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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
  • कठोपनिषद् * २२९ इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥ पृथक् = ( अपने-अपने कारणसे ) भिन्न-भिन्न रूपोंमें; उत्पद्यमानानाम् = उत्पन्न हुई; इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियोंकी; यत् = जो; पृथक् भावम् = पृथक्-पृथक् सत्ता है; च = और, [ यत् = जो उनका, ] उदयास्तमयौ = उदय हो जाना और लय हो जाना- रूप स्वभाव है, [ तत् = उसे ]; मत्वा = जानकर, धीरः = ( आत्माका स्वरूप उनसे विलक्षण समझनेवाला ) धीर पुरुष, न शोचति = शोक नहीं करता ॥ ६ ॥ व्याख्या-शब्द-स्पर्शादि विषयोंके अनुभवरूप पृथक्-पृथक् कार्य करनेके लिये भिन्न-भिन्न रूपमें उत्पन्न हुई इन्द्रियोंके जो पृथक्-पृथक् भाव हैं तथा जाग्रत् अवस्थामें कार्यशील हो जाना और सुषुप्तिकालमें लय हो जाना रूप जो उनकी परिवर्तन- शीलता है, इनपर विचार करके जब बुद्धिमान् मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है कि 'ये इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि या इनका सङ्घातरूप यह शरीर मैं नहीं हूँ, मैं इनसे सर्वथा विलक्षण नित्य चेतन हूँ, सर्वथा विशुद्ध एवं सदा एकरस हूँ,' तब वह किसी प्रकारका शोक नहीं करता। सदाके लिये दुःख और शोकसे रहित हो जाता है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध - इस मन्त्रमें तत्त्वविचार करते हैं- इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ इन्द्रियेभ्यः = इन्द्रियोंसे (तो), मनः = मन, परम् = श्रेष्ठ है, मनसः = मनसे; सत्त्वम् = बुद्धि; उत्तमम् = उत्तम है; सत्त्वात् = बुद्धिसे, महान् आत्मा = उसका स्वामी जीवात्मा, अधि = ऊँचा है और; महतः = जीवात्मासे, अव्यक्तम् = अव्यक्त शक्ति, उत्तमम् = उत्तम है ॥ ७ ॥ व्याख्या-इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि उत्तम है, बुद्धिसे उनका स्वामी जीवात्मा ऊँचा है; क्योंकि उन सबपर उसका अधिकार है। वे सभी उसकी आज्ञा पालन करनेवाले हैं और यह इनका शासक है, अतः उनसे सर्वथा विलक्षण है। इस जीवात्मासे भी इसका अव्यक्त शरीर-भगवान्‌की वह प्रकृति प्रबल है, जिसने इसको बन्धनमें डाल रक्खा है। तुलसीदास- जी ने भी कहा है 'जेहि बस कीन्हे जीव निकाया'। गीतामें भी प्रकृतिजनित तीनों गुणोंके द्वारा जीवात्माके बाँधे जानेकी बात कही गयी है (१४।५) ॥ ७ ॥ अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च । यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ तु = परन्तु; अव्यक्तात् = अव्यक्तसे ( भी वह ), व्यापकः = व्यापक; च = और, अलिङ्गः एव = सर्वथा आकाररहित; पुरुषः = परम पुरुष, परः = श्रेष्ठ है, यम् = जिसको, ज्ञात्वा = जानकर, जन्तुः = जीवात्मा, मुच्यते = मुक्त हो जाता है; च = और, अमृतत्वम् = अमृतरूप आनन्दमय ब्रह्मको, गच्छति = प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥ व्याख्या-परंतु इस प्रकृतिसे भी इसके स्वामी परमपुरुष परमात्मा श्रेष्ठ हैं, जो निराकाररूपसे सर्वत्र व्यापक हैं ( गीता ९।४) । अतः मनुष्यको चाहिये कि वह इस प्रकृतिके बन्धनसे छूटनेके लिये इसके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तमकी शरण ग्रहण करे। परमात्मा जब इस जीवपर दया करके मायाके परदेको हटा लेते हैं, तभी इसको उनकी प्राप्ति होती है। नहीं तो, यह भाग्यहीन जीव सर्वदा अपने समीप रहते हुए भी उन परमेश्वरको पहचान नहीं पाता, जिनको जानकर यह जीवात्मा प्रकृतिके बन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जाता है और अमृतस्वरूप परमानन्दको पा लेता है ॥ ८ ॥ न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥ अस्य = इस परमेश्वरका; रूपम् = वास्तविक स्वरूप; संदृशे = अपने सामने प्रत्यक्ष विषयके रूपमें; न तिष्ठति = नहीं ठहरता

२३० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *- एनम्=इसको; कश्चन = कोई भी; चक्षुषा = चर्मचक्षुओं‌द्वारा; न पश्यति = नहीं देख पाता; मनसा = मनसे; अभिक्लृप्तः = बारंबार चिन्तन करके ध्यानमें लाया हुआ (वह परमात्मा); हृदा = निर्मल और निश्चल हृदयसे; मनीषा = (और) विशुद्ध बुद्धिके द्वारा; [ दृश्यते = देखनेमें आता है; ] ये एतत् विदुः = जो इसको जानते हैं; ते अमृताः भवन्ति = वे अमृत (आनन्द) स्वरूप हो जाते हैं ॥ ९ ॥ व्याख्या-इन परब्रह्म परमेश्वरका दिव्य स्वरूप प्रत्यक्ष विषयके रूपमें अपने सामने नहीं ठहरता; परमात्माके दिव्य- रूपको कोई भी मनुष्य प्राकृत चर्मचक्षुओंके द्वारा नहीं देख सकता। जो भाग्यवान् साधक निरन्तर प्रेमपूर्वक मनसे उनका चिन्तन करता रहता है, उसके हृदयमें जब भगवान्‌के उस दिव्य स्वरूपका ध्यान प्रगाढ होता है, उस समय उस साधकका हृदय भगवान्‌के ध्यानजनित स्वरूपमें निश्चल हो जाता है। ऐसे निश्चल हृदयसे ही वह साधक विशुद्ध बुद्धिरूप नेत्रोंके द्वारा परमात्माके उस दिव्य स्वरूपकी झाँकी करता है। जो इन परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं, अर्थात् परमानन्द- स्वरूप बन जाते हैं ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-योगधारणाके द्वारा मन और इन्द्रियोंको रोककर परमात्माको प्राप्त करनेका दूसरा साधन बतलाने हैं— यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥१०॥ यदा = जब; मनसा सह = मनके सहित; पञ्च ज्ञानानि = पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ; अवतिष्ठन्ते = भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं; बुद्धिः च = और बुद्धि भी; न विचेष्टति = किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं करती; ताम् = उस स्थितिको; परमाम् गतिम् आहुः = (योगी) परमगति कहते हैं ॥ १० ॥ व्याख्या-योगाभ्यास करते-करते जब मनके सहित पाँचों इन्द्रियाँ भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी एक परमात्माके स्वरूपमें इस प्रकार स्थित हो जाती है; जिससे उसको परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तुका तनिक भी ज्ञान नहीं रहता; उससे कोई भी चेष्टा नहीं बनती; उस स्थितिको योगीजन परमगति—योगकी सर्वोत्तम स्थिति—बतलाते हैं ॥१०॥ तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥११॥ ताम् = उस; स्थिराम् इन्द्रियधारणाम् = इन्द्रियोंकी स्थिर धारणाको ही; योगम् इति = 'योग', मन्यन्ते = मानते हैं; तदा = उस समय; अप्रमत्तः = (साधक) प्रमादरहित; भवति = हो जाता है; हि योगः = क्योंकि योग; प्रभवाप्ययौ = उदय और अस्त होनेवाला है ॥ ११ ॥ व्याख्या-इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी स्थिर धारणाका ही नाम योग है—ऐसा अनुभवी योगी महानुभाव मानते हैं; क्योंकि उस समय साधक विषयदर्शनरूप सब प्रकारके प्रमादसे सर्वथा रहित हो जाता है। परन्तु यह योग उदय और अस्त होनेवाला है, अत परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छावाले साधकको निरन्तर योगयुक्त रहनेका दृढ अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ ११ ॥ नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥१२॥ न वाचा = (वह परब्रह्म परमेश्वर ) न तो वाणीसे; न मनसा = न मनसे (और); न चक्षुषा एव = न नेत्रोंसे ही; प्राप्तुम् शक्यः = प्राप्त किया जा सकता है (फिर); तत् अस्ति = वह 'अवश्य है'; इति ब्रुवतः अन्यत्र = इस प्रकार कहनेवालेके अतिरिक्त दूसरेको, कथम् उपलभ्यते = कैसे मिल सकता है ? ॥ १२ ॥ व्याख्या-वह परब्रह्म परमात्मा वाणी आदि कर्मेन्द्रियोंसे, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियोंसे और मन बुद्धिरूप अन्त:करणसे

  • कठोपनिषद् * २३१ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह इन सबकी पहुँचसे परे है। परंतु वह है अवश्य और उसे प्राप्त करनेकी तीव्र इच्छा रखनेवालेको वह अवश्य मिलता है—इस बातको जो नहीं कहता, नहीं स्वीकार करता अर्थात् इसपर जिसका दृढ विश्वास नहीं है, उसको वह कैसे मिल सकता है ? अतः पूर्व मन्त्रोंमें बतलायी हुई रीतिके अनुसार इन्द्रिय-मन आदि सबको योगाभ्यासके द्वारा रोककर 'वह अवश्य है और साधकको मिलता है' ऐसे दृढतम निश्चयसे निरन्तर उसकी प्राप्तिके लिये परम उत्कण्ठाके साथ प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥ १२ ॥ अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः। अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥१३॥ अस्ति = (अतः उस परमात्माको पहले तो) 'वह अवश्य है'; इति एव = इस प्रकार निश्चयपूर्वक; उपलब्धव्यः = ग्रहण करना चाहिये, अर्थात् पहले उसके अस्तित्वका दृढ निश्चय करना चाहिये; [तदनु=तदनन्तर,] तत्त्वभावेन = तत्त्वभावसे भी; [ उपलब्धव्यः = उसे प्राप्त करना चाहिये, ] उभयोः = इन दोनों प्रकारोंमेंसे, अस्ति इति एव = 'वह अवश्य है' इस प्रकार निश्चयपूर्वक, उपलब्धस्य = परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करनेवाले साधकके लिये, तत्त्वभावः = परमात्माका तात्त्विक स्वरूप ( अपने-आप); प्रसीदति = (शुद्ध हृदयमें) प्रत्यक्ष हो जाता है ॥ १३ ॥ व्याख्या—साधकको चाहिये कि पहले तो वह इस बातका दृढ निश्चय करे कि 'परमेश्वर अवश्य हैं और वे साधक- को अवश्य मिलते हैं,' फिर इसी विश्वाससे उन्हें स्वीकार करे और उसके पश्चात् तात्त्विक विवेचनपूर्वक निरन्तर उनका ध्यान करके उन्हें प्राप्त करे। जब साधक इस निश्चित विश्वाससे भगवान्‌को स्वीकार कर लेता है कि 'वे अवश्य हैं और अपने हृदयमें ही विराजमान हैं, यत्नशीलको उनकी प्राप्ति अवश्य होती है,' तो परमात्माका वह तात्त्विक दिव्य स्वरूप उसके विशुद्ध हृदयमें अपने-आप प्रकट हो जाता है, उसका प्रत्यक्ष हो जाता है ॥ १३ ॥ सम्बन्ध—अत्र निष्कामभावकी महिमा बतलाते हैं— यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥१४॥ अस्य = इस (साधक') के, हृदि श्रिताः = हृदयमे स्थित, ये कामाः = जो कामनाएँ (हैं); सर्वे यदा = (वे) सब-की- सब जब; प्रमुच्यन्ते = समूल नष्ट हो जाती हैं, अथ = तब, मर्त्यः = मरणधर्मा मनुष्य, अमृतः = अमर, भवति = हो जाता है (और), अत्र = (वह) यहीं, ब्रह्म समश्नुते = ब्रह्मका भलीभाँति अनुभव कर लेता है ॥ १४ ॥ व्याख्या—मनुष्यका हृदय नित्य-निरन्तर विभिन्न प्रकारकी इहलौकिक और पारलौकिक कामनाओसे भरा रहता है; इसी कारण न तो वह कभी यह विचार ही करता है कि परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है और न काम्यविषयोंकी आसक्तिके कारण वह परमात्माको पानेकी अभिलाषा ही करता है। ये सारी कामनाएँ साधक पुरुषके हृदयसे जब समूल नष्ट हो जाती हैं, तब वह—जो सदासे मरणधर्मा था— अमर हो जाता है और यहीं— इस मनुष्य-शरीरमें ही उस परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति साक्षात् अनुभव कर लेता है ॥ १४ ॥ सम्बन्ध—संशयरहित दृढ निश्चयकी महिमा बतलाते हैं— यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम् ॥१५॥ यदा = जब (इसके), हृदयस्य = हृदयकी, सर्वे = सम्पूर्ण; ग्रन्थयः = ग्रन्थियाँ, प्रभिद्यन्ते = भलीभाँति खुल जाती हैं; अथ = तब; मर्त्यः = वह मरणधर्मा मनुष्य, इह = इसी शरीरमें; अमृतः = अमर; भवति = हो जाता है, हि एतावत् = बस, इतना ही; अनुशासनम् = सनातन उपदेश है ॥ १५ ॥

