्त्वका; वक्ता आश्चर्यः = वर्णन करनेवाला महापुरुष आश्चर्यमय है (बड़ा दुर्लभ है), लब्धा कुशलः = उसे प्राप्त करनेवाला भी बड़ा कुशल (सफलजीवन) कोई एक ही होता है; कुशलानुशिष्टः = और जिसे तत्त्वकी उपलब्धि हो गयी है, ऐसे ज्ञानी महापुरुषके द्वारा शिक्षा प्राप्त किया हुआ, ज्ञाता = आत्मतत्त्वका ज्ञाता भी, आश्चर्यः = आश्चर्यमय है (परम दुर्लभ है) ॥ ७ ॥ व्याख्या-आत्मतत्त्वकी दुर्लभता बतलानेके हेतुसे यमराजने कहा-नचिकेता ! आत्मतत्त्व कोई साधारण-सी बात नहीं है । जगत्‌मे अधिकांश मनुष्य तो ऐसे ह--जिनको आत्मऋल्याणकी चर्चातक सुननेको नहीं मिलती । वे ऐसे वातावरणमे रहते हैं कि जहाँ प्रात काल जागनेसे लेकर रात्रिको सोनेतक केवल विषय चर्चा ही हुआ करती है, जिसमे उनका मन आठो पहर विषय चिन्तनमे डूबा रहता है । उनके मनमे आत्मतत्त्व सुनने समझनेकी कभी कल्पना ही नहीं आती, और भूले-भटके यदि ऐसा कोई प्रसङ्ग आ जाता है तो उन्हें विषय-सेवनसे अवकाश नहीं मिलता । कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो सुनना-समझना उत्तम समझकर सुनते तो ह, परतु उनके विषयाभिभूत मनमे उसकी धारणा नहीं हो पाती अथवा मन्दबुद्धिके कारण वे उसे समझ नहीं पाते । जो तीक्ष्णबुद्धि पुरुष समझ लेते है, उनमें भी ऐसे आश्चर्यमय महापुरुष कोई विरले ही होते हैं, जो उस आत्म- तत्त्वका यथार्थरूपसे वर्णन करनेवाले समर्थ वक्ता हो। एव ऐसे पुरुष भी कोई एक ही होते हैं जिन्होने आत्मतत्त्वको प्राप्त करके जीवनकी सफलता सम्पन्न की हो; और भलीभाँति समझाकर वर्णन करनेवाले सफलजीवन अनुभवी आत्मदर्शी आचार्यके द्वारा उपदेश प्राप्त करके उसके अनुसार मनन निदिध्यासन करते करते तत्त्वका साक्षात्कार करनेवाले पुरुष भी जगत्‌मे कोई विरले ही होते हैं । अतः इसमे सर्वत्र ही दुर्लभता है ॥ ७ ॥ सम्बन्ध-अब आत्मज्ञानकी दुर्लभताका कारण बताते हैं- न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥८॥ अवरेण नरेण प्रोक्तः = अल्पज्ञ मनुष्यके द्वारा बतलाये जानेपर; बहुधा चिन्त्यमानः = ( और उसके अनुसार )

  • कठोपनिषद् * १९९ बहुत प्रकारसे चिन्तन किये जानेपर भी; एषः = यह आत्मतत्त्व, सुविज्ञेयः = सहज ही समझमें आ जाय, न = ऐसा नहीं है; अनन्यप्रोक्ते = किमी दूसरे ज्ञानी पुरुषके द्वारा उपदेश न किये जानेपर; अत्र गतिः न अस्ति = इस विषयमें मनुष्यका प्रवेश नहीं होता, हि अणुप्रमाणात् = क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुसे भी; अणीयान् = अधिक सूक्ष्म है, अतर्क्यम् = ( इसलिये ) तर्कसे अतीत है ॥ ८ ॥ व्याख्या-प्रकृतिपर्यन्त जो भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्त्व है, यह आत्मतत्त्व उससे भी सूक्ष्म है। यह इतना गहन है कि जबतक इसे यथार्थरूपसे समझानेवाले कोई महापुरुष नहीं मिलते, तबतक मनुष्यका इसमे प्रवेश पाना अत्यन्त ही कठिन है। अल्पज्ञ—साधारण ज्ञानवाले मनुष्य यदि इसे बतलाते हैं और उसके अनुसार यदि कोई विविध प्रकारसे इसके चिन्तनका अभ्यास करता है, तो उसका आत्मज्ञानरूपी फल नहीं होता। आत्मतत्त्व तनिक-सा भी समझमे नहीं आता। न यह ऐसा ही है कि दूसरेसे सुने बिना केवल अपने आप तर्क-वितर्कयुक्त विचार करनेसे समझमें आ जाय। सुनना आवश्यक है, पर सुनना उनसे है, जो इसे भलीभाँति जाननेवाले महापुरुष हों। तभी इस तर्कसे सर्वथा अतीत विषयमे जानकारी हो सकती है ॥ ८ ॥ नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९॥ प्रेष्ठ = हे प्रियतम !, याम् त्वम् आपः = जिसको तुमने पाया है, एषा मतिः = यह बुद्धि, तर्केण न आपनेया = तर्कसे नहीं मिल सकती ( यह तो ); अन्येन प्रोक्ता एव = दूसरेके द्वारा कही हुई ही, सुज्ञानाय = आत्मज्ञानमें निमित्त, [ भवति = होती है;] बत = सचमुच ही; (तुम) सत्यधृतिः = उत्तम धैर्यवाले; असि = हो, नचिकेतः = हे नचिकेता ! (हम चाहते हैं कि); = तुम्हारे-जैसे ही, प्रष्टा = पूछनेवाले; नः भूयात् = हमें मिला करें ॥ ९॥ व्याख्या-नचिकेताकी प्रशंसा करते हुए यमराज फिर कहते है कि हे प्रियतम ! तुम्हारी इस पवित्र मति—निर्मल निष्ठाको देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। ऐसी निष्ठा तर्कसे कभी नहीं मिल सकती। यह तो तभी उत्पन्न होती है, जब भगवत्कृपासे किसी महापुरुषका सङ्ग प्राप्त होता है और उनके द्वारा लगातार परमात्माके महत्त्वका विशद विवेचन सुननेका सौभाग्य मिलता है। ऐसी निष्ठा ही मनुष्यको आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करनेमें प्रवृत्त करती है। इतना प्रलोभन दिये जानेपर तुम अपनी निष्ठापर दृढ रहे—इससे यह सिद्ध है कि वस्तुतः तुम सच्ची धारणासे सम्पन्न हो। नचिकेता ! हमें तुम-जैसे ही पूछनेवाले जिज्ञासु मिला करें ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-अब यमराज अपने उदाहरणसे निष्काम भावकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं— जानाम्यहँ शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥१०॥ अहम् जानामि = मैं जानता हूँ कि; शेवधिः = कर्मफलरूप निधि; अनित्यम् इति = अनित्य है, हि अध्रुवैः = क्योंकि अनित्य (विनाशशील) वस्तुओंसे; तत् ध्रुवम् = वह नित्य पदार्थ (परमात्मा), न हि प्राप्यते = नहीं मिल सकता, ततः = इसलिये; मया = मेरे द्वारा (कर्तव्यबुद्धिसे), अनित्यैः द्रव्यैः = अनित्य पदार्थोंके द्वारा, नाचिकेतः = नाचिकेत नामक, अग्निः चितः = अग्निका चयन किया गया (अनित्य भोगोंकी प्राप्तिके लिये नहीं, अतः उस निष्काम भावकी अपूर्व शक्तिसे मै ), नित्यम् = नित्य वस्तु परमात्माको; प्राप्तवान् = प्राप्त हो गया, अस्मि = हूँ ॥ १० ॥ व्याख्या-नचिकेता ! मैं इस बातको भलीभाँति जानता हूँ कि कर्मोंके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके भोगसमूहकी जो निधि मिलती है, वह चाहे कितनी ही महान् क्यों न हो, एक दिन उसका विनाश निश्चित है, अतएव वह अनित्य है। और यह सिद्ध है कि अनित्य साधनोंसे नित्य पदार्थकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस रहस्यको जानकर ही मैने नाचिकेत अग्निके चयनादिरूपसे जो कुछ यज्ञादि कर्म अनित्य वस्तुओंके द्वारा किये, सब-के-सब कामना और आसक्तिसे रहित होकर केवल कर्तव्यबुद्धिसे किये। इस निष्काम भावकी ही यह महिमा है कि अनित्य पदार्थोंके द्वारा यजन करके भी मैंने नित्य सुखरूप परमात्माको प्राप्त कर लिया* ॥ १० ॥
  • कुछ आदरणीय महानुभावोंने इसका यह अर्थ किया है—

