भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 253
  • कठोपनिषद् * २२९ इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥ पृथक् = ( अपने-अपने कारणसे ) भिन्न-भिन्न रूपोंमें; उत्पद्यमानानाम् = उत्पन्न हुई; इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियोंकी; यत् = जो; पृथक् भावम् = पृथक्-पृथक् सत्ता है; च = और, [ यत् = जो उनका, ] उदयास्तमयौ = उदय हो जाना और लय हो जाना- रूप स्वभाव है, [ तत् = उसे ]; मत्वा = जानकर, धीरः = ( आत्माका स्वरूप उनसे विलक्षण समझनेवाला ) धीर पुरुष, न शोचति = शोक नहीं करता ॥ ६ ॥ व्याख्या-शब्द-स्पर्शादि विषयोंके अनुभवरूप पृथक्-पृथक् कार्य करनेके लिये भिन्न-भिन्न रूपमें उत्पन्न हुई इन्द्रियोंके जो पृथक्-पृथक् भाव हैं तथा जाग्रत् अवस्थामें कार्यशील हो जाना और सुषुप्तिकालमें लय हो जाना रूप जो उनकी परिवर्तन- शीलता है, इनपर विचार करके जब बुद्धिमान् मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है कि 'ये इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि या इनका सङ्घातरूप यह शरीर मैं नहीं हूँ, मैं इनसे सर्वथा विलक्षण नित्य चेतन हूँ, सर्वथा विशुद्ध एवं सदा एकरस हूँ,' तब वह किसी प्रकारका शोक नहीं करता। सदाके लिये दुःख और शोकसे रहित हो जाता है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध - इस मन्त्रमें तत्त्वविचार करते हैं- इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ इन्द्रियेभ्यः = इन्द्रियोंसे (तो), मनः = मन, परम् = श्रेष्ठ है, मनसः = मनसे; सत्त्वम् = बुद्धि; उत्तमम् = उत्तम है; सत्त्वात् = बुद्धिसे, महान् आत्मा = उसका स्वामी जीवात्मा, अधि = ऊँचा है और; महतः = जीवात्मासे, अव्यक्तम् = अव्यक्त शक्ति, उत्तमम् = उत्तम है ॥ ७ ॥ व्याख्या-इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि उत्तम है, बुद्धिसे उनका स्वामी जीवात्मा ऊँचा है; क्योंकि उन सबपर उसका अधिकार है। वे सभी उसकी आज्ञा पालन करनेवाले हैं और यह इनका शासक है, अतः उनसे सर्वथा विलक्षण है। इस जीवात्मासे भी इसका अव्यक्त शरीर-भगवान्‌की वह प्रकृति प्रबल है, जिसने इसको बन्धनमें डाल रक्खा है। तुलसीदास- जी ने भी कहा है 'जेहि बस कीन्हे जीव निकाया'। गीतामें भी प्रकृतिजनित तीनों गुणोंके द्वारा जीवात्माके बाँधे जानेकी बात कही गयी है (१४।५) ॥ ७ ॥ अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च । यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ तु = परन्तु; अव्यक्तात् = अव्यक्तसे ( भी वह ), व्यापकः = व्यापक; च = और, अलिङ्गः एव = सर्वथा आकाररहित; पुरुषः = परम पुरुष, परः = श्रेष्ठ है, यम् = जिसको, ज्ञात्वा = जानकर, जन्तुः = जीवात्मा, मुच्यते = मुक्त हो जाता है; च = और, अमृतत्वम् = अमृतरूप आनन्दमय ब्रह्मको, गच्छति = प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥ व्याख्या-परंतु इस प्रकृतिसे भी इसके स्वामी परमपुरुष परमात्मा श्रेष्ठ हैं, जो निराकाररूपसे सर्वत्र व्यापक हैं ( गीता ९।४) । अतः मनुष्यको चाहिये कि वह इस प्रकृतिके बन्धनसे छूटनेके लिये इसके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तमकी शरण ग्रहण करे। परमात्मा जब इस जीवपर दया करके मायाके परदेको हटा लेते हैं, तभी इसको उनकी प्राप्ति होती है। नहीं तो, यह भाग्यहीन जीव सर्वदा अपने समीप रहते हुए भी उन परमेश्वरको पहचान नहीं पाता, जिनको जानकर यह जीवात्मा प्रकृतिके बन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जाता है और अमृतस्वरूप परमानन्दको पा लेता है ॥ ८ ॥ न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥ अस्य = इस परमेश्वरका; रूपम् = वास्तविक स्वरूप; संदृशे = अपने सामने प्रत्यक्ष विषयके रूपमें; न तिष्ठति = नहीं ठहरता