भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 235
  • कठोपनिषद् * २१३ उत्तिष्ठत = (हे मनुष्यो !) उठो, जाग्रत = जागो (सावधान हो जाओ और), वरान् = श्रेष्ठ महापुरुषोंके, प्राप्य = पास जाकर ( उनके द्वारा ), निबोधत = उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लो ( क्योंकि ); कवयः = त्रिकालज्ञ ज्ञानीजन, तत् पथः = उस तत्त्वज्ञानके मार्गको, क्षुरस्य = छुरीकी, निशिता दुरत्यया = तीक्ष्ण एव दुस्तर, धारा ( इव ) = धारके सदृश, दुर्गम् = दुर्गम ( अत्यन्त कठिन ), वदन्ति = बतलाते हैं ॥ १४ ॥ व्याख्या—हे मनुष्यो ! तुम जन्म जन्मान्तरसे अज्ञाननिद्रामें सो रहे हो। अब तुम्हें परमात्माकी दयासे यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर मिला है। इसे पाकर अब एक क्षण भी प्रमादमें मत खोओ। शीघ्र सावधान हो जाओ। श्रेष्ठ महापुरुषोंके पास जाकर उनके उपदेशद्वारा अपने कल्याणका मार्ग और परमात्माका रहस्य समझ लो। परमात्माका तत्त्व बड़ा गहन है, उसके स्वरूपका ज्ञान, उसकी प्राप्तिका मार्ग महापुरुषोंकी सहायता और परमात्माकी कृपाके बिना वैसा ही दुस्तर है, जिस प्रकार छुरीकी तेज धारपर चलना। ऐसे दुस्तर मार्गसे सुगमतापूर्वक पार होनेका सरल उपाय वे अनुभवी महापुरुष ही बता सकते हैं, जो स्वयं इसे पार कर चुके हैं ॥ १४ ॥ सम्बन्ध—ब्रह्मप्राप्तिका मार्ग इतना दुस्तर क्यों है ?—इस जिज्ञासापर परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसको जानने- का फल बताते हैं— अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च * यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ यत् = जो, अशब्दम् = शब्दरहित, अस्पर्शम् = स्पर्border/स्पर्शरहित, अरूपम् = रूपरहित, अरसम् = रसरहित, च = और, अगन्धवत् = बिना गन्धवाला है, तथा = तथा ( जो ), अव्ययम् = अविनाशी, नित्यम् = नित्य, अनादि = अनादि, अनन्तम् = अनन्त ( असीम ); महतः परम् = महान् आत्मासे श्रेष्ठ ( एव ); ध्रुवम् = सर्वथा सत्य तत्त्व है, तत् = उस परमात्माको, निचाय्य = जानकर ( मनुष्य ); मृत्युमुखात् = मृत्युके मुखसे, प्रमुच्यते = सदाके लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे उस परब्रह्म परमात्माको प्राकृत शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित बतलाकर यह दिखलाया गया है कि सांसारिक विषयोंको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे नित्य, अनादि और असीम हैं। जीवात्मासे भी श्रेष्ठ और सर्वथा सत्य हैं। उन्हें जानकर मनुष्य सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाता है* ॥ १५ ॥ सम्बन्ध—यहाँतक एक अध्यायके उपदेशको पूर्ण करके अब इस आख्यानके श्रवण और वर्णनका माहात्म्य बतलाते हैं— नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्त ँ सनातनम् । उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ मेधावी = बुद्धिमान् मनुष्य, मृत्युप्रोक्तम् = यमराजके द्वारा कहे हुए, नाचिकेतम् = नचिकेताके; सनातनम् = ( इस ) सनातन, उपाख्यानम् = उपाख्यानका, उक्त्वा = वर्णन करके, च = और; श्रुत्वा = श्रवण करके, ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोकमें; महीयते = महिमान्वित होता है ( प्रतिष्ठित होता है ) ॥ १६ ॥ व्याख्या—यह जो इस अध्यायमें नचिकेताके प्रति यमराजका उपदेश है, यह कोई नयी बात नहीं है, यह परम्परागत सनातन उपाख्यान है। इसका वर्णन करनेवाला और श्रवण करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठावाला होता है ॥ १६ ॥ य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥
  • एक आदरणीय महानुभावने इसका यह अर्थ किया है— जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस, नित्य और अगन्ध है, जो अनादि, अनन्त, महत्त्त्वसे भी विलक्षण और कूटस्थ नित्य है, उस ब्रह्म आत्माको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है।