२०० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध—नचिकेतामें वह निष्कामभाव पूर्णरूपसे है, इसलिये यमराज उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं— कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम् । स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥ नचिकेतः=हे नचिकेता !, कामस्य आप्तिम्=जिसमें सब प्रकारके भोग मिल सकते हैं, जगतः प्रतिष्ठाम्=जो जगत्का आधार, क्रतोः अनन्त्यम्=यज्ञका चिरस्थायी फल, अभयस्य पारम्=निर्भयताकी अवधि और; स्तोममहत्= स्तुति करनेयोग्य एव महत्त्वपूर्ण है (तथा), उरुगायम्=वेदोंमें जिसके गुण नाना प्रकारसे गाये गये हैं, प्रतिष्ठाम्=(और ) जो दीर्घकालतककी स्थितिसे सम्पन्न है, ऐसे स्वर्गलोकको, दृष्ट्वा धृत्या=देखकर भी तुमने धैर्यपूर्वक; अत्यस्राक्षीः=उसका त्याग कर दिया, [ अतः=इसलिये मैं समझता हूँ कि ], धीरः (असि)=तुम बहुत ही बुद्धिमान् हो ॥ ११ ॥ व्याख्या—नचिकेता ! तुम सब प्रकारसे श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न और निष्काम हो । मैंने तुम्हारे सामने वरदानके रूपमें उस स्वर्गलोकको रक्खा, जो सब प्रकारके भोगोंसे परिपूर्ण, जगत्‌का आधारस्वरूप, यज्ञादि शुभकर्मोंका अन्तरहित फल, सब प्रकारके दुःख और भयसे रहित, स्तुति करनेयोग्य और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । वेदोंने भाँति भाँतिमें उसकी शोभाके गुणगान किये हैं और वह दीर्घकालतक स्थित रहनेवाला है, तुमने उसके महत्त्वको समझकर भी बड़े धैर्यके साथ उसका परित्याग कर दिया, तुम्हारा मन तनिक भी उसमें आसक्त नहीं हुआ, तुम अपने निश्चयपर दृढ और अटल रहे । यह साधारण बात नहीं है । इसलिये मैं यह मानता हूँ कि तुम बड़े ही बुद्धिमान्, अनासक्त और आत्मतत्त्वको जाननेके अधिकारी हो* ॥११॥ सम्बन्ध—इस प्रकार नचिकेताके निष्कामभावको देखकर यमराजने निश्चय कर लिया कि यह परमात्माके तत्त्वज्ञानका यथार्थ अधिकारी है, अत उसके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करनेके लिये यमराज अब दो मन्त्रोंमें परब्रह्म परमात्माकी महिमाका वर्णन करते हैं— तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥ गूढम्=जो योगमायाके पर्देमें छिपा हुआ, अनुप्रविष्टम्=सर्वव्यापी, गुहाहितम्=सबके हृदयरूप गुफामे स्थित (अतएव ), गह्वरेष्ठम्=संसाररूप गहन वनमें रहनेवाला, पुराणम्=सनातन है, ऐसे, तम् दुर्दर्शम् देवम्=उस कठिनतासे देखे जानेवाले परमात्मदेवको, धीरः=शुद्ध बुद्धियुक्त साधक, अध्यात्मयोगाधिगमेन=अध्यात्मयोगकी प्राप्तिके द्वारा; मत्वा=समझकर, हर्षशोकौ जहाति=हर्ष और शोकको त्याग देता है ॥ १२ ॥ व्याख्या—यह सम्पूर्ण जगत् एक अत्यन्त दुर्गम गहन वनके सदृश है, परंतु यह परब्रह्म परमेश्वरसे परिपूर्ण है । वह सर्वव्यापी इसमें सर्वत्र प्रविष्ट है ( गीता ९ । ४ )। वह सबके हृदयरूपी गुफामे स्थित है । ( गीता १३ । १८, १५ । १५; मैं जानता हूँ कि कर्मफलरूप निधि अनित्य है, क्योंकि अनित्य साधनोंसे परमात्मारूपी नित्य निधि नहीं मिल सकती । यह जानते हुए भी मैंने स्वर्गके साधनभूत नाचिकेत अग्निका अनित्य पदार्थोंके द्वारा चयन किया था, उसीसे मैंने अधिकारसम्पन्न होकर यह आपेक्षिक नित्य ( दूसरे पदोंकी अपेक्षा अधिक कालतक रहनेवाला तथा श्रेष्ठ ) यमराजका पद प्राप्त किया ।

  • १-इसका अर्थ एक आदरणीय महानुभाव इस प्रकार करते हैं— नचिकेता ! तुमने उस परमपदार्थ परमात्माके सम्मुख जगत्की चरम सीमाके भोग, प्रतिष्ठा, यज्ञका अनन्त फलरूप हिरण्यगर्भका पद, अभयकी मर्यादा (चिरकालस्थायी दीर्घजीवन ), स्तुत्य और महान् अणिमादि ऐश्वर्य, शुभफल और अत्युत्तम गति—इन सभीको हेय समझकर धैर्यके द्वारा त्याग दिया है । इसलिये तुम बड़े ही बुद्धिमान् हो । २-एक दूसरे महानुभावने इसका अर्थ यों किया है— जहाँ कामनाकी परिसमाप्ति हो जाती है, जो जगत्का आधार है, जहाँ ज्ञानकी अनन्तता है, जो अभयकी सीमा है, जो सबके द्वारा स्तुतिके योग्य है, जो सबसे महान् है, जिसकी सब स्तुति करते हैं और जो आप ही अपनी प्रतिष्ठा है, उस परमात्माको देखकर— उसको सामने रखकर बड़े धैर्यके साथ तुमने इस अनित्य निधिका त्याग कर दिया है, इसलिये तुम बड़े बुद्धिमान् हो ।
  • कठोपनिषद् * २०१ १८ । ६१) । इस प्रकार नित्य साथ रहनेपर भी लोग उसे सहजमें देख नहीं पाते; क्योंकि वह अपनी योगमायाके पर्देमें छिपा है (गीता ७ । २५), इसलिये अत्यन्त गुप्त है। उसके दर्शन बहुत ही दुर्लभ हैं। जो शुद्ध-बुद्धिसम्पन्न साधक अपने मन-बुद्धिको नित्य निरन्तर उसके चिन्तनमे संलग्न रखता है, वह उस सनातन देवको प्राप्त करके सदाके लिये हर्ष शोकसे रहित हो जाता है। उसके अन्त:करणमेसे हर्ष-शोकादिके विकार समूल नष्ट हो जाते हैं* ॥ १२ ॥ एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृद्ध्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥ मर्त्यः = मनुष्य (जब); एतत् = इस, धर्म्यम् = धर्ममय (उपदेश) को, श्रुत्वा = सुनकर; सम्परिगृह्य = भलीभाँति ग्रहण करके, प्रवृद्ध्य = (और) उसपर विवेकपूर्वक विचार करके; एतम् = इस; अणुम् = सूक्ष्म आत्मतत्त्वको; आप्य = जानकर अनुभव कर लेता है; (तब), सः = वह, मोदनीयम् = आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; लब्ध्वा = पाकर, मोदते हि = आनन्दमें ही मग्न हो जाता है; नचिकेतसम् = तुम नचिकेताके लिये; विवृतम् सद्म मन्ये = (मैं) परमधामका द्वार खुला हुआ मानता हूँ ॥ १३ ॥ व्याख्या—इस अध्यात्मविषयक धर्ममय उपदेशको पहले तो अनुभवी महापुरुषके द्वारा अतिशय श्रद्धापूर्वक सुनना चाहिये, सुनकर उसका मनन करना चाहिये। तदनन्तर एकान्तमे उसपर विचार करके बुद्धिमे उसको स्थिर करना चाहिये । इस प्रकार साधन करनेपर जब मनुष्यको आत्मस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् जब वह आत्माको तत्त्वसे समझ लेता है, तब आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। उस आनन्दके महान् समुद्रको पाकर वह उसमें निमग्न हो जाता है। हे नचिकेता ! तुम्हारे लिये उस परमधामका द्वार खुला हुआ है। तुमको वहाँ जानेसे कोई रोक नहीं सकता। तुम ब्रह्म- प्राप्तिके उत्तम अधिकारी हो, ऐसा मैं मानता हूँ ॥ १३ ॥ सम्बन्ध—यमराजके मुखसे परब्रह्म पुरुषोत्तमकी महिमा सुनकर और अपनेको उसका अधिकारी जानकर नचिकेताके मनमें परमात्मतत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी। साथ ही उसे यमराजके द्वारा अपनी प्रशंसा सुनकर साधु-सम्मत सङ्कोच भी हुआ। इसलिये उसने यमराजसे बीचमें ही पूछा— अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥ यत् तत् = जिस उस परमेश्वरको, धर्मात् अन्यत्र = धर्मसे अतीत; अधर्मात् अन्यत्र = अधर्मसे भी अतीत; च = तथा; अस्मात् कृताकृतात् = इस कार्य और कारणरूप सम्पूर्ण जगत्से भी; अन्यत्र च = भिन्न और; भूतात् भव्यात् = भूत, वर्तमान एव भविष्यत्—तीनों कालोंसे तथा इनसे सम्बन्धित पदाथसेि भी; अन्यत्र = पृथक्; पश्यसि = (आप) जानते हैं; तत् = उसे; वद = बतलाइये ॥ १४ ॥ व्याख्या—नचिकेता कहता है—भगवन् ! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो धर्म और अधर्मके सम्बन्धसे रहित, कार्य कारणरूप प्रकृतिसे पृथक् एव भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन सबसे भिन्न जिस परमात्मतत्त्वको आप जानते हैं, उसे मुझको बतलाइये† ॥ १४ ॥
  • १-कुछ आदरणीय महानुभावोंने इसका अर्थ यों किया है कि— 'उस दुर्दर्श, शब्दादि प्राकृत विषयविकाररूप विषानसे छिपे हुए, बुद्धिमें स्थित, अनेक अनर्थोंसे व्याप्त देहमें स्थित, चिरन्तन— पुरातन देवको जो अध्यात्मयोगकी प्राप्तिके द्वारा जान लेता है, वह धीर पुरुष हर्ष-शोकका परित्याग कर देता है। २-प्रात स्मरणीय भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने भी ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें इस प्रकरणको परमात्मविषयक माना है ('प्रकरणं चेदं परमात्मन '—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा०२, के १२ वें सूत्रका भाष्य ) । † भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने इस प्रकरणको भी अपने ब्रह्मसूत्रभाष्यमें परमेश्वरविषयक ही माना है ( 'पृष्टं चेह ब्रह्म'—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० ३ के २४ वें सूत्रका भाष्य ) । उ० अं० २६—२७—

