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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

ॐ द्वितीय अध्याय प्रथम वल्ली सम्बन्ध—तृतीय वल्लीमें यह बतलाया गया कि वे परब्रह्म परमेश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंमें वर्तमान हैं, परंतु सबको दीखते नहीं। कोई विरला ही उन्हें सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा देख सकता है । इसपर यह प्रश्न होता है कि जब वे ब्रह्म अपने ही हृदयमें हैं तो उन्हें सभी लोग अपनी बुद्धिरूप नेत्रोंद्वारा क्यों नहीं देख लेते ? कोई विरला ही क्यों देखता है ? इसपर कहते है— पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥ स्वयंभूः=स्वय प्रकट होनेवाले परमेश्वरने, खानि=समस्त इन्द्रियोंको, पराञ्चि=बाहरकी ओर जानेवाली ही, व्यतृणत्=बनाया है, तस्मात्=इसलिये (मनुष्य इन्द्रियोंके द्वारा प्राय ), पराङ्=बाहरकी वस्तुओको ही, पश्यति= देखता है, अन्तरात्मन्=अन्तरात्माको, न=नहीं; कश्चित्=किसी भाग्यशाली, धीरः=बुद्धिमान् मनुष्यने ही, अमृतत्वम्= अमर पदको, इच्छन्=पानेकी इच्छा करके, आवृत्तचक्षुः=चक्षु आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंकी ओरमे लौटाकर, प्रत्यगात्मानम्=अन्तरात्माको, ऐक्षत्=देखा है ॥ १ ॥ व्याख्या—शब्द-स्पर्श रूप-रस गन्ध—इन्द्रियोंके ये सभी स्थूल विषय बाहर हैं। इनका यथार्थ ज्ञान करानेके लिये इन्द्रियोंकी रचना हुई है। क्योंकि इनका ज्ञान हुए बिना न तो मनुष्य किसी विषयके स्वरूप और गुणको ही जान सकता , है और न उसका यथायोग्य त्याग एव ग्रहण करके भगवान्के इन्द्रिय निर्माणके उद्देश्यको सिद्ध करनेके लिये उनके द्वारा नवीन शुभ कर्मोंका सम्पादन ही कर सकता है । इन्द्रिय निर्माण इसीलिये है कि मनुष्य इन्द्रियोके द्वारा स्वास्थ्यकर, सुबुद्धिदायक, विशुद्ध विषयोंका ग्रहण करके सुखमय जीवन बिताते हुए परमात्माकी ओर अग्रसर हो। इसीलिये स्वयंभू भगवान्ने इन्द्रियोंका मुख बाहरकी ओर बनाया, परतु विवेकके अभावसे अधिकांश मनुष्य इस बातको नहीं जानते और विषयासक्ति- वश उन्मत्तकी भाँति आपातरमणीय परतु परिणाममें भगवान्से हटाकर दुःखशोकमय नरकोंमे पहुँचानेवाले अशुद्ध विषय- भोगोंमे ही रचे-पचे रहते है । वे अन्तर्यामी परमात्माकी ओर देखते ही नहीं। कोई विरला ही बुद्धिमान् मनुष्य ऐसा होता है जो सत्संग, स्वाध्याय तथा भगवत्कृपासे अशुद्ध विषयभोगोंकी परिणामदुःखताको जानकर अमृतरूप परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे लौटाकर, उन्हे भगवत्सम्बन्धी विषयोंमे लगाकर, अन्तरात्माको—अन्तर्यामी परमात्माको देखता है* ॥ १ ॥ पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥ ( ये ) बालाः=( परंतु ) जो मूर्ख, पराचः=बाह्य, कामान्=भोगोंका, अनुयन्ति=अनुसरण करते हैं ( उन्हींमें रचे-पचे रहते हैं ), ते=वे, विततस्य=सर्वत्र फैले हुए, मृत्योः=मृत्युके, पाशम्=बन्धनमें, यन्ति=पड़ते हैं, अथ=किंतु, धीराः=बुद्धिमान् मनुष्य, ध्रुवम्=नित्य, अमृतत्वम्=अमरपदको, विदित्वा=विवेकद्वारा जानकर, इह=इस जगत्में, अध्रुवेषु=अनित्य भोगोंमेंसे किसीको ( भी ), न प्रार्थयन्ते=नहीं चाहते अर्थात् उनमें आसक्त नहीं होते ॥ २ ॥

  • एक महानुभावने ऐसा अर्थ किया है— स्वयम्भू भगवान्ने कृपा करके ( उस भक्तके ) बाहरकी ओर जानेवाले इन्द्रिय-प्रवाहको रोक दिया—भीतरकी ओर मोड़ दिया। अतएव वह पुरुष बाहरकी वस्तुओंको नहीं देखता, अन्तरात्माको देखता है । अमृतत्वकी इच्छा करनेवाला कोई शान्तस्वभाव सत ही भगवत्कृपासे इस प्रकार बहिर्विषयोंसे चक्षु आदि इन्द्रियोंको मोड़कर अन्तर्यामी परमात्माको देखता है ।

२१६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-जो बाह्य (भगवद्-विमुख) विषयोंकी चमक दमक और आपात रमणीयताको देखकर उनमें आसक्त हुए रहते हैं और उनके पाने तथा भोगनेमें ही दुर्लभ एव अमूल्य मनुष्यजीवनको खो देते हैं, वे मूर्ख हैं। निश्चय ही वे सर्वकालव्यापी मृत्युके पाशमें बँध जाते हैं, दीर्घकालतक नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म धारण करके बार-बार जन्मते मरते रहते हैं; परंतु जो बुद्धिमान् हैं वे इस विषयपर गहराईसे यों विचार करते हैं कि 'ये इन्द्रियोंके भोग तो जीवको दूसरी योनियोंमें भी पर्याप्त मिल सकते हैं। मनुष्य शरीर उन सबसे विलक्षण है। इसका वास्तविक उद्देश्य विषयोपभोग कभी नहीं हो सकता।' इस प्रकार विचार करनेपर जब यह बात उनकी समझमें आ जाती है कि इसका उद्देश्य अमृतस्वरूप नित्य परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति करना है और वह इसी शरीरमे प्राप्त की जा सकती है, तब वे सर्वतोभावसे उसीकी ओर लग जाते हैं। फिर वे इस विनाशशील जगत्मे क्षणभङ्गुर भोगोंको प्राप्त करनेकी चेष्टा नहीं करते; इनसे सर्वथा विरक्त होकर सावधानीके साथ परमार्थ-साधनमे लग जाते हैं ॥ २ ॥ येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाँश्च मैथुनान् । एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥ येन = जिसके अनुग्रहसे मनुष्य, शब्दान् = शब्दोको, स्पर्शान् = स्पर्शोंको, रूपम् = रूप-समुदायको, रसम् = रस- समुदायको, गन्धम् = गन्ध-समुदायको, च = और, मैथुनान् = स्त्री-प्रसङ्ग आदिके सुखोको, विजानाति = अनुभव करता है (और); एतेन एव = इसीके अनुग्रहसे यह भी जानता है कि, अत्र किम् = यहाँ क्या, परिशिष्यते = शेष रह जाता है, एतत् वै = यह ही है, तत् = वह परमात्मा (जिसके विषयमें तुमने पूछा था) । ॥ ३ ॥ व्याख्या-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धात्मक सब प्रकारके विषयों का और स्त्री-सहवासादिसे होनेवाले सुखों का मनुष्य जिस परम देवसे मिली हुई ज्ञानशक्तिके द्वारा अनुभव करता है, उन्हींकी दी हुई शक्तिसे इनकी क्षणभङ्गुरताको देखकर वह यह भी समझ सकता है कि इन सबमेंसे ऐसी कौन वस्तु है, जो यहाँ शेष रहेगी ? विचार करनेपर यही समझमे आता है कि ये सभी पदार्थ प्रतिक्षण बदलनेवाले होनेसे विनाशीील हैं। इन सबके परम कारण एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही नित्य हैं। वे पहले भी थे और पीछे भी रहेंगे । अतः हे नचिकेता ! तुम्हारा पूछा हुआ वह ब्रह्मतत्त्व यही है जो सबका शेपी है, सबका पर्यवसान है, सबकी अवधि और सबकी परम गति है ॥ ३ ॥ स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ स्वप्नान्तम् च = स्वप्नके दृश्यों और, जागरितान्तम् = जाग्रत्-अवस्थाके दृश्यों; उभौ = इन दोनोको (मनुष्य); येन = जिससे; अनुपश्यति = बार-बार देखता है, [ तम् = उस, ] महान्तम् = सर्वश्रेष्ट; विभुम् = सर्वव्यापी, आत्मानम् = सबके आत्माको, मत्वा = जानकर; धीरः = बुद्धिमान् मनुष्य; न शोचति = शोक नहीं करता ॥ ४ ॥ व्याख्या-जिस परमात्माके द्वारा यह जीवात्मा स्वप्नमें और जाग्रतमें होनेवाली समस्त घटनाओका बारम्बार अनुभव करता रहता है, इन सबको जाननेकी शक्ति इसको जिस परब्रह्म परमेश्वरसे मिली है, जिसकी कृपासे ही इस जीवको उस (परमात्मा) की विज्ञानशक्तिका एक अश प्राप्त हुआ है, उस सबकी अपेक्षा महान् सदा-सर्वदा सर्वत्र व्याप्त परब्रह्म परमात्माको जानकर धीर पुरुष कभी, किसी भी कारणसे, किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता * ॥ ४ ॥

  • कुछ आदरणीय महानुभावोंने इस मन्त्रका निम्नलिखित भावार्थ माना है- १-जिस आत्माके द्वारा स्वप्न तथा जाग्रत् अवस्थाके अन्तर्गत दीखनेवाले पदार्थोंको मनुष्य देखता है, उस महान् और विभु आत्माको जानकर अर्थात् वह 'परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा आत्मभावसे साक्षात् अनुभव कर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता । २-निद्राके अन्त और ज्ञानदवस्थाके अन्तमें अर्थात् नींदसे जागनेपर और सोनेते पहले जो उस महान् सर्वव्यापी परमात्मामें मन लगाकर उसीको देखता है-उसीकी स्तुति-उपासना कर अपना सारा दायित्व उसीपर छोड़ उसीके अनन्य आश्रित हो रहता है, उस बुद्धिमान् पुरुषको कोई शोक नहीं होता ।

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  • कठोपनिषद् * २१७ य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५ ॥ यः=जो मनुष्य; मध्वदम्=कर्मफलदाता, जीवम्*=सबको जीवन प्रदान करनेवाले; (तथा) भूतभव्यस्य=भूत, वर्तमान और भविष्यका, ईशानम्=शासन करनेवाले, इमम्=इस, आत्मानम्=परमात्माको, अन्तिकात् वेद=(अपने) समीप जानता है, ततः(=उसके बाद वह, न विजुगुप्सते=(कभी) किसीकी निन्दा नहीं करता; एतत् वै=यह ही (है); तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमे तुमने पूछा था) ॥ ५ ॥ व्याख्या—जो साधक सबको जीवन प्रदान करनेवाले, जीवोंके परम जीवन और उन्हे उनके कर्मोंका फल भुगतानेवाले तथा भूत, वर्तमान और भावी जगत्‌का एकमात्र शासन करनेवाले उस परब्रह्म परमेश्वरको इस प्रकार समझ लेता है कि 'वह अन्तर्यामीरूपसे निरन्तर मेरे समीप—मेरे हृदयमें ही स्थित है,' और इससे स्वाभाविक ही यह अनुमान कर लेता है कि इसी प्रकार वे सर्वनियन्ता परमात्मा सबके हृदयमे स्थित है, वह फिर उनके इस महिमामय स्वरूपको कभी नहीं भूल सकता । इसलिये वह कभी किसीकी निन्दा नही करता या किसीसे भी घृणा नहीं करता । नचिकेता ! तुमने जिस ब्रह्मके विषयमें पूछा था, वह यही है, जिसका मैंने ऊपर वर्णन किया है † ॥ ५ ॥ सम्बन्ध—अब यह बतलाते हैं कि ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणी उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही उत्पन्न हुए हैं, अतः जो कुछ भी है, सब उन्हींका रूपविशेष है । उनसे भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है, क्योंकि इस सम्पूर्ण जगत्‌के अभिन्ननिमित्तोपादान कारण एकमात्र परमेश्वर ही हैं, वे एक ही अनेक रूपोंमें स्थित हैं । यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत् ।। एतद्वै तत् ॥ ६ ॥ यः=जो, अद्‌भ्यः=जलसे, पूर्वम्=पहले; अजायत=हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था, [तम्=उस,] पूर्वम्=सबसे पहले, तपसः जातम्=तपसे उत्पन्न, गुहाम् प्रविश्य=हृदय-गुफामें प्रवेश करके, भूतेभिः (सह)=जीवात्माओंके साथ, तिष्ठन्तम्=स्थित रहनेवाले परमेश्वरको, यः=जो पुरुष, व्यपश्यत्=देखता है (वही ठीक देखता है), एतत् वै=यह ही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ६॥ व्याख्या—जो जलसे उपलक्षित पाँचों महाभूतोंसे पहले हिरण्यगर्भ ब्रह्माके रूपमें प्रकट हुए थे, उन अपने ही सङ्कल्परूप तपसे प्रकट होनेवाले और सब जीवोंके हृदयरूप गुफामें प्रविष्ट होकर उनके साथ रहनेवाले परमेश्वरको जो इस प्रकार जानता है कि 'सबके हृदयमें निवास करनेवाले सबके अन्तर्यामी परमेश्वर एक ही हैं, यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींकी महिमाका प्रकाश करता है,' वही यथार्थ जानता है । वे सदा सबके हृदयमें रहनेवाले ही ये तुम्हारे पूछे हुए परब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ ६ ॥ सम्बन्ध—उन्हीं परब्रह्मका अब अदितिदेवीके रूपसे वर्णन करते हैं— या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत ॥ एतद्वै तत् ॥ ७॥ ────────────────────────────────────────────────────────────────
  • यहाँ 'जीव' शब्द परमात्माके लिये ही प्रयुक्त हुआ है, क्योकि भूत, भविष्य और वर्तमानका शासक जीव नहीं हो सकता । और प्रकरण भी यहाँ परमात्माका है, जीवका नहीं (देखिये ब्रह्मसूत्र १ । ३ । २४ का शाङ्करभाष्य) । † कुछ विद्वानोंने इसका यह अर्थ किया है— १—जो पुरुष कर्मफलभोक्ता और प्राणधारक इस जीवात्माको अपने समीप भूत और भविष्यका (त्रिकालका) ईश्वर समझता है, वह फिर किसी भयसे अपनेको छिपाकर नहीं रखता । (एक ब्रह्मसत्ताका ज्ञान होनेपर फिर कोई भय नहीं रहता, क्योंकि दूसरेकी सत्ता माननेसे ही भय होता है ।) २—जो मनुष्य मधु अर्थात् आनन्दके उपभोक्ता, भूत और भविष्यके शासक, जीवके नित्य समीप रहनेवाले, जीवके जीवन परमात्माको जान लेता है, वह फिर किसीसे भय नहीं करता । उ० अं० २८—