२३२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-जब साधकके हृदयकी अहन्ता-ममतारूप समस्त अज्ञान ग्रन्थियाँ भलीभाँति कट जाती हैं, उसके सब प्रकार- के संशय सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और उपर्युक्त उपदेशके अनुसार उसे यह दृढ निश्चय हो जाता है कि 'परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं और वे निश्चय ही मिलते हैं,' तब वह इस शरीरमें रहते हुए ही परमात्माका साक्षात् करके अमर हो जाता है। बस, इतना ही वेदान्तका सनातन उपदेश है ॥ १५ ॥ सम्बन्ध-अब मरनेके बाद होनेवाली जीवात्माकी गतिका वर्णन करते हैं- शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्डन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥१६॥ हृदयस्य=हृदयकी; शतम् च एका च= (कुल मिलाकर) एक सौ एक, नाड्यः =नाड़ियाँ हैं; तासाम् =उनमेंसे; एका=एक; मूर्धानम् =मूर्धा (कपाल) की ओर, अभिनिःसृता=निकली हुई है (इसे ही सुषुम्णा कहते हैं); तया= उसके द्वारा, ऊर्ध्वम् =ऊपरके लोकोंमें; आयन्=जाकर (मनुष्य), अमृतत्वम् =अमृतभावको; एति=प्राप्त हो जाता है; अन्याः=दूसरी एक सौ नाड़ियाँ; उत्क्रमणे =मरणकालमें (जीवको); विष्वङ्=नाना प्रकारकी योनियोंमे ले जानेकी हेतु; भवन्ति =होती है ॥ १६ ॥ व्याख्या-हृदयमें एक सौ एक प्रधान नाड़ियाँ हैं, जो वहाँसे सब ओर फैली हुई हैं। उनमेंसे एक नाड़ी, जिसको सुषुम्णा कहते हैं, हृदयसे मस्तककी ओर गयी है। भगवान्‌के परमधाममें जानेका अधिकारी उस नाड़ीके द्वारा शरीरसे बाहर निकलकर सबसे ऊँचे लोकमें अर्थात् भगवान्‌के परमधाममे जाकर अमृतस्वरूप परमानन्दमय परमेश्वरको प्राप्त हो जाता है; और दूसरे जीव मरणकालमें दूसरी नाड़ियोंके द्वारा शरीरसे बाहर निकलकर अपने-अपने कर्म और वासनाके अनुसार नाना योनियोंको प्राप्त होते हैं ॥ १६ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण। तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥१७॥ अन्तरात्मा=सबका अन्तर्यामी, अङ्गुष्ठमात्रः =अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला, पुरुषः=परम पुरुष, सदा =सदैव, जनानाम् = मनुष्योंके, हृदये=हृदयमें, संनिविष्टः =भलीभाँति प्रविष्ट है; तम् =उसको, मुञ्जात् =मूँजसे; इषीकाम् इव =सींककी भाँति, स्वात्=अपनेसे (और), शरीरात् =शरीरसे, धैर्येण=धीरतापूर्वक, प्रवृहेत्=पृथक् करके देखे; तम् =उसीको, शुक्रम् अमृतम् विद्यात्=विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे, तम् शुक्रम् अमृतम् विद्यात् = (और) उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे ॥ १७ ॥ व्याख्या-सबके अन्तर्यामी परमपुरुष परमेश्वर हृदयके अनुरूप अङ्गुष्ठमात्र रूपवाले होकर सदैव सभी मनुष्योंके भीतर निवास करते हैं, तो भी मनुष्य उनकी ओर देखतातक नहीं ! जो प्रमादरहित होकर उनकी प्राप्तिके साधनमे लगे हैं, उन मनुष्योंको चाहिये कि उन शरीरस्थ परमेश्वरको इस शरीरसे और अपने-आपसे भी उसी तरह पृथक् और विलक्षण समझें, जैसे साधारण लोग मूँजसे सींकको पृथक् देखते हैं। अर्थात् जिस प्रकार मूँजमें रहनेवाली सींक मूँजसे विलक्षण और पृथक् है, उसी प्रकार वह शरीर और आत्माके भीतर रहनेवाला परमेश्वर उन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है। वही विशुद्ध अमृत है, वही विशुद्ध अमृत है। यहाँ यह वाक्यकी पुनरावृत्ति उपदेशकी समाप्ति एव सिद्धान्तकी निश्चितताको सूचित करती है* ॥ १७ ॥

  • इसका अन्य आदरणीय महानुभावोंने यह अर्थ किया है— “अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जो जीवोंके हृदयमें स्थित उनका अन्तरात्मा है, उसे धैर्य-—अप्रमादपूर्वक मूँजसे सींकके निकालनेके समान शरीरसे बाहर निकालकर पृथक् करे। शरीरमे पृथक् किये हुए उस अङ्गुष्ठमात्र पुरुषको ही चिन्मात्र विशुद्ध और अमृतमय ब्रह्म जाने। यहा 'त विद्याच्छुक्रममृतम्' इस पदकी द्विरुक्ति और 'इति' उपनिषद्‌की समाप्तिके लिये है।”
  • कठोपनिषद् * २३३ मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् । ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥१८॥ अथ=इस प्रकार उपदेश सुननेके अनन्तर; नचिकेता=नचिकेता; मृत्युप्रोक्ताम्=यमराजद्वारा बतलायी हुई; एताम्=इस; विद्याम् च=विद्याको और; कृत्स्नम्=सम्पूर्ण; योगविधिम्=योगकी विधिको; लब्ध्वा=प्राप्त करके; विमृत्युः= मृत्युसे रहित (और); विरजः( सन् )=विशुद्ध—सब प्रकारके विकारोंसे शून्य होकर; : अभूत्=ब्रह्मको प्राप्त हो गया; अन्यः अपि यः=दूसरा भी जो कोई; ( इदम् ) अध्यात्मम् एवं वित्=इस अध्यात्मविद्याको इसी प्रकार जानने- वाला है; ( सः अपि एवम् ) एव (भवति)=वह भी ऐसा ही हो जाता है अर्थात् मृत्यु और विकारोंसे रहित होकर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥ व्याख्या-इस प्रकार यमराजके द्वारा उपदिष्ट समस्त विवेचनको श्रद्धापूर्वक सुननेके पश्चात् नचिकेता उनके द्वारा बतायी हुई सम्पूर्ण विद्या और योगकी विधिको प्राप्त करके जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त, सब प्रकारके विकारोंसे रहित एव सर्वथा विशुद्ध होकर परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त हो गया । दूसरा भी जो कोई इस अध्यात्मविद्याको इस प्रकार नचिकेताकी भाँति ठीक-ठीक जाननेवाला और श्रद्धापूर्वक उसे धारण करनेवाला है, वह भी नचिकेताकी भाँति सब विकारोंसे रहित तथा जन्म-मृत्युसे मुक्त होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥ ॥ तृतीय वल्ली ॥३॥ ॥ द्वितीय अध्याय ॥२॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कठोपनिषद् ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ कठोपनिषद्‌के आरम्भमे दिया जा चुका है ।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ प्रश्नोपनिषद् प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेदके पिप्पलाद शाखीय ब्राह्मणभागके अन्तर्गत है। इस उपनिषद्मे पिप्पलाद ऋषिने सुकेशा आदि छः ऋषियोंके छः प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर दिया है, इसलिये इसका नाम प्रश्नोपनिषद् हो गया। शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! देवाः=हे देवगण !; (वयम्) यजत्राः (सन्तः)=हम भगवान्‌का यजन (आराधन) करते हुए, कर्णेभिः= कानोंसे, भद्रम्=कल्याणमय वचन, शृणुयाम=सुनें, अक्षभिः=नेत्रोंसे; भद्रम्=कल्याण (ही), पश्येम=देखें, स्थिरैः=सुदृढ; अङ्गैः=अङ्गों, तनूभिः=एव शरीरसे, तुष्टुवांसः (वयम्)=भगवान्‌की स्तुति करते हुए हमलोग; यत्=जो; आयुः= आयु, देवहितम्=आराध्यदेव परमात्माके काम आ सके; (तत्)=उसका; व्यशेम=उपभोग करें, वृद्धश्रवाः=सब ओर फैले हुए सुयशवाले, इन्द्रः=इन्द्र, नः=हमारे लिये; स्वस्ति दधातु=कल्याणका पोषण करें, विश्ववेदाः=सम्पूर्ण विश्वका ज्ञान रखनेवाले, पूषा=पूषा; नः=हमारे लिये; स्वस्ति (दधातु)=कल्याणका पोषण करें;, अरिष्टनेमिः=अनिष्टोंको मिटानेके लिये चक्रसदृश शक्तिशाली, तार्क्ष्यः=गरुड़देव, नः=हमारे लिये; स्वस्ति (दधातु)=कल्याणका पोषण करें; [ तथा=तथा, ] बृहस्पतिः=(बुद्धिके स्वामी) बृहस्पति भी; नः=हमारे लिये, स्वस्ति (दधातु)=कल्याणकी पुष्टि करें; ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः=परमात्मन् ! हमारे त्रिविध तापकी शान्ति हो। व्याख्या—गुरुके यहाँ अध्ययन करनेवाले शिष्य अपने गुरु, सहपाठी तथा मानवमात्रका कल्याण-चिन्तन करते हुए देवताओंसे प्रार्थना करते हैं कि 'हे देवगण ! हम अपने कानोंसे शुभ—कल्याणकारी वचन ही सुनें। निन्दा, चुगली, गाली या दूसरी दूसरी पापकी बातें हमारे कानोंमें न पड़ें और हमारा अपना जीवन यजन-परायण हो—हम सदा भगवान्‌की आराधनामें ही लगे रहें। न केवल कानोंसे सुनें, नेत्रोंसे भी हम सदा कल्याणका ही दर्शन करें। किसी अमङ्गलकारी अथवा पतनकी ओर ले जानेवाले दृश्योंकी ओर हमारी दृष्टिका आकर्षण कभी न हो। हमारा शरीर, हमारा एक-एक अवयव सुदृढ एव सुपुष्ट हो—वह भी इसलिये कि हम उनके द्वारा भगवान्‌का स्तवन करते रहें। हमारी आयु भोग-विलास या प्रमादमें न- बीते। हमें ऐसी आयु मिले, जो भगवान्‌के कार्यमें आ सके। [ देवता हमारी प्रत्येक इन्द्रियमें व्याप्त रहकर उसका संरक्षण और सञ्चालन करते हैं। उनके अनुकूल रहनेसे हमारी इन्द्रियाँ सुगमतापूर्वक सन्मार्गमें लगी रह सकती हैं, अत. उनसे प्रार्थना करनी उचित ही है। ] जिनका सुयश सब ओर फैला है, वे देवराज इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अरिष्टनिवारक तार्क्ष्य (गरुड़) और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति—ये सभी देवता भगवान्‌की दिव्य विभूतियाँ हैं। ये सदा हमारे कल्याणका पोषण करें। इनकी कृपासे हमारे साथ प्राणिमात्रका कल्याण होता रहे। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—सभी प्रकारके तापोंकी शान्ति हो।