२७२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध-नचिकेताके इस प्रकार पूछनेपर यमराज उस ब्रह्मतत्त्वके वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं- सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाꣳसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदꣳ सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ सर्वे वेदाः = सम्पूर्ण वेद; यत् पदम् = जिस परम पदको; आमनन्ति = बारंबार प्रतिपादन करते हैं; च = और सर्वाणि = सम्पूर्ण; तपांसि = तप; यत् = जिस पदका; वदन्ति = लक्ष्य कराते हैं अर्थात् वे जिसके साधन हैं; यत् इच्छन्तः = जिसको चाहनेवाले साधकगण; ब्रह्मचर्यम् = ब्रह्मचर्यका; चरन्ति = पालन करते हैं; तत् पदम् = वह पद; ते = तुम्हें; संग्रहेण = संक्षेपसे; ब्रवीमि = (मैं) बतलाता हूँ; (वह है) ओम् = ओम्; इति = ऐसा; एतत् = यह (एक अक्षर-) ॥ १५ ॥ व्याख्या-यमराज यहाँ परब्रह्म पुरुषोत्तमको परमप्राप्य बतलाकर, उसके वाचक ॐकारको प्रतीकरूपसे उसका स्वरूप बतलाते हैं। वे कहते हैं कि समस्त वेद नोंनों प्रकार और नाना छन्दोंसे जिसका प्रतिपादन करते हैं, सम्पूर्ण तप आदि साधनों- का जो एकमात्र परम और चरम लक्ष्य है तथा जिसको प्राप्त करनेकी इच्छासे साधक निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्यका अनुष्ठान किया करते हैं, उस पुरुषोत्तम भगवान्‌का परमतत्त्व मैं तुम्हें संक्षेपमें बतलाता हूँ। वह है 'ॐ' यह एक अक्षर ॥ १५ ॥ सम्बन्ध-नामरहित होनेपर भी परमात्मा अनेक नामोंसे पुकारे जाते हैं। उनके सब नामोंमेंसे 'ओम्' सर्वश्रेष्ठ माना गया है, अतः यहाँ नाम और नामीका अभेद मानकर 'प्रणव'को परब्रह्म पुरुषोत्तमके स्थानमें वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं- एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् । एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥ एतत् = यह; अक्षरम् एव हि ब्रह्म = अक्षर ही तो ब्रह्म है (और); एतत् = यह; अक्षरम् एव हि = अक्षर ही; परम् = परब्रह्म है; एतत् एव हि = इसी; अक्षरम् = अक्षरको; ज्ञात्वा = जानकर; यः = जो; यत् = जिसको; इच्छति = चाहता है; तस्य = उसको; तत् = वही (मिल जाता है) ॥ १६ ॥ व्याख्या-यह अविनाशी प्रणव्-ॐकार ही तो ब्रह्म (परमात्मा) का निर्विशेष स्वरूप है और यही स्वयं समग्र ब्रह्म परम पुरुष पुरुषोत्तम है,अर्थात् उस ब्रह्म और परब्रह्म दोनोंका ही नाम ॐकार है। अतः इस तत्त्वको समझकर साधक इसके द्वारा दोनोंमेंसे किसी भी अभीष्ट रूपको प्राप्त कर सकता है * ॥ १६ ॥ एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥ एतत् = यही; श्रेष्ठम् = अत्युत्तम; आलम्बनम् = आलम्बन है; एतत् = यही (सबका); परम् आलम्बनम् = अन्तिम आश्रय है; एतत् = इस; आलम्बनम् = आलम्बनको; ज्ञात्वा = भलीभाँति जानकर; ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोकमें; महीयते = (साधक) महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥ व्याख्या-यह ॐकार ही परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये सब प्रकारके आलम्बनोंमेंसे सबसे श्रेष्ठ आलम्बन है और यहीं चरम आलम्बन है। इससे परे और कोई आलम्बन नहीं है अर्थात् परमात्माके श्रेष्ठ नामकी शरण हो जाना ही उनकी प्राप्तिका सर्वोत्तम एव अमोघ साधन है। इस रहस्यको समझकर जो साधक श्रद्धा और प्रेमपूर्वक इसपर निर्भर करता है, वह निस्सन्देह परमात्माकी प्राप्तिका परम गौरव लाभ करता है ॥ १७ ॥

  • इस मन्त्रका यह अर्थ भी किया गया है-- यह अक्षर ही अपर ब्रह्म है और यह अक्षर ही परब्रह्म है। यह दोनोंका ही प्रतीक है। इसीको उपास्य ब्रह्म जानकर जो पर अथवा-'अपर' जिस ब्रह्मकी इच्छा करता है वह उसीको प्राप्त हो जाता है। यदि उसका उपास्य परब्रह्म (निर्विशेष आत्मा) हो तो वह केवल जाना जा सकता है और यदि अपरब्रह्म (सविशेष सगुण) हो तो प्राप्त किया जा सकता है।
  • कठोपनिषद् * ९०३ सम्बन्ध—इस प्रकार ॐकारको ब्रह्म और परब्रह्म इन दोनोंका प्रतीक बताकर अब नचिकेताके प्रश्नानुसार यमराज पहले आत्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं— न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥ विपश्चित्=नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा, न जायते=न तो जन्मता है, वा न म्रियते=और न मरता ही है, अयम् न=यह न तो स्वय, कुतश्चित्=किसीसे हुआ है, [ न=न (इससे),] कश्चित्=कोई भी, बभूव=हुआ है अर्थात् यह न तो किसीका कार्य है और न कारण ही है, अयम्=यह, अजः=अजन्मा, नित्यः=नित्य, शाश्वतः=सदा एकरस रहनेवाला (और), पुराणः=पुरातन है अर्थात् क्षय और वृद्धिसे रहित है, शरीरे हन्यमाने=शरीरके नाश किये जानेपर भी (इसका); न हन्यते=नाश नहीं किया जा सकता* ॥ १८ ॥ हन्ता चेन्मन्यते हन्तुग् हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायग् हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ चेत्=यदि कोई, हन्ता=मारनेवाला व्यक्ति, हन्तुम्=अपनेको मारनेमें समर्थ, मन्यते=मानता है (और), चेत्=यदि, हतः=(कोई) मारा जानेवाला व्यक्ति, हतम्=अपनेको मारा गया, मन्यते=समझता है (तो), तौ उभौ=वे दोनों ही; न विजानीतः=(आत्मस्वरूपको) नहीं जानते (क्योंकि), अयम्=यह आत्मा, न हन्ति=न तो (किसीको) मारता है (और), न हन्यते=न मारा (ही) जाता है† ॥ १९ ॥ व्याख्या—यमराज यहाँ आत्माके शुद्ध स्वरूपका और उसकी नित्यताका निरूपण करते हैं, क्योंकि जबतक साधक को अपनी नित्यता और निर्विकारताका अनुभव नहीं हो जाता एव वह जबतक अपनेको शरीर आदि अनित्य वस्तुओंसे भिन्न नहीं समझ लेता, तबतक इन अनित्य पदार्थोंसे उसका वैराग्य होकर उसके अन्तःकरणमे नित्य तत्त्वकी अभिलाषा उत्पन्न नहीं होती । उसको यह दृढ अनुभूति होनी चाहिये कि जीवात्मा नित्य चेतन ज्ञानस्वरूप है, अनित्य, विनाशी, जड शरीर और भोगोंसे वास्तवमें इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह अनादि और अनन्त है, न तो इसका कोई कारण है और न कार्य ही; अतः यह जन्म-मरणसे सर्वथा रहित, सदा एकरस, सर्वथा निर्विकार है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता। जो लोग इसको मारनेवाला या मरनेवाला मानते है, वे वस्तुतः आत्मस्वरूपको जानते ही नहीं, वे सर्वथा भ्रान्त हैं। उनकी बातोंपर ध्यान नहीं देना चाहिये । वस्तुतः आत्मा न तो किसीको मारता है और न इसे कोई मार ही सकता है। साधकको शरीर और भोगोंकी अनित्यता और अपने आत्माकी नित्यतापर विचार करके, इन अनित्य भोगोंके सुखकी आशाका त्याग करके सदा अपने साथ रहनेवाले नित्य सुखस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका अभिलाषी बनना चाहिये ॥ १८-१९ ॥
  • गीतामें इस मन्त्रके भावको इस प्रकार समझाया गया है— न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ (२।२०) ‘यह आत्मा किसी भी कालमें न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है। क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता ।’ † गीतामें इस मन्त्रके भावको और भी स्पष्टरूपसे व्यक्त किया गया है— य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ (२।१९) ‘जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मारा गया मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते, क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको मारता है, न किसीके द्वारा मारा जाता है ।’

२०४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध—इस प्रकार आत्मतत्त्वके वर्णनद्वारा नचिकेताके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके यमराज अब परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं— अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥ अस्य=इस, जन्तोः=जीवात्माके, गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें, निहितः=रहनेवाला, आत्मा=परमात्मा, अणोः अणीयान्=सूक्ष्मसे अति सूक्ष्म (और), महतः महीयान्=महान्‌से भी महान्‌ है; आत्मनः तम् महिमानम्=परमात्माकी उस महिमाको, अक्रतुः=कामनारहित (और), वीतशोकः=चिन्तारहित कोई विरला साधक, धातुप्रसादात्=सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वरकी कृपासे ही, पश्यति=देख पाता है ॥ २० ॥ व्याख्या—इससे पहले जीवात्माके शुद्ध स्वरूपका वर्णन किया गया है, उसीको इस मन्त्रमें 'जन्तु' नाम देकर उसकी बद्धावस्था व्यक्त की गयी है । भाव यह कि यद्यपि परब्रह्म पुरुषोत्तम उस जीवात्माके अत्यन्त समीप—जहाँ यह स्वयं रहता है, वहीं हृदयमे छिपे हुए हैं, तो भी यह उनकी ओर नहीं देखता । मोहवश भोगोंमे भूला रहता है । इसी कारण यह 'जन्तु' है—मनुष्य-शरीर पाकर भी कीट-पतङ्ग आदि तुच्छ प्राणियोंकी भाँति अपना दुर्लभ जीवन व्यर्थ नष्ट कर रहा है । जो साधक पूर्वोक्त विवेचनके अनुसार अपने-आपको नित्य चेतनस्वरूप समझकर सब प्रकारके भोगोंकी कामनासे रहित और शोकरहित हो जाता है, वह परमात्माकी कृपासे यह अनुभव करता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम अणुसे भी अणु और महान्- से भी महान्—सर्वव्यापी हैं और इस प्रकार उनकी महिमाको समझकर उनका साक्षात्कार कर लेता है । ( यहाँ 'धातु- प्रसादान्'का अर्थ 'परमेश्वरकी कृपा' किया गया है । 'धातु' शब्दका अर्थ सर्वधारक परमात्मा माना गया है। विष्णुसहस्र- नाममें भी 'अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तम '- 'धातु' को भगवान्‌का एक नाम माना गया है* ॥ २० ॥ आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥ आसीनः=(वह परमेश्वर) बैठा हुआ ही, दूरम् व्रजति=दूर पहुँच जाता है, शयानः=सोता हुआ (भी), सर्वतः=सब ओर, याति=चलता रहता है, तम् मदामदम् देवम्=उस ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त न होनेवाले देवको; मदन्यः कः=मुझसे भिन्न दूसरा कौन; ज्ञातुम्=जाननेमें, अर्हति=समर्थ है ॥ २१ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमात्मा अचिन्त्यशक्ति हैं और विरुद्धधर्माश्रय हैं । एक ही समयमे उनमें विरुद्ध धर्मोंकी लीला होती है । इसीसे वे एक ही साथ सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और महान्-से-महान् बताये गये हैं । यहाँ यह कहते हैं कि वे परमेश्वर अपने नित्य परमधाममें विराजमान रहते हुए ही भक्ताधीनतावश उनकी पुकार सुनते ही दूर-से-दूर चले जाते हैं । परम धाममें निवास करनेवाले पार्षद भक्तोंकी दृष्टिमें वहाँ शयन करते हुए ही वे सब ओर चलते रहते हैं । अथवा वे परमात्मा सदा-सर्वदा सर्वत्र स्थित हैं । उनकी सर्वव्यापकता ऐसी है कि बैठे भी वही हैं, दूर देशमें चलते भी वही हैं, सोते भी वही हैं और सब ओर जाते-आते भी वही हैं । वे सर्वत्र सब रूपोंमें नित्य अपनी महिमामें स्थित हैं । इस प्रकार अलौकिक परमैश्वर्य- स्वरूप होनेपर भी उन्हें अपने ऐश्वर्यका तनिक भी अभिमान नहीं है । उन परमदेवको जाननेका अधिकारी उनका कृपापात्र मेरे (आत्मतत्त्वज्ञ यमराजके सदृश अधिकारियोंके) सिवा दूसरा कौन हो सकता है ?† ॥ २१ ॥

