कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२१६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-जो बाह्य (भगवद्-विमुख) विषयोंकी चमक दमक और आपात रमणीयताको देखकर उनमें आसक्त हुए रहते हैं और उनके पाने तथा भोगनेमें ही दुर्लभ एव अमूल्य मनुष्यजीवनको खो देते हैं, वे मूर्ख हैं। निश्चय ही वे सर्वकालव्यापी मृत्युके पाशमें बँध जाते हैं, दीर्घकालतक नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म धारण करके बार-बार जन्मते मरते रहते हैं; परंतु जो बुद्धिमान् हैं वे इस विषयपर गहराईसे यों विचार करते हैं कि 'ये इन्द्रियोंके भोग तो जीवको दूसरी योनियोंमें भी पर्याप्त मिल सकते हैं। मनुष्य शरीर उन सबसे विलक्षण है। इसका वास्तविक उद्देश्य विषयोपभोग कभी नहीं हो सकता।' इस प्रकार विचार करनेपर जब यह बात उनकी समझमें आ जाती है कि इसका उद्देश्य अमृतस्वरूप नित्य परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति करना है और वह इसी शरीरमे प्राप्त की जा सकती है, तब वे सर्वतोभावसे उसीकी ओर लग जाते हैं। फिर वे इस विनाशशील जगत्मे क्षणभङ्गुर भोगोंको प्राप्त करनेकी चेष्टा नहीं करते; इनसे सर्वथा विरक्त होकर सावधानीके साथ परमार्थ-साधनमे लग जाते हैं ॥ २ ॥ येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाँश्च मैथुनान् । एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥ येन = जिसके अनुग्रहसे मनुष्य, शब्दान् = शब्दोको, स्पर्शान् = स्पर्शोंको, रूपम् = रूप-समुदायको, रसम् = रस- समुदायको, गन्धम् = गन्ध-समुदायको, च = और, मैथुनान् = स्त्री-प्रसङ्ग आदिके सुखोको, विजानाति = अनुभव करता है (और); एतेन एव = इसीके अनुग्रहसे यह भी जानता है कि, अत्र किम् = यहाँ क्या, परिशिष्यते = शेष रह जाता है, एतत् वै = यह ही है, तत् = वह परमात्मा (जिसके विषयमें तुमने पूछा था) । ॥ ३ ॥ व्याख्या-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धात्मक सब प्रकारके विषयों का और स्त्री-सहवासादिसे होनेवाले सुखों का मनुष्य जिस परम देवसे मिली हुई ज्ञानशक्तिके द्वारा अनुभव करता है, उन्हींकी दी हुई शक्तिसे इनकी क्षणभङ्गुरताको देखकर वह यह भी समझ सकता है कि इन सबमेंसे ऐसी कौन वस्तु है, जो यहाँ शेष रहेगी ? विचार करनेपर यही समझमे आता है कि ये सभी पदार्थ प्रतिक्षण बदलनेवाले होनेसे विनाशीील हैं। इन सबके परम कारण एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही नित्य हैं। वे पहले भी थे और पीछे भी रहेंगे । अतः हे नचिकेता ! तुम्हारा पूछा हुआ वह ब्रह्मतत्त्व यही है जो सबका शेपी है, सबका पर्यवसान है, सबकी अवधि और सबकी परम गति है ॥ ३ ॥ स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ स्वप्नान्तम् च = स्वप्नके दृश्यों और, जागरितान्तम् = जाग्रत्-अवस्थाके दृश्यों; उभौ = इन दोनोको (मनुष्य); येन = जिससे; अनुपश्यति = बार-बार देखता है, [ तम् = उस, ] महान्तम् = सर्वश्रेष्ट; विभुम् = सर्वव्यापी, आत्मानम् = सबके आत्माको, मत्वा = जानकर; धीरः = बुद्धिमान् मनुष्य; न शोचति = शोक नहीं करता ॥ ४ ॥ व्याख्या-जिस परमात्माके द्वारा यह जीवात्मा स्वप्नमें और जाग्रतमें होनेवाली समस्त घटनाओका बारम्बार अनुभव करता रहता है, इन सबको जाननेकी शक्ति इसको जिस परब्रह्म परमेश्वरसे मिली है, जिसकी कृपासे ही इस जीवको उस (परमात्मा) की विज्ञानशक्तिका एक अश प्राप्त हुआ है, उस सबकी अपेक्षा महान् सदा-सर्वदा सर्वत्र व्याप्त परब्रह्म परमात्माको जानकर धीर पुरुष कभी, किसी भी कारणसे, किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता * ॥ ४ ॥
- कुछ आदरणीय महानुभावोंने इस मन्त्रका निम्नलिखित भावार्थ माना है- १-जिस आत्माके द्वारा स्वप्न तथा जाग्रत् अवस्थाके अन्तर्गत दीखनेवाले पदार्थोंको मनुष्य देखता है, उस महान् और विभु आत्माको जानकर अर्थात् वह 'परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा आत्मभावसे साक्षात् अनुभव कर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता । २-निद्राके अन्त और ज्ञानदवस्थाके अन्तमें अर्थात् नींदसे जागनेपर और सोनेते पहले जो उस महान् सर्वव्यापी परमात्मामें मन लगाकर उसीको देखता है-उसीकी स्तुति-उपासना कर अपना सारा दायित्व उसीपर छोड़ उसीके अनन्य आश्रित हो रहता है, उस बुद्धिमान् पुरुषको कोई शोक नहीं होता ।