भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 254

२३० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *- एनम्=इसको; कश्चन = कोई भी; चक्षुषा = चर्मचक्षुओं‌द्वारा; न पश्यति = नहीं देख पाता; मनसा = मनसे; अभिक्लृप्तः = बारंबार चिन्तन करके ध्यानमें लाया हुआ (वह परमात्मा); हृदा = निर्मल और निश्चल हृदयसे; मनीषा = (और) विशुद्ध बुद्धिके द्वारा; [ दृश्यते = देखनेमें आता है; ] ये एतत् विदुः = जो इसको जानते हैं; ते अमृताः भवन्ति = वे अमृत (आनन्द) स्वरूप हो जाते हैं ॥ ९ ॥ व्याख्या-इन परब्रह्म परमेश्वरका दिव्य स्वरूप प्रत्यक्ष विषयके रूपमें अपने सामने नहीं ठहरता; परमात्माके दिव्य- रूपको कोई भी मनुष्य प्राकृत चर्मचक्षुओंके द्वारा नहीं देख सकता। जो भाग्यवान् साधक निरन्तर प्रेमपूर्वक मनसे उनका चिन्तन करता रहता है, उसके हृदयमें जब भगवान्‌के उस दिव्य स्वरूपका ध्यान प्रगाढ होता है, उस समय उस साधकका हृदय भगवान्‌के ध्यानजनित स्वरूपमें निश्चल हो जाता है। ऐसे निश्चल हृदयसे ही वह साधक विशुद्ध बुद्धिरूप नेत्रोंके द्वारा परमात्माके उस दिव्य स्वरूपकी झाँकी करता है। जो इन परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं, अर्थात् परमानन्द- स्वरूप बन जाते हैं ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-योगधारणाके द्वारा मन और इन्द्रियोंको रोककर परमात्माको प्राप्त करनेका दूसरा साधन बतलाने हैं— यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥१०॥ यदा = जब; मनसा सह = मनके सहित; पञ्च ज्ञानानि = पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ; अवतिष्ठन्ते = भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं; बुद्धिः च = और बुद्धि भी; न विचेष्टति = किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं करती; ताम् = उस स्थितिको; परमाम् गतिम् आहुः = (योगी) परमगति कहते हैं ॥ १० ॥ व्याख्या-योगाभ्यास करते-करते जब मनके सहित पाँचों इन्द्रियाँ भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी एक परमात्माके स्वरूपमें इस प्रकार स्थित हो जाती है; जिससे उसको परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तुका तनिक भी ज्ञान नहीं रहता; उससे कोई भी चेष्टा नहीं बनती; उस स्थितिको योगीजन परमगति—योगकी सर्वोत्तम स्थिति—बतलाते हैं ॥१०॥ तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥११॥ ताम् = उस; स्थिराम् इन्द्रियधारणाम् = इन्द्रियोंकी स्थिर धारणाको ही; योगम् इति = 'योग', मन्यन्ते = मानते हैं; तदा = उस समय; अप्रमत्तः = (साधक) प्रमादरहित; भवति = हो जाता है; हि योगः = क्योंकि योग; प्रभवाप्ययौ = उदय और अस्त होनेवाला है ॥ ११ ॥ व्याख्या-इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी स्थिर धारणाका ही नाम योग है—ऐसा अनुभवी योगी महानुभाव मानते हैं; क्योंकि उस समय साधक विषयदर्शनरूप सब प्रकारके प्रमादसे सर्वथा रहित हो जाता है। परन्तु यह योग उदय और अस्त होनेवाला है, अत परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छावाले साधकको निरन्तर योगयुक्त रहनेका दृढ अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ ११ ॥ नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥१२॥ न वाचा = (वह परब्रह्म परमेश्वर ) न तो वाणीसे; न मनसा = न मनसे (और); न चक्षुषा एव = न नेत्रोंसे ही; प्राप्तुम् शक्यः = प्राप्त किया जा सकता है (फिर); तत् अस्ति = वह 'अवश्य है'; इति ब्रुवतः अन्यत्र = इस प्रकार कहनेवालेके अतिरिक्त दूसरेको, कथम् उपलभ्यते = कैसे मिल सकता है ? ॥ १२ ॥ व्याख्या-वह परब्रह्म परमात्मा वाणी आदि कर्मेन्द्रियोंसे, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियोंसे और मन बुद्धिरूप अन्त:करणसे