  • एक आदरणीय महानुभावने इसका निम्नलिखित अर्थ करते हुए 'धातुप्रसादात्'का अर्थ 'इन्द्रियोंको निर्मलता' माना है— ' यह आत्मा ही सूक्ष्म-से-सूक्ष्मतर और महान्-से-महान् है, क्योंकि नाम रूपवाली सभी वस्तुएँ इसकी उपाधि हैं। बाह्य विषयोंसे उपरत दृष्टिवाला निष्काम साधक अपनी इन्द्रियों—जो शरीरको धारण करनेके कारण 'धातु' कहलाती हैं—के प्रसाद— निर्मलतासे उस आत्माकी कर्मनिमित्तक वृद्धि और क्षयमे रहित महिमाको देखता है, अर्थात् इस बातको साक्षात् जानता है कि यह मैं हूँ, तदनन्तर वह शोकरहित हो जाता है। † कुछ आदरणीय महानुभावोंने ऐसा अर्थ किया है— वह अचल होकर भी दूर चला जाता है तथा शयन करता हुआ भी सब ओर पहुँचता है, इस प्रकार वह आत्मा समग्र और
  • कठोपनिषद् * २०५ सम्बन्ध—अब इस प्रकार उन परमेश्वरकी महिमाको समझनेवाले पुरुषकी पहचान बताते हैं— अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥ अनवस्थेषु=(जो) स्थिर न रहनेवाले (विनाशशील), शरीरेषु=शरीरोंमें, अशरीरम्=शरीररहित (एव); अव- स्थितम्=अविचलभावसे स्थित है, महान्तम्=(उस) महान्, विभुम्=सर्वव्यापी, आत्मानम्=परमात्माको, मत्वा=जानकर; धीरः=बुद्धिमान् महापुरुष, न शोचति=(कभी किसी भी कारणसे) शोक नहीं करता ॥ २२ ॥ व्याख्या—प्राणियोंके शरीर अनित्य और विनाशशील हैं, इनमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। इन सबमें सम- भावसे स्थित परब्रह्म पुरुषोत्तम इन शरीरोंसे सर्वथा रहित, अशरीरी हैं। इसी कारण वे नित्य और अचल हैं। प्राकृत देश-काल-गुणादिसे अपरिच्छिन्न उन महान्, सर्वव्यापी, सबके आत्मरूप परमेश्वरको जान लेनेके बाद वह ज्ञानी महापुरुष कभी किसी भी कारणसे किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता। यही उसकी पहचान है* ॥ २२ ॥ सम्बन्ध—अब यह बतलाते हैं कि वे परमात्मा अपने पुरुषार्थसे नहीं मिलते, वर उसीको मिलते हैं, जिसको वे स्वीकार कर लेते हैं— नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ २३ ॥ अयम्=यह; आत्मा न=परब्रह्म परमात्मा न तो, प्रवचनेन=प्रवचनसे, न मेधया=न बुद्धिसे (और), न बहुना श्रुतेन=न बहुत सुननेसे ही, लभ्यः=प्राप्त हो सकता है, यम्=जिसको, एषः=यह, वृणुते=स्वीकार कर लेता है, तेन एव लभ्यः=उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि), एषः आत्मा=यह परमात्मा, तस्य=उसके लिये, स्वाम् तनूम्=अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते=प्रकट कर देता है ॥ २३ ॥ व्याख्या—जिन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन मैं कर रहा हूँ, वे न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्म-तत्त्वका नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं, न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं, जो बुद्धि- के अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं, और न उनको ही मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनतेरहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है, जो उनके बिना रह नहीं सकता। परंतु जो अपनी बुद्धि या साधनपर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमाया- का परदा हटाकर उसके सामने अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूपमें प्रकट हो जाते हैं† ॥ २३ ॥ सम्बन्ध—अब यह बतलाते हैं कि परमात्मा किसको प्राप्त नहीं होते— नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ अमद—हर्षसहित और हर्षरहित—इस प्रकार विरुद्ध धर्मवाला है। उस मदयुक्त और मदरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है ?
  • इस मन्त्रका यह अर्थ भी माना गया है— आत्मा अपने स्वरूपसे आकाशके समान है, अतः देव, पितृ और मनुष्यादि शरीरोंमें शरीररहित है, अवस्थितिरहित—अनित्योंमें अवस्थित नित्य अविकारी है, उस महान् और सर्वव्यापक आत्माको 'यही मैं हूँ' ऐसा जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता। † इस मन्त्रका यह अर्थ भी माना गया है— यह आत्मा वेदोंके प्रवचनसे विदित होने योग्य नहीं है, न मेधा—ग्रन्थ-धारणकी शक्तिसे ही, और न केवल बहुत श्रवण करनेसे

२०६ * महान्तं विभुमात्मानं मंत्व धीरो न शोचति * प्रज्ञानेन=सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा, अपि=भी, एनम्=इस परमात्माको, न दुश्चरितात् अविरतः आप्नुयात्=न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे आचरणोंसे निवृत्त नहीं हुआ है; न अशान्तः=न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है; न असमाहितः=न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, वा=और; न अशान्तमानसः (आप्नुयात् )=न वही प्राप्त करता है, जिसका मन चञ्चल है ॥ २४ ॥ व्याख्या - जो मनुष्य बुरे आचरणोंसे घृणा करके उनका त्याग नहीं कर देता, जिसका मन परमात्माको छोड़कर दिन-रात सांसारिक भोगोंमे भटकता रहता है, परमात्मापर विश्वास न होनेके कारण जो सदा अशान्त रहता है, जिसका मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ वशमें की हुई नहीं हैं, ऐसा मनुष्य सूक्ष्म बुद्धिद्वारा आत्मविचार करते रहनेपर भी परमात्माको नहीं पा सकता। क्योंकि वह परमात्माकी असीम कृपाका आदर नहीं करता, उसकी अवहेलना करता रहता है, अतः वह उनकी कृपाका अधिकारी नहीं होता ॥ २४ ॥ सम्बन्ध - उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्वको सुनकर और बुद्धिद्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्या नहीं जान सकता ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५॥ यस्य=(संहारकालमे) जिस परमेश्वरके, ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे=ब्राह्मण और क्षत्रिय-ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण प्राणि- मात्र, ओदनः भोजन, भवतः=बन जाते हैं (तथा), मृत्युः यस्य=सबका संहार करनेवाली मृत्यु (भी) जिसका, उप- सेचनम्=उपसेचन (भोज्य वस्तुके साथ लगाकर खानेका व्यञ्जन, तरकारी आदि), [ भवति =बन जाती है, ] सः यत्र=वह परमेश्वर जहाँ (और), इत्था=जैसा है, यह ठीक ठीक, कः वेद=कौन जानता है ॥ २५ ॥ व्याख्या - मनुष्य-शरीरमे भी धर्मशील ब्राह्मण और धर्मरक्षक क्षत्रियका शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये अधिक उत्तम माना गया है, किंतु वे भी उन कालस्वरूप परमेश्वरके भोजन बन जाते हैं, फिर अन्य साधारण मनुष्य शरीरोंकी तो बात ही क्या है। जो सबको मारनेवाले मृत्युदेव है, वे भी उन परमेश्वरके उपसेचन अर्थात् भोजनके साथ लगाकर खाये जानेवाले व्यञ्जन—चटनी-तरकारी आदिकी भाँति हैं। ऐसे ब्राह्मण-क्षत्रियादि समस्त प्राणियोंके और स्वयं मृत्युके संहारक अथवा आश्रयदाता परमेश्वरको भला, कोई भी मनुष्य इन अनित्य मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अन्य ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति कैसे जान सकता है। किसकी सामर्थ्य है, जो सबके जाननेवालेको जान ले। अतः (पूर्वोक्त २३ वें मन्त्रके अनुसार ) जिसको परमात्मा अपनी कृपाका पात्र बनाकर अपना तत्त्व समझाना चाहते हैं, वही उनको जान सकता है। अपनी शक्तिसे उन्हें कोई भी यथार्थ रूपमे नहीं जान सकता, क्योंकि वे लौकिक ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति बुद्धिके द्वारा जाननेमे आनेवाले नहीं हैं ॥ २५ ॥ ॥ द्वितीय वल्ली समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय वल्ली सम्बन्ध-द्वितीय वल्लीमें जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया और उनको जानकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेनेका फल भी बतलाया गया। संक्षेपमें यह बात भी कही गयी कि जिसको वे परमात्मा स्वीकार करते हैं, वही उन्हें जान सकता है, परंतु परमात्माको प्राप्त करनेके साधनोंका वहाँ स्पष्टरूपसे वर्णन नहीं हुआ, अत साधनोंका वर्णन करनेके लिये तृतीय वल्ली- का आरम्भ करते हुए यमराज पहले मन्त्रमें जीवात्मा और परमात्माका नित्य सम्बन्ध और निवास-स्थान बतलाते हैं- ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥ ही जाना जा सकता है । साधक जिस आत्माका वरण करता है, उस वरण करनेवाले आत्माके द्वारा यह आत्मा स्वय ही प्राप्त किया जाता है । उस आत्माभावीके प्रति वह आत्मा अपने पारमार्थिक स्वरूपको यथार्थ रूपमें प्रकट कर देता है ।

