भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 832 में से

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पृष्ठ 234

३१२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥ एषः आत्मा = यह सबका आत्मरूप परमपुरुष, सर्वेषु भूतेषु = समस्त प्राणियोंमें रहता हुआ भी, गूढः = मायाके परदेमें छिपा रहनेके कारण, न प्रकाशते = सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, तु सूक्ष्मदर्शिभिः = केवल सूक्ष्मतत्त्वको समझनेवाले पुरुषोंद्वारा ही, सूक्ष्मया अग्र्यया बुद्ध्या = अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धिसे, दृश्यते = देखा जाता ह ॥ १२ ॥ व्याख्या—ये परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान् सबके अन्तर्यामी हैं, अतः सब प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं; परन्तु अपनी मायाके परदेमें छिपे हुए हैं, इस कारण उनके जाननेमे नहीं आते । जिन्होंने भगवान्‌का आश्रय लेकर अपनी बुद्धिको तीक्ष्ण बना लिया है, वे सूक्ष्मदर्शी ही भगवान्‌की दयासे सूक्ष्मबुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं ॥ १२ ॥ सम्बन्ध—विवेकीशील मनुष्यको भगवान्‌के शरण होकर किस प्रकार भगवान्‌की प्राप्तिके लिये साधन करना चाहिये ?—इस जिज्ञासापर कहते हैं— यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥१३॥ प्राज्ञः = बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि; वाक् = (पहले) वाक् आदि (समस्त इन्द्रियों) को, मनसी = मनमें, यच्छेत् = निरुद्ध करे, तत् = उस मनको, ज्ञाने आत्मनि = ज्ञानस्वरूप बुद्धिमे, यच्छेत् = विलीन करे, ज्ञानम् = ज्ञानस्वरूप बुद्धिको; महति आत्मनि = महान् आत्मामे, नियच्छेत् = विलीन करे (और), तत् = उसको, शान्ते आत्मनि = शान्तस्वरूप परमपुरुष परमात्मामे यच्छेत् = विलीन करे ॥ १३ ॥ व्याख्या—बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह पहले तो वाक् आदि इन्द्रियोको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमे विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो—मनमे विषयोंकी स्फुरणा न रहे । जब यह साधन भलीभाँति होने लगे, तब मनको ज्ञानस्वरूप बुद्धिमे विलीन कर दे अर्थात् एकमात्र विज्ञानस्वरूप निश्चयात्मिका बुद्धिकी वृत्तिके सिवा मनकी भिन्न सत्ता न रहे, किसी प्रकारका अन्य कोई भी चिन्तन न रहे । जब यहाँतक दृढ अभ्यास हो जाय, तदनन्तर उस ज्ञानस्वरूपा बुद्धिको भी जीवात्माके शुद्ध स्वरूपमें विलीन कर दे। अर्थात् ऐसी स्थितिमें स्थित हो जाय, जहाँ एकमात्र आत्मतत्त्वके सिवा—अपनेसे भिन्न किसी भी वस्तुकी सत्ता या स्मृति नहीं रह जाती । इसके पश्चात् अपने-आपको भी पूर्व निश्चयके अनुसार शान्त आत्मारूप परब्रह्म पुरुषोत्तममे विलीन कर दे* ॥ १३ ॥ सम्बन्ध—इस प्रकार परमात्माके स्वरूपका वर्णन, तथा उसकी प्राप्तिका महत्त्व और साधन बतलाकर अब श्रुति मनुष्योंको सावधान करती हुई कहती है— उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥ (२) इन्द्रियोंकी अधिष्ठात्री देवता सोम, कुबेर, सूर्य, वरुण, अश्विनी, अग्नि, इन्द्र, जयन्त, यम और दक्षकी अपेक्षा अर्थ (विषयों) के अधिष्ठात्री देवता सौपर्णी, वारुणी और उमा (शब्द-स्पर्शकी अधिष्ठात्री सौपर्णी, रूप-रसकी वारुणी और गन्धकी उमा हैं) श्रेष्ठ हैं, इनसे मनके अधिष्ठात्री देवता रुद्र, वीन्द्र (पक्षिराज गरुड़) और शेष श्रेष्ठ हैं, मनके देवताओंसे बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवता सरस्वती श्रेष्ठ हैं, सरस्वतीसे महत्तत्त्वके अधिष्ठात्री देवता ब्रह्मा श्रेष्ठ हैं, ब्रह्मासे अव्यक्तकी अधिष्ठात्री देवता श्री या रमा श्रेष्ठ हैं और उनसे श्रेष्ठ पुरुषशब्दवाच्य विष्णु हैं। वे परिपूर्ण हैं, उनके तुल्य ही कोई नहीं है, फिर उनसे श्रेष्ठ तो कैसे हो ?

  • इसका यह अर्थ भी किया गया है— विवेकी पुरुष वाक्-इन्द्रियका मनमें उपसहार करें, यहाँ वाक् शब्द उपलक्षणमात्र है, तात्पर्य यह है कि समस्त इन्द्रियोंको मनके अधीन करे, उस मनको ज्ञान शब्दवाच्य बुद्धिरूप आत्मामें संयत करे, उस बुद्धिको हिरण्यगर्भकी उपाधिरूप महत्तत्त्वमें लीन करे और महत्तत्त्वको भी शान्त (निष्क्रिय) आत्मामें निरोध करे ।