कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ द्वितीय अध्याय प्रथम वल्ली सम्बन्ध—तृतीय वल्लीमें यह बतलाया गया कि वे परब्रह्म परमेश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंमें वर्तमान हैं, परंतु सबको दीखते नहीं। कोई विरला ही उन्हें सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा देख सकता है । इसपर यह प्रश्न होता है कि जब वे ब्रह्म अपने ही हृदयमें हैं तो उन्हें सभी लोग अपनी बुद्धिरूप नेत्रोंद्वारा क्यों नहीं देख लेते ? कोई विरला ही क्यों देखता है ? इसपर कहते है— पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥ स्वयंभूः=स्वय प्रकट होनेवाले परमेश्वरने, खानि=समस्त इन्द्रियोंको, पराञ्चि=बाहरकी ओर जानेवाली ही, व्यतृणत्=बनाया है, तस्मात्=इसलिये (मनुष्य इन्द्रियोंके द्वारा प्राय ), पराङ्=बाहरकी वस्तुओको ही, पश्यति= देखता है, अन्तरात्मन्=अन्तरात्माको, न=नहीं; कश्चित्=किसी भाग्यशाली, धीरः=बुद्धिमान् मनुष्यने ही, अमृतत्वम्= अमर पदको, इच्छन्=पानेकी इच्छा करके, आवृत्तचक्षुः=चक्षु आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंकी ओरमे लौटाकर, प्रत्यगात्मानम्=अन्तरात्माको, ऐक्षत्=देखा है ॥ १ ॥ व्याख्या—शब्द-स्पर्श रूप-रस गन्ध—इन्द्रियोंके ये सभी स्थूल विषय बाहर हैं। इनका यथार्थ ज्ञान करानेके लिये इन्द्रियोंकी रचना हुई है। क्योंकि इनका ज्ञान हुए बिना न तो मनुष्य किसी विषयके स्वरूप और गुणको ही जान सकता , है और न उसका यथायोग्य त्याग एव ग्रहण करके भगवान्के इन्द्रिय निर्माणके उद्देश्यको सिद्ध करनेके लिये उनके द्वारा नवीन शुभ कर्मोंका सम्पादन ही कर सकता है । इन्द्रिय निर्माण इसीलिये है कि मनुष्य इन्द्रियोके द्वारा स्वास्थ्यकर, सुबुद्धिदायक, विशुद्ध विषयोंका ग्रहण करके सुखमय जीवन बिताते हुए परमात्माकी ओर अग्रसर हो। इसीलिये स्वयंभू भगवान्ने इन्द्रियोंका मुख बाहरकी ओर बनाया, परतु विवेकके अभावसे अधिकांश मनुष्य इस बातको नहीं जानते और विषयासक्ति- वश उन्मत्तकी भाँति आपातरमणीय परतु परिणाममें भगवान्से हटाकर दुःखशोकमय नरकोंमे पहुँचानेवाले अशुद्ध विषय- भोगोंमे ही रचे-पचे रहते है । वे अन्तर्यामी परमात्माकी ओर देखते ही नहीं। कोई विरला ही बुद्धिमान् मनुष्य ऐसा होता है जो सत्संग, स्वाध्याय तथा भगवत्कृपासे अशुद्ध विषयभोगोंकी परिणामदुःखताको जानकर अमृतरूप परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे लौटाकर, उन्हे भगवत्सम्बन्धी विषयोंमे लगाकर, अन्तरात्माको—अन्तर्यामी परमात्माको देखता है* ॥ १ ॥ पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥ ( ये ) बालाः=( परंतु ) जो मूर्ख, पराचः=बाह्य, कामान्=भोगोंका, अनुयन्ति=अनुसरण करते हैं ( उन्हींमें रचे-पचे रहते हैं ), ते=वे, विततस्य=सर्वत्र फैले हुए, मृत्योः=मृत्युके, पाशम्=बन्धनमें, यन्ति=पड़ते हैं, अथ=किंतु, धीराः=बुद्धिमान् मनुष्य, ध्रुवम्=नित्य, अमृतत्वम्=अमरपदको, विदित्वा=विवेकद्वारा जानकर, इह=इस जगत्में, अध्रुवेषु=अनित्य भोगोंमेंसे किसीको ( भी ), न प्रार्थयन्ते=नहीं चाहते अर्थात् उनमें आसक्त नहीं होते ॥ २ ॥
- एक महानुभावने ऐसा अर्थ किया है— स्वयम्भू भगवान्ने कृपा करके ( उस भक्तके ) बाहरकी ओर जानेवाले इन्द्रिय-प्रवाहको रोक दिया—भीतरकी ओर मोड़ दिया। अतएव वह पुरुष बाहरकी वस्तुओंको नहीं देखता, अन्तरात्माको देखता है । अमृतत्वकी इच्छा करनेवाला कोई शान्तस्वभाव सत ही भगवत्कृपासे इस प्रकार बहिर्विषयोंसे चक्षु आदि इन्द्रियोंको मोड़कर अन्तर्यामी परमात्माको देखता है ।