  • कठोपनिषद् * २०७ सुकृतस्य लोके=शुभ कर्मोंके फलरूप मनुष्य-शरीरमें, परमे परार्धे=परब्रह्मके उत्तम निवास-स्थान (हृदय- आकाश) में, गुहाम् प्रविष्टौ=बुद्धिरूप गुफामें छिपे हुए, ऋतम् पिबन्तौ=सत्यका पान करनेवाले (दो हैं), छायातपौ= (वे) छाया और आतपकी भाँति परस्पर भिन्न हैं, (यह बात) ब्रह्मविदः=ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष, वदन्ति=कहते हैं, च ये=तथा जो, त्रिणाचिकेताः=तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन कर लेनेवाले (और), पञ्चाग्नयः=पञ्चाग्निसम्पन्न गृहस्थ हैं, [ ते वदन्ति=वे भी यही बात कहते हैं ] ॥ १ ॥ व्याख्या-यमराजने यहाँ जीवात्मा और परमात्माके नित्य सम्बन्धका परिचय देते हुए कहा कि ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महानुभाव तथा यज्ञादि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले आस्तिक सज्जन—सभी एक स्वरसे यही कहते हैं कि यह मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ है। पूर्वजन्मार्जित अनेकों पुण्यकर्मोंको निमित्त बनाकर परम कृपालु परमात्मा कृपापरवश हो जीवको उसके कल्याण-सम्पादनके लिये यह श्रेष्ठ शरीर प्रदान करते हैं और फिर उस जीवात्माके साथ ही स्वयं भी उसीके हृदयके अन्तस्तलमें—परब्रह्मके निवासस्वरूप श्रेष्ठ स्थानमें अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हो रहते हैं। इतना ही नहीं, वे दोनों साथ-ही-साथ वहाँ सत्यका पान करते हैं—शुभ कर्मोंके अवश्यम्भावी सत्फलका भोग करते हैं (गीता ५-२९)। अवश्य ही दोनोंके भोगमें बड़ा अन्तर है। परमात्मा असङ्ग और अभोक्ता हैं, उनका प्रत्येक प्राणीके हृदयमें निवास करके उसके शुभकर्मोंके फलका उपभोग करना उनकी वैसी ही लीला है, जैसी अजन्मा होकर जन्म ग्रहण करना। इसलिये यह कहा जाता है कि वे भोगते हुए भी वस्तुतः नहीं भोगते । अथवा यह भी कहा जा सकता है कि परमात्मा सत्यको पिलाते हैं—शुभ कर्मका फल भुगताते हैं, और जीवात्मा पीता है—फल भोगता है। परंतु जीवात्मा फलभोगके समय असङ्ग नहीं रहता। वह अभिमानवश उसमें सुखका उपभोग करता है। इस प्रकार साथ रहनेपर भी जीवात्मा और परमात्मा दोनों छाया और धूपकी भाँति परस्पर भिन्न हैं। जीवात्मा छायाकी भाँति अल्पप्रकाश—अल्पज्ञ है, और परमात्मा धूपकी भाँति पूर्णप्रकाश—सर्वज्ञ । परंतु जीवात्मामें जो कुछ अल्पज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है, जैसे छायामें अल्पप्रकाश पूर्णप्रकाशरूप धूपका ही होता है।* इस रहस्यको समझकर मनुष्यको अपनेमें किसी प्रकारकी भी शक्ति-सामर्थ्यका अभिमान नहीं करना चाहिये और अन्तर्यामीरूपसे सदा-सर्वदा अपने हृदयमें रहनेवाले परम आत्मीय परम कृपालु परमात्माका नित्य निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिये ॥ १ ॥ सम्बन्ध—परमात्माको जानने और प्राप्त करनेका जो सर्वोत्तम साधन 'उन्हें जानने और पानेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये उन्हींसे प्रार्थना करना है' इस बातको यमराज स्वयं प्रार्थना करते हुए बतलाते हैं— यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतँ शकेमहि ॥ २ ॥ ईजानानाम्=यज्ञ करनेवालोंके लिये, यः सेतुः=जो दुःख-समुद्रसे पार पहुँचा देने योग्य सेतु है, (तम्) नाचिकेतम्= उस नाचिकेत अग्निको (और), पारम् तितीर्षताम्=संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये, यत् अभयम्=जो भयरहित पद है, (तत्) अक्षरम्=उस अविनाशी, परम् ब्रह्म=परब्रह्म पुरुषोत्तमको, शकेमहि=जानने और प्राप्त करनेमें भी हम समर्थ हों ॥ २ ॥ व्याख्या—यमराज कहते हैं कि हे परमात्मन् ! आप हमें वह सामर्थ्य दीजिये, जिससे हम निष्कामभावसे यज्ञादि शुभ कर्म करनेकी विधिको भलीभाँति जान सकें और आपके आज्ञापालनार्थ उनका अनुष्ठान करके आपकी प्रसन्नता प्राप्त कर सकें। तथा जो संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावाले विरक्त पुरुषोंके लिये निर्भयपद है, उस परम अविनाशी आप परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्‌को भी जानने और प्राप्त करनेके योग्य बन जायँ । इस मन्त्रमें यमराजने परमात्मामें उन्हें जाननेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये प्रार्थना करके यह भाव दिखलाया है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानने और प्राप्त करनेका सबसे उत्तम और सरल साधन उनसे प्रार्थना करना ही है ॥ २ ॥
  • इस मन्त्रमें 'जीवात्मा' और 'परमात्मा' को ही गुहामें प्रविष्ट बतलाया गया है, 'बुद्धि' और 'जीव'को नहीं । 'गुहांहितौ तु' ० ० परमात्मन एव दृश्यते' (वेद्रिये--ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पाद २ सू० ११ का शाङ्करभाष्य)।

२०८ * विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध—अब उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके परमधाममें किन साधनोंसे सम्पन्न मनुष्य पहुँच सकता है, यह बात रथ और रथी- के रूपककी कल्पना करके समझायी जाती है— आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥ आत्मानम्=( हे नचिकेता ! तुम ) जीवात्माको तो; रथिनम्=रथका स्वामी ( उसमें बैठकर चलनेवाला ); विद्धि=समझो, तु=और, शरीरम् एव=शरीरको ही, रथम्=रथ ( समझो ), तु बुद्धिम्=तथा बुद्धिको, सारथिम्=सारथि ( रथको चलानेवाला ), विद्धि=समझो, च मनः एव=और मनको ही, प्रग्रहम्=लगाम ( समझो ) ॥ ३ ॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥ मनीषिणः=ज्ञानीजन ( इस रूपकमें ); इन्द्रियाणि=इन्द्रियोंको; हयान्=घोड़े; आहुः=बतलाते हैं ( और ); विषयान्=विषयोंको; तेषु गोचरान्=उन घोड़ोंके विचरनेका मार्ग ( बतलाते हैं ), आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्=( तथा ) शरीर, इन्द्रिय और मन—इन सबके साथ रहनेवाला जीवात्मा ही, भोक्ता=भोक्ता है; इति आहुः=यों कहते हैं ॥ ४ ॥ व्याख्या—जीवात्मा परमात्मासे बिछुड़ा हुआ है अनन्त कालसे, यह अनवरत संसाररूपी वीहड़ वनमें इधर-उधर सुखकी खोजमें भटक रहा है। सुख समझकर जहाँ भी जाता है, वहीं धोखा खाता है। सर्वथा साधनहीन और दयनीय है। जबतक वह परम सुखरूप परमात्माके समीप नहीं पहुँच जाता, तबतक उसे सुख शान्ति कभी नहीं मिल सकती । उसकी इस दयनीय दशाको देखकर दयामय परमात्माने उसे मानव-शरीररूपी सुन्दर सर्वसाधनसम्पन्न रथ दिया। इन्द्रियरूप बलवान् घोड़े दिये। उनके मनरूपी लगाम लगाकर उसे बुद्धिरूपी सारथिके हाथोंमें सौंप दिया और जीवात्माको उस रथमे बैठाकर—उसका स्वामी बनाकर यह बतला दिया कि वह निरन्तर बुद्धिको प्रेरणा करता रहे और परमात्माकी ओर ले जानेवाले भगवान्‌के नाम, रूप, लीला, धाम आदिके श्रवण, कीर्तन, मननादि विषयरूप प्रशस्त और सहज मार्गपर चलकर शीघ्र परमात्माके धाममे पहुँच जाय । जीवात्मा यदि ऐसा करता तो वह शीघ्र ही परमात्मातक पहुँच जाता, परन्तु वह अपने परमानन्दमय भगवत्प्राप्तिरूप इस महान् लक्ष्यको मोहवश भूल गया। उसने बुद्धिको प्रेरणा देना बंद कर दिया, जिससे बुद्धिरूपी सारथि असावधान हो गया, उसने मनरूपी लगामको इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़ोंकी इच्छापर छोड़ दिया। परिणाम यह हुआ कि जीवात्मा विषयप्रवण इन्द्रियोंके अधीन होकर सतत संसारचक्रमें डालनेवाले लौकिक शब्द स्पर्शादि विषयोंमें भटकने लगा। अर्थात् वह जिन शरीर, इन्द्रिय, मनके सहयोगसे भगवान्‌को प्राप्त करता, उन्हींके साथ युक्त होकर वह विषय विषके उपभोगमे लग गया ॥ ३-४ ॥ सम्बन्ध—परमात्माकी ओर न जाकर उसकी इन्द्रियाँ लौकिक विषयोंमें क्यों लग गयीं, इसका कारण बतलाते हैं— यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥ यः सदा=जो सदा, अविज्ञानवान् तु=विवेकहीन बुद्धिवाला ( और ), अयुक्तेन=अवशीभूत ( चञ्चल ), मनसा= मनसे ( युक्त ), भवति=रहता है, तस्य=उसकी, इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ, सारथेः=असावधान सारथिके, दुष्टाश्वाः इव= दुष्ट घोड़ोंकी भाँति, अवश्यानि=वशमें न रहनेवाली, [ भवन्ति=हो जाती हैं ] ॥ ५ ॥ व्याख्या—रथको घोड़े ही चलाते हैं, परन्तु उन घोड़ोंको चाहे जिस ओर, चाहे जिस मार्गपर ले जाना—लगाम हाथमें थामे हुए बुद्धिमान् सारथिका काम है। इन्द्रियरूपी बलवान् और दुर्धर्ष घोड़े स्वाभाविक ही आपात रमणीय विषयोंसे भरे संसाररूप हरी-हरी घासके जगलकी ओर मनमाना दौड़ना चाहते हैं, परन्तु यदि बुद्धिरूप सारथि मनरूपी लगामको जोरसे