२१८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * या=जो; देवतामयी=देवतामयी; अदितिः=अदिति; प्राणेन=प्राणोंके सहित; संभवति=उत्पन्न होती है; या=जो; भूतेभिः=प्राणियोंके सहित; व्यजायत=उत्पन्न हुई है, (तथा जो) गुहाम्=हृदयरूपी गुफामें; प्रविश्य=प्रवेश करके; तिष्ठन्तीम्=वहीं रहती है, (उसे जो पुरुष देखता है, वही यथार्थ देखता है, ) एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ७ ॥ व्याख्या—जो सर्वदेवतामयी भगवती अदितिदेवी पहले पहल उस परब्रह्मके सङ्कल्पसे सब जगत्की जीवनी-शक्तिके सहित उत्पन्न होती है, तथा जो सम्पूर्ण प्राणियोंको बीजरूपसे अपने साथ लेकर प्रकट हुई थी, हृदयरूपी गुहामें प्रविष्ट होकर वहीं रहनेवाली वह भगवती—भगवान्की अचिन्त्यमहाशक्ति भगवान्से सर्वथा अभिन्न है, भगवान् और उनकी शक्तिमें कोई भेद नहीं है, भगवान् ही शक्तिरूपसे सबके हृदयमें प्रवेश किये हुए हैं। हे नचिकेता ! यही ये ब्रह्म हैं, जिनके विषयमें तुमने पूछा था। अथवा—जननीरूपमें समस्त देवताओंका सृजन करनेवाली होनेके कारण जो सर्वदेवतामयी हैं, शब्दादि समस्त भोगसमूहका अदन-भक्षण करनेवाली होनेसे भी जिनका नाम अदिति है, जो हिरण्यगर्भरूप प्राणोंके सहित प्रकट होती हैं और समस्त भूतप्राणियोंके साथ ही जिनका प्रादुर्भाव होता है तथा जो सम्पूर्ण भूतप्राणियोंकी हृदय-गुफामें प्रविष्ट होकर वहाँ स्थित रहती हैं, वे परमेश्वरकी महाशक्ति वस्तुतः उनकी प्रतीक ही हैं। स्वय परमेश्वर ही इस रूपमें अपनेको प्रकट करते हैं। यही वह ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमें नचिकेता ! तुमने पूछा था ॥ ७ ॥ अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः । दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः ॥ एतद्वै तत् ॥ ८॥ (यः)=जो; जातवेदाः=सर्वज्ञ; अग्निः=अग्निदेवता; गर्भिणीभिः=गर्भिणी स्त्रियोंद्वारा; सुभृतः=उपयुक्त अन्नपानादिके द्वारा भलीभाँति परिपुष्ट हुआ; गर्भः=गर्भकी; इव=भाँति; अरण्योः=दो अरणियोंमें; निहितः=सुरक्षित है—छिपा है (तथा जो); जागृवद्भिः=सावधान (और), हविष्मद्भिः=हवन करनेयोग्य सामग्रियोंसे (युक्त); मनुष्येभिः=मनुष्योंद्वारा; दिवे दिवे=प्रतिदिन; ईड्यः=स्तुति करनेयोग्य (है); एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥८॥ व्याख्या—जिस प्रकार गर्भिणी स्त्रीके द्वारा शुद्ध अन्न-पानादिसे परिपुष्ट होकर बालक गर्भमें छिपा रहता है और श्रद्धा, प्रीति एव प्रसवकालीन क्लेशरूप मन्थनके द्वारा समयपर प्रकट होता है, उसी प्रकार अधर और उत्तर अरणि (ऊपर-नीचेके काष्ठखण्ड) के अंदर अग्नि देवता छिपे हुए रहते हैं एवं इनके उपासक प्रमादरहित होकर एकाग्रता, श्रद्धा तथा प्रीतिके साथ स्तुति करते हुए अरणि-मन्थनके द्वारा इन्हें प्रकट करते हैं। तदनन्तर आज्यादि विविध हवनसामग्रियोंके द्वारा इन्हें सन्तुष्ट करते हैं। ये अग्निदेवता सर्वज्ञ परमेश्वरके ही प्रतीक हैं। नचिकेता ! ये ही वे तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं ॥८॥ यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति । तं देवाः सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन ॥ एतद्वै तत् ॥ ९॥ यतः=जहाँसे; सूर्यः=सूर्यदेव; उदेति=उदय होते हैं; च=और; यत्र=जहाँ; अस्तम् च=अस्तभावको भी; गच्छति=प्राप्त होते हैं; सर्वे=सभी; देवाः=देवता; तम्=उसीमें; अर्पिताः=समर्पित हैं। तत् उ=उस परमेश्वरको; कश्चन=कोई (कभी भी); न अत्येति=नहीं लाँघ सकता; एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ९॥ व्याख्या—जिन परमेश्वरसे सूर्यदेव प्रकट होते हैं और जिनमें जाकर विलीन हो जाते हैं, जिनकी महिमामें ही यह सूर्यदेवताकी उदय-अस्तलीला नियमपूर्वक चलती है, उन परब्रह्ममें ही सम्पूर्ण देवता प्रविष्ट हैं—सब उन्हींमें ठहरे हुए हैं। ऐसा कोई भी नहीं है, जो उन सर्वात्मक, सर्वमय, सबके आदि-अन्त-आश्रयस्थल परमेश्वरकी महिमा और व्यवस्थाका उल्लङ्घन कर सके। सर्वतोभावसे सभी सर्वदा उनके अधीन और उन्हींके अनुशासनमें रहते हैं। कोई भी उनकी महिमाका पार नहीं पा सकता। वे सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं ॥ ९ ॥

  • कठोपनिषद् * २१९ यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥१०॥ यत् इह=जो परब्रह्म यहाँ (है); तत् एव अमुत्र=वही वहाँ (परलोकमें भी है); यत् अमुत्र=जो वहाँ (है); तत् अनु इह=वही यहाँ ( इस लोकमें) भी है; सः मृत्योः=वह मनुष्य मृत्युसे; मृत्युम्=मृत्युको (अर्थात् बारंबार जन्म-मरणको); आप्नोति=प्राप्त होता है; यः=जो, इह=इस जगत्में; नाना इव=(उस परमात्माको) अनेककी भाँति, पश्यति=देखता है ॥१०॥ व्याख्या - जो सर्वशक्तिमान्, सर्वान्तर्यामी, सर्वरूप, सबके परम कारण, परब्रह्म पुरुषोत्तम यहाँ इस पृथ्वीलोकमे हैं, वही वहाँ परलोकमें अर्थात् देव-गन्धर्वादि विभिन्न अनन्त लोकोंमे भी हैं; तथा जो वहाँ हैं, वही यहाँ भी हैं। एक ही परमात्मा अखिल ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं। जो उन एक ही परब्रह्मको लीलासे नाना नामों और रूपोंमें प्रकाशित देखकर मोहवश उनमें नानात्वकी कल्पना करता है, उसे पुनः-पुनः मृत्युके अधीन होना पड़ता है, उसके जन्म-मरणका चक्र सहज ही नहीं छूटता । अतः दृढरूपसे यही समझना चाहिये कि वे एक ही परब्रह्म परमेश्वर अपनी अचिन्त्य शक्तिके सहित नाना रूपोंमें प्रकट हैं और यह सारा जगत् बाहर-भीतर उन एक परमात्मासे ही व्याप्त होनेके कारण उन्हींका स्वरूप है ॥ १० ॥ मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥११॥ एव=(शुद्ध) मनसे ही; इदम् आप्तव्यम्=यह परमात्मतत्त्व प्राप्त किये जानेयोग्य है; इह=इस जगत्में (एक परमात्मासे अतिरिक्त); नाना=नाना (भिन्न-भिन्न भाव), किंचन=कुछ भी, न अस्ति=नहीं है, (इसलिये) यः इह= जो इस जगत्में; नाना इव=नानाकी भाँति, पश्यति=देखता है; सः=वह मनुष्य, मृत्योः=मृत्युसे, मृत्युम् गच्छति=मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥ ११ ॥ व्याख्या - परमात्माका परमतत्त्व शुद्ध मनसे ही इस प्रकार जाना जा सकता है कि इस जगत्में एकमात्र पूर्णब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। सब कुछ उन्हींका स्वरूप है। यहाँ परमात्मासे भिन्न कुछ भी नहीं है। जो यहाँ विभिन्नताकी झलक देखता है, वह मनुष्य मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥ ११ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ एतद्वैतत् ॥१२॥ अङ्गुष्ठमात्रः=अङ्गुष्ठमात्र (परिमाणवाला); पुरुषः=परम पुरुष (परमात्मा), आत्मनि मध्ये=शरीरके मध्यभाग- हृदयाकाशमें; तिष्ठति=स्थित है; भूतभव्यस्य=जो कि भूत, (वर्तमान) और भविष्यका; ईशानः=शासन करनेवाला (है); ततः=उसे जान लेनेके बाद (वह); न विजुगुप्सते=किसीकी भी निन्दा नहीं करता, एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १२ ॥
  • यद्यपि अन्तर्यामी परमेश्वर समानभावसे सर्वदा सर्वत्र परिपूर्ण हैं, तथापि हृदयमें उनका विशेष स्थान माना गया है। परमेश्वर किसी स्थूल-सूक्ष्म आकार-विशेषवाले नहीं हैं, परंतु स्थितिके अनुसार वे सभी आकारोंसे सम्पन्न हैं। क्षुद्र चींटीके हृदयदेशमें वे चींटीके हृदय-परिमाणके अनुसार परिमाणवाले हैं और विशालकाय हाथीके हृदयमें उसके हृदय- परिमाणवाले बनकर विराजित हैं। मनुष्यका हृदय अङ्गुष्ठ-परिमाणका है, और मानवशरीर ही परमात्माकी प्राप्तिका अधिकारी माना गया है। अतः मनुष्यका हृदय ही परब्रह्म परमेश्वरकी उपलब्धिका स्थान समझा जाता है। इसलिये यहाँ मनुष्यके हृदय- परिमाणके अनुसार परमेश्वरको अङ्गुष्ठमात्रपरिमाणका कहा गया है। इस प्रकार परमेश्वरको अपने हृदयमें स्थित देखनेवाला स्वाभाविक ही यह जानता है कि इसी भाँति वे सबके हृदयमें स्थित हैं, अतएव वह फिर किसीकी निन्दा नहीं करता अथवा किसीसे घृणा नहीं करता। नचिकेता ! यही वह ब्रह्म हैं, जिनके विषयमें तुमने पूछा था ॥ १२ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥ एतद्वै तत् ॥१३॥

