भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 240

२१८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * या=जो; देवतामयी=देवतामयी; अदितिः=अदिति; प्राणेन=प्राणोंके सहित; संभवति=उत्पन्न होती है; या=जो; भूतेभिः=प्राणियोंके सहित; व्यजायत=उत्पन्न हुई है, (तथा जो) गुहाम्=हृदयरूपी गुफामें; प्रविश्य=प्रवेश करके; तिष्ठन्तीम्=वहीं रहती है, (उसे जो पुरुष देखता है, वही यथार्थ देखता है, ) एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ७ ॥ व्याख्या—जो सर्वदेवतामयी भगवती अदितिदेवी पहले पहल उस परब्रह्मके सङ्कल्पसे सब जगत्की जीवनी-शक्तिके सहित उत्पन्न होती है, तथा जो सम्पूर्ण प्राणियोंको बीजरूपसे अपने साथ लेकर प्रकट हुई थी, हृदयरूपी गुहामें प्रविष्ट होकर वहीं रहनेवाली वह भगवती—भगवान्की अचिन्त्यमहाशक्ति भगवान्से सर्वथा अभिन्न है, भगवान् और उनकी शक्तिमें कोई भेद नहीं है, भगवान् ही शक्तिरूपसे सबके हृदयमें प्रवेश किये हुए हैं। हे नचिकेता ! यही ये ब्रह्म हैं, जिनके विषयमें तुमने पूछा था। अथवा—जननीरूपमें समस्त देवताओंका सृजन करनेवाली होनेके कारण जो सर्वदेवतामयी हैं, शब्दादि समस्त भोगसमूहका अदन-भक्षण करनेवाली होनेसे भी जिनका नाम अदिति है, जो हिरण्यगर्भरूप प्राणोंके सहित प्रकट होती हैं और समस्त भूतप्राणियोंके साथ ही जिनका प्रादुर्भाव होता है तथा जो सम्पूर्ण भूतप्राणियोंकी हृदय-गुफामें प्रविष्ट होकर वहाँ स्थित रहती हैं, वे परमेश्वरकी महाशक्ति वस्तुतः उनकी प्रतीक ही हैं। स्वय परमेश्वर ही इस रूपमें अपनेको प्रकट करते हैं। यही वह ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमें नचिकेता ! तुमने पूछा था ॥ ७ ॥ अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः । दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः ॥ एतद्वै तत् ॥ ८॥ (यः)=जो; जातवेदाः=सर्वज्ञ; अग्निः=अग्निदेवता; गर्भिणीभिः=गर्भिणी स्त्रियोंद्वारा; सुभृतः=उपयुक्त अन्नपानादिके द्वारा भलीभाँति परिपुष्ट हुआ; गर्भः=गर्भकी; इव=भाँति; अरण्योः=दो अरणियोंमें; निहितः=सुरक्षित है—छिपा है (तथा जो); जागृवद्भिः=सावधान (और), हविष्मद्भिः=हवन करनेयोग्य सामग्रियोंसे (युक्त); मनुष्येभिः=मनुष्योंद्वारा; दिवे दिवे=प्रतिदिन; ईड्यः=स्तुति करनेयोग्य (है); एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥८॥ व्याख्या—जिस प्रकार गर्भिणी स्त्रीके द्वारा शुद्ध अन्न-पानादिसे परिपुष्ट होकर बालक गर्भमें छिपा रहता है और श्रद्धा, प्रीति एव प्रसवकालीन क्लेशरूप मन्थनके द्वारा समयपर प्रकट होता है, उसी प्रकार अधर और उत्तर अरणि (ऊपर-नीचेके काष्ठखण्ड) के अंदर अग्नि देवता छिपे हुए रहते हैं एवं इनके उपासक प्रमादरहित होकर एकाग्रता, श्रद्धा तथा प्रीतिके साथ स्तुति करते हुए अरणि-मन्थनके द्वारा इन्हें प्रकट करते हैं। तदनन्तर आज्यादि विविध हवनसामग्रियोंके द्वारा इन्हें सन्तुष्ट करते हैं। ये अग्निदेवता सर्वज्ञ परमेश्वरके ही प्रतीक हैं। नचिकेता ! ये ही वे तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं ॥८॥ यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति । तं देवाः सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन ॥ एतद्वै तत् ॥ ९॥ यतः=जहाँसे; सूर्यः=सूर्यदेव; उदेति=उदय होते हैं; च=और; यत्र=जहाँ; अस्तम् च=अस्तभावको भी; गच्छति=प्राप्त होते हैं; सर्वे=सभी; देवाः=देवता; तम्=उसीमें; अर्पिताः=समर्पित हैं। तत् उ=उस परमेश्वरको; कश्चन=कोई (कभी भी); न अत्येति=नहीं लाँघ सकता; एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ९॥ व्याख्या—जिन परमेश्वरसे सूर्यदेव प्रकट होते हैं और जिनमें जाकर विलीन हो जाते हैं, जिनकी महिमामें ही यह सूर्यदेवताकी उदय-अस्तलीला नियमपूर्वक चलती है, उन परब्रह्ममें ही सम्पूर्ण देवता प्रविष्ट हैं—सब उन्हींमें ठहरे हुए हैं। ऐसा कोई भी नहीं है, जो उन सर्वात्मक, सर्वमय, सबके आदि-अन्त-आश्रयस्थल परमेश्वरकी महिमा और व्यवस्थाका उल्लङ्घन कर सके। सर्वतोभावसे सभी सर्वदा उनके अधीन और उन्हींके अनुशासनमें रहते हैं। कोई भी उनकी महिमाका पार नहीं पा सकता। वे सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं ॥ ९ ॥