  • प्रश्नोपनिषद् * २३५ प्रथम प्रश्न ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैव्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥ ॐ = ॐ इस परमात्माके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं; भारद्वाजः सुकेशा = भरद्वाज-पुत्र सुकेशा; च शैब्यः सत्यकामः = और शिविकुमार सत्यकाम; च गार्ग्यः सौर्यायणी = तथा गर्ग-गोत्रमे उत्पन्न सौर्यायणी; च कौसल्यः आश्वलायनः = एव कोसलदेशीय आश्वलायन; च वैदर्भिः भार्गवः = तथा विदर्भनिवासी भार्गव; ( च ) कात्यायनः कबन्धी = और कत्य ऋषिका प्रपौत्र कबन्धी; ते एते ह ब्रह्मपराः = ये ये छः प्रसिद्ध ऋषि जो कि वेदपरायण (और); ब्रह्मनिष्ठाः = वेदमें निष्ठा रखनेवाले थे; ते ह = वे सब-के-सब; परम् ब्रह्म = परब्रह्मकी; अन्वेषमाणाः = खोज करते हुए; एषः ह वै तत् सर्वम् वक्ष्यति इति = यह समझकर कि ये (पिप्पलाद ऋषि) निश्चय ही उस ब्रह्मके विषयमे सारी बातें बतायेंगे; समित्पाणयः = हाथमे समिधा लिये हुए; भगवन्तम् पिप्पलादम् उपसन्नाः = भगवान् पिप्पलाद ऋषिके पास गये ॥ १ ॥ व्याख्या-ओंकारस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्माका स्मरण करके उपनिषद्‌का आरम्भ किया जाता है । प्रसिद्ध है कि भरद्वाजके पुत्र सुकेशा, शिविकुमार सत्यकाम, गर्गगोत्रमे उत्पन्न सौर्यायणी, कोसलदेश-निवासी आश्वलायन, विदर्भदेशीय भार्गव और कत्यके प्रपौत्र कबन्धी—ये वेदाभ्यासके परायण और ब्रह्मनिष्ठ अर्थात् श्रद्धापूर्वक वेदानुकूल आचरण करनेवाले थे । एक बार ये छहों ऋषि परब्रह्म परमेश्वरकी जिज्ञासासे एक साथ बाहर निकले । इन्होंने सुना था कि पिप्पलाद ऋषि इस विषयको विशेषरूपसे जानते हैं, अतः यह सोचकर कि 'परब्रह्मके सम्बन्धमे हम जो कुछ जानना चाहते हैं, वह सब वे हमें बता देंगे' वे लोग जिज्ञासुके वेषमे हाथमे समिधा लिये हुए महर्षि पिप्पलादके पास गये ॥ १ ॥ तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥ तान् सः ह = उन सुकेशा आदि ऋषियोंसे वे प्रसिद्ध, ऋषिः उवाच = (पिप्पलाद) ऋषि बोले—; भूयः एव = तुमलोग पुनः; श्रद्धया = श्रद्धाके साथ; ब्रह्मचर्येण = ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए; (और) तपसा = तपस्यापूर्वक, संवत्सरम् = एक वर्षतक (यहाँ); संवत्स्यथ = भलीभाँति निवास करो, यथाकामम् = (उसके बाद) अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार; प्रश्नान् पृच्छत = प्रश्न पूछना; यदि विज्ञास्यामः = यदि (तुम्हारी पूछी हुई बातोंको) मैं जानता होऊँगा; ह सर्वम् = तो निस्सन्देह वे सब बातें, वः वक्ष्यामः इति = तुमलोगोंको बताऊँगा ॥ २ ॥ व्याख्या—उपर्युक्त छहों ऋषियोंको परब्रह्मकी जिज्ञासासे अपने पास आया देखकर महर्षि पिप्पलादने उनसे कहा— तुमलोग तपस्वी हो, तुमने ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक साङ्गोपाङ्ग वेद पढे हैं, तथापि मेरे आश्रममे रहकर पुनः एक वर्षतक श्रद्धा- पूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए तपश्चर्या करो । उसके बाद तुमलोग जो चाहो, मुझसे प्रश्न करना । यदि तुम्हारे पूछे हुए विषयका मुझे ज्ञान होगा तो निस्सन्देह तुम्हें सब बातें भलीभाँति समझाकर बतलाऊँगा ॥ २ ॥ सम्बन्ध-ऋषिके आज्ञानुसार सबने श्रद्धा, ब्रह्मचर्य और तपस्याके साथ विधिपूर्वक एक वर्षतक वहाँ निवास किया । अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ । भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ ३ ॥ अथ = तदनन्तर (उनमेसे); कात्यायनः कबन्धी = कत्य ऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने; उपेत्य = (पिप्पलाद ऋषिके) पास जाकर; पप्रच्छ = पूछा—, भगवन् = भगवन् !, कुतः ह वै = किस प्रसिद्ध और सुनिश्चित कारणविशेषसे; इमाः प्रजाः = यह सम्पूर्ण प्रजा, प्रजायन्ते = नाना रूपोंमें उत्पन्न होती है, इति = यह मेरा प्रश्न है ॥ ३ ॥

२३६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—महर्षि पिप्पलादकी आज्ञा पाकर वे लोग श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वहीं तपश्चर्या करने लगे। महर्षिकी देखरेखमें संयमपूर्वक रहकर एक वर्षतक उन्होंने त्यागमय जीवन बिताया। उसके बाद वे सब पुनः पिप्पलाद ऋषिके पास गये तथा उनमेंसे सर्वप्रथम कत्यऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने श्रद्धा और विनयपूर्वक पूछा—'भगवन् ! जिससे ये सम्पूर्ण चराचर जीव नाना रूपोंमें उत्पन्न होते हैं, जो इनका सुनिश्चित परम कारण है, वह कौन है ?' ॥ ३ ॥ तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पाद॑यते । रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥ तस्मै सः ह उवाच=उससे वे प्रसिद्ध महर्षि बोले—; वै प्रजाकामः = निश्चय ही प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छावाला (जो); प्रजापतिः =प्रजापति है, सः तपः अतप्यत =उसने तप किया; स तपः तप्त्वा=उसने तपस्या करके (सृष्टि आरम्भ की, उस समय पहले); सः=उसने; रयिम् च = एक तो रयि (चन्द्रमा) तथा; प्राणम् च= दूसरा प्राण (सूर्य) भी; इति मिथुनम्= यह जोड़ा; उत्पादयेते=उत्पन्न किया, एतौ मे=(इन्हें उत्पन्न करनेका उद्देश्य यह था) कि ये (दोनों मिलकर) मेरी; बहुधा=नाना प्रकारकी; प्रजाः=प्रजाओंको, करिष्यतः इति=उत्पन्न करेंगे ॥ ४ ॥ व्याख्या—कबन्धी ऋषिका यह प्रश्न सुनकर महर्षि पिप्पलाद बोले-हे कात्यायन ! यह बात वेदोंमें प्रसिद्ध है कि सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी परमेश्वरको सृष्टिके आदिमें जब प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छा हुई तो उन्होंने सङ्कल्परूप तप किया । तपसे उन्होंने सर्वप्रथम रयि और प्राण-इन दोनोंका एक जोड़ा उत्पन्न किया । उसे उत्पन्न करनेका उद्देश्य यह था कि ये दोनों मिलकर मेरे लिये नाना प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न करेंगे । इस मन्त्रमें सबको जीवन प्रदान करनेवाली जो समष्टि जीवनी-शक्ति है, उसे ही 'प्राण' नाम दिया गया है। इस जीवनी शक्तिसे ही प्रकृतिके स्थूल स्वरूपमें-समस्त पदार्थोंमें जीवन, स्थिति और यथा- योग्य सामञ्जस्य आता है एव स्थूल भूत समुदायका नाम 'रयि' रक्खा गया है, जो प्राणरूप जीवनी शक्तिसे अनुप्राणित होकर कार्यक्षम होता है । प्राण चेतना है, रयि शक्ति या आकृति है। धनात्मक और ऋणात्मक दो तत्त्वोंकी भाँति प्राण और रयिक संयोगसे ही सृष्टिका समस्त कार्य सम्पन्न होता है। इन्हींको अन्यत्र अग्नि और सोमके एव पुरुष तथा प्रकृतिके नामसे भी कहा गया है ॥ ४ ॥ आदित्यो ह वैप्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत् सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥५॥ ह=यह निश्चय है कि; आदित्यः वै=सूर्य ही; प्राणः =प्राण हैं (और); चन्द्रमाः एव =चन्द्रमा ही; रयिः= रयि है; यत् मूर्तम् च=जो कुछ आकारवाला है (पृथ्वी, जल और तेज); अमूर्तम् च=और जो आकाररहित है (आकाश और वायु), एतत् सर्वम् वै=यह सभी कुछ; रयिः =रयि है; तस्मात्=इसलिये; मूर्तिः एव =मूर्तमात्र ही अर्थात् देखने तथा जाननेमें आनेवाली सभी वस्तुएँ, रयिः=रयि हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें उपर्युक्त प्राण और रयिका स्वरूप समझाया गया है। पिप्पलाद कहते हैं कि यह दीखनेवाला सम्पूर्ण जगत् प्राण और रयि-इन दोनो तत्त्वोंके संयोग या सम्मिश्रणसे बना है, इसलिये यद्यपि इन्हें पृथक् पृथक् करके नहीं बताया जा सकता, तथापि तुम इस प्रकार समझो-यह सूर्य, जो हमें प्रत्यक्ष दिखलायी देता है, यही प्राण है, क्योंकि इसीमें सबको जीवन प्रदान करनेवाली चेतना-शक्तिकी प्रधानता और अधिकता है। यह सूर्य उस सूक्ष्म जीवनी शक्तिका घनीभूत स्वरूप है। उसी प्रकार यह चन्द्रमा ही 'रयि' है, क्योंकि इसमें स्थूल तत्त्वोंको पुष्ट करनेवाली भूत तन्मात्राओंकी ही अधिकता है। समस्त प्राणियोंके स्थूल शरीरोंका पोषण इस चन्द्रमाकी शक्तिको पाकर ही होता है। हमारे शरीरोंमें ये दोनों शक्तियाँ प्रत्येक अङ्ग प्रत्यङ्गमें व्याप्त हैं। उनमें जीवनी शक्तिका सम्बन्ध सूर्यसे है और मास, मेद आदि स्थूल तत्त्वोका सम्बन्ध चन्द्रमासे है॥५॥ अथादित्य उद्यन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते । यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६ ॥