२२० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अङ्गुष्ठमात्रः=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; पुरुषः=परमपुरूष परमात्मा; अधूमकः=धूमरहित, ज्योतिः इव=ज्योतिकी भाँति है; भूतभव्यस्य=भूत, (वर्तमान और) भविष्यपर; ईशानः=शासन करनेवाला; सः एव अद्य=वह परमात्मा ही आज है; उ=और; सः (एव) श्वः=वही कल भी है (अर्थात् वह नित्य, सनातन है), एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १३ ॥ व्याख्या—मनुष्यकी हृदय-गुफामें स्थित ये अङ्गुष्ठमात्र पुरुष भूत, भविष्य और वर्तमानका नियन्त्रण करनेवाले स्वतन्त्र शासक हैं। ये ज्योतिर्मय हैं। सूर्य, अग्निकी भाँति उष्ण प्रकाशवाले नहीं; परंतु दिव्य, निर्मल और शान्त प्रकाशस्वरूप हैं। लौकिक ज्योतियोंमें धूमरूप दोष होता है; ये धूमरहित—दोषरहित, सर्वथा विशुद्ध हैं। अन्य ज्योतियाँ घटती-बढ़ती हैं और समयपर बुझ जाती हैं, परंतु ये जैसे आज हैं, वैसे ही कल भी हैं। इनकी एकरसता नित्य अक्षुण्ण है। ये कभी न तो घटते-बढ़ते हैं और न कभी मिटते ही हैं। नचिकेता! ये परिवर्तनरहित अविनाशी परमेश्वर ही वे ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमे तुमने पूछा था* ॥ १३ ॥ यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान् पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥१४॥ यथा=जिस प्रकार, दुर्गे=ऊँचे शिखरपर, वृष्टम्=बरसा हुआ; उदकम्=जल; पर्वतेषु=पहाड़के नाना स्थलोंमें; विधावति=चारों ओर चला जाता है; एवम्=उसी प्रकार; धर्मान्=भिन्न-भिन्न धर्मों (स्वभावों) से युक्त देव, असुर, मनुष्य आदिको, पृथक्=परमात्मासे पृथक्, पश्यन्=देखकर (उनका सेवन करनेवाला मनुष्य); तान् एव=उन्हींके; अनु- विधावति=पीछे दौड़ता रहता है (उन्हींके शुभाशुभ लोकोंमे और नाना उच्च-नीच योनियोंमें भटकता रहता है) ॥ १४॥ व्याख्या—वर्षाका जल एक ही है; पर वह जब ऊँचे पर्वतकी ऊबड़-खाबड़ चोटीपर बरसता है तो वहाँ ठहरता नहीं, तुरत ही नीचेकी ओर बहकर विभिन्न वर्ण, आकार और गन्धको धारण करके पर्वतमें चारों ओर बिखर जाता है। इसी प्रकार एक ही परमात्मासे प्रवृत्त विभिन्न स्वभाववाले देव असुर मनुष्यादिको जो परमात्मासे पृथक् मानता है और पृथक् मानकर ही उनका सेवन करता है, उसे भी बिखरे हुए जलकी भाँति ही विभिन्न देव-असुरादिके लोकोंमें एव नाना प्रकारकी योनियों- में भटकना पड़ता है, वह ब्रह्मको प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १४॥ यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥१५॥ यथा=(परंतु) जिस प्रकार; शुद्धे (उदके)=निर्मल जलमें; आसिक्तम्=(मेघोंद्वारा) सब ओरसे बरसाया हुआ; शुद्धम्=निर्मल, उदकम्=जल; तादृक् एव=वैसा ही, भवति=हो जाता है; एवम्=उसी प्रकार; गौतम=हे गौतमवंशी नचिकेता; विजानतः=(एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है, इस प्रकार) जाननेवाले; मुनेः=मुनिका (अर्थात् संसारसे उपरत हुए महापुरुषका), आत्मा=आत्मा, भवति=(ब्रह्मको प्राप्त) हो जाता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—परंतु वही वर्षाका निर्मल जल यदि निर्मल जलमें ही बरसता है तो वह उसी क्षण निर्मल जल ही हो जाता है। उसमें न तो कोई विकार उत्पन्न होता है और न वह कहीं बिखरता ही है। इसी प्रकार, हे गौतमवंशीय नचिकेता! जो इस बातको भलीभाँति जान गया है कि जो कुछ है, वह सब परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है, उस मननशील—संसारके बाहरी स्वरूपसे उपरत पुरुषका आत्मा परब्रह्ममें मिलकर उसके साथ तादात्म्यभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥ (४) ❖

  • यहाँ 'अङ्गुष्ठमात्र' शब्द परमात्माका वाचक है, जीवका नहीं। प्रात स्मरणीय आचार्यने स्पष्ट शब्दोंमें कहा है— "परमात्मैवायमङ्गुष्ठमात्रपरिमित पुरुषो भवितुमर्हति । कस्मात् ? शब्दात्—'ईशानो भूतभव्यस्य' इति । न ह्यन्य परमेश्वराद् भूतभव्यस्य निरङ्कुश- मीशिता।" अर्थात् यहाँ अङ्गुष्ठमात्र-परिमाण पुरुष परमात्मा ही है। कैसे जाना ? 'ईशानो' आदि श्रुतिसे। भूत और भव्यका निरङ्कुश नियन्ता परमेश्वरके सिवा दूसरा नहीं हो सकता। (देखिये ब्रह्मसूत्र १। ३। २४ का शाङ्करभाष्य)
  • कठोपनिषद् * २२१ द्वितीय वल्ली पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ १ ॥ अवक्रचेतसः = सरल, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, अजस्य = अजन्मा परमेश्वरका; एकादशद्वारम् = ग्यारह द्वारोंवाला (मनुष्य- शरीररूप), पुरम् = पुर (नगर), (अस्ति) = है (इसके रहते हुए ही), अनुष्ठाय = (परमेश्वरका ध्यान आदि) साधन करके; न शोचति = (मनुष्य) कभी शोक नहीं करता; च = अपि तु, विमुक्तः = जीवन्मुक्त होकर; विमुच्यते = (मरनेके बाद) विदेहमुक्त हो जाता है; एतत् वै = यही है; तत् = वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १ ॥ व्याख्या—यह मनुष्य-शरीररूपी पुर दो आँख, दो कान, दो नासिकाके छिद्र, एक मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और शिश्न—इन ग्यारह द्वारोंवाला है। यह सर्वव्यापी, अविनाशी, अजन्मा, नित्य निर्विकार, एकरस, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमेश्वरकी नगरी है। वे सर्वत्र समभावसे सदा परिपूर्ण रहते हुए भी अपनी राजधानीरूप इस मनुष्यशरीरके हृदय-प्रासादमें राजाकी भाँति विशेषरूपसे विराजित रहते हैं। इस रहस्यको समझकर मनुष्यशरीरके रहते हुए ही—जीते-जी जो मनुष्य भजन- स्मरणादि साधन करता है, नगरके महान् स्वामी परमेश्वरका निरन्तर चिन्तन और ध्यान करता है, वह कभी शोक नहीं करता; वह शोकके कारणरूप संसार-बन्धनसे छूटकर जीवन्मुक्त हो जाता है और शरीर छूटनेके पश्चात् विदेहमुक्त हो जाता है— परमात्माका साक्षात्कार करके जन्म मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। यह जो सर्वव्यापक ब्रह्म है, यही वह हैं, जिनके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ १ ॥ सम्बन्ध—अब उस परमेश्वरकी सर्वरूपताका स्पष्टीकरण करते हैं— हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसद्दतसद्वयोमसद्बब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ शुचिपत् = जो विशुद्ध परमधाममें रहनेवाला; हंसः = स्वयंप्रकाश पुरुषोत्तम है (वही); अन्तरिक्षसत् = अन्तरिक्षमें निवास करनेवाला; वसुः = वसु है, दुरोणसत् = घरोंमें उपस्थित होनेवाला; अतिथिः = अतिथि है (और), वेदिषत् होता = यज्ञकी वेदीपर स्थापित अग्निरूप तथा उसमें आहुति डालनेवाला 'होता' है (तथा); नृषत् = समस्त मनुष्योंमें रहनेवाला, वरसत् = मनुष्योंसे श्रेष्ठ देवताओंमें रहनेवाला, ऋतसत् = सत्यमें रहनेवाला और; व्योमसत् = आकाशमें रहने- वाला (है तथा); अब्जाः = जलोंमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला, गोजाः = पृथिवीमें नानारूपोंसे प्रकट होनेवाला, := सत्कर्मोंमें प्रकट होनेवाला (और); अद्रिजाः = पर्वतोंमें नानारूपसे प्रकट होनेवाला (है), बृहत् ऋतम् = सबसे बड़ा परम सत्य है ॥ २ ॥ व्याख्या—जो प्राकृतिक गुणोंसे सर्वथा अतीत दिव्य विशुद्ध परमधाममें विराजित स्वयंप्रकाश परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं, वही अन्तरिक्षमें विचरनेवाले वसु नामक देवता हैं, वही अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरोंमें उपस्थित होते हैं, वही यज्ञकी वेदीपर प्रतिष्ठित ज्योतिर्मय अग्नि तथा उसमें आहुति प्रदान करनेवाले होते हैं, वही समस्त मनुष्योंके रूपमें स्थित हैं, मनुष्योंकी अपेक्षा श्रेष्ठ देवता और पितृ आदि रूपमें स्थित, आकाशमें स्थित और सत्यमें प्रतिष्ठित हैं, वही जलोंमे मत्स्य, शङ्ख, शुक्ति आदिके रूपमें प्रकट होते हैं, पृथिवीमे वृक्ष, अङ्कुर, अन्न, ओषधि आदिके रूपमें, यज्ञादि सत्कर्मोंमें नाना प्रकारके यज्ञफलादिके रूपमें और पर्वतोंमें नद-नदी आदिके रूपमे प्रकट होते हैं। वे सभी दृष्टियोंसे सभीकी अपेक्षा श्रेष्ठ, महान् और परम सत्य तत्त्व हैं* ॥२॥
  • कुछ आदरणीय महानुभावोंने इस मन्त्रके ये अर्थ किये हैं— १—जो सर्वथा दोषहीन सर्वरूप 'हंस' हैं (हं चासौ—दोषहीनश्चासौ, सश्च साररूपश्च इति इस ), विशुद्ध (वायु) में स्थित शुचिषद् हैं, अन्तरिक्षमें स्थित सर्वोपरि सुखरूप वसु (व=वर, सु+सुख, यस्य स वसु ) हैं, समस्त इन्द्रियोंके नियन्ता होता हैं, सबके द्वारा सम्मान्य वैद्य वेदिषत् हैं, घरोंमें अतिथि हैं या महान् ऐश्वर्यरूप (अति—महान्, थ—सम्पत्ति-ऐश्वर्य) हैं, सोमरूपसे कलशमें स्थित दुरोणसत् हैं, जो मनुष्योंमें हैं, उनसे श्रेष्ठ देवताओंमें हैं, वेदोंमें ऋत या सत्यरूप हैं, महान् प्रकृतिमें या श्रीमें हैं, जलसे उत्पन्न

