कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 239, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 239
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- कठोपनिषद् * २१७ य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५ ॥ यः=जो मनुष्य; मध्वदम्=कर्मफलदाता, जीवम्*=सबको जीवन प्रदान करनेवाले; (तथा) भूतभव्यस्य=भूत, वर्तमान और भविष्यका, ईशानम्=शासन करनेवाले, इमम्=इस, आत्मानम्=परमात्माको, अन्तिकात् वेद=(अपने) समीप जानता है, ततः(=उसके बाद वह, न विजुगुप्सते=(कभी) किसीकी निन्दा नहीं करता; एतत् वै=यह ही (है); तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमे तुमने पूछा था) ॥ ५ ॥ व्याख्या—जो साधक सबको जीवन प्रदान करनेवाले, जीवोंके परम जीवन और उन्हे उनके कर्मोंका फल भुगतानेवाले तथा भूत, वर्तमान और भावी जगत्का एकमात्र शासन करनेवाले उस परब्रह्म परमेश्वरको इस प्रकार समझ लेता है कि 'वह अन्तर्यामीरूपसे निरन्तर मेरे समीप—मेरे हृदयमें ही स्थित है,' और इससे स्वाभाविक ही यह अनुमान कर लेता है कि इसी प्रकार वे सर्वनियन्ता परमात्मा सबके हृदयमे स्थित है, वह फिर उनके इस महिमामय स्वरूपको कभी नहीं भूल सकता । इसलिये वह कभी किसीकी निन्दा नही करता या किसीसे भी घृणा नहीं करता । नचिकेता ! तुमने जिस ब्रह्मके विषयमें पूछा था, वह यही है, जिसका मैंने ऊपर वर्णन किया है † ॥ ५ ॥ सम्बन्ध—अब यह बतलाते हैं कि ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणी उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही उत्पन्न हुए हैं, अतः जो कुछ भी है, सब उन्हींका रूपविशेष है । उनसे भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है, क्योंकि इस सम्पूर्ण जगत्के अभिन्ननिमित्तोपादान कारण एकमात्र परमेश्वर ही हैं, वे एक ही अनेक रूपोंमें स्थित हैं । यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत् ।। एतद्वै तत् ॥ ६ ॥ यः=जो, अद्भ्यः=जलसे, पूर्वम्=पहले; अजायत=हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था, [तम्=उस,] पूर्वम्=सबसे पहले, तपसः जातम्=तपसे उत्पन्न, गुहाम् प्रविश्य=हृदय-गुफामें प्रवेश करके, भूतेभिः (सह)=जीवात्माओंके साथ, तिष्ठन्तम्=स्थित रहनेवाले परमेश्वरको, यः=जो पुरुष, व्यपश्यत्=देखता है (वही ठीक देखता है), एतत् वै=यह ही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ६॥ व्याख्या—जो जलसे उपलक्षित पाँचों महाभूतोंसे पहले हिरण्यगर्भ ब्रह्माके रूपमें प्रकट हुए थे, उन अपने ही सङ्कल्परूप तपसे प्रकट होनेवाले और सब जीवोंके हृदयरूप गुफामें प्रविष्ट होकर उनके साथ रहनेवाले परमेश्वरको जो इस प्रकार जानता है कि 'सबके हृदयमें निवास करनेवाले सबके अन्तर्यामी परमेश्वर एक ही हैं, यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींकी महिमाका प्रकाश करता है,' वही यथार्थ जानता है । वे सदा सबके हृदयमें रहनेवाले ही ये तुम्हारे पूछे हुए परब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ ६ ॥ सम्बन्ध—उन्हीं परब्रह्मका अब अदितिदेवीके रूपसे वर्णन करते हैं— या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत ॥ एतद्वै तत् ॥ ७॥ ────────────────────────────────────────────────────────────────
- यहाँ 'जीव' शब्द परमात्माके लिये ही प्रयुक्त हुआ है, क्योकि भूत, भविष्य और वर्तमानका शासक जीव नहीं हो सकता । और प्रकरण भी यहाँ परमात्माका है, जीवका नहीं (देखिये ब्रह्मसूत्र १ । ३ । २४ का शाङ्करभाष्य) । † कुछ विद्वानोंने इसका यह अर्थ किया है— १—जो पुरुष कर्मफलभोक्ता और प्राणधारक इस जीवात्माको अपने समीप भूत और भविष्यका (त्रिकालका) ईश्वर समझता है, वह फिर किसी भयसे अपनेको छिपाकर नहीं रखता । (एक ब्रह्मसत्ताका ज्ञान होनेपर फिर कोई भय नहीं रहता, क्योंकि दूसरेकी सत्ता माननेसे ही भय होता है ।) २—जो मनुष्य मधु अर्थात् आनन्दके उपभोक्ता, भूत और भविष्यके शासक, जीवके नित्य समीप रहनेवाले, जीवके जीवन परमात्माको जान लेता है, वह फिर किसीसे भय नहीं करता । उ० अं० २८—