  • प्रश्नोपनिषद् * २३७ अथ=रात्रिके अनन्तर; उदयन्=उदय होता हुआ; आदित्यः=सूर्य; यत् प्राचीम् दिशम्=जो पूर्व दिशामें; प्रविशति=प्रवेश करता है; तेन प्राच्यान् प्राणान्=उससे पूर्व दिशाके प्राणोंको; रश्मिषु=अपनी किरणोंमें; संनिधत्ते= धारण करता है (उसी प्रकार); यत् दक्षिणाम्=जो दक्षिण दिशाको; यत् प्रतीचीम्=जो पश्चिम दिशाको; यत् उदीचीम्=जो उत्तर दिशाको; यत् अधः=जो नीचेके लोकोंको; यत् ऊर्ध्वम्=जो ऊपरके लोकोंको; यत् अन्तरा दिशः= जो दिशाओंके बीचके भागों (कोणों) को (और); यत् सर्वम्=जो अन्य सबको; प्रकाशयति=प्रकाशित करता है; तेन सर्वान् प्राणान्=उससे समस्त प्राणोंको अर्थात् सम्पूर्ण जगत्के प्राणोंको; रश्मिषु संनिधत्ते=अपनी किरणोंमें धारण करता है ॥ ६ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंमें जो जीवनी-शक्ति है, उसके साथ सूर्यका सम्बन्ध दिखलाया गया है। भाव यह है कि रात्रिके बाद जब सूर्य उदय होकर पूर्वदिशामे अपना प्रकाश फैलाता है, उस समय वहाँके प्राणियोंके प्राणोंको अपनी किरणोंमें धारण करता है अर्थात् उनकी जीवनी-शक्तिका सूर्यकी किरणोंसे सम्बन्ध होकर उसमें नवीन स्फूर्ति आ जाती है। उसी प्रकार जिस समय जिस दिशामे जहाँ-जहाँ सूर्य अपना प्रकाश फैलाता है, वहाँ-वहाँके प्राणियोंको स्फूर्ति देता रहता है; अतः सूर्य ही समस्त प्राणियोंका प्राण है ॥ ६ ॥ स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥ ७ ॥ सः एषः=वह यह सूर्य ही; उदयते=उदय होता है; वैश्वानरः अग्निः=(जो कि) वैश्वानर अग्नि (जठराग्नि) और; विश्वरूपः प्राणः=विश्वरूप प्राण है; तत् एतत्=वही यह बात; ऋचा=ऋचाद्वारा; अभ्युक्तम्=आगे कही गयी है ॥७॥ व्याख्या—प्राणियोंके शरीरमे जो वैश्वानर नामसे कही जानेवाली जठराग्नि है, जिससे अन्नका पाचन होता है (गीता १५। १४), वह सूर्यका ही अंश है; अतः सूर्य ही है। तथा जो प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—इन पाँच रूपोंमें विभक्त प्राण है, वह भी इस उदय होनेवाले सूर्यका ही अंश है, अतः सूर्य ही है। यही बात अगली ऋचा- द्वारा समझायी गयी है ॥ ७ ॥ विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ८ ॥ विश्वरूपम्=सम्पूर्ण रूपोंके केन्द्र; जातवेदसम्=सर्वज्ञ; परायणम्=सर्वाधार; ज्योतिः=प्रकाशमय; तपन्तम्= तपते हुए; हरिणम्=किरणोंवाले सूर्यको; एकम्=अद्वितीय (बतलाते हैं), एषः=यह; सहस्ररश्मिः=सहस्रों किरणोंवाला; सूर्यः=सूर्य; ୧ :=सैकड़ों प्रकारसे वर्तता हुआ; प्रजानाम्=समस्त जीवोंका; प्राणः=प्राण (जीवनदाता) होकर; उदयति=उदय होता है ॥ ८ ॥ व्याख्या—इस सूर्यके तत्त्वको जाननेवालोंका कहना है कि यह किरणजालसे मण्डित एव प्रकाशमय, तपता हुआ सूर्य विश्वके समस्त रूपोंका केन्द्र है। सभी रूप (रग और आकृतियाँ) सूर्यसे उत्पन्न और प्रकाशित होते हैं। यह सविता ही सबका उत्पत्तिस्थान है और यही सबकी जीवन-ज्योतिका मूलस्रोत है। यह सर्वज्ञ और सर्वाधार है, वैश्वानर अग्नि और प्राण- शक्तिके रूपमें सर्वत्र व्याप्त है और सबको धारण किये हुए है। समस्त जगत्का प्राणरूप सूर्य एक ही है—इसके समान इस जगत्में दूसरी कोई भी जीवनी-शक्ति नहीं है। यह सहस्रों किरणोंवाला सूर्य हमारे सैकड़ों प्रकारके व्यवहार सिद्ध करता हुआ उदय होता है। जगत्में उष्णता और प्रकाश फैलाना, सबको जीवन प्रदान करना, ऋतुओंका परिवर्तन करना आदि हमारी सैकड़ों प्रकारकी आवश्यकताओंको पूर्ण करता हुआ सम्पूर्ण सृष्टिका जीवनदाता प्राण ही सूर्यके रूपमें उदित होता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—इस प्रकार यहाँतक कात्यायन कबन्धीके प्रश्नानुसार संक्षेपमें यह बताया गया कि उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरसे ही उसके सङ्कल्पद्वारा प्राण और रयिके संयोगसे इस सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति आदि होती है। अब इस प्राणशक्ति और रयि- शक्तिके सम्बन्धसे परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार और उसका फल बतलानेके लिये दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं—

२३८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च। तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ९ ॥ संवत्सरः वै=संवत्सर (बारह महीनोंवाला काल) ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; तस्य अयने=उसके दो अयन हैं-, दक्षिणम् च=एक दक्षिण और; उत्तरम् च=दूसरा उत्तर, तत् ये ह=वहाँ मनुष्योंमें जो लोग निश्चयपूर्वक; तत् इष्टापूर्ते वै= (केवल) उन इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही, कृतम् इति=करने योग्य कर्म मानकर (सकाम भावसे), उपासते= उनकी उपासना करते हैं (उन्हींके अनुष्ठानमें लगे रहते हैं), ते चान्द्रमसम् = वे चन्द्रमाके; लोकम् एव=लोकको ही; अभिजयन्ते=जीतते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं (और); ते एव=वे ही, पुनः आवर्तन्ते=पुनः (वहाँसे) लौटकर आते हैं, तस्मात् एते= इसलिये ये, प्रजाकामाः ऋषयः = सन्तानकी कामनावाले ऋषिगण, दक्षिणम् प्रतिपद्यन्ते= दक्षिण (मार्ग) को प्राप्त होते हैं; ह एषः वै रयिः = निस्सन्देह यही वह रयि है; य. पितृयाणः = जो 'पितृयान' नामक मार्ग है ॥ ९॥ व्याख्या- इस मन्त्रमें संवत्सरको परमात्माका प्रतीक बताकर उसके रयिस्थानीय भोग्य पदार्थोंकी उपासना और उसका फल बताते हैं। भाव यह है कि बारह महीनोंका यह संवत्सररूप काल ही मानो सृष्टिके स्वामी परमेश्वरका स्वरूप है। इसके दो अयन हैं - दक्षिण और उत्तर । दक्षिणायनके जो छः महीने हैं, जिनमें सूर्य दक्षिणकी ओर घूमता है - ये मानो इसके दक्षिण अङ्ग हैं और उत्तरायणके छः महीने ही उत्तर अङ्ग हैं। उनमें उत्तर अङ्ग तो प्राण है अर्थात् इस विश्वके आत्मारूप उस परमेश्वरका सर्वान्तर्यामी स्वरूप है और दक्षिण अङ्ग रयि अर्थात् उसका बाह्य भोग्य स्वरूप है। इस जगत्में जो सन्तानकी कामनावाले ऋषि स्वर्गादि सांसारिक भोगोंमें आसक्त हैं, वे यज्ञादिद्वारा देवताओंका पूजन करना, ब्राह्मण एव श्रेष्ठ पुरुषोंका धनादिसे सत्कार करना, दुखी प्राणियोंकी सेवा करना आदि इष्टकर्म तथा कुँआ, बावली, तालाब, बगीचा, धर्मशाला, विद्यालय, औषधालय, पुस्तकालय आदि लोकोपकारी चिरस्थायी स्मारकोंकी स्थापना करना आदि पूर्तकर्मोंको श्रेष्ठ समझते हैं और इनके फलस्वरूप इस लोक तथा परलोकके भोगोंके उद्देश्यसे इनकी उपासना अर्थात् विधिवत् अनुष्ठान करते हैं, यह उस संवत्सररूप परमेश्वरके दक्षिण अङ्गकी उपासना है। इसीको ईशावास्य-उपनिषद्में असम्भूतिकी उपासनाके नामसे देव, पितर, मनुष्य आदि शरीरोंकी सेवा बताया है। इसके प्रभावसे वे चन्द्रलोकको प्राप्त होते हैं और वहाँ अपने कर्मोंका फल भोगकर पुनः इस लोकमें लौट आते हैं, यही पितृयाण मार्ग है ॥ ९ ॥ अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामा- यतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥ १० ॥ अथ= किंतु (जो), तपसा = तपस्याके साथ; ब्रह्मचर्येण = ब्रह्मचर्यपूर्वक (और); श्रद्धया = श्रद्धासे युक्त होकर; विद्यया = अध्यात्मविद्याके द्वारा; आत्मानम् = (सूर्यरूप) परमात्माकी; अन्विष्य = खोज करके (जीवन सार्थक करते हैं, वे); उत्तरेण = उत्तरायण-मार्गसे, आदित्यम् = सूर्यलोकको; अभिजयन्ते = जीत लेते हैं (प्राप्त करते हैं), एतत् वै=यह (सूर्य) ही, प्राणानाम् = प्राणों का, आयतनम् = केन्द्र है, एतत् अमृतम् = यह अमृत (अविनाशी) और, अभयम् = निर्भय पद है, एतत् परायणम् = यह परमगति है, एतस्मात् = इससे, न पुन. आवर्तन्ते = पुनः लौटकर नहीं आते, इति एषः = इस प्रकार यह, निरोधः = निरोध (पुनरावृत्तिका निवारक) है, तत् एषः = इस बात को स्पष्ट करनेवाला यह (अगला), श्लोकः = श्लोक है ॥ १० ॥ व्याख्या - उपर्युक्त सकाम उपासकोंसे भिन्न जो कल्याणकामी साधक हैं, वे इन सांसारिक भोगोंकी अनित्यता और दुःखरूपताको समझकर इनसे सर्वथा विरक्त हो जाते हैं। वे श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सयमके साथ त्यागमय जीवन बिताते हैं और अध्यात्मविद्याके द्वारा अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले किसी भी अनुकूल साधनद्वारा सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरकी निष्काम उपासना करते हैं। यह मानो उस संवत्सररूप प्रजापतिके उत्तर अङ्गकी उपासना है। इसको ईशावास्य-उपनिषद्में सम्भूतिकी उपासना कहा है। इसके उपासक उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकमे जाकर सूर्यके आत्मारूप

परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त हो जाते हैं। यह सूर्य ही समस्त जगत्‌के प्राणोंका केन्द्र है। यही अमृत—अविनाशी और निर्भय पद है। यही परम गति है। इसे प्राप्त हुए महापुरुष फिर लौटकर नहीं आते। यह निरोध अर्थात् पुनर्जन्मको रोकनेवाला- आत्यन्तिक प्रलय है। इस मन्त्रमें सूर्यको परमेश्वरका स्वरूप मानकर ही सब बातें कही गयी हैं। इसी बातको अगले मन्त्रमे स्पष्ट किया गया है ॥ १० ॥ पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् । अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥ (कितने ही लोग तो इस सूर्यको)—पञ्चपादम् = पाँच चरणोंवाला; पितरम् = सबका पिता; द्वादशाकृतिम् = बारह आकृतियोंवाला; पुरीषिणम् = जलका उत्पादक; दिवः परे अर्धे = (और) स्वर्गलोकसे भी ऊपरके स्थानमें (स्थित), आहुः = बतलाते हैं; अथ इमे = तथा ये; अन्ये उ = दूसरे कितने ही लोग; परे = विशुद्ध; सप्तचक्रे = सात पहियोंवाले (और); षडरे = छः अरोंवाले (रथमे); अर्पितम् = बैठा हुआ (एव); विचक्षणम् = सबको भलीभाँति जाननेवाला है, इति आहुः = ऐसा बतलाते हैं ॥ ११ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरके प्रत्यक्ष—दृष्टिगोचर स्वरूप इस सूर्यके विषयमें कितने ही तत्त्ववेत्ता तो यों कहते हैं कि इसके पाँच पैर हैं। अर्थात् छः ऋतुओंमेंसे हेमन्त और शिशिर—इन दो ऋतुओंकी एकता करके पाँच ऋतुओंको ने इस सूर्यके पाँच चरण बतलाते हैं; तथा यह भी कहते हैं कि बारह महीने ही इसकी बारह आकृतियों अर्थात् बारह शरीर हैं। इसका स्थान स्वर्गलोकसे भी ऊँचा है। स्वर्गलोक भी इसीके आलोकसे प्रकाशित है। इस लोकमें जो जल बरसता है, उस जलकी उत्पत्ति इसीसे होती है। अतः सबको जलरूप जीवन प्रदान करनेवाला होनेसे यह सबका पिता है। दूसरे ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि लाल, पीले आदि सात गाँकी किरणोंसे युक्त तथा वसन्त आदि छः ऋतुओंके हेतुभूत इस विशुद्ध प्रकाशमय सूर्यमण्डलमें—जिसे सात चक्र एव छः अरोंवाला रथ कहा गया है—बैठा हुआ इसका आत्मारूप, सबको भलीभाँति जाननेवाला सर्वज्ञ परमेश्वर ही उपास्य है। यह स्थूल नेत्रोंसे दिखायी देनेवाला सूर्यमण्डल उसका शरीर है। इसलिये यह उसीकी महिमा है ॥ ११ ॥ मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः : प्राणस्तस्मादेत : शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥ मासः वै = महीना ही; प्रजापतिः = प्रजापति है; तस्य = उसका; कृष्णपक्षः एव = कृष्णपक्ष ही; रयिः = रयि है और; शुक्लः प्राणः = शुक्लपक्ष प्राण है; तस्मात् = इसलिये; एते ऋषयः = ये (कल्याणकामी) ऋषिगण; शुक्ले = शुक्ल- पक्षमे (निष्कामभावसे), इष्टम् = यज्ञादि कर्तव्य-कर्म; कुर्वन्ति = किया करते हैं; (तथा) इतरे = दूसरे (जो सांसारिक भोगोंको चाहते हैं); इतरस्मिन् = दूसरे पक्षमे—कृष्णपक्षमें (सकामभावसे यज्ञादि शुभकर्मोंका अनुष्ठान किया करते हैं) ॥ १२ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें महीनेको प्रजापतिका रूप देकर परमेश्वरकी कर्मोंद्वारा उपासना करनेका रहस्य बताया गया है। भाव यह है कि प्रत्येक महीना ही मानो प्रजापति है, उसमें कृष्णपक्षके पंद्रह दिन तो उस परमात्माका दाहिना अङ्ग हैं; इसे रयि (स्थूलभूत-समुदायका कारण) समझना चाहिये। यह उस परमेश्वरका शक्तिस्वरूप भोगमय रूप है। और शुक्ल- पक्षके पंद्रह दिन ही मानो उत्तर अङ्ग हैं। यही प्राण अर्थात् सबको जीवन प्रदान करनेवाले परमात्माका सर्वान्तर्यामी रूप है। इसलिये जो कल्याणकामी ऋषि हैं, अर्थात् जो रयिस्थानीय भोग-पदार्थोंसे विरक्त होकर प्राणस्थानीय सर्वात्मरूप परब्रह्म- को चाहनेवाले हैं, वे अपने समस्त शुभ कर्मोंको शुक्लपक्षमें करते हैं अर्थात् शुक्लपक्षस्थानीय प्राणाधार परब्रह्म परमेश्वरके अर्पण करके करते हैं—स्वय उसका कोई फल नहीं चाहते, यही गीतोक्त कर्मयोग है। इनसे भिन्न जो भोगासक्त मनुष्य हैं, वे कृष्णपक्षमे अर्थात् कृष्णपक्ष-स्थानीय स्थूल पदार्थोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे सब प्रकारके कर्म किया करते हैं। इनका वर्णन गीतामें 'स्वर्गपराः' के नामसे हुआ है (गीता २। ४२—४४) ॥ १२ ॥

२४० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥ अहोरात्रः वै=दिन और रातका जोड़ा ही, प्रजापतिः = प्रजापति है; तस्य = उसका; अहः एव= दिन ही; प्राणः = प्राण है (और); रात्रिः एव = रात्रि ही; रयिः = रयि है; ये दिवा = ( अतः ) जो दिनमे; रत्या संयुज्यन्ते = स्त्री- सहवास करते हैं; एते= ये लोग; वै प्राणम् = सचमुच अपने प्राणोको ही; प्रस्कन्दन्ति = क्षीण करते हैं तथा (मनुष्य); यत् रात्रौ = जो रात्रिमें; रत्या संयुज्यन्ते = स्त्री-सहवास करते हैं; तत् ब्रह्मचर्यम् एव = वह ब्रह्मचर्य ही है ॥ १३ ॥ व्याख्या - इस मन्त्रमें दिन और रात्रिरूप चौबीस घंटेके कालरूपमे परमेश्वरके स्वरूपकी कल्पना करके जीवनोपयोगी कर्मोंका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि ये दिन और रात मिलकर जगत्पति परमेश्वरका पूर्णरूप हैं। उसका यह दिन तो मानो प्राण अर्थात् सबको जीवन देनेवाला प्रकाशमय विशुद्ध स्वरूप है और रात्रि ही भोगरूप रयि है। अतः जो मनुष्य दिनमे स्त्री-प्रसङ्ग करते है अर्थात् परमात्माके विशुद्ध स्वरूपको प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रकाशमय मार्गमें चलना प्रारम्भ करके भी स्त्री-प्रसङ्ग आदि विलासमे आसक्त हो जाते है, वे अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इस अमूल्य जीवनको व्यर्थ खो देते हैं। उनसे भिन्न जो सासारिक उन्नति चाहनेवाले हैं, वे यदि शास्त्रके नियमानुसार ऋतुकालमे रात्रिके समय नियमानुकूल स्त्री-प्रसङ्ग करते है तो वे शास्त्रकी आज्ञाका पालन करनेके कारण ब्रह्मचारीके तुल्य ही हैं। लौकिक दृष्टिसे यों कह सकते हैं कि इस मन्त्रमे गृहस्थोको दिनमे स्त्री-प्रसङ्ग कदापि न करनेका और विहित रात्रियोंमें शास्त्रानुसार नियमित और संयमितरूपमें केवल सन्तानकी इच्छासे करनेका उपदेश दिया गया है। तभी वह ब्रह्मचर्यकी गणनामे आ सकता है* ॥ १३ ॥ अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥ अन्नम् वै = अन्न ही; प्रजापतिः = प्रजापति है; ह ततः वै = क्योंकि उसीसे; तत् रेतः = वह वीर्य ( उत्पन्न होता है ), तस्मात् = उस वीर्यसे, इमाः प्रजाः = ये सम्पूर्ण चराचर प्राणी; प्रजायन्ते इति = उत्पन्न होते हैं ॥ १४ ॥ व्याख्या- इस मन्त्रमें अन्नको प्रजापतिका स्वरूप बताकर अन्नकी महिमा बतलाते हुए कहते हैं कि यह सब प्राणियोंका आहाररूप अन्न ही प्रजापति है, क्योंकि इसीसे वीर्य उत्पन्न होता है और वीर्यसे समस्त चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। इस कारण इस अन्नको भी प्रकारान्तरसे प्रजापति माना गया है ॥ १४ ॥ सम्बन्ध- अब पहले बतलाये हुए दो प्रकारके साधकोंको मिलनेवाले पृथक्-पृथक् फलका वर्णन करते हैं- तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ तत् ये ह वै = जो कोई भी निश्चयपूर्वक; तत् प्रजापतिव्रतम् = उस प्रजापति-व्रतका; चरन्ति = अनुष्ठान करते हैं; ते मिथुनम् = वे जोड़ेको; उत्पादयन्ते = उत्पन्न करते हैं; येषाम् तपः = जिनमें तप ( और ); ब्रह्मचर्यम् = ब्रह्मचर्य (है); येषु सत्यम् = जिनमें सत्य; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है; तेषाम् एव = उन्हींको; एषः ब्रह्मलोकः = यह ब्रह्मलोक मिलता है ॥ १५ ॥ व्याख्या-जो लोग सन्तानोत्पत्तिरूप प्रजापतिके व्रतका अनुष्ठान करते हैं अर्थात् स्वर्गादि लोकोके भोगकी प्राप्तिके लिये शास्त्रविहित शुभ कर्मोंका आचरण करते हुए नियमानुसार स्त्री-प्रसङ्ग आदि भोगोंका उपभोग करते हैं, वे तो पुत्र और कन्यारूप जोड़ेको उत्पन्न करके प्रजाकी वृद्धि करते हैं। और जो उनसे भिन्न हैं, जिनमे ब्रह्मचर्य और तप भरा हुआ है,

  • रजोदर्शनके दिनसे लेकर सोलह दिनोंतक स्वाभाविक ऋतुकाल कहलाता है। इनमें पहली चार रात्रियों तथा ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रियों सर्वथा वर्जित हैं। शेष दस रात्रियोंमें पर्व- ( एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, ग्रहण, व्यतीपात, सक्रान्ति, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, रामनवमी आदि ) दिनोंको छोड़कर पत्नीकी रतिकामनासे जो पुरुष महीनेमें केवल दो रात्रि स्त्री-सहवास करता है, वह गृहस्थाश्रममें रहता हुआ ही ब्रह्मचारी माना जाता है। ( मनुस्मृति ३ । ४५-४७, ५०)