२२० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अङ्गुष्ठमात्रः=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला, पुरुषः = परमपुरुष परमात्मा, अधूमकः = धूमरहित; ज्योतिः इव = ज्योतिकी भाँति है; भूतभव्यस्य = भूत, (वर्तमान और) भविष्यपर; ईशानः = शासन करनेवाला; सः एव अद्य = वह परमात्मा ही आज है; उ=और, सः (एव) श्वः = वही कल भी है (अर्थात् वह नित्य, सनातन है), एतत् वै = यही है; तत् = वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १३ ॥ व्याख्या—मनुष्यकी हृदय-गुफामें स्थित ये अङ्गुष्ठमात्र पुरुष भूत, भविष्य और वर्तमानका नियन्त्रण करनेवाले स्वतन्त्र शासक हैं। ये ज्योतिर्मय है। सूर्य, अग्निकी भाँति उष्ण प्रकाशवाले नहीं, परंतु दिव्य, निर्मल और शान्त प्रकाशस्वरूप हैं। लौकिक ज्योतियोंमें धूम्ररूप दोष होता है, ये धूम्ररहित—दोषरहित, सर्वथा विशुद्ध है। अन्य ज्योतियाँ घटती-बढती हैं और समयपर बुझ जाती हैं, परंतु ये जैसे आज हैं, वैसे ही कल भी हैं। इनकी एकरसता नित्य अक्षुण्ण है। ये कभी न तो घटते-बढते हैं और न कभी मिटते ही हैं। नचिकेता ! ये परिवर्तनरहित अविनाशी परमेश्वर ही वे ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमें तुमने पूछा था* ॥ १३ ॥ यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान् पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥१४॥ यथा = जिस प्रकार, दुर्गे = ऊँचे शिखरपर; वृष्टम् = बरसा हुआ; उदकम् = जल; पर्वतेषु = पहाड़के नाना स्थलोंमें; विधावति = चारों ओर चला जाता है, एवम् = उसी प्रकार; धर्मान् = भिन्न-भिन्न धर्मों (स्वभावों) से युक्त देव, असुर, मनुष्य आदिको, पृथक् = परमात्मासे पृथक्, पश्यन् = देखकर (उनका सेवन करनेवाला मनुष्य); तान् एव = उन्हींके; अनु- विधावति = पीछे दौड़ता रहता है (उन्हींके शुभाशुभ लोकोंमें और नाना उच्च-नीच योनियोंमें भटकता रहता है) ॥ १४॥ व्याख्या—वर्षाका जल एक ही है; पर वह जब ऊँचे पर्वतकी ऊबड़-खाबड़ चोटीपर बरसता है तो वहाँ ठहरता नहीं, तुरत ही नीचेकी ओर बहकर विभिन्न वर्ण, आकार और गन्धको धारण करकेपर्वतमें चारों ओर बिखर जाता है। इसी प्रकार एक ही परमात्मासे प्रवृत्त विभिन्न स्वभाववाले देव असुर मनुष्यादिको जो परमात्मासे पृथक् मानता है और पृथक् मानकर ही उनका सेवन करता है, उसे भी बिखरे हुए जलकी भाँति ही विभिन्न देव-असुरादिके लोकोंमें एव नाना प्रकारकी योनियों- में भटकना पड़ता है, वह ब्रह्मको प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १४ ॥ यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥१५॥ यथा = (परंतु) जिस प्रकार, शुद्धे (उदके) = निर्मल जलमें, आसिक्तम् = (मेघोंद्वारा) सब ओरसे बरसाया हुआ, शुद्धम् = निर्मल; उदकम् = जल; तादृक् एव = वैसा ही; भवति = हो जाता है, एवम् = उसी प्रकार, गौतम = हे गौतमवंशी नचिकेता, विजानतः = (एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है, इस प्रकार) जाननेवाले, मुनेः = मुनिका (अर्थात् संसारसे उपरत हुए महापुरुषका), आत्मा = आत्मा, भवति = (ब्रह्मको प्राप्त) हो जाता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—परंतु वही वर्षाका निर्मल जल यदि निर्मल जलमें ही बरसता है तो वह उसी क्षण निर्मल जल ही हो जाता है। उसमें न तो कोई विकार उत्पन्न होता है और न वह कहीं बिखरता ही है। इसी प्रकार, हे गौतमवंशीय नचिकेता ! जो इस बातको भलीभाँति जान गया है कि जो कुछ है, वह सब परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है, उस मननशील—संसारके बाहरी स्वरूपसे उपरत पुरुषका आत्मा परब्रह्ममें मिलकर उसके साथ तादात्म्यभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥ (४) ❖

  • यहाँ 'अङ्गुष्ठमात्र' शब्द परमात्माका वाचक है, जीवका नहीं। प्रात स्मरणीय आचार्यने स्पष्ट शब्दोंमें कहा है— "परमात्मैवायमङ्गुष्ठमात्रपरिमित पुरुषो भवितुमर्हति । कस्मात् ? शब्दात्—'ईशानो भूतभव्यस्य' इति । न ह्यन्यः परमेश्वराद् भूतभव्यस्य निरङ्कुश- मीशिता।" अर्थात् यहाँ अङ्गुष्ठमात्र-परिमाण पुरुष परमात्मा ही है। कैसे जाना ? 'ईशानो' आदि श्रुतिसे। भूत और भव्यका निरङ्कुश नियन्ता परमेश्वरके सिवा दूसरा नहीं हो सकता । (देखिये ब्रह्मसूत्र १।३। २४ का शाङ्करभाष्य )

द्वितीय वल्ली

  • कठोपनिषद् * २२१ द्वितीय वल्ली पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ १ ॥ अवक्रचेतसः =सरल, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, अजस्य =अजन्मा परमेश्वरका, एकादशद्वारम् =ग्यारह द्वारोंवाला (मनुष्य- शरीररूप ), पुरम् =पुर ( नगर ); (अस्ति )=है ( इसके रहते हुए ही ), अनुष्ठाय = ( परमेश्वरका ध्यान आदि ) साधन करके; न शोचति = ( मनुष्य ) कभी शोक नहीं करता, च =अपि तु, विमुक्तः =जीवन्मुक्त होकर; विमुच्यते = ( मरनेके बाद ) विदेहमुक्त हो जाता है; एतत् वै =यही है, तत् =वह ( परमात्मा, जिसके विषयमे तुमने पूछा था ) ॥ १ ॥ व्याख्या-यह मनुष्य-शरीररूपी पुर दो आँख, दो कान, दो नासिकाके छिद्र, एक मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और शिश्न-इन ग्यारह द्वारोंवाला है। यह सर्वव्यापी, अविनाशी, अजन्मा, नित्य निर्विकार, एकरस, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमेश्वरकी नगरी है। वे सर्वत्र समभावसे सदा परिपूर्ण रहते हुए भी अपनी राजधानीरूप इस मनुष्यशरीरके हृदय-प्रासादमें राजाकी भाँति विशेषरूपसे विराजित रहते हैं। इस रहस्यको समझकर मनुष्यशरीरके रहते हुए ही-जीते-जी जो मनुष्य भजन- स्मरणादि साधन करता है, नगरके महान् स्वामी परमेश्वरका निरन्तर चिन्तन और ध्यान करता है, वह कभी शोक नहीं करता; वह शोकके कारणरूप संसार-बन्धनसे छूटकर जीवन्मुक्त हो जाता है और शरीर छूटनेके पश्चात् विदेहमुक्त हो जाता है- परमात्माका साक्षात्कार करके जन्म मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। यह जो सर्वव्यापक ब्रह्म है, यही वह हैं, जिनके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ १ ॥ सम्बन्ध-अब उस परमेश्वरकी सर्वरूपताका स्पष्टीकरण करते हैं- हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिपदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ शुचिषत् =जो विशुद्ध परमधाममें रहनेवाला; हंसः =स्वयंप्रकाश पुरुषोत्तम है (वही ), अन्तरिक्षसत् =अन्तरिक्षमें निवास करनेवाला, वसुः =वसु है, दुरोणसत् =घरोंमें उपस्थित होनेवाला, अतिथिः =अतिथि है ( और ), वेदिषत् होता =यज्ञकी वेदीपर स्थापित अग्निरूप तथा उसमे आहुति डालनेवाला 'होता' है ( तथा ), नृषत् =समस्त मनुष्योंमें रहनेवाला, वरसत् =मनुष्योंसे श्रेष्ठ देवताओंमें रहनेवाला; ऋतसत् =सत्यमें रहनेवाला और, व्योमसत् =आकाशमें रहने- वाला (है तथा), अब्जाः =जलोंमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला, गोजाः =पृथिवीमें नानारूपोंसे प्रकट होनेवाला, ऋतजाः = सत्कर्मोंमें प्रकट होनेवाला (और); अद्रिजाः =पर्वतोंमे नानारूपसे प्रकट होनेवाला ( है ), बृहत् ऋतम् =सबसे बड़ा परम सत्य है ॥ २ ॥ व्याख्या-जो प्राकृतिक गुणोंसे सर्वथा अतीत दिव्य विशुद्ध परमधाममें विराजित स्वयंप्रकाश परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं, वही अन्तरिक्षमें विचरनेवाले वसु नामक देवता हैं, वही अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरोंमें उपस्थित होते हैं, वही यज्ञकी वेदीपर प्रतिष्ठित ज्योतिर्मय अग्नि तथा उसमे आहुति प्रदान करनेवाले होते हैं, वही समस्त मनुष्योंके रूपमे स्थित हैं, मनुष्योंकी अपेक्षा श्रेष्ठ देवता और पितृ आदि रूपमें स्थित, आकाशमें स्थित और सत्यमें प्रतिष्ठित हैं, वही जलोंमें मत्स्य, शङ्ख, शुक्ति आदिके रूपमें प्रकट होते हैं, पृथिवीमें वृक्ष, अङ्कुर, अन्न, ओषधि आदिके रूपमें, यज्ञादि सत्कर्मोंमें नाना प्रकारके यज्ञफलादिके रूपमें और पर्वतोंमें नद-नदी आदिके रूपमें प्रकट होते हैं। वे सभी दृष्टियोंसे सभीकी अपेक्षा श्रेष्ठ, महान् और परम सत्य तत्त्व हैं* ॥२॥
  • कुछ आदरणीय महानुभावोंने इस मन्त्रके ये अर्थ किये हैं- १-जो सर्वथा दोषहीन सर्वसाररूप 'हंस' हैं ( ह चासौ-दोषहीनश्चासौ, सश्च साररूपश्च श्ति इस ), विशुद्ध (वायु) में स्थित शुचिषद् हैं, अन्तरिक्षमें स्थित सर्वोपरि सुखस्वरूप वसु ( व=वर, सु+सुख, यस्य स वसु ) हैं, समस्त इन्द्रियोंके नियन्ता होता हैं, सबके द्वारा सम्मान्य वेद्य वेदिषत् हैं, घरोंमें अतिथि हैं या महान् ऐश्वर्यरूप ( अति-महान्, थ-सम्पत्ति-ऐश्वर्य ) हैं, सोमरूपसे कलशमें स्थित दुरोणसत् हैं, जो मनुष्योंमें हैं, उनसे श्रेष्ठ देवताओंमें हैं, वेदोंमें ऋत या सत्यरूप हैं, महान् प्रकृतिमें या श्रीमें हैं, जलसे उत्पन्न

२२२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥ प्राणम् = (जो) प्राणको, ऊर्ध्वम् = ऊपरकी ओर, उन्नयति = उठाता है (और); अपानम् = अपानको, प्रत्यक् अस्यति = नीचे ढकेलता है, मध्ये = शरीरके मध्य (हृदय) में, आसीनम् = बैठे हुए (उस), वामनम् = सर्वश्रेष्ठ भजनेयोग्य परमात्माकी, विश्वे देवाः = सभी देवता, उपासते = उपासना करते हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या—शरीरमें नियमितरूपसे अनवरत प्राण-अपानादिकी क्रिया हो रही है; इन जड पदार्थोंमें जो क्रियाशीलता आ रही है, वह उन परमात्माकी शक्ति और प्रेरणासे ही आ रही है। वे ही मानव हृदयमें राजाकी भाँति विराजित रहकर प्राणको ऊपरकी ओर चढा रहे हैं और अपानको नीचेकी ओर ढकेल रहे हैं। इस प्रकार शरीरके अदर होनेवाले सारे व्यापारोंका सुचारूरूपसे सम्पादन कर रहे हैं। उन हृदयस्थित परम भजनीय परब्रह्म पुरुषोत्तमकी सभी देवता उपासना कर रहे हैं—शरीरस्थित प्राण मन बुद्धि-इन्द्रियादिके सभी अधिष्ठातृ-देवता उन परमेश्वरकी प्रसन्नताके लिये उन्हींकी प्रेरणाके अनुसार नित्य सावधानीके साथ समस्त कार्योंका यथाविधि सम्पादन करते रहते हैं ॥ ३ ॥ अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥ अस्य = इस, शरीरस्थस्य = शरीरमें स्थित, विस्रंसमानस्य = एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जानेवाले, देहिनः = जीवात्माके; देहात् = शरीरसे, विमुच्यमानस्य = निकल जानेपर, अत्र = यहाँ (इस शरीरसे), किम् परिशिष्यते = क्या शेष रहता है, एतत् वै = यही है, तत् = वह (परमात्मा, जिसके विषयमे तुमने पूछा था) ॥ ४ ॥ व्याख्या—यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमें गमन करनेके स्वभाववाला देही (जीवात्मा) जब इस वर्तमान शरीरसे निकलकर चला जाता है और उसके साथ ही जब इन्द्रिय, प्राण आदि भी चले जाते हैं, तब इस मृत शरीरमें क्या वच रहता है ? देखनेमें तो कुछ भी नहीं रहता, पर वह परब्रह्म परमेश्वर, जो सदा-सर्वदा समानभावसे सर्वत्र परिपूर्ण है, जो चेतन जीव तथा जड प्रकृति—सभीमें सदा व्याप्त है, वह रह जाता है। यही वह ब्रह्म है, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—अब निम्नाङ्कित दो मन्त्रोंमें यमराज नचिकेताके पूछे हुए तत्त्वका पुन दूसरे प्रकारसे वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं— न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ हन्त तं इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥ कश्चन = कोई भी, मर्त्यः = मरणधर्मा प्राणी, न प्राणेन = न तो प्राणसे (जीता है और), न अपानेन = न अपानसे (ही), जीवति = जीता है, तु = किंतु, यस्मिन् = जिसमें, एतौ उपाश्रितौ = (प्राण और अपान) ये दोनों आश्रय पाये हुए हैं, इतरेण = (ऐसे किसी) दूसरेसे ही, जीवन्ति = (सब) जीते हैं, गौतम = हे गौतमवंशीय, गुह्यम् सनातनम् = (वह) रहस्यमय मत्स्यादिमें हैं, पृथ्वीसे उत्पन्न वृक्ष-अन्नादिमें हैं, पर्वतोंसे उत्पन्न नदा आदिमें है, जो मुक्त पुरुषोंमें है (मुक्तोंको 'ऋता' कहते हैं, उनमें रहकर जो उनका नियन्त्रण करता है, वह ऋतजा है), और परम सत्य है तथा सब गुणोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। २—जो गमन करनेवाला है, आकाशमें चलनेवाला सूर्य है, आकाशमें व्याप्त वायु है, पृथ्वीमें रहनेवाला होता—अग्नि है, कलशमें स्थित सोम है, घरोंमें रहनेवाला ब्राह्मण अतिथि है, मनुष्योंमें गमन करनेवाला, देवताओंमें जानेवाला, यज्ञ या सत्यमें निवास करनेवाला, आकाशमें चलनेवाला, जलमें शङ्ख-सीपी आदि रूपोंमें उत्पन्न होनेवाला, पृथ्वीमें अन्नादिरूपसे उत्पन्न होनेवाला, यज्ञान्नरूपसे उत्पन्न होनेवाला, पर्वतोंसे नदी आदिके रूपमें उत्पन्न होनेवाला, सत्यस्वरूप और महान् है अर्थात् जगत्का एकमात्र सर्वव्यापक आत्मा है।