ॐ कठोपनिषद् ॐ २०९ खींचकर उन्हें अपने वशमें कर लेता है तो फिर घोड़े मनरूपी लगामके सहारे बिना चाहे जिस ओर नहीं जा सकते। यह सभी जानते हैं कि इन्द्रियाँ विषयोंका ग्रहण तभी कर सकती हैं, जब मन उनके साथ होता है। घोड़े उसी ओर दौड़ते हैं, जिस ओर लगामका सहारा होता है; पर इस लगामको ठीक रखना सारथिकी बलबुद्धिपर निर्भर करता है। यदि बुद्धिरूपी सारथि विवेकयुक्त, स्वामीका आज्ञाकारी, लक्ष्यपर सदा स्थिर, बलवान्, मार्गके ज्ञानसे सम्पन्न और इन्द्रियरूपी घोड़ोंको चलानेमें दक्ष नहीं होता तो इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़े उसके वशमें न रहकर लगामके सहारे सारे रथको ही अपने वशमें कर लेते हैं और फलस्वरूप रथी और सारथिसमेत उस रथको लिये हुए गहरे गड्ढेमें गिर पड़ते हैं। बुद्धिके नियन्त्रणसे रहित इन्द्रियाँ उत्तरोत्तर उच्छृङ्खल ही होती चली जाती हैं ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-अब स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धिको विवेकशील बनानेसे होनेवाला लाभ बतलाते हैं--- यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥ तु यः सदा=परन्तु जो सदा; विज्ञानवान्=विवेकयुक्त बुद्धिवाला (और); युक्तेन=वशमें किये हुए; मनसा=मनसे सम्पन्न; भवति=रहता है; तस्य=उसकी; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; सारथेः=सावधान सारथिके; सदश्वाः इव=अच्छे घोड़ोंकी भाँति; वश्यानि=वशमें; [ भवन्ति=रहती हैं ] ॥ ६ ॥ व्याख्या-जो जीवात्मा अपनी बुद्धिको विवेकसम्पन्न बना लेता है—जिसकी बुद्धि अपने लक्ष्यकी ओर ध्यान रखती हुई नित्य निरन्तर निपुणताके साथ इन्द्रियोंको सन्मार्गपर चलानेके लिये मनको बाध्य किये रखती है, उसका मन भी लक्ष्यकी ओर लगा रहता है एवं उसकी इन्द्रियाँ निश्चयात्मिका बुद्धिके अधीन रहकर भगवत्सम्बन्धी पवित्र विषयोंके सेवनमें उसी प्रकार संलग्न रहती हैं, जैसे श्रेष्ठ अश्व सावधान सारथिके अधीन रहकर उसके निर्दिष्ट मार्गपर चलते हैं ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-पाँचवें मन्त्रके अनुसार जिसके बुद्धि और मन आदि विवेक और संयमसे हीन होते हैं, उसकी क्या गति होती है— इसे बतलाते हैं-- यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः । न स तत्पदमाप्नोति सँसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ यः तु सदा=जो कोई सदा; अविज्ञानवान्=विवेकहीन बुद्धिवाला; अमनस्कः=असंयतचित्त और; अशुचिः= अपवित्र; भवति=रहता है; सः तत्पदम्=वह उस परमपदको; न आप्नोति=नहीं पा सकता; च=अपितु; संसारम् अधिगच्छति=बार-बार जन्म मृत्युरूप संसार-चक्रमें ही भटकता रहता है ॥ ७ ॥ व्याख्या-जिसकी बुद्धि सदा ही विवेक—कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे रहित और मनको वशमें रखनेम असमर्थ रहती है, जिसका मन निग्रहरहित—असंयत और जिसका विचार दूषित रहता है और जिसकी इन्द्रियाँ निरन्तर दुराचारमें प्रवृत्त रहती हैं, ऐसे बुद्धिशक्तिम रहित मन इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले मनुष्यका जीवन कभी पवित्र नहीं रह पाता और इसलिये वह मानव शरीरसे प्राप्त होनेयोग्य परमपदको नहीं पा सकता, वर अपने दुष्कर्मोंके परिणामस्वरूप अनवरत इस संसार चक्रमें ही भटकता रहता है—शूकर-कुकुरादि विभिन्न योनियोंमें जन्मता एवं मरता रहता है ॥ ७ ॥ यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः । स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते ॥ ८ ॥ तु यः सदा=परन्तु जो सदा; विज्ञानवान्=विवेकशील बुद्धिसे युक्त; समनस्कः=संयतचित्त (और); शुचिः=पवित्र; भवति=रहता है; सः तु=वह तो; तत्पदम्=उस परमपदको; आप्नोति=प्राप्त हो जाता है; यस्मात् भूयः=जहाँसे (लौटकर) पुनः; न जायते=जन्म नहीं लेता ॥ ८ ॥ व्याख्या-इसके विपरीत जो छठे मन्त्रके अनुसार स्वयं सावधान होकर अपनी बुद्धिको निरन्तर विवेकशील बनाये

२१० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * रखता है और उनके द्वारा मनको रोककर इन्द्रियोंके द्वारा भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार पवित्र कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करता है तथा भगवान्‌को अर्पण किये हुए भोगोंका राग द्वेषसे रहित हो निष्काम भावमे शरीरनिर्वाहके लिये उपभोग करता रहता है, वह परमेश्वरके उस परमधामको प्राप्त कर लेता है, जहाँसे फिर लौटना नहीं होता ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—आठवें मन्त्रम कही हुई बातको फिरसे स्पष्ट करते हुए रूपक रूपकका उपसहार करते हैं— विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९॥ यः नरः =जो (कोई) मनुष्य, विज्ञानसारथिः तु=विवेकशील बुद्धिरूप सारथिने सम्पन्न (और) मनःप्रग्रहवान्= मनरूप लगामको वशमे रखनेवाला है, सः = वह, अध्वनः = संसार-मार्गके, पारम् = पार पहुँचकर, विष्णो = सर्वव्यापक पुरुषोत्तम भगवान्‌के, तत् परमम् पदम् = उस सुप्रसिद्ध परमपदको, आप्नोति= प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥ व्याख्या—तृतीय मन्त्रसे नवम मन्त्रतक—सात मन्त्रोम रूपक रूपकम यह बात समझायी गयी है कि यह अति दुर्लभ मनुष्य-शरीर जिस जीवात्माको परमात्माकी कृपासे मिल गया है, उसे शीघ्र सचेत होकर भगवत्प्राप्तिके मार्गमें लग जाना चाहिये। शरीर अनित्य है, प्रतिक्षण इसका ह्रास हो रहा है। यदि अपने जीवनके इस अमूल्य समयको पशुओंकी भाँति सासारिक भोगोंके भोगनेम ही नष्ट कर दिया गया तो फिर बारवार जन्म मृत्युरूप ससारचक्रम घूमनेको बाध्य होना पड़ेगा। जिस महान् कार्यकी सिद्धिके लिये यह दुर्लभ मनुष्य शरीर मिला था, वह पूरा नहीं होगा। अतः मनुष्यको भगवान्‌की कृपासे मिली हुई विवेकशक्तिका उपयोग करना चाहिये। समारकी अनित्यताको ओर इन आपात रमणीय विषय- जनित सुखोंकी यथार्थ दुःखरूपताको समझकर इनके चिन्तन ओर उपभोगसे सर्वथा उपरत हो जाना चाहिये। केवल शरीर- निर्वाहके उपयुक्त कर्तव्यकर्मोंका निष्कामभावमे भगवान्‌की आज्ञा समझकर अनुष्ठान करते हुए अपनी बुद्धिमे भगवान्‌के नाम, रूप, लीला, धाम तथा उनकी अलौकिक शक्ति और अहैतुकी दयापर दृढ विश्वास उत्पन्न करना चाहिये और सर्वतो- भावसे भगवान्‌पर ही निर्भर हो जाना चाहिये। अपने मनको भगवान्‌के तत्त्व चिन्तनमे, वाणीको उनके गुण-वर्णनमें, नेत्रोको उनके दर्शनमे तथा कानोको उनकी महिमा-श्रवणमे लगाना चाहिये । इस प्रकार सारी इन्द्रियोंका सम्बन्ध भगवान्‌से जोड़ देना चाहिये। जीवनका एक क्षण भी भगवान्‌की स्मृतिके बिना न बीतने पाये । इसीमे मनुष्य जीवनकी सार्थकता है। जो ऐसा करता है, वह निश्चय ही परब्रह्म पुरुषोत्तमके अचिन्त्य परमपदको प्राप्त होकर सदाके लिये कृतकृत्य हो जाता है ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—उपर्युक्त वर्णनमे रथके रूपककी कल्पना करके भगवत्प्राप्तिके लिये जो साधन बतलाया गया, उसमें विवेकशील बुद्धिके द्वारा मनको वशमे करके, इन्द्रियोंको विपरीत मार्गस हटाकर, भगवत्प्राप्तिके मार्गम लगानेकी बात कही गयी। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि स्वभावसे ही दुष्ट और बलवान् इन्द्रियोंको उनके प्रिय ओर अभ्यस्त असत्-मार्गस किस प्रकार हटाया जाय, अतः इस बातका तात्त्विक विवेचन करके इन्द्रियोंको असत्-मार्गसे रोककर भगवान्‌की ओर लगानेका प्रकार बतलाते हैं— इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १० ॥ हि इन्द्रियेभ्यः=क्योंकि इन्द्रियोमे, अर्थाः=शब्दादि विषय, पराः च=बलवान् हैं ओर, अर्थेभ्यः=शब्दादि विषयोंसे, मनः=मन, परम्=पर (प्रबल) हे तु मनसः=और मनसे भी, बुद्धिः=बुद्धि, परा=पर (बलवती) हे; बुद्धेः= (तथा) बुद्धिसे, महान् आत्मा=महान् आत्मा, (उन सबका स्वामी होनेके कारण); परः=अत्यन्त श्रेष्ठ और बलवान् है ॥१०॥ व्याख्या-इस मन्त्रमे 'पर' शब्दका प्रयोग बलवान्‌के अर्थम हुआ है, यह बात समझ लेनी चाहिये, क्योंकि कार्य- कारणभावसे या सूक्ष्मतारी दृष्टिमे इन्द्रियोंकी अपेक्षा शब्दादि विषयोंको श्रेष्ठ बतलाना युक्तियुक्त नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार 'महान्' विशेषणके सहित 'आत्मा' शब्द भी 'जीवात्मा'का वाचक है, 'महत्तत्त्व'का नहीं। जीवात्मा उन सबका स्वामी है, अतः उसके लिये 'महान्' विशेषण देना उचित ही है। यदि महत्तत्त्वके अर्थमें इसका प्रयोग होता तो 'आत्मा' शब्दके प्रयोगकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। दूसरी बात यह भी है कि बुद्धि तत्त्व ही महत्तत्त्व है। तत्त्व-विचारकालमें