~ प्रश्नोपनिषद् * २४१ जिनका जीवन सत्यमय है तथा जो सत्यस्वरूप परमेश्वरको अपने हृदयमे नित्य स्थित देखते हे, उन्हींको वह ब्रह्मलोक ( परम पद, परमगति ) मिलता है, दूसरोंको नहीं ॥ १५ ॥ तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥ येषु न=जिनमें न तो, जिह्मम्=कुटिलता ( और ), अनृतम्=झूठ है; च न=तथा न, माया=माया ( कपट ) ही है, तेषाम्=उन्हींको; असौ=वह, विरजः=विशुद्ध, विकाररहित, ब्रह्मलोकः इति=ब्रह्मलोक ( मिलता है ) ॥ १६ ॥ व्याख्या-जिनमे कुटिलताका लेश भी नहीं है, जो स्वप्ने भी मिथ्या-भाषण नहीं करते और असत्यमय आचरणसे सदा दूर रहते हैं, जिनमे राग-द्वेषादि विकारोका सर्वथा अभाव है, जो सब प्रकारके छल-कपटसे शून्य हैं, उन्हींको वह विशुद्ध विकाररहित ब्रह्मलोक मिलता है । जो इनसे विपरीत लक्षणोवाले हैं, उनको नहीं मिलता ॥ १६ ॥ ॥ प्रथम प्रश्न समाप्त ॥ १ ॥ +++ द्वितीय प्रश्न अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥ अथ ह एनम्=इसके पश्चात् इन प्रसिद्ध ( महात्मा पिप्पलाद ) ऋषिसे, वैदर्भिः भार्गवः=विदर्भदेशीय भार्गवने; पप्रच्छ=पूछा, भगवन्=भगवन्, कति देवाः एव=कुल कितने देवता, प्रजां विधारयन्ते=प्रजाको धारण करते हैं; कतरे एतत्=उनमेंसे कौन-कौन इसे, प्रकाशयन्ते=प्रकाशित करते हे; पुनः=फिर ( यह भी बतलाइये कि), एषाम्= इन सबमें; कः=कौन; वरिष्ठः=सर्वश्रेष्ठ है; इति=यही ( मेरा प्रश्न है ) ॥ १ ॥ व्याख्या-इन भार्गव ऋषि महर्षि पिप्पलादसे तीन बातें पूछी हैं- ( १ ) प्रजाको यानी प्राणियोंके शरीरको धारण करनेवाले कुल कितने देवता हैं ? ( २ ) उनमेंसे कौन-कौन इसको प्रकाशित करनेवाले हैं ? ( ३ ) इन सबमें अत्यन्त श्रेष्ठ कौन है ? ॥ १ ॥ तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्रकाश्या- भिवदन्ति वयमेतद्वाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥ सः ह=उन प्रसिद्ध महर्षि (पिप्पलाद) ने, तस्मै उवाच=उन भार्गवने कहा; ह आकाशः वै=निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश, एषः देवः=यह देवता है ( तथा ), वायुः=वायु, अग्निः=अग्नि; आपः=जल; पृथिवी=पृथ्वी, वाक्=वाणी ( कर्मेन्द्रियाँ); चक्षुः च श्रोत्रम् मनः=नेत्र और श्रोत्र ( ज्ञानेन्द्रियाँ ) तथा मन (अन्तःकरण ) भी [ देवता हैं ]; ते प्रकाश्य=वे सब (अपनी-अपनी शक्ति ) प्रकट करके, अभिवदन्ति=अभिमानपूर्वक कहने लगे; वयम् एतत् बाणम्= हमने इस शरीरको, अवष्टभ्य=आश्रय देकर, विधारयामः=धारण कर रक्खा है ॥ २ ॥ व्याख्या-इस प्रकार भार्गवके पूछनेपर महर्षि पिप्पलाद उत्तर देते हैं । यहाँ दो प्रश्नोंका उत्तर एक ही साथ दे दिया गया है । वे कहते हैं कि सबका आधार तो वैसे आकाशरूप देवता ही है, परतु उससे उत्पन्न होनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-ये चारों महाभूत भी शरीरको धारण किये रहते हैं । यह स्थूलशरीर इन्हींसे बना है । इसलिये ये धारक देवता हैं । वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एव मन आदि अन्तःकरण-ये चौदह देवता इस शरीरके प्रकाशक हैं । ये देवता देहको धारण और प्रकाशित करते हैं, इसलिये ये प्रकाशक देवता कहलाते हैं। ये इस देहको प्रकाशित करके आपसमें झगड़ पड़े और अभिमानपूर्वक परस्पर कहने लगे कि 'हमने इस शरीरको आश्रय देकर धारण कर रक्खा है' ॥ २ ॥ उ० अं० ३१-

२८२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तान्वरिष्ठः प्राण उवाच । मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्वाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥ तान् वरिष्ठः प्राणः = उनसे सर्वश्रेष्ठ प्राण उवाच = बोला, मोहम् = (तुमलोग) मोहमें; मा आपद्यथ = न पड़ो अहम् एव = मै ही एतत् आत्मानम् = अपने इस स्वरूपको पञ्चधा प्रविभज्य = पाँच भागोंमें विभक्त करके, एतत् वाणम् = इस शरीरको अवष्टभ्य = आश्रय देकर, विधारयामि = धारण करता हूँ, इति ते = यह (सुनकर भी) वे; अश्रद्दधानाः = अविश्वासी ही बभूवुः = बने रहे ॥ ३ ॥ व्याख्या—इस प्रकार जब सम्पूर्ण महाभूत इन्द्रियाँ और अन्तःकरणरूप देवता परस्पर विवाद करने लगे, तब सर्वश्रेष्ठ प्राणने उनसे कहा—'तुमलोग अज्ञानवश आपसमें विवाद मत करो तुम्मेंसे किसीमें भी इस शरीरको धारण करने या सुरक्षित रखनेकी शक्ति नहीं है। इसे तो मैंने ही अपनेको (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदानरूप) पाँच भागोंमें विभक्त करके आश्रय देते हुए धारण कररक्खा है और मुझसे ही यह सुरक्षित है।' प्राणकी यह बात सुनकर भी उन देवताओंने उसपर विश्वास नहीं किया वे अविश्वासी ही बने रहे ॥ ३ ॥ सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥ सः = (तब) वह प्राण अभिमानात् = अभिमानपूर्वक ऊर्ध्वम् उत्क्रमते इव = मानो (उस शरीरसे) ऊपरकी ओर बाहर निकलने लगा; तस्मिन् उत्क्रामति = उसके बाहर निकलनेपर, अथ इतरे सर्वे एव = उसीके साथ-ही-साथ अन्य सब भी उत्क्रामन्ते च = शरीरसे बाहर निकलने लगे और तस्मिन् प्रतिष्ठमाने = (शरीरमे लौटकर) उसके ठहर जानेपर; सर्वे एव प्रातिष्ठन्ते = और सब देवता भी ठहर गये तत् यथा = तत्र जैसे (मधुके छत्तेसे); मधुकरराजानम् = मधु- मक्खियोंके राजाके उत्क्रामन्तम् = निकलनेपर उसीके साथ-साथ सर्वाः एव = सारी ही मक्षिकाः = मधुमक्खियाँ, उत्क्रामन्ते = बाहर निकल जाती हैं च तस्मिन् = और उसके प्रतिष्ठमाने = बैठ जानेपर सर्वाः एव = सब-की-सत्र, प्रातिष्ठन्ते = बैठ जाती हैं एवम् = ऐसी ही दशा (इन सबकी हुई) वाक् चक्षुः श्रोत्रम् च मनः = अतः वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन; ते = वे (सभी) प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति = (प्राणकी श्रेष्ठताका अनुभव करके) प्रसन्न होकर प्राणकी स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥ व्याख्या—तत्र उनको अपना प्रभाव दिखलाकर सावधान करनेके लिये वह सर्वश्रेष्ठ प्राण अभिमानमें ठेस लगनेसे मानो रूठकर इस शरीरसे बाहर निकलनेके लिये ऊपरकी ओर उठने लगा। फिर तो सब-के-सब देवता विवश होकर उसीके साथ बाहर निकलने लगे कोई भी स्थिर नहीं रह सका। जब वह पुन लौटकर अपने स्थानपर स्थित हो गया, तब अन्य सब भी स्थित हो गये। जैसे मधुमक्खियोंका राजा जब अपने स्थानसे उड़ता है तब उसके साथ ही वहाँ बैठी हुई अन्य सब मधु- मक्खियाँ भी उड़ जाती हैं, और जब वह बैठ जाता है तो अन्य सब भी बैठ जाती हैं ऐसी ही दशा इन सब वागादि देवताओंकी भी हुई। यह देखकर वागी चक्षु श्रोत्र आदि सब इन्द्रियोंको और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंको भी यह विश्वास हो गया कि हम सबमें प्राण ही श्रेष्ठ है' अतः वे सब प्रसन्नतापूर्वक निम्न प्रकारने प्राणकी स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—प्राणको ही प्रत्यक्ष परमेश्वरका स्वरूप मानकर उपासना करनेके लिये उमरा मर्वरूपसे महत्त्व बतलाया जाता है— एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः । एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५॥ एषः अग्निः तपति = यह प्राण अग्निरूपसे तपता है एषः सूर्यः = यही सूर्य है, एषः पर्जन्यः = यही मेघ है, (एषः) मघवान् = यही इन्द्र है एषः वायुः = यही वायु है (तथा) एषः देवः = यह प्राणरूप देव ही; पृथिवी = पृथिवी (एव), रयिः = रयि है' (तथा) यत् = जो कुछ, सत् = सन्, च = और, असत् = असत् है, च = तथा, [यत् = जो ] अमृतम् = अमृत कहा जाता है, वह भी है ॥ ५॥

व्याख्या— वे वाणी आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले—'यह प्राण ही अग्निरूप धारण करके तपता है और यही सूर्य है । यही मेघ, इन्द्र और वायु है । यही देव पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है । तथा सत् और असत् एव उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है ॥ ५ ॥

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् । ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६ ॥

रथनाभौ = रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए; अराः इव = अरोंकी भाँति, ऋचः यजूंषि = ऋग्वेदकी सम्पूर्ण ऋचाएँ, यजुर्वेदके मन्त्र (तथा), सामानि = सामवेदके मन्त्र, यज्ञः च = यज्ञ और; ब्रह्म, क्षत्रम् = (यज्ञ करनेवाले) ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग; सर्वम् = ये सब के-सब; प्राणे = (इस) प्राणमें; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित हैं ॥ ६ ॥

व्याख्या— जिस प्रकार रथके पहियेकी नाभिमे लगे हुए अरे नाभिके ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेदकी सब ऋचाएँ, यजुर्वेदके समस्त मन्त्र, सब-का सब सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञादि शुभ कर्म और यज्ञादि शुभ कर्म करनेवाले ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग—ये सब-के सब प्राणके आधारपर ही टिके हुए हैं; सबका आश्रय प्राण ही है ॥ ६ ॥

सम्बन्ध— इस प्रकार प्राणका महत्त्व बतलाकर अब उसकी स्तुति की जाती है—

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे । तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥

प्राण = हे प्राण; [ त्वम् एव = तू ही; ] प्रजापतिः = प्रजापति है; त्वम् एव = तू ही, गर्भे चरसि = गर्भमें विचरता है, प्रतिजायसे = (और तू ही) माता-पिताके अनुरूप होकर जन्म लेता है, तु = निश्चय ही, इमाः = ये सब, प्रजाः = जीव, तुभ्यम् = तुझे; बलिम् हरन्ति = भेंट समर्पण करते हैं, यः = जो तू; प्राणैः प्रतितिष्ठसि = (अपानादि अन्य) प्राणोंके साथ-साथ स्थित हो रहा है ॥ ७ ॥