  • कठोपनिषद् * २२३ सनातनः ब्रह्म=ब्रह्म (जैसा है), च=और; आत्मा=जीवात्मा, मरणम् प्राप्य=मरकर, यथा=जिस प्रकारसे; भवति=रहता है; इदम् ते=यह बात तुम्हें; हन्त प्रवक्ष्यामि=मैं अब फिरसे बतलाऊँगा ॥ ५-६ ॥ व्याख्या—यमराज कहते हैं—नचिकेता ! एक दिन निश्चय ही मृत्युके मुखमें जानेवाले ये मनुष्यादि प्राणी न तो प्राणकी शक्तिसे जीवित रहते हैं और न अपानकी शक्तिसे ही। इन्हें जीवित रखनेवाला तो कोई दूसरा ही चेतन तत्त्व है और वह है जीवात्मा । ये प्राण-अपान दोनों उस जीवात्माके ही आश्रित हैं। जीवात्माके बिना एक क्षण भी ये नहीं रह सकते; जब जीवात्मा जाता है, तब केवल ये ही नहीं, इन्द्रींके साथ इन्द्रियादि सभी उसका अनुसरण करते हुए चले जाते हैं। अब मैं तुमको यह बतलाऊँगा कि मनुष्यके मरनेके बाद इस जीवात्माका क्या होता है, यह कहाँ जाता है, तथा किस प्रकार रहता है और साथ ही यह भी बतलाऊँगा कि उस परम रहस्यमय सर्वव्यापी सर्वाधार सर्वाधिपति परब्रह्म परमेश्वरका क्या स्वरूप है ॥ ५-६ ॥ योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७॥ यथाकर्म = जिसका जैसा कर्म होता है, यथाश्रुतम् = और शास्त्रादिके श्रवणद्वारा जिसको जैसा भाव प्राप्त हुआ है (उन्हींके अनुसार ), शरीरत्वाय=शरीर धारण करनेके लिये, अन्ये = कितने ही, देहिनः=जीवात्मा तो, योनिम्=( नाना प्रकारकी जङ्गम) योनियोंको, प्रपद्यन्ते = प्राप्त हो जाते हैं और; अन्ये=दूसरे (कितने ही), स्थाणुम् = स्थाणु (स्थावर) भावका; अनुसंयन्ति = अनुसरण करते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या—यमराज कहते हैं कि अपने-अपने शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार और शास्त्र, गुरु, सङ्ग, शिक्षा, व्यवसाय आदिके द्वारा देखे-सुने हुए भावोंसे निर्मित अन्त कालीन वासनाके अनुसार मरनेके पश्चात् कितने ही जीवात्मा तो दूसरा शरीर धारण करनेके लिये शुक्रके साथ माताकी योनिमें प्रवेश कर जाते हैं। इनमें जिनके पुण्य-पाप समान होते हैं, वे मनुष्यका, और जिनके पुण्य कम तथा पाप अधिक होते हैं, वे पशु पक्षीका शरीर धारण करके उत्पन्न होते हैं और कितने ही, जिनके पाप अत्यधिक होते हैं, वे स्थावरभावको प्राप्त होते हैं अर्थात् वृक्ष, लता, तृण, पर्वत आदि जड शरीरोंमें उत्पन्न होते हैं ॥७॥ सम्बन्ध—यमराजने जीवात्माकी गति और परमात्माका स्वरूप—इन दो बातोंको बतलानेकी प्रतिज्ञा की थी, इनमें 'मरनेके बाद जीवात्माकी क्या गति होती है, इसको बतलाकर अब वे दूसरी बात बतलाते हैं— य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ८॥ यः एषः=जो यह; कामम् कामम् = (जीवोंके कर्मानुसार) नाना प्रकारके भोगोंका, निर्मिमाणः = निर्माण करनेवाला; पुरुषः = परमपुरुष परमेश्वर; सुप्तेषु = (प्रलयकालमें सबके ) सो जानेपर भी, ^=जागता रहता है, तत् एव = वही; शुक्रम् = परम विशुद्ध तत्त्व है; तत् ब्रह्म = वही ब्रह्म है, तत् एव = वही; अमृतम्=अमृत; उच्यते = कहलाता है; (तथा) तस्मिन् =उसीमें, सर्वे = सम्पूर्ण, लोकाः श्रिताः = लोक आश्रय पाये हुए हैं, तत् कश्चन उ = उसे कोई भी; न अत्येति = अतिक्रमण नहीं कर सकता; एतत् वै =यही है; तत् = वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था ) ॥ ८ ॥ व्याख्या—जीवात्माओंके कर्मानुसार उनके लिये नाना प्रकारके भोगोंका निर्माण करनेवाला तथा उनकी यथायोग्य व्यवस्था करनेवाला जो यह परमपुरुष परमेश्वर समस्त जीवोंके सो जानेपर अर्थात् प्रलयकालमें सबका ज्ञान लुप्त हो जानेपर भी अपनी महिमामें नित्य जागता रहता है, जो स्वयं ज्ञानस्वरूप है, जिसका ज्ञान सदैव एकरस रहता है, कभी अधिक-न्यून या लुप्त नहीं होता, वही परम विशुद्ध दिव्य तत्त्व है, वही परब्रह्म है, उसीको ज्ञानी महापुरुषोंके द्वारा प्राप्य परम अमृतरूप परमानन्द कहा जाता है । ये सम्पूर्ण लोक उसीके आश्रित हैं। उसे कोई भी नहीं लाँघ सकता—कोई भी उसके नियमोंका अतिक्रमण नहीं कर सकता । सभी सदा-सर्वदा एकमात्र उसीके शासनमें रहनेवाले और उसीके अधीन हैं । कोई भी उसकी महिमाका पार नहीं पा सकता । यही है वह ब्रह्म-तत्त्व, जिसके विषयमें तुमने पूछा था ॥ ८ ॥

२२४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध—अब अग्निके दृष्टान्तसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी व्यापकता और निर्लेपताका वर्णन करते हैं— अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९॥ यथा=जिस प्रकार; भुवनम्=समस्त ब्रह्माण्डमे; प्रविष्टः=प्रविष्ट; एकः अग्निः=एक ही अग्नि; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उनके समान रूपवाला ही; बभूव=हो रहा है; तथा=वैसे (ही); सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा परब्रह्म; एकः (सन्) =एक होते हुए भी; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमे; प्रतिरूपः=उन्हींके-जैसे रूपवाला (हो रहा है); च बहिः=और उनके बाहर भी है ॥ ९॥ व्याख्या—एक ही अग्नि निराकाररूपसे सारे ब्रह्माण्डमे व्याप्त है, उसमे कोई भेद नहीं है; परंतु जब वह साकाररूपसे प्रज्वलित होता है, तब उन आधारभूत वस्तुओंका जैसा आकार होता है, वैसा ही आकार अग्निका भी दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी परमेश्वर एक हैं और सबमें समभावसे व्याप्त हैं, उनमे किसी प्रकारका कोई भेद नहीं है, तथापि वे भिन्न भिन्न प्राणियोंमे उन-उन प्राणियोंके अनुरूप नाना रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। भाव यह कि आधारभूत वस्तुके अनुरूप ही उनकी महिमाका प्राकट्य होता है। वास्तवमें उन परमेश्वरकी महत्ता इतनी ही नहीं है, इससे बहुत अधिक और विलक्षण है। उनकी अनन्त शक्तिके एक क्षुद्रतम अशसे ही यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नाना प्रकारकी आश्चर्य- मय शक्तियोंसे सम्पन्न हो रहा है ॥ ९॥ सम्बन्ध—वही बात वायुके दृष्टान्तसे कहते हैं— वायैर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥१०॥ यथा=जिस प्रकार; भुवनम्=समस्त ब्रह्माण्डमें; प्रविष्टः=प्रविष्ट; एकः वायुः=एक (ही) वायु; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उनके समान रूपवाला ही; बभूव=हो रहा है; तथा=वैसे (ही,) सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तरात्मा परब्रह्म; एकः (सन् अपि)=एक होते हुए भी; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमे; प्रतिरूपः=उन्हींके-जैसे रूपवाला (हो रहा है); बहिः च=और उनके बाहर भी है ॥ १०॥ व्याख्या—एक ही वायु अव्यक्तरूपसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमे व्याप्त है, तथापि व्यक्तमे भिन्न-भिन्न वस्तुओंके संयोगसे उन-उन वस्तुओके अनुरूप गति और शक्तिवाला दिखलायी देता है। उसी प्रकार समस्त प्राणियोका अन्तर्यामी परमेश्वर एक होते हुए भी उन-उन प्राणियोंके सम्बन्धसे पृथक् पृथक् शक्ति और गतिवाला दीखता है, किंतु वह उतना ही नहीं है, उन सबके बाहर भी अनन्त—असीम एव विलक्षण रूपसे स्थित है। (नवम मन्त्रकी व्याख्याके अनुसार इसे भी समझ लेना चाहिये)॥ १०॥ सम्बन्ध—इस मन्त्रमें सूर्यके दृष्टान्तसे परमात्माकी निर्लेपता दिखलाते हैं— सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥११॥ यथा=जिस प्रकार; सर्वलोकस्य=समस्त ब्रह्माण्डका; चक्षुः सूर्यः=प्रकाशक सूर्य देवता; चाक्षुषैः=लोगोंकी आँखों- से होनेवाले; बाह्यदोषैः=बाहरके दोषोंसे; न लिप्यते=लिप्त नहीं होता; तथा=उसी प्रकार; सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तरात्मा परमात्मा; एकः=एक है, (तो भी) लोकदुःखेन=लोगोंके दुःखोंसे; न लिप्यते=लिप्त नहीं होता; [यतः=क्योंकि;] बाह्यः=सबमे रहता हुआ भी वह सबसे अलग है ॥ ११॥ व्याख्या—एक ही सूर्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता है। उसका प्रकाश प्राणिमात्रकी आँखोंका सहायक है। उस प्रकाशकी ही सहायता लेकर लोग नाना प्रकारके गुणदोषमय कर्म करते हैं, परंतु सूर्य उनके नेत्रोंद्वारा किये

