कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * यः=जो मनुष्य, प्रयत:=सर्वथा शुद्ध होकर, इमम्=इस परमम् गुह्यम्=परम गुह्य रहस्यमय प्रसङ्गको, ब्रह्मसंसदि=ब्राह्मणोंकी सभामे, श्रावयेत्=सुनाता है, वा=अथवा, श्राद्धकाले=श्राद्धकालमे, श्रावयेत्=( भोजन करने- वालोको ) सुनाता है, तत्=( उसका ) वह श्रवण करानेरूप कर्म, आनन्त्याय कल्पते=अनन्त होनेमे ( अविनाशी फल देनेमे ) समर्थ होता है; तत् आनन्त्याय कल्पते इति=वह अनन्त होनेमे समर्थ होता है ॥ १७ ॥ व्याख्या--जो मनुष्य विशुद्ध होकर सावधानीपूर्वक इस परम रहस्यमय प्रसङ्गको तत्त्वविवेचनपूर्वक भगवत्प्रेमी शुद्धबुद्धि ब्राह्मणोंकी सभामे सुनाता है अथवा श्राद्धकालमे भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंको सुनाता है; उसका यह वर्णनरूप कर्म अनन्त फल देनेवाला होता है । अनन्त होनेमें समर्थ होता है । दुबारा कहकर इस सिद्धान्तकी निश्चितता और अध्यायकी समाप्तिका लक्ष्य कराया गया है ॥ १७ ॥ ᅳ॥ तृतीय वल्ली समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