इसमें भेद नहीं माना जाता । इसके सिवा आगे चलकर जहाँ निरोध ( एक तत्त्वको दूसरेमें लीन करने ) का प्रसङ्ग है, वहाँ भी बुद्धिका निरोध 'महान् आत्मा'मे करनेके लिये कहा है । इन सब कारणोंसे तथा ब्रह्मसूत्रकारको साख्यमतानुसार महत्तत्त्व और अव्यक्त प्रकृतिरूप अर्थ स्वीकार न होनेसे भी यही मानना चाहिये कि यहाँ 'महान्' विशेषणके सहित 'आत्मा' पदका अर्थ जीवात्मा ही है । * इसलिये मन्त्रका सारांश यह है कि इन्द्रियोंसे अर्थ ( विषय ) बलवान् है । वे साधककी इन्द्रियोंको बलपूर्वक अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं, अतः साधकको उचित है कि इन्द्रियोंको विषयोसे दूर रक्खे । विषयोसे बलवान् मन है । यदि मनकी विषयोमे आसक्ति न रहे तो इन्द्रियाँ और विषय-ये दोनों साधककी कुछ भी हानि नहीं कर सकते । मनसे भी बुद्धि बलवान् है, अतः बुद्धिके द्वारा विचार करके मनको राग-द्वेषरहित बनाकर अपने वशमें कर लेना चाहिये । एव बुद्धिसे भी इन 'सबका स्वामी 'महान् आत्मा' बलवान् है । उसकी आज्ञा माननेके लिये ये सभी बाध्य है, अतः मनुष्यको आत्मशक्तिका अनुभव करके उसके द्वारा बुद्धि आदि सबको नियन्त्रणमें रखना चाहिये ॥ १० ॥

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥

महतः=उस जीवात्मामे, परम्=बलवती है, अव्यक्तम्=भगवान्की माया; अव्यक्तात्=अव्यक्त मायासे भी; परः= श्रेष्ठ है; पुरुषः=परमपुरुष ( स्वय परमेश्वर ), पुरुषात्=परम पुरुष भगवान्‌से, परम्=श्रेष्ठ और बलवान्, किञ्चित्=कुछ भी, न=नहीं है, सा काष्ठा=वही सबकी परम अवधि (और), सा परा गतिः=वही परम गति है ॥ ११ ॥

व्याख्या-इस मन्त्रमे 'अव्यक्त' शब्द भगवान्‌की उस त्रिगुणमयी दैवी मायाशक्तिके लिये प्रयुक्त हुआ है, जो गीतामे दुरत्यय ( अति दुस्तर ) बतायी गयी है ( ७ । १४ ), जिससे मोहित हुए जीव भगवान्‌को नही जानते (गीता ७ । १३) । यही जीवात्मा और परमात्माके बीचमें परदा है, जिसके कारण जीव सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वरको नित्य समीप होनेपर भी नही देख पाता । इसे इस प्रकरणमें'जीवसे भी बलवान् बतलानेका यह भाव है कि जीव अपनी शक्तिसे इस मायाको नहीं हटा सकता, भगवान्‌की शरण ग्रहण करनेपर भगवान्‌की दयाके बलसे ही मनुष्य इससे पार हो सकता है ( गीता ७ । १४)। यहाँ 'अव्यक्त' शब्दसे सांख्यमतावलम्बियोंका 'प्रधान तत्त्व' नहीं ग्रहण करना चाहिये । क्योंकि उनके मतमे 'प्रधान' स्वतन्त्र है, वह आत्मासे पर नहीं है, तथा' आत्मांको भोग और मुक्ति-दोनों वस्तुएँ देकर उसका प्रयोजन सिद्ध करनेवाला है । परन्तु उपनिषद् और गीतामें इस अव्यक्त प्रकृतिकों कहीं भी मुक्ति देनेमें समर्थ नही माना है । अतः इस मन्त्रका तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि-इन सबपर आत्माका अधिकार है, अतः यह स्वयं उनको वशमें करके भगवान्‌की ओर बढ सकता है । परन्तु इस आत्मासे भी बलवान् एक और तत्त्व है, जिसका नाम 'अव्यक्त' है। कोई उसे प्रकृति और कोई माया भी कहते. हैं। इसीसे सब जीवसमुदाय मोहित होकर उसके वशमें हो रहा है । इसको हटाना जीवके अधिकारकी बात नहीं है, अतः इससे भी बलवान् जो इसके स्वामी परमपुरुष परमेश्वर हैं-जो बल, क्रिया और ज्ञान आदि सभी शक्तियोंकी अन्तिम अवधि और परम आधार हैं,-उन्हींकी शरण लेनी चाहिये । जब वे दया करके इस मायारूप परदेको स्वय हटा लेंगे, तब उसी क्षण वही भगवान्‌की प्राप्ति !हो जायगी, क्योंकि वे तो सदासे ही सर्वत्र विद्यमान हैं ॥ ११ ॥

सम्बन्ध-यही भाव अगले मन्त्रमें स्पष्ट करते हैं-

  • भाष्यकार प्रात स्मरणीयः स्वामी शकराचार्यजीने भी यहाँ 'महान् आत्मा'को जीवात्मा ही माना है, महत्तत्त्व नहीं ( देखिये ब्रह्मसूत्र अ० १ पा० ४ सू० १ का शाङ्करभाष्य ) । † इन ( १०-११ ) मन्त्रोंके कुछ आदरणीय विद्वानोंद्वारा निम्नलिखित अर्थ भी किये गये हैं- ( १ ) इन्द्रियोंसे उनके विषय सूक्ष्म, महान् और प्रत्यगात्मस्वरूप हैं, विषयोंसे सूक्ष्म महान् और प्रत्यगात्मस्वरूप मन है, मनसे सूक्ष्मतर, महत्तर और प्रत्यगात्मस्वरूप बुद्धिगब्दवाच्य भूतसूक्ष्म है, उस बुद्धिसे सूक्ष्म और महान् है सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला हिरण्यगर्भ-तत्त्व महान् आत्मा ( महत्तत्त्व ), इस महत्से सूक्ष्मतर प्रत्यगात्मस्वरूप और सबसे महान् अव्यक्त (मूल प्रकृति ) है, इस अव्यक्त- की अपेक्षा समन्त कारणोंका कारण और प्रत्यगात्मस्वरूप होनेसे पुरुष सूक्ष्मतर और महान् है । इस चिद्घनमात्र वस्तुसे भिन्न और कुछ भी नह। है, इस लिये यहाँ सूक्ष्मत्व, महत्त्व और प्रत्यगात्मत्वकी पराकाष्ठाकी स्थिति या पर्यवसान है और यही उत्कृष्ट गति है ।

३१२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥ एषः आत्मा = यह सबका आत्मरूप परमपुरुष, सर्वेषु भूतेषु = समस्त प्राणियोंमें रहता हुआ भी, गूढः = मायाके परदेमें छिपा रहनेके कारण, न प्रकाशते = सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, तु सूक्ष्मदर्शिभिः = केवल सूक्ष्मतत्त्वको समझनेवाले पुरुषोंद्वारा ही, सूक्ष्मया अग्र्यया बुद्ध्या = अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धिसे, दृश्यते = देखा जाता ह ॥ १२ ॥ व्याख्या—ये परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान् सबके अन्तर्यामी हैं, अतः सब प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं; परन्तु अपनी मायाके परदेमें छिपे हुए हैं, इस कारण उनके जाननेमे नहीं आते । जिन्होंने भगवान्‌का आश्रय लेकर अपनी बुद्धिको तीक्ष्ण बना लिया है, वे सूक्ष्मदर्शी ही भगवान्‌की दयासे सूक्ष्मबुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं ॥ १२ ॥ सम्बन्ध—विवेकीशील मनुष्यको भगवान्‌के शरण होकर किस प्रकार भगवान्‌की प्राप्तिके लिये साधन करना चाहिये ?—इस जिज्ञासापर कहते हैं— यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥१३॥ प्राज्ञः = बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि; वाक् = (पहले) वाक् आदि (समस्त इन्द्रियों) को, मनसी = मनमें, यच्छेत् = निरुद्ध करे, तत् = उस मनको, ज्ञाने आत्मनि = ज्ञानस्वरूप बुद्धिमे, यच्छेत् = विलीन करे, ज्ञानम् = ज्ञानस्वरूप बुद्धिको; महति आत्मनि = महान् आत्मामे, नियच्छेत् = विलीन करे (और), तत् = उसको, शान्ते आत्मनि = शान्तस्वरूप परमपुरुष परमात्मामे यच्छेत् = विलीन करे ॥ १३ ॥ व्याख्या—बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह पहले तो वाक् आदि इन्द्रियोको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमे विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो—मनमे विषयोंकी स्फुरणा न रहे । जब यह साधन भलीभाँति होने लगे, तब मनको ज्ञानस्वरूप बुद्धिमे विलीन कर दे अर्थात् एकमात्र विज्ञानस्वरूप निश्चयात्मिका बुद्धिकी वृत्तिके सिवा मनकी भिन्न सत्ता न रहे, किसी प्रकारका अन्य कोई भी चिन्तन न रहे । जब यहाँतक दृढ अभ्यास हो जाय, तदनन्तर उस ज्ञानस्वरूपा बुद्धिको भी जीवात्माके शुद्ध स्वरूपमें विलीन कर दे। अर्थात् ऐसी स्थितिमें स्थित हो जाय, जहाँ एकमात्र आत्मतत्त्वके सिवा—अपनेसे भिन्न किसी भी वस्तुकी सत्ता या स्मृति नहीं रह जाती । इसके पश्चात् अपने-आपको भी पूर्व निश्चयके अनुसार शान्त आत्मारूप परब्रह्म पुरुषोत्तममे विलीन कर दे* ॥ १३ ॥ सम्बन्ध—इस प्रकार परमात्माके स्वरूपका वर्णन, तथा उसकी प्राप्तिका महत्त्व और साधन बतलाकर अब श्रुति मनुष्योंको सावधान करती हुई कहती है— उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥ (२) इन्द्रियोंकी अधिष्ठात्री देवता सोम, कुबेर, सूर्य, वरुण, अश्विनी, अग्नि, इन्द्र, जयन्त, यम और दक्षकी अपेक्षा अर्थ (विषयों) के अधिष्ठात्री देवता सौपर्णी, वारुणी और उमा (शब्द-स्पर्शकी अधिष्ठात्री सौपर्णी, रूप-रसकी वारुणी और गन्धकी उमा हैं) श्रेष्ठ हैं, इनसे मनके अधिष्ठात्री देवता रुद्र, वीन्द्र (पक्षिराज गरुड़) और शेष श्रेष्ठ हैं, मनके देवताओंसे बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवता सरस्वती श्रेष्ठ हैं, सरस्वतीसे महत्तत्त्वके अधिष्ठात्री देवता ब्रह्मा श्रेष्ठ हैं, ब्रह्मासे अव्यक्तकी अधिष्ठात्री देवता श्री या रमा श्रेष्ठ हैं और उनसे श्रेष्ठ पुरुषशब्दवाच्य विष्णु हैं। वे परिपूर्ण हैं, उनके तुल्य ही कोई नहीं है, फिर उनसे श्रेष्ठ तो कैसे हो ?

  • इसका यह अर्थ भी किया गया है— विवेकी पुरुष वाक्-इन्द्रियका मनमें उपसहार करें, यहाँ वाक् शब्द उपलक्षणमात्र है, तात्पर्य यह है कि समस्त इन्द्रियोंको मनके अधीन करे, उस मनको ज्ञान शब्दवाच्य बुद्धिरूप आत्मामें संयत करे, उस बुद्धिको हिरण्यगर्भकी उपाधिरूप महत्तत्त्वमें लीन करे और महत्तत्त्वको भी शान्त (निष्क्रिय) आत्मामें निरोध करे ।
  • कठोपनिषद् * २१३ उत्तिष्ठत = (हे मनुष्यो !) उठो, जाग्रत = जागो (सावधान हो जाओ और), वरान् = श्रेष्ठ महापुरुषोंके, प्राप्य = पास जाकर ( उनके द्वारा ), निबोधत = उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लो ( क्योंकि ); कवयः = त्रिकालज्ञ ज्ञानीजन, तत् पथः = उस तत्त्वज्ञानके मार्गको, क्षुरस्य = छुरीकी, निशिता दुरत्यया = तीक्ष्ण एव दुस्तर, धारा ( इव ) = धारके सदृश, दुर्गम् = दुर्गम ( अत्यन्त कठिन ), वदन्ति = बतलाते हैं ॥ १४ ॥ व्याख्या—हे मनुष्यो ! तुम जन्म जन्मान्तरसे अज्ञाननिद्रामें सो रहे हो। अब तुम्हें परमात्माकी दयासे यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर मिला है। इसे पाकर अब एक क्षण भी प्रमादमें मत खोओ। शीघ्र सावधान हो जाओ। श्रेष्ठ महापुरुषोंके पास जाकर उनके उपदेशद्वारा अपने कल्याणका मार्ग और परमात्माका रहस्य समझ लो। परमात्माका तत्त्व बड़ा गहन है, उसके स्वरूपका ज्ञान, उसकी प्राप्तिका मार्ग महापुरुषोंकी सहायता और परमात्माकी कृपाके बिना वैसा ही दुस्तर है, जिस प्रकार छुरीकी तेज धारपर चलना। ऐसे दुस्तर मार्गसे सुगमतापूर्वक पार होनेका सरल उपाय वे अनुभवी महापुरुष ही बता सकते हैं, जो स्वयं इसे पार कर चुके हैं ॥ १४ ॥ सम्बन्ध—ब्रह्मप्राप्तिका मार्ग इतना दुस्तर क्यों है ?—इस जिज्ञासापर परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसको जानने- का फल बताते हैं— अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च * यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ यत् = जो, अशब्दम् = शब्दरहित, अस्पर्शम् = स्पर्border/स्पर्शरहित, अरूपम् = रूपरहित, अरसम् = रसरहित, च = और, अगन्धवत् = बिना गन्धवाला है, तथा = तथा ( जो ), अव्ययम् = अविनाशी, नित्यम् = नित्य, अनादि = अनादि, अनन्तम् = अनन्त ( असीम ); महतः परम् = महान् आत्मासे श्रेष्ठ ( एव ); ध्रुवम् = सर्वथा सत्य तत्त्व है, तत् = उस परमात्माको, निचाय्य = जानकर ( मनुष्य ); मृत्युमुखात् = मृत्युके मुखसे, प्रमुच्यते = सदाके लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे उस परब्रह्म परमात्माको प्राकृत शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित बतलाकर यह दिखलाया गया है कि सांसारिक विषयोंको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे नित्य, अनादि और असीम हैं। जीवात्मासे भी श्रेष्ठ और सर्वथा सत्य हैं। उन्हें जानकर मनुष्य सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाता है* ॥ १५ ॥ सम्बन्ध—यहाँतक एक अध्यायके उपदेशको पूर्ण करके अब इस आख्यानके श्रवण और वर्णनका माहात्म्य बतलाते हैं— नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्त ँ सनातनम् । उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ मेधावी = बुद्धिमान् मनुष्य, मृत्युप्रोक्तम् = यमराजके द्वारा कहे हुए, नाचिकेतम् = नचिकेताके; सनातनम् = ( इस ) सनातन, उपाख्यानम् = उपाख्यानका, उक्त्वा = वर्णन करके, च = और; श्रुत्वा = श्रवण करके, ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोकमें; महीयते = महिमान्वित होता है ( प्रतिष्ठित होता है ) ॥ १६ ॥ व्याख्या—यह जो इस अध्यायमें नचिकेताके प्रति यमराजका उपदेश है, यह कोई नयी बात नहीं है, यह परम्परागत सनातन उपाख्यान है। इसका वर्णन करनेवाला और श्रवण करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठावाला होता है ॥ १६ ॥ य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥
  • एक आदरणीय महानुभावने इसका यह अर्थ किया है— जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस, नित्य और अगन्ध है, जो अनादि, अनन्त, महत्त्त्वसे भी विलक्षण और कूटस्थ नित्य है, उस ब्रह्म आत्माको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है।

२१४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * यः=जो मनुष्य, प्रयत:=सर्वथा शुद्ध होकर, इमम्=इस परमम् गुह्यम्=परम गुह्य रहस्यमय प्रसङ्गको, ब्रह्मसंसदि=ब्राह्मणोंकी सभामे, श्रावयेत्=सुनाता है, वा=अथवा, श्राद्धकाले=श्राद्धकालमे, श्रावयेत्=( भोजन करने- वालोको ) सुनाता है, तत्=( उसका ) वह श्रवण करानेरूप कर्म, आनन्त्याय कल्पते=अनन्त होनेमे ( अविनाशी फल देनेमे ) समर्थ होता है; तत् आनन्त्याय कल्पते इति=वह अनन्त होनेमे समर्थ होता है ॥ १७ ॥ व्याख्या--जो मनुष्य विशुद्ध होकर सावधानीपूर्वक इस परम रहस्यमय प्रसङ्गको तत्त्वविवेचनपूर्वक भगवत्प्रेमी शुद्धबुद्धि ब्राह्मणोंकी सभामे सुनाता है अथवा श्राद्धकालमे भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंको सुनाता है; उसका यह वर्णनरूप कर्म अनन्त फल देनेवाला होता है । अनन्त होनेमें समर्थ होता है । दुबारा कहकर इस सिद्धान्तकी निश्चितता और अध्यायकी समाप्तिका लक्ष्य कराया गया है ॥ १७ ॥ ᅳ॥ तृतीय वल्ली समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