व्याख्या— हे प्राण ! तू ही प्रजापति (प्राणियोंका ईश्वर) है, तू ही गर्भमें विचरनेवाला और माता-पिताके अनुरूप संतानके रूपमें जन्म लेनेवाला है । ये सब जीव तुझे ही भेंट समर्पण करते हैं । तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीर- में स्थित हो रहा है ॥ ७ ॥

देवानामसि वह्नितमः पितॄणां [ ] स्वधा । ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥

(हे प्राण !) देवानाम् = (तू) देवताओंके लिये; वह्नितमः = उत्तम अग्नि है; पितॄणाम् = पितरोंके लिये; प्रथमा स्वधा = पहली स्वधा है; अथर्वाङ्गिरसाम् = अथर्वाङ्गिरस् आदि, ऋषीणाम् = ऋषियोंके द्वारा; चरितम् = आचरित, सत्यम् = सत्य, असि = है ॥ ८ ॥

व्याख्या— हे प्राण ! तू देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम अग्नि है । पितरोंके लिये पहली स्वधा है । अथर्वाङ्गिरस् आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है ॥ ८ ॥

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता । त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥

प्राण = हे प्राण; त्वम् तेजसा = तू तेजसे (सम्पन्न), इन्द्रः = इन्द्र; रुद्रः = रुद्र (और); परिरक्षिता = रक्षा करनेवाला; असि = है, त्वम् = तू ही; अन्तरिक्षे = अन्तरिक्षमें; चरसि = विचरता है (और); त्वम् = तू ही, ज्योतिषां पतिः = समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी; सूर्यः = सूर्य है ॥ ९ ॥

२४४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—हे प्राण ! तू सब प्रकारके तेज ( शक्तियों) से सम्पन्न, तीनों लोकों का स्वामी इन्द्र है । तू ही प्रलयकालमें सबका सहार करनेवाला रुद्र है और तू ही सबकी भलीभाँति यथायोग्य रक्षा करनेवाला है। तू ही अन्तरिक्षमें (पृथ्वी और स्वर्गके बीचमें) विचरनेवाला वायु है तथा तू ही अग्नि, चन्द्र, तारे आदि समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी सूर्य है ॥९॥ यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः। आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥१०॥ प्राण=हे प्राण, यदा त्वम्=जब तू, अभिवर्षसि=भलीभाँति वर्षा करता है; अथ=उस समय, ते इमाः प्रजाः= तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा, कामाय=यथेष्ट, अन्नम्=अन्न, भविष्यति=उत्पन्न होगा, इति=यह समझकर, आनन्दरूपाः= आनन्दमय; तिष्ठन्ति=हो जाती है ॥ १० ॥ व्याख्या-हे प्राण ! जब तू मेघरूप होकर पृथ्वीलोकमे सब ओर वर्षा करता है, तब तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा 'हमलोगोंके जीवननिर्वाहके लिये यथेष्ट अन्न उत्पन्न होगा'—ऐसी आशा करती हुई आनन्दमे मग्न हो जाती है ॥ १० ॥ व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिंरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥११॥ प्राण=हे प्राण; त्वम्=तू, व्रात्यः=संस्काररहित ( होते हुए भी ), एकर्षिः=एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है ( तथा); वयम्=हमलोग ( तेरे लिये ), आद्यस्य=भोजनको, दातारः=देनेवाले हैं ( और तू), अत्ता=भोक्ता ( खानेवाला ) है; विश्वस्य=समस्त जगतका, सत्पतिः=( तू ही ) श्रेष्ठ स्वामी है, मातरिश्व=हे आकाशमें विचरनेवाले वायुदेव, त्वम्=तू; नः=हमारा, पिता=पिता है ॥ ११ ॥ व्याख्या-हे प्राण ! तू संस्काररहित होकर भी एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। तात्पर्य यह कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है, अतः तुझे संस्कारद्वारा शुद्धिकी आवश्यकता नहीं है, प्रत्युत तू ही सबको पवित्र करनेवाला एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। हमलोग ( सब इन्द्रियाँ और मन आदि ) तेरे लिये नाना प्रकारकी भोजन-सामग्री अर्पण करनेवाले हैं और तू उसे खानेवाला है। तू ही समस्त विश्वका उत्तम स्वामी है । हे आकाशचारी समष्टिवायुरूप प्राण ! तू हमारा पिता है, क्योंकि तुझसे ही हम सबकी उत्पत्ति हुई है ॥ ११ ॥ या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥१२॥ (हे प्राण !) या ते तनूः=जो तेरा स्वरूप, वाचि=वाणीमें, प्रतिष्ठिता च=स्थित है, तथा; या श्रोत्रे=जो श्रोत्रमें, या चक्षुषि च=जो चक्षुमें और, या मनसि=जो मनमें, संतता=व्याप्त है, ताम्=उसको, शिवाम्= कल्याणमय, कुरु=बना ले, मा उत्क्रमीः=( तू ) उत्क्रमण न कर ॥ १२ ॥ व्याख्या-हे प्राण ! जो तेरा स्वरूप वाणी, श्रोत्र, चक्षु आदि समस्त इन्द्रियोंमें और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंमें व्याप्त है, उसे तू कल्याणमय बना ले । अर्थात् तुझमें जो हमें सावधान करनेके लिये आवेग आया है, उसे शान्त कर ले और तू शरीरसे उठकर बाहर न जा । यह हमलोगोंकी प्रार्थना है ॥ १२ ॥ प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥१३॥ इदम्=यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला जगत् (और), यत् त्रिदिवे=जो कुछ स्वर्गलोकमें, प्रतिष्ठितम्=स्थित है; सर्वम्= वह सब-का सब, प्राणस्य=प्राणके; वशे=अधीन है ( हे प्राण ! ), माता पुत्रान् इव=जैसे माता अपने पुत्रोकी रक्षा करती है, उसी प्रकार ( तू हमारी ), रक्षस्व=रक्षा कर, च=तथा; नः श्रीः च=हमें कान्ति और; प्रज्ञाम्=बुद्धि; विधेहि=प्रदान कर, इति=इस प्रकार यह दूसरा प्रश्न समाप्त हुआ ॥ १३ ॥

  • प्रश्नोपनिषद् * २४५ व्याख्या—प्रत्यक्ष दीखनेवाले इस लोकमें जितने भी पदार्थ हैं और जो कुछ स्वर्गमें स्थित हैं, वे सब-के-सब इस प्राणके ही अधीन हैं। यह सोचकर वे इन्द्रियादि देवगण अन्तमें प्राणसे प्रार्थना करते हैं—'हे प्राण ! जिस प्रकार माता अपने पुत्रोंकी रक्षा करती है, उसी प्रकार तू हमारी रक्षा कर तथा तू हमलोगोंको श्री अर्थात् कार्य करनेकी शक्ति और प्रज्ञा (ज्ञान) प्रदान कर।' इस प्रकार इस प्रकरणमें भार्गव ऋषिद्वारा पूछे हुए तीन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए महर्षि पिप्पलादने यह बात समझायी कि समस्त प्राणियोंके शरीरोंको अवकाश देकर बाहर और भीतरसे धारण करनेवाला आकाश-तत्त्व है। साथ ही इस शरीरके अवयवोंकी पूर्ति करनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये चार तत्त्व हैं। दस इन्द्रियाँ और अन्तःकरण— ये इसको प्रकाश देकर क्रियाशील बनानेवाले हैं। इन सबसे श्रेष्ठ प्राण है। अतएव प्राण ही वास्तवमें इस शरीरको धारण करनेवाला है, प्राणके बिना शरीरको धारण करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है। अन्य सब इन्द्रिय आदिमें इसीकी शक्ति अनुस्यूत है, इसीकी शक्ति पाकर वे शरीरको धारण करते हैं। इसी प्रकार प्राणकी श्रेष्ठताका वर्णन छान्दोग्य-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके आरम्भमें और बृहदारण्यक-उपनिषद्के छठे अध्यायके आरम्भमें आया है। इस प्रकरणमें प्राणकी स्तुतिका प्रपञ्च अधिक है ॥ १३ ॥ ॥ द्वितीय प्रश्न समाप्त ॥ २ ॥ 𑁍 तृतीय प्रश्न अथ हैनँ कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥ अथ ह एनम्=उसके बाद इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद) से, कौसल्यः आश्वलायनः=कोसलदेशीय आश्वलायनने, च=भी; पप्रच्छ=पूछा, भगवन्=भगवन्, एषः प्राणः=यह प्राण, कुतः जायते=किससे उत्पन्न होता है, अस्मिन् शरीरे=इस शरीरमें, कथम् आयाति=कैसे आता है, वा आत्मानम्=तथा अपनेको, प्रविभज्य=विभाजित करके, कथम् प्रातिष्ठते=किस प्रकार स्थित होता है, केन उत्क्रमते=किस ढंगसे उत्क्रमण करता—शरीरसे बाहर निकलता है; कथम् बाह्यम्=किस प्रकार बाह्य जगत्को, अभिधत्ते=भलीभाँति धारण करता है (और); कथम् अध्यात्मम्= किस प्रकार मन और इन्द्रिय आदि शरीरके भीतर रहनेवाले जगत्को, इति=यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें आश्वलायन मुनिने महर्षि पिप्पलादसे कुल छः बातें पूछी हैं—(१) जिस प्राणकी महिमा- का आपने वर्णन किया, वह प्राण किससे उत्पन्न होता है ? (२) वह इस मनुष्य-शरीरमें कैसे प्रवेश करता है ? (३) अपनेको विभाजित करके किस प्रकार शरीरमें स्थित रहता है ? (४) एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाते समय पहले शरीरसे किस प्रकार निकलता है ? (५) इस बाह्य (पाञ्चभौतिक) जगत्को किस प्रकार धारण करता है ? तथा (६) मन और इन्द्रिय आदि आध्यात्मिक (आन्तरिक) जगत्को किस प्रकार धारण करता है ? यहाँ प्राणके विषयमें वे ही बातें पूछी गयी हैं, जिनका वर्णन पहले उत्तरमें नहीं आया है और जो पहले प्रश्नके उत्तरको सुनकर ही स्फुरित हुई हैं, इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रश्नोत्तरके समय सुकेशादि छहों ऋषि वहाँ साथ-साथ बैठे सुन रहे थे ॥ १ ॥ तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥ तस्मै सः ह उवाच=उनसे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; अतिप्रश्नान् पृच्छसि=तू बड़े कठिन प्रश्न पूछ रहा है (किन्तु); ब्रह्मिष्ठः असि इति=वेदोंको अच्छी तरह जाननेवाला है, तस्मात्=अतः, अहम्=मैं, ते=तेरे; ब्रवीमि= प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ ॥ २ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें महर्षि पिप्पलादने आश्वलायन मुनिके प्रश्नोंको कठिन बतलाकर उनकी बुद्धिमत्ता और

२४६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तर्कशीलताकी प्रशंसा की है और साथ ही यह भाव भी दिखलाया है कि 'तू जिस ढगसे पूछ रहा है, उसे देखते हुए तो मुझे तेरे प्रश्नोंका उत्तर नहीं देना चाहिये । परतु मै जानता हूँ कि तू तर्कबुद्धिसे नहीं पूछ रहा है, तू श्रद्धालु है, वेदोंमें निष्णात है, अतः मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर दे रहा हूँ' ॥ २ ॥ आत्मन एष प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्छरीरे ॥ ३ ॥ एषः प्राणः = यह प्राण, आत्मनः=परमात्मासे; जायते = उत्पन्न होता है, यथा=जिस प्रकार; एषा छाया= यह छाया, पुरुषे=पुरुषके होनेपर ( ही होती है ), [ तथा =उसी प्रकार; ] एतत् = यह ( प्राण ); एतस्मिन् = इम ( परमात्मा ) के ही; आततम्=आश्रित है ( और ), अस्मिन् शरीरे = इस शरीरमें, मनोकृतेन = मनके किये हुए ( सकल्प ) से; आयाति=आता है ॥ ३ ॥ व्याख्या - यहाँ महर्षि पिप्पलादने क्रमसे आश्वलायन ऋषिके दो प्रश्नोंका उत्तर दिया है । पहले प्रश्नका उत्तर तो यह है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राण परमात्मासे उत्पन्न हुआ है । वह परब्रह्म परमेश्वर ही इसका उपादानकारण है और वही इसकी रचना करनेवाला है, अत इसकी स्थिति उस सर्वात्मा महेश्वरके अधीन - उसीके आश्रित है - ठीक जिस प्रकार किसी मनुष्यकी छाया उसके अधीन रहती है । दूसरे प्रश्नका उत्तर यह है कि यह मनद्वारा किये हुए सङ्कल्पसे किसी शरीरमें प्रवेश करता है । भाव यह कि मरते समय प्राणीके मनमे उसके कर्मानुसार जैसा संकल्प होता है, उसे वैसा ही शरीर मिलता है, अतः प्राणोंका शरीरमें प्रवेश मनके सङ्कल्पसे ही होता है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध - अब आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका उत्तर विस्तारपूर्वक आरम्भ किया जाता है- यथा सम्राडेवाधिकृतान्‌विनियुङ्क्ते एतान्ग्रामानेतान्ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥ यथा = जिस प्रकार, सम्राट् एव = चक्रवर्ती महाराज स्वय ही, एतान् ग्रामान् एतान् ग्रामान् अधितिष्ठस्व = इन गाँवोंमें ( तुम रहो, ) इन गाँवोंमें तुम रहो, इति = इस प्रकार, अधिकृतान् = अधिकारियोंको, विनियुङ्क्ते = अलग-अलग नियुक्त करता है; एवम् एव = इसी प्रकार; एषः प्राणः = यह मुख्य प्राण, इतरान् = दूसरे, प्राणान् = प्राणोंको; पृथक् पृथक् एव = पृथक् पृथक् ही, संनिधत्ते = स्थापित करता है ॥ ४ ॥ व्याख्या - यहाँ महर्षि उदाहरणद्वारा तीसरे प्रश्नका समाधान करते हुए कहते हैं- 'जिस प्रकार भूमण्डलका चक्रवर्ती महाराज भिन्न-भिन्न ग्राम, मण्डल और जनपद आदिमें पृथक्-पृथक् अधिकारियोंकी नियुक्ति करता है और उनका कार्य बाँट देता है, उसी प्रकार यह सर्वश्रेष्ठ प्राण भी अपने अङ्गरूप अपान, व्यान आदि दूसरे प्राणोंको शरीरके पृथक्- पृथक् स्थानोंमें पृथक् पृथक् कार्यके लिये नियुक्त कर देता है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध - अब मुख्य प्राण, अपान ओर समान - इन तीनोंका वासस्थान और कार्य बतलाया जाता है- पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्ताचिषो भवन्ति ॥ ५ ॥ प्राणः =( वह ) प्राण, पायूपस्थे=गुदा और उपस्थमें; अपानम् ( नियुङ्क्ते )=अपानको रखता है, स्वयम्= स्वय, मुखनासिकाभ्याम् = मुख और नासिकाद्वारा ( विचरता हुआ ), चक्षुःश्रोत्रे = नेत्र और श्रोत्रमें, प्रातिष्ठते= स्थित रहता है; तु मध्ये = और शरीरके मध्यभागमें, समानः = समान ( रहता है ); एष हि = यह ( समान वायु ) ही; एतत् हुतम् अन्नम् = इस प्राणाग्निमें हवन किये हुए अन्नको, समम् नयति = समस्त शरीरमे यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है, तस्मात् = उससे; एताः सप्त = ये सात, अर्चिषः = ज्वालाएँ (विषयोंको प्रकाशित करनेवाले ऊपरके द्वार ); भवन्ति = उत्पन्न होती हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या - यह स्वयं तो मुख और नासिकाद्वारा विचरता हुआ नेत्र और श्रोत्रमें स्थित रहता है, तथा गुदा और

उपस्थमें अपानको स्थापित करता है । उसका काम मल-मूत्रको शरीरके बाहर निकाल देना है, रज-वीर्य और गर्भको बाहर करना भी इसीका काम है । शरीरके मध्य भाग-नाभिमें समानको रखता है । यह समान वायु ही प्राणरूप अग्निमें हवन किये -हुए- उदरमें डाले हुए अन्नको अर्थात् उसके सारको सम्पूर्ण शरीरके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है । उस अन्नके सारभूत रससे ही इस शरीरमें ये सात ज्वालाएँ अर्थात् समस्त विषयोंको प्रकाशित करनेवाले दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाएँ और एक मुख ( रसना )-ये सात द्वार उत्पन्न होते हैं, उस रससे पुष्ट होकर ही ये अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-अब व्यानकी गतिका वर्णन किया जाता है- हृदि ह्येष आत्मा अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रति- शाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्वरति ॥ ६ ॥ एषः हि=यह प्रसिद्ध, आत्मा=जीवात्मा, हृदि=हृदयदेशमें रहता है; अत्र=इस ( हृदय ) में; एतत्=यह; नाडीनाम् एकशतम्=मूलरूपसे एक सौ नाड़ियोंका समुदाय है, तासाम्=उनमेंसे, एकैकस्याम्=एक-एक नाड़ीमें; शतम् शतम्=एक-एक सौ ( शाखाएँ ) हैं ( प्रत्येक शाखा-नाड़ीकी ), द्वासप्ततिः द्वासप्ततिः=बहत्तर-बहत्तर; प्रतिशाखानाडीसहस्राणि=हजार प्रतिशाखा-नाड़ियाँ, भवन्ति=होती हैं आसु=इनमें, व्यानः=व्यानवायु, चरति= विचरण करता है ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस शरीरमें जो हृदयप्रदेश है, जो जीवात्माका निवासस्थान है, उसमें एक सौ मूलभूत नाड़ियाँ हैं, उनमेंसे प्रत्येक नाड़ीकी एक-एक सौ शाखा-नाड़ियाँ हैं और प्रत्येक शाखा-नाड़ीकी बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखा-नाड़ियाँ हैं । इस प्रकार इस शरीरमे कुल बहत्तर करोड़ नाड़ियों हैं, इन सबमें व्यानवायु विचरण करता है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-अब उदानका स्थान और कार्य बतलाते हैं, साथ ही आश्वलायनके चौथे प्रश्नका उत्तर भी देते हैं- अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७ ॥ अथ=तथा, एकया=जो एक नाड़ी और है, उसके द्वारा, उदानः ऊर्ध्वः=उदान वायु ऊपरकी ओर, [ चरति= विचरता है, ] ( सः) पुण्येन=वह पुण्यकर्मोंके द्वारा, [ मनुष्यम्=मनुष्यको, ] पुण्यम् लोकम्=पुण्यलोकोंमें, नयति= ले जाता है, पापेन=पापकर्मोंके कारण (उसे ), पापम् नयति=पापयोनियोंमें ले जाता है ( तथा ), उभाभ्याम् एव=पाप और पुण्य दोनों प्रकारके कर्मोंद्वारा ( जीवको ), मनुष्यलोकम्=मनुष्य-शरीरमें, [ नयति=ले जाता है ] ॥ ७ ॥ व्याख्या-इन ऊपर बतलायी हुई बहत्तर करोड़ नाड़ियोंसे भिन्न एक नाड़ी और है, जिसको 'सुपुम्णा' कहते हैं, जो हृदयसे निकलकर ऊपर मस्तकमें गयी है । उसके द्वारा उदान वायु शरीरमे ऊपरकी ओर विचरण करता है । ( इस प्रकार आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका समाधान करके अब महर्षि उसके चौथे प्रश्नका उत्तर संक्षेपमें देते हैं-) जो मनुष्य पुण्यशील होता है, जिसके शुभकर्मोंके भोग उदय हो जाते हैं, उसे यह उदान वायु ही अन्य सब प्राण और इन्द्रियोंके सहित वर्तमान शरीरसे निकालकर पुण्यलोकोंमें अर्थात् स्वर्गादि उच्च लोकोंमें ले जाता है । पापकर्म से युक्त मनुष्यको शूकर-कूकर आदि पाप-योनियोंमें और रौरवादि नरकोंमें ले जाता है तथा जो पाप और पुण्य-दोनो प्रकारके कर्मोंका मिश्रित फल भोगनेके लिये अभिमुख हुए रहते हैं, उनको मनुष्य शरीरमें ले जाता है * ॥ ७ ॥ सम्बन्ध-अब दो मन्त्रोंमें आश्वलायनके पाँचवें और छठे प्रश्नका उत्तर देते हुए जीवात्माके प्राण और इन्द्रियोंसहित एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी बात भी स्पष्ट करते हैं-

  • एक शरीरसे निकलकर जब मुख्य प्राण उदानको साथ लेकर उसके द्वारा दूसरे शरीरमें जाता है, तब अपने अङ्गभूत समान आदि प्राणोंको तथा इन्द्रिय और मनको तो साथ ले ही जाता है, इन सबका स्वामी जीवात्मा भी उसीके साथ जाता है-यह बात यहाँ कहनी थी, इसीलिये पूर्वमन्त्रमें जीवात्माका स्थान हृदय बतलाया गया है ।

२४८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥ ह=यह निश्चय है कि, आदित्यः वै=सूर्य ही, बाह्यः प्राणः=बाह्य प्राण है, एष हि=यही; एनम् चाक्षुषम्= इस नेत्रसम्बन्धी, प्राणम्=प्राणपर, अनुगृह्णानः=अनुग्रह करता हुआ, उदयति=उदित होता है, पृथिव्याम्= पृथ्वीमें, या देवता=जो (अपान वायुकी शक्तिरूप) देवता है, सा एषा=वही यह, पुरुषस्य=मनुष्यके, अपानम्= अपान वायुको, अवष्टभ्य=स्थिर किये; [ वर्तते=रहता है, ] अन्तरा=पृथ्वी और स्वर्गके बीच, यत् आकाशः=जो आकाश (अन्तरिक्षलोक) है, सः समानः=वह समान है, वायु व्यानः=वायु ही व्यान है ॥ ८ ॥ व्याख्या-यह निश्चयपूर्वक समझना चाहिये कि सूर्य ही-सबका बाह्य प्राण है। यह मुख्य प्राण सूर्यरूपमे उदय होकर इस शरीरके बाह्य अङ्ग प्रत्यङ्गोंको पुष्ट करता है और नेत्र-इन्द्रियरूप आध्यात्मिक शरीरपर अनुग्रह करता है--उसे देखनेकी शक्ति अर्थात् प्रकाश देता है। पृथ्वीमें जो देवता अर्थात् अपान वायुकी शक्ति है, वह इस मनुष्यके भीतर रहनेवाले अपान वायुको आश्रय देती है-टिकाये रखती है। यह अपान वायुकी शक्ति गुदा और उपस्थ इन्द्रियोंकी सहायक है तