भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 233

इसमें भेद नहीं माना जाता । इसके सिवा आगे चलकर जहाँ निरोध ( एक तत्त्वको दूसरेमें लीन करने ) का प्रसङ्ग है, वहाँ भी बुद्धिका निरोध 'महान् आत्मा'मे करनेके लिये कहा है । इन सब कारणोंसे तथा ब्रह्मसूत्रकारको साख्यमतानुसार महत्तत्त्व और अव्यक्त प्रकृतिरूप अर्थ स्वीकार न होनेसे भी यही मानना चाहिये कि यहाँ 'महान्' विशेषणके सहित 'आत्मा' पदका अर्थ जीवात्मा ही है । * इसलिये मन्त्रका सारांश यह है कि इन्द्रियोंसे अर्थ ( विषय ) बलवान् है । वे साधककी इन्द्रियोंको बलपूर्वक अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं, अतः साधकको उचित है कि इन्द्रियोंको विषयोसे दूर रक्खे । विषयोसे बलवान् मन है । यदि मनकी विषयोमे आसक्ति न रहे तो इन्द्रियाँ और विषय-ये दोनों साधककी कुछ भी हानि नहीं कर सकते । मनसे भी बुद्धि बलवान् है, अतः बुद्धिके द्वारा विचार करके मनको राग-द्वेषरहित बनाकर अपने वशमें कर लेना चाहिये । एव बुद्धिसे भी इन 'सबका स्वामी 'महान् आत्मा' बलवान् है । उसकी आज्ञा माननेके लिये ये सभी बाध्य है, अतः मनुष्यको आत्मशक्तिका अनुभव करके उसके द्वारा बुद्धि आदि सबको नियन्त्रणमें रखना चाहिये ॥ १० ॥

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥

महतः=उस जीवात्मामे, परम्=बलवती है, अव्यक्तम्=भगवान्की माया; अव्यक्तात्=अव्यक्त मायासे भी; परः= श्रेष्ठ है; पुरुषः=परमपुरुष ( स्वय परमेश्वर ), पुरुषात्=परम पुरुष भगवान्‌से, परम्=श्रेष्ठ और बलवान्, किञ्चित्=कुछ भी, न=नहीं है, सा काष्ठा=वही सबकी परम अवधि (और), सा परा गतिः=वही परम गति है ॥ ११ ॥

व्याख्या-इस मन्त्रमे 'अव्यक्त' शब्द भगवान्‌की उस त्रिगुणमयी दैवी मायाशक्तिके लिये प्रयुक्त हुआ है, जो गीतामे दुरत्यय ( अति दुस्तर ) बतायी गयी है ( ७ । १४ ), जिससे मोहित हुए जीव भगवान्‌को नही जानते (गीता ७ । १३) । यही जीवात्मा और परमात्माके बीचमें परदा है, जिसके कारण जीव सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वरको नित्य समीप होनेपर भी नही देख पाता । इसे इस प्रकरणमें'जीवसे भी बलवान् बतलानेका यह भाव है कि जीव अपनी शक्तिसे इस मायाको नहीं हटा सकता, भगवान्‌की शरण ग्रहण करनेपर भगवान्‌की दयाके बलसे ही मनुष्य इससे पार हो सकता है ( गीता ७ । १४)। यहाँ 'अव्यक्त' शब्दसे सांख्यमतावलम्बियोंका 'प्रधान तत्त्व' नहीं ग्रहण करना चाहिये । क्योंकि उनके मतमे 'प्रधान' स्वतन्त्र है, वह आत्मासे पर नहीं है, तथा' आत्मांको भोग और मुक्ति-दोनों वस्तुएँ देकर उसका प्रयोजन सिद्ध करनेवाला है । परन्तु उपनिषद् और गीतामें इस अव्यक्त प्रकृतिकों कहीं भी मुक्ति देनेमें समर्थ नही माना है । अतः इस मन्त्रका तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि-इन सबपर आत्माका अधिकार है, अतः यह स्वयं उनको वशमें करके भगवान्‌की ओर बढ सकता है । परन्तु इस आत्मासे भी बलवान् एक और तत्त्व है, जिसका नाम 'अव्यक्त' है। कोई उसे प्रकृति और कोई माया भी कहते. हैं। इसीसे सब जीवसमुदाय मोहित होकर उसके वशमें हो रहा है । इसको हटाना जीवके अधिकारकी बात नहीं है, अतः इससे भी बलवान् जो इसके स्वामी परमपुरुष परमेश्वर हैं-जो बल, क्रिया और ज्ञान आदि सभी शक्तियोंकी अन्तिम अवधि और परम आधार हैं,-उन्हींकी शरण लेनी चाहिये । जब वे दया करके इस मायारूप परदेको स्वय हटा लेंगे, तब उसी क्षण वही भगवान्‌की प्राप्ति !हो जायगी, क्योंकि वे तो सदासे ही सर्वत्र विद्यमान हैं ॥ ११ ॥

सम्बन्ध-यही भाव अगले मन्त्रमें स्पष्ट करते हैं-

  • भाष्यकार प्रात स्मरणीयः स्वामी शकराचार्यजीने भी यहाँ 'महान् आत्मा'को जीवात्मा ही माना है, महत्तत्त्व नहीं ( देखिये ब्रह्मसूत्र अ० १ पा० ४ सू० १ का शाङ्करभाष्य ) । † इन ( १०-११ ) मन्त्रोंके कुछ आदरणीय विद्वानोंद्वारा निम्नलिखित अर्थ भी किये गये हैं- ( १ ) इन्द्रियोंसे उनके विषय सूक्ष्म, महान् और प्रत्यगात्मस्वरूप हैं, विषयोंसे सूक्ष्म महान् और प्रत्यगात्मस्वरूप मन है, मनसे सूक्ष्मतर, महत्तर और प्रत्यगात्मस्वरूप बुद्धिगब्दवाच्य भूतसूक्ष्म है, उस बुद्धिसे सूक्ष्म और महान् है सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला हिरण्यगर्भ-तत्त्व महान् आत्मा ( महत्तत्त्व ), इस महत्से सूक्ष्मतर प्रत्यगात्मस्वरूप और सबसे महान् अव्यक्त (मूल प्रकृति ) है, इस अव्यक्त- की अपेक्षा समन्त कारणोंका कारण और प्रत्यगात्मस्वरूप होनेसे पुरुष सूक्ष्मतर और महान् है । इस चिद्घनमात्र वस्तुसे भिन्न और कुछ भी नह। है, इस लिये यहाँ सूक्ष्मत्व, महत्त्व और प्रत्यगात्मत्वकी पराकाष्ठाकी स्थिति या पर्यवसान है और यही उत्कृष्ट गति है ।