  • कठोपनिषद् * २२५ जानेवाले नाना प्रकारके बाह्य कर्मरूप दोषोंसे तनिक भी लिप्त नहीं होता । इसी प्रकार सबके अन्तर्यामी भगवान् परब्रह्म पुरुषोत्तम एक हैं, उन्हींकी शक्तिसे शक्तियुक्त होकर मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा मनुष्य नाना प्रकारके शुभाशुभ कर्म करते हैं तथा उनका फलरूप सुख-दुःखादि भोगते हैं। परंतु वे परमेश्वर उनके कर्म और दुःखोंसे लिप्त नहीं होते, क्योंकि वे सबमें रहते हुए भी सबसे पृथक् और सर्वथा असङ्ग हैं ॥ ११ ॥ एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥१२॥ यः=जो; सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तर्यामी, एकः वशी=अद्वितीय एव सबको वशमें रखनेवाला (परमात्मा), एकम् रूपम् = (अपने) एक ही रूपको; बहुधा = बहुत प्रकारसे, करोति = बना लेता है; तम् आत्मस्थम् = उस अपने अंदर रहनेवाले (परमात्मा) को, ये धीराः = जो ज्ञानी पुरुष; अनुपश्यन्ति = निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम् = उन्हींको, शाश्वतम् सुखम् = सदा अटल रहनेवाला परमानन्दस्वरूप वास्तविक सुख (मिलता है), इतरेषाम् न = दूसरोंको नहीं ॥१२॥ व्याख्या-जो परमात्मा सदा सबके अन्तरात्मारूपसे स्थित हैं, जो अद्वितीय हैं और सम्पूर्ण जगत्मे देव-मनुष्यादि सभीको सदा अपने वशमें रखते हैं, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वभवनसमर्थ परमेश्वर अपने एक ही रूपको अपनी लीलासे बहुत प्रकारका बना लेते हैं। उन परमात्माको जो ज्ञानी महापुरुष निरन्तर अपने अदर स्थित देखते हैं, उन्हींको सदा स्थिर रहनेवाला-सनातन परमानन्द मिलता है, दूसरोंको नहीं ॥ १२ ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥१३॥ यः = जो, नित्यानाम्* = नित्योंका (भी); नित्यः = नित्य (है); चेतनानाम् = चेतनोंका (भी), चेतनः = चेतन है (और); एकः बहूनाम् = एक होते हुए भी इन अनेक (जीवों) की; कामान् = कामनाओंको, विदधाति = पूर्ण करता है, तम् आत्मस्थम् = उस अपने अंदर रहनेवाले (पुरुषोत्तमको), ये धीराः = जो ज्ञानी; अनुपश्यन्ति = निरन्तर देखते रहते हैं, तेषाम् = उन्हींको; शाश्वती शान्तिः = सदा अटल रहनेवाली शान्ति (प्राप्त होती है); इतरेषाम् न = दूसरोंको नहीं ॥ १३ ॥ व्याख्या-जो समस्त नित्य चेतन आत्माओंके भी नित्य चेतन आत्मा हैं और जो स्वयं एक होते हुए ही अनन्त जीवोके भोगोंका उन-उनके कर्मानुसार निर्माण करते हैं, उन सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमको जो ज्ञानी महापुरुष अपने अदर निरन्तर स्थित देखते हैं, उन्हींको सदा स्थिर रहनेवाली-सनातनी परम शान्ति मिलती है, दूसरोको नहीं † ॥ १३ ॥ सम्बन्ध-जिज्ञासु नचिकेता इस प्रकार उस ब्रह्मप्राप्तिके आनन्द और शान्तिकी महिमा सुनकर मन-ही-मन विचार करने लगा- तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥१४॥
  • कुछ लोगोंने 'नित्य अनित्यानाम्' पाठ मानकर उसका अर्थ यह किया है कि यह आत्मा जितने भी विनाशशील भाव- पदार्थ हैं, उनमें अविनाशी है। अर्थात् यह 'शक्तियेोपलब्धका आधार' है। जब समस्त पदार्थोंका लय हो जाता है, तब उस लयको भी अपने अदर विलीन करनेवाला, लयका भी साक्षी आत्मा रह जाता है। इसलिये वह अनित्योंमें नित्य है। † कुछ महानुभावोंने इस मन्त्रका ऐसा अर्थ किया है- जो आकाश, काल आदि नित्यके नामसे प्रसिद्ध पदार्थोंको नित्यत्व प्रदान करनेवाला परम नित्य है और जो ब्रह्मादि चेतनोंको भी चेतनत्व प्रदान करनेवाला चेतन है, जो अकेला ही अनेकोंकी कामनाएँ पूर्ण करता है, अपनी बुद्धिमें स्थित उस आत्माको जो विवेकशील पुरुष देखते हैं, उन्हींको नित्य शान्ति प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं। उ० अं० २९-

२३६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तत्=वह, अनिर्देश्यम्=अनिर्वचनीय, परमम्=परम, सुखम्=सुख, एतत्=यह (परमात्मा ही है), इति=यों; मन्यन्ते=(ज्ञानीजन) मानते हैं, तत्=उसको, कथम् नु=किस प्रकारसे; विजानीयाम्=मैं भलीभाँति समझूँ, किमु= क्या वह, भाति=प्रकाशित होता है, वा=या, विभाति=अनुभवमें आता है ॥ १४ ॥ व्याख्या—उस सनातन परम आनन्द और परम शान्तिको प्राप्त ज्ञानी महात्माजन ऐसा मानते हैं कि परब्रह्म पुरुषोत्तम ही वह अलौकिक सर्वोपरि आनन्द है, जिसका निर्देश मन-वाणीसे नहीं किया जा सकता । उस परमानन्दस्वरूप परमेश्वरको मैं अपरोक्षरूपसे किस प्रकार जानूँ ? क्या वह प्रत्यक्ष प्रकट होता है ? या अनुभवमें आता है ? उसका ज्ञान किस प्रकारसे होता है ? ॥ १४ ॥ सम्बन्ध—नचिकेताके आन्तरिक भावको समझकर यमराजने कहा— न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१५॥ तत्र=वहाँ, न सूर्यः भाति=न (तो) सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रतारकम्=न चन्द्रमा और तारोंका समुदाय (ही प्रकाशित होता है), न इमाः विद्युततः भान्ति=(और) न ये बिजलियाँ ही (वहाँ) प्रकाशित होती हैं, अयम् अग्निः कुतः=फिर यह (लौकिक) अग्नि कैसे (प्रकाशित हो सकता है क्योंकि); तम्=उसके, भान्तम् एव=प्रकाशित होनेपर ही (उसीके प्रकाशसे), सर्वम्=ऊपर बतलाये हुए सूर्यादि सब, अनुभाति=प्रकाशित होते हैं; तस्य भासा=उसीके प्रकाशसे; इदम् सर्वम्=यह सम्पूर्ण जगत्, विभाति=प्रकाशित होता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—उस स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य नहीं प्रकाशित होता । जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकट होनेपर खद्योतका प्रकाश लुप्त हो जाता है, वैसे ही सूर्यका आंशिक तेज भी उस असीम तेजके सामने लुप्त हो जाता है । चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ नहीं चमकते, फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है । क्योंकि प्राकृत जगत्में जो कुछ भी तत्त्व प्रकाशशील हैं, सब उस परब्रह्म परमेश्वरकी प्रकाश शक्तिके अंशको पाकर ही प्रकाशित हैं । वे अपने प्रकाशकके समीप अपना प्रकाश कैसे फैला सकते हैं। सारांश यह कि यह सम्पूर्ण जगत् उस जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे अथवा उस प्रकाशके एक क्षुद्रतम अंगसे प्रकाशित हो रहा है ॥ १५ ॥ ॥ द्वितीय वल्ली समाप्त ॥ २ ॥ (५) तृतीय वल्ली ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ १ ॥ ऊर्ध्वमूलः=ऊपरकी ओर मूलवाला, अवाक्शाखः=नीचेकी ओर शाखावाला, एषः=यह (प्रत्यक्ष जगत्), सनातनः अश्वत्थः=सनातन पीपलका वृक्ष है । [ तन्मूलम्=इसका मूलभूत ] तद् एव शुक्रम्=वह (परमेश्वर) ही विशुद्ध तत्त्व है, तत् ब्रह्म=वही ब्रह्म है (और), तद् एव=वही, अमृतम् उच्यते=अमृत कहलाता है, सर्वे लोकाः=सब लोक, तस्मिन्=उसीके, श्रिताः=आश्रित हैं, कश्चन उ=कोई भी, तत्=उसको, न अत्येति=लाँघ नहीं सकता, एतत् वै=यही है, तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १ ॥ व्याख्या—जिसका मूलभूत परब्रह्म पुरुषोत्तम ऊपर है अर्थात् सर्वश्रेष्ठ, सबसे सूक्ष्म और सर्वशक्तिमान् है और जिसकी प्रधान शाखा ब्रह्मा तथा अवान्तर शाखाएँ देव, पितर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि क्रमसे नीचे हैं, ऐसा यह ब्रह्माण्डरूप पीपल वृक्ष अनादिकालीन—सदासे है। कभी प्रकटरूपमे और कभी अप्रकटरूपसे अपने कारणरूप परब्रह्ममे नित्य स्थित रहता है, अतः

  • कठोपनिषद् * २२७ सनातन है । इसका जो मूल कारण है, जिससे यह उत्पन्न होता है, जिससे सुरक्षित है और जिसमें विलीन होता है, वही विशुद्ध दिव्य तत्त्व है, वही ब्रह्म है, उसीको अमृत कहते हैं, तथा सब लोक उसीके आश्रित हैं। कोई भी उसका अतिक्रमण करनेमें समर्थ नहीं है। नचिकेता ! यही है वह तत्त्व, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ १ ॥ यदिदं किं च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥ निःसृतम्=(परब्रह्म परमेश्वरसे) निकला हुआ, इदम् यत् किं च=यह जो कुछ भी, सर्वम् जगत्=सम्पूर्ण जगत् है; प्राणे एजति=उस प्राणस्वरूप परमेश्वरमें ही चेष्टा करता है, एतत्=इस; उद्यतम् वज्रम्=उठे हुए वज्रके समान; महत् भयम्=महान् भयरूप (सर्वशक्तिमान्) परमेश्वरको, ये विदुः=जो जानते हैं, ते=वे; अमृताः भवन्ति=अमर हो जाते हैं अर्थात् जन्म-मरणसे छूट जाते हैं ॥ २ ॥ व्याख्या—यह जो कुछ भी इन्द्रिय, मन और बुद्धिके द्वारा देखने, सुनने और समझनेमे आनेवाला सम्पूर्ण चराचर जगत् है, सब अपने परम कारणरूप जिन परब्रह्म पुरुषोत्तमसे प्रकट हुआ है, उन्हीं प्राणस्वरूप परमेश्वरमें चेष्टा करता है। अर्थात् इसकी चेष्टाओके आधार एव नियामक भी वे परमेश्वर ही हैं। वे परमेश्वर परम दयालु होते हुए भी महान् भयरूप हैं—छोटे-बड़े सभी उनसे भय मानते हैं। साथ ही वे उठे हुए वज्रके समान हैं। जिस प्रकार हाथमें वज्र लिये हुए प्रभुको देखकर सभी सेवक यथाविधि निरन्तर आज्ञापालनमें तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार समस्त देवता सदा-सर्वदा नियमानुसार इन परमेश्वरके आज्ञापालनमें नियुक्त रहते हैं। इस परब्रह्मको जो जानते हैं, वे तत्त्वज्ञ पुरुष अमर हो जाते हैं—जन्म-मृत्युके चक्रसे छूट जाते हैं ॥ २ ॥ भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥ अस्य भयात्=इसीके भयसे; अग्निः तपति=अग्नि तपता है, भयात्=(इसीके) भयसे; सूर्यः तपति=सूर्य तपता है; च=तथा; (अस्य) भयात्=इसीके भयसे, इन्द्रः वायुः=इन्द्र, वायु, च=और; पञ्चमः मृत्युः=पाँचवें मृत्यु देवता; धावति=(अपने-अपने काममें) प्रवृत्त हो रहे हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या—सबपर शासन करनेवाले और सबको नियन्त्रणमें रखकर नियमानुसार चलानेवाले इन परमेश्वरके भयसे ही अग्नि तपता है, इन्हींके भयसे सूर्य तप रहा है, इन्हींके भयसे इन्द्र, वायु और पाँचवें मृत्यु देवता दौड़-दौड़कर जल आदि बरसाना, चलना, जीवोंके शरीरोंका अन्त करना आदि अपना-अपना काम त्वरापूर्वक कर रहे हैं। सारांश यह कि इस जगत्में देवसमुदायके द्वारा सारे कार्य जो नियमित रूपसे सम्पन्न हो रहे हैं, वे इन सर्वशक्तिमान्, सर्वेश्वर, सबके शासक एव नियन्ता परमेश्वरके अमोघ शासनसे ही हो रहे हैं ॥ ३ ॥ इह चेदशकद् बोद्धुं प्राक्शरीरस्य विस्रसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥ चेत्=यदि; शरीरस्य=शरीरका, विस्रसः=पतन होनेसे, प्राक्=पहले-पहले; इह=इस मनुष्यशरीरमें ही (साधक), बोद्धुम्=परमात्माका साक्षात्; अशकत्=कर सका (तब तो ठीक है); ततः=नहीं तो फिर; सर्गेषु=अनेक कल्पोतक; लोकेषु=नाना लोक और योनियोंमें; शरीरत्वाय कल्पते=शरीर धारण करनेको विवश होता है ॥ ४ ॥ व्याख्या—इस सर्वशक्तिमान्, सबके प्रेरक और सबपर शासन करनेवाले परमेश्वरको यदि कोई साधक इस दुर्लभ मनुष्यशरीरका नाश होनेसे पहले ही जान लेता है, अर्थात् जबतक इसमें भजन स्मरण आदि साधन करनेकी शक्ति बनी हुई है और जबतक यह मृत्युके मुखमे नहीं चला जाता, तभीतक (इसके रहते-रहते ही) सावधानीके साथ प्रयत्न करके परमात्माके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब तो उसका जीवन सफल हो जाता है; अनादिकालसे जन्म-मृत्युके प्रवाहमें पड़ा हुआ वह जीव उससे छुटकारा पा जाता है। नहीं तो, फिर उसे अनेक कल्पोंतक विभिन्न लोकों और योनियोंमें शरीर धारण करनेके

२२८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * लिये बाध्य होना पड़ता है । अतएव मनुष्यको मृत्युसे पहले पहले ही परमात्माको जान लेना चाहिये* ॥४॥ यथाऽऽदर्शे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥ यथा आदर्शों=जैसे दर्पणमें (सामने आयी हुई वस्तु दीखती है); तथा आत्मनि=वैसे ही शुद्ध अन्तःकरणमें (ब्रह्मके दर्शन होते हैं), यथा स्वप्ने=जैसे स्वप्नमें (वस्तु अस्पष्ट दिखलायी देती है), तथा पितृलोके=उसी प्रकार पितृलोकमें (परमेश्वर दीखता है); यथा अप्सु=जैसे जलमें (वस्तुके रूपकी झलक पड़ती है); तथा गन्धर्वलोके=उसी प्रकार गन्धर्वलोकमें, परि ददृशे इव=परमात्माकी झलक सी पड़ती है (और); ब्रह्मलोके=ब्रह्मलोकमें (तो), छायातपयोः इव=छाया और धूपकी भाँति (आत्मा और परमात्मा दोनोंका स्वरूप पृथक् पृथक् स्पष्ट दिखलायी देता है) ॥ ५ ॥ व्याख्या—जैसे मलरहित दर्पणमें उसके सामने आयी हुई वस्तु दर्पणसे विलक्षण और स्पष्ट दिखलायी देती है, उसी प्रकार ज्ञानी महापुरुषोंके विशुद्ध अन्तःकरणमें वे परमेश्वर उससे विलक्षण एव स्पष्ट दिखलायी देते हैं। जैसे स्वप्नमें वस्तुसमूह यथार्थरूपमे न दीखकर स्वप्नद्रष्टा मनुष्यकी वासना और विविध संस्कारोंके अनुसार कहींकी वस्तु कहीं विशृङ्खलरूपसे अस्पष्ट दिखायी देती है, वैसे ही पितृलोकमें परमेश्वरका स्वरूप यथावत् स्पष्ट न दीखकर अस्पष्ट ही दीखता है; क्योंकि पितृलोकको प्राप्त प्राणी पूर्व-जन्मकी स्मृति और वहाँके सम्बन्धियोंका पूर्ववत् ज्ञान होनेके कारण तदनुरूप वासनाजालमें आबद्ध रहते हैं। गन्धर्वलोक पितृलोककी अपेक्षा कुछ श्रेष्ठ है, इसलिये जैसे स्वप्नकी अपेक्षा जाग्रत् अवस्थामें जलके अदर देखनेपर प्रतिबिम्ब कुछ-का-कुछ न दीखकर यथावत् तो दीखता है, परंतु जलकी लहरोंके कारण हिलता हुआ-सा प्रतीत होता है, स्पष्ट नहीं दीखता, वैसे ही गन्धर्वलोकमें भी-भोग-लहरियोंमें लहराते हुए चित्तसे युक्त वहाँके निवासियोंको भगवान्‌के सर्वथा स्पष्ट दर्शन नहीं होते । किंतु ब्रह्मलोकमे वहाँ रहनेवालोंको छाया और धूपकी तरह अपना और उन परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञान प्रत्यक्ष और सुस्पष्ट होता है । वहाँ किसी प्रकारका भ्रम नहीं रहता । तीसरी वल्लीके पहले मन्त्रमें बतलाया गया है कि यह मनुष्यशरीर भी एक लोक है, इसमें परब्रह्म परमेश्वर और जीवात्मा—दोनों छाया और धूपकी तरह हृदयरूप गुफामें रहते हैं। अतः मनुष्यको दूसरे लोकोंकी कामना न करके इस मनुष्यशरीरके रहते-रहते ही उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लेना चाहिये। यही इसका अभिप्राय है† ॥ ५ ॥

  • एक महानुभावने इस मन्त्रमें 'सर्गेषु'के स्थानपर 'स्वर्गेषु' पाठ मानकर इस प्रकार अर्थ किया है— यदि इस शरीरका पतन होनेसे पहले ही कोई भगवान्‌को जान लेता है तो वह फिर स्वर्ग नामसे ख्यात वैकुण्ठादि दिव्य लोकों- में अप्राकृत चिदानन्दात्मक शरीर प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। † इस मन्त्रका भावार्थ निम्नलिखित रूपोंमें भी किया गया है— १—जैसे दर्पणमें मुखमण्डल स्पष्ट दीखता है, वैसे ही महापुरुषोंको ज्ञाननेत्रोंके द्वारा अपने अंदर भगवान्‌के स्पष्ट दर्शन होते हैं । लोकोंमें प्राय इम प्रकारका स्पष्ट ज्ञान नहीं होता । पितृलोकमें वैसे ही अस्पष्ट ज्ञान होता है, जैसा स्वप्नमें होता है, गन्धर्वलोकका स्तर ज्ञानमें पितृलोककी अपेक्षा कहीं ऊँचा है, इसलिये वहाँ पितृलोककी अपेक्षा कुछ अधिक स्पष्ट ज्ञान होता है—वैसे ही जैसे लहराते हुए जलमें अस्पष्ट मुख दीखता है । ब्रह्मलोकमें अधिक स्पष्ट ज्ञान होता है—वैसे ही जैसे छाया-धूपके बीचमें प्रभातके समय, जब न तो दुपहरीका प्रकाश रहता है और न रात्रिका अन्धकार होता है एव वस्तु स्पष्ट दीखती है। २—जैसा काँच होता है, उसके सामने आयी हुई वस्तु उसीके अनुसार छोटी-बड़ी, दूर-समीप या लाल-पीली दिखलायी देती है । वैसे ही इस लोकमें मनुष्यका जैसा—मलिन, मिश्रित अथवा स्वच्छ अन्त करण होता है, वैसा ही उसके द्वारा भगवान्‌का रूप समझमें आता है । पितृलोक अपेक्षाकृत शुद्ध है, इसलिये वहाँ, जैसे स्वप्नमें वस्तु विशृङ्खल दीखनेपर भी कुछ स्पष्ट दीखती है, वैसे ही पितृलोकमें परमेश्वरके रूपका ज्ञान होता है । गन्धर्वलोकमें, निर्मल जलमें दीखनेवाले रूपकी भाँति और भी स्पष्ट दिखायी देता है एवं ब्रह्मलोकमें तो छाया तथा धूपकी भाँति बहुत स्पष्ट रूपमें ऐसा ज्ञान होता है कि पूर्णप्रकाश परमेश्वरके साथ ही उसीके आधारपर अल्पप्रकाश जीवात्मा भी स्थित है अर्थात् एक ही परमात्मा दो रूपोंमें प्रकट हैं।
  • कठोपनिषद् * २२९ इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥ पृथक् = ( अपने-अपने कारणसे ) भिन्न-भिन्न रूपोंमें; उत्पद्यमानानाम् = उत्पन्न हुई; इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियोंकी; यत् = जो; पृथक् भावम् = पृथक्-पृथक् सत्ता है; च = और, [ यत् = जो उनका, ] उदयास्तमयौ = उदय हो जाना और लय हो जाना- रूप स्वभाव है, [ तत् = उसे ]; मत्वा = जानकर, धीरः = ( आत्माका स्वरूप उनसे विलक्षण समझनेवाला ) धीर पुरुष, न शोचति = शोक नहीं करता ॥ ६ ॥ व्याख्या-शब्द-स्पर्शादि विषयोंके अनुभवरूप पृथक्-पृथक् कार्य करनेके लिये भिन्न-भिन्न रूपमें उत्पन्न हुई इन्द्रियोंके जो पृथक्-पृथक् भाव हैं तथा जाग्रत् अवस्थामें कार्यशील हो जाना और सुषुप्तिकालमें लय हो जाना रूप जो उनकी परिवर्तन- शीलता है, इनपर विचार करके जब बुद्धिमान् मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है कि 'ये इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि या इनका सङ्घातरूप यह शरीर मैं नहीं हूँ, मैं इनसे सर्वथा विलक्षण नित्य चेतन हूँ, सर्वथा विशुद्ध एवं सदा एकरस हूँ,' तब वह किसी प्रकारका शोक नहीं करता। सदाके लिये दुःख और शोकसे रहित हो जाता है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध - इस मन्त्रमें तत्त्वविचार करते हैं- इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ इन्द्रियेभ्यः = इन्द्रियोंसे (तो), मनः = मन, परम् = श्रेष्ठ है, मनसः = मनसे; सत्त्वम् = बुद्धि; उत्तमम् = उत्तम है; सत्त्वात् = बुद्धिसे, महान् आत्मा = उसका स्वामी जीवात्मा, अधि = ऊँचा है और; महतः = जीवात्मासे, अव्यक्तम् = अव्यक्त शक्ति, उत्तमम् = उत्तम है ॥ ७ ॥ व्याख्या-इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि उत्तम है, बुद्धिसे उनका स्वामी जीवात्मा ऊँचा है; क्योंकि उन सबपर उसका अधिकार है। वे सभी उसकी आज्ञा पालन करनेवाले हैं और यह इनका शासक है, अतः उनसे सर्वथा विलक्षण है। इस जीवात्मासे भी इसका अव्यक्त शरीर-भगवान्‌की वह प्रकृति प्रबल है, जिसने इसको बन्धनमें डाल रक्खा है। तुलसीदास- जी ने भी कहा है 'जेहि बस कीन्हे जीव निकाया'। गीतामें भी प्रकृतिजनित तीनों गुणोंके द्वारा जीवात्माके बाँधे जानेकी बात कही गयी है (१४।५) ॥ ७ ॥ अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च । यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ तु = परन्तु; अव्यक्तात् = अव्यक्तसे ( भी वह ), व्यापकः = व्यापक; च = और, अलिङ्गः एव = सर्वथा आकाररहित; पुरुषः = परम पुरुष, परः = श्रेष्ठ है, यम् = जिसको, ज्ञात्वा = जानकर, जन्तुः = जीवात्मा, मुच्यते = मुक्त हो जाता है; च = और, अमृतत्वम् = अमृतरूप आनन्दमय ब्रह्मको, गच्छति = प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥ व्याख्या-परंतु इस प्रकृतिसे भी इसके स्वामी परमपुरुष परमात्मा श्रेष्ठ हैं, जो निराकाररूपसे सर्वत्र व्यापक हैं ( गीता ९।४) । अतः मनुष्यको चाहिये कि वह इस प्रकृतिके बन्धनसे छूटनेके लिये इसके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तमकी शरण ग्रहण करे। परमात्मा जब इस जीवपर दया करके मायाके परदेको हटा लेते हैं, तभी इसको उनकी प्राप्ति होती है। नहीं तो, यह भाग्यहीन जीव सर्वदा अपने समीप रहते हुए भी उन परमेश्वरको पहचान नहीं पाता, जिनको जानकर यह जीवात्मा प्रकृतिके बन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जाता है और अमृतस्वरूप परमानन्दको पा लेता है ॥ ८ ॥ न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥ अस्य = इस परमेश्वरका; रूपम् = वास्तविक स्वरूप; संदृशे = अपने सामने प्रत्यक्ष विषयके रूपमें; न तिष्ठति = नहीं ठहरता

२३० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *- एनम्=इसको; कश्चन = कोई भी; चक्षुषा = चर्मचक्षुओं‌द्वारा; न पश्यति = नहीं देख पाता; मनसा = मनसे; अभिक्लृप्तः = बारंबार चिन्तन करके ध्यानमें लाया हुआ (वह परमात्मा); हृदा = निर्मल और निश्चल हृदयसे; मनीषा = (और) विशुद्ध बुद्धिके द्वारा; [ दृश्यते = देखनेमें आता है; ] ये एतत् विदुः = जो इसको जानते हैं; ते अमृताः भवन्ति = वे अमृत (आनन्द) स्वरूप हो जाते हैं ॥ ९ ॥ व्याख्या-इन परब्रह्म परमेश्वरका दिव्य स्वरूप प्रत्यक्ष विषयके रूपमें अपने सामने नहीं ठहरता; परमात्माके दिव्य- रूपको कोई भी मनुष्य प्राकृत चर्मचक्षुओंके द्वारा नहीं देख सकता। जो भाग्यवान् साधक निरन्तर प्रेमपूर्वक मनसे उनका चिन्तन करता रहता है, उसके हृदयमें जब भगवान्‌के उस दिव्य स्वरूपका ध्यान प्रगाढ होता है, उस समय उस साधकका हृदय भगवान्‌के ध्यानजनित स्वरूपमें निश्चल हो जाता है। ऐसे निश्चल हृदयसे ही वह साधक विशुद्ध बुद्धिरूप नेत्रोंके द्वारा परमात्माके उस दिव्य स्वरूपकी झाँकी करता है। जो इन परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं, अर्थात् परमानन्द- स्वरूप बन जाते हैं ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-योगधारणाके द्वारा मन और इन्द्रियोंको रोककर परमात्माको प्राप्त करनेका दूसरा साधन बतलाने हैं— यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥१०॥ यदा = जब; मनसा सह = मनके सहित; पञ्च ज्ञानानि = पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ; अवतिष्ठन्ते = भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं; बुद्धिः च = और बुद्धि भी; न विचेष्टति = किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं करती; ताम् = उस स्थितिको; परमाम् गतिम् आहुः = (योगी) परमगति कहते हैं ॥ १० ॥ व्याख्या-योगाभ्यास करते-करते जब मनके सहित पाँचों इन्द्रियाँ भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी एक परमात्माके स्वरूपमें इस प्रकार स्थित हो जाती है; जिससे उसको परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तुका तनिक भी ज्ञान नहीं रहता; उससे कोई भी चेष्टा नहीं बनती; उस स्थितिको योगीजन परमगति—योगकी सर्वोत्तम स्थिति—बतलाते हैं ॥१०॥ तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥११॥ ताम् = उस; स्थिराम् इन्द्रियधारणाम् = इन्द्रियोंकी स्थिर धारणाको ही; योगम् इति = 'योग', मन्यन्ते = मानते हैं; तदा = उस समय; अप्रमत्तः = (साधक) प्रमादरहित; भवति = हो जाता है; हि योगः = क्योंकि योग; प्रभवाप्ययौ = उदय और अस्त होनेवाला है ॥ ११ ॥ व्याख्या-इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी स्थिर धारणाका ही नाम योग है—ऐसा अनुभवी योगी महानुभाव मानते हैं; क्योंकि उस समय साधक विषयदर्शनरूप सब प्रकारके प्रमादसे सर्वथा रहित हो जाता है। परन्तु यह योग उदय और अस्त होनेवाला है, अत परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छावाले साधकको निरन्तर योगयुक्त रहनेका दृढ अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ ११ ॥ नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥१२॥ न वाचा = (वह परब्रह्म परमेश्वर ) न तो वाणीसे; न मनसा = न मनसे (और); न चक्षुषा एव = न नेत्रोंसे ही; प्राप्तुम् शक्यः = प्राप्त किया जा सकता है (फिर); तत् अस्ति = वह 'अवश्य है'; इति ब्रुवतः अन्यत्र = इस प्रकार कहनेवालेके अतिरिक्त दूसरेको, कथम् उपलभ्यते = कैसे मिल सकता है ? ॥ १२ ॥ व्याख्या-वह परब्रह्म परमात्मा वाणी आदि कर्मेन्द्रियोंसे, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियोंसे और मन बुद्धिरूप अन्त:करणसे

  • कठोपनिषद् * २३१ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह इन सबकी पहुँचसे परे है। परंतु वह है अवश्य और उसे प्राप्त करनेकी तीव्र इच्छा रखनेवालेको वह अवश्य मिलता है—इस बातको जो नहीं कहता, नहीं स्वीकार करता अर्थात् इसपर जिसका दृढ विश्वास नहीं है, उसको वह कैसे मिल सकता है ? अतः पूर्व मन्त्रोंमें बतलायी हुई रीतिके अनुसार इन्द्रिय-मन आदि सबको योगाभ्यासके द्वारा रोककर 'वह अवश्य है और साधकको मिलता है' ऐसे दृढतम निश्चयसे निरन्तर उसकी प्राप्तिके लिये परम उत्कण्ठाके साथ प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥ १२ ॥ अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः। अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥१३॥ अस्ति = (अतः उस परमात्माको पहले तो) 'वह अवश्य है'; इति एव = इस प्रकार निश्चयपूर्वक; उपलब्धव्यः = ग्रहण करना चाहिये, अर्थात् पहले उसके अस्तित्वका दृढ निश्चय करना चाहिये; [तदनु=तदनन्तर,] तत्त्वभावेन = तत्त्वभावसे भी; [ उपलब्धव्यः = उसे प्राप्त करना चाहिये, ] उभयोः = इन दोनों प्रकारोंमेंसे, अस्ति इति एव = 'वह अवश्य है' इस प्रकार निश्चयपूर्वक, उपलब्धस्य = परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करनेवाले साधकके लिये, तत्त्वभावः = परमात्माका तात्त्विक स्वरूप ( अपने-आप); प्रसीदति = (शुद्ध हृदयमें) प्रत्यक्ष हो जाता है ॥ १३ ॥ व्याख्या—साधकको चाहिये कि पहले तो वह इस बातका दृढ निश्चय करे कि 'परमेश्वर अवश्य हैं और वे साधक- को अवश्य मिलते हैं,' फिर इसी विश्वाससे उन्हें स्वीकार करे और उसके पश्चात् तात्त्विक विवेचनपूर्वक निरन्तर उनका ध्यान करके उन्हें प्राप्त करे। जब साधक इस निश्चित विश्वाससे भगवान्‌को स्वीकार कर लेता है कि 'वे अवश्य हैं और अपने हृदयमें ही विराजमान हैं, यत्नशीलको उनकी प्राप्ति अवश्य होती है,' तो परमात्माका वह तात्त्विक दिव्य स्वरूप उसके विशुद्ध हृदयमें अपने-आप प्रकट हो जाता है, उसका प्रत्यक्ष हो जाता है ॥ १३ ॥ सम्बन्ध—अत्र निष्कामभावकी महिमा बतलाते हैं— यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥१४॥ अस्य = इस (साधक') के, हृदि श्रिताः = हृदयमे स्थित, ये कामाः = जो कामनाएँ (हैं); सर्वे यदा = (वे) सब-की- सब जब; प्रमुच्यन्ते = समूल नष्ट हो जाती हैं, अथ = तब, मर्त्यः = मरणधर्मा मनुष्य, अमृतः = अमर, भवति = हो जाता है (और), अत्र = (वह) यहीं, ब्रह्म समश्नुते = ब्रह्मका भलीभाँति अनुभव कर लेता है ॥ १४ ॥ व्याख्या—मनुष्यका हृदय नित्य-निरन्तर विभिन्न प्रकारकी इहलौकिक और पारलौकिक कामनाओसे भरा रहता है; इसी कारण न तो वह कभी यह विचार ही करता है कि परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है और न काम्यविषयोंकी आसक्तिके कारण वह परमात्माको पानेकी अभिलाषा ही करता है। ये सारी कामनाएँ साधक पुरुषके हृदयसे जब समूल नष्ट हो जाती हैं, तब वह—जो सदासे मरणधर्मा था— अमर हो जाता है और यहीं— इस मनुष्य-शरीरमें ही उस परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति साक्षात् अनुभव कर लेता है ॥ १४ ॥ सम्बन्ध—संशयरहित दृढ निश्चयकी महिमा बतलाते हैं— यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम् ॥१५॥ यदा = जब (इसके), हृदयस्य = हृदयकी, सर्वे = सम्पूर्ण; ग्रन्थयः = ग्रन्थियाँ, प्रभिद्यन्ते = भलीभाँति खुल जाती हैं; अथ = तब; मर्त्यः = वह मरणधर्मा मनुष्य, इह = इसी शरीरमें; अमृतः = अमर; भवति = हो जाता है, हि एतावत् = बस, इतना ही; अनुशासनम् = सनातन उपदेश है ॥ १५ ॥

२३२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-जब साधकके हृदयकी अहन्ता-ममतारूप समस्त अज्ञान ग्रन्थियाँ भलीभाँति कट जाती हैं, उसके सब प्रकार- के संशय सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और उपर्युक्त उपदेशके अनुसार उसे यह दृढ निश्चय हो जाता है कि 'परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं और वे निश्चय ही मिलते हैं,' तब वह इस शरीरमें रहते हुए ही परमात्माका साक्षात् करके अमर हो जाता है। बस, इतना ही वेदान्तका सनातन उपदेश है ॥ १५ ॥ सम्बन्ध-अब मरनेके बाद होनेवाली जीवात्माकी गतिका वर्णन करते हैं- शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्डन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥१६॥ हृदयस्य=हृदयकी; शतम् च एका च= (कुल मिलाकर) एक सौ एक, नाड्यः =नाड़ियाँ हैं; तासाम् =उनमेंसे; एका=एक; मूर्धानम् =मूर्धा (कपाल) की ओर, अभिनिःसृता=निकली हुई है (इसे ही सुषुम्णा कहते हैं); तया= उसके द्वारा, ऊर्ध्वम् =ऊपरके लोकोंमें; आयन्=जाकर (मनुष्य), अमृतत्वम् =अमृतभावको; एति=प्राप्त हो जाता है; अन्याः=दूसरी एक सौ नाड़ियाँ; उत्क्रमणे =मरणकालमें (जीवको); विष्वङ्=नाना प्रकारकी योनियोंमे ले जानेकी हेतु; भवन्ति =होती है ॥ १६ ॥ व्याख्या-हृदयमें एक सौ एक प्रधान नाड़ियाँ हैं, जो वहाँसे सब ओर फैली हुई हैं। उनमेंसे एक नाड़ी, जिसको सुषुम्णा कहते हैं, हृदयसे मस्तककी ओर गयी है। भगवान्‌के परमधाममें जानेका अधिकारी उस नाड़ीके द्वारा शरीरसे बाहर निकलकर सबसे ऊँचे लोकमें अर्थात् भगवान्‌के परमधाममे जाकर अमृतस्वरूप परमानन्दमय परमेश्वरको प्राप्त हो जाता है; और दूसरे जीव मरणकालमें दूसरी नाड़ियोंके द्वारा शरीरसे बाहर निकलकर अपने-अपने कर्म और वासनाके अनुसार नाना योनियोंको प्राप्त होते हैं ॥ १६ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण। तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥१७॥ अन्तरात्मा=सबका अन्तर्यामी, अङ्गुष्ठमात्रः =अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला, पुरुषः=परम पुरुष, सदा =सदैव, जनानाम् = मनुष्योंके, हृदये=हृदयमें, संनिविष्टः =भलीभाँति प्रविष्ट है; तम् =उसको, मुञ्जात् =मूँजसे; इषीकाम् इव =सींककी भाँति, स्वात्=अपनेसे (और), शरीरात् =शरीरसे, धैर्येण=धीरतापूर्वक, प्रवृहेत्=पृथक् करके देखे; तम् =उसीको, शुक्रम् अमृतम् विद्यात्=विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे, तम् शुक्रम् अमृतम् विद्यात् = (और) उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे ॥ १७ ॥ व्याख्या-सबके अन्तर्यामी परमपुरुष परमेश्वर हृदयके अनुरूप अङ्गुष्ठमात्र रूपवाले होकर सदैव सभी मनुष्योंके भीतर निवास करते हैं, तो भी मनुष्य उनकी ओर देखतातक नहीं ! जो प्रमादरहित होकर उनकी प्राप्तिके साधनमे लगे हैं, उन मनुष्योंको चाहिये कि उन शरीरस्थ परमेश्वरको इस शरीरसे और अपने-आपसे भी उसी तरह पृथक् और विलक्षण समझें, जैसे साधारण लोग मूँजसे सींकको पृथक् देखते हैं। अर्थात् जिस प्रकार मूँजमें रहनेवाली सींक मूँजसे विलक्षण और पृथक् है, उसी प्रकार वह शरीर और आत्माके भीतर रहनेवाला परमेश्वर उन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है। वही विशुद्ध अमृत है, वही विशुद्ध अमृत है। यहाँ यह वाक्यकी पुनरावृत्ति उपदेशकी समाप्ति एव सिद्धान्तकी निश्चितताको सूचित करती है* ॥ १७ ॥

  • इसका अन्य आदरणीय महानुभावोंने यह अर्थ किया है— “अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जो जीवोंके हृदयमें स्थित उनका अन्तरात्मा है, उसे धैर्य-—अप्रमादपूर्वक मूँजसे सींकके निकालनेके समान शरीरसे बाहर निकालकर पृथक् करे। शरीरमे पृथक् किये हुए उस अङ्गुष्ठमात्र पुरुषको ही चिन्मात्र विशुद्ध और अमृतमय ब्रह्म जाने। यहा 'त विद्याच्छुक्रममृतम्' इस पदकी द्विरुक्ति और 'इति' उपनिषद्‌की समाप्तिके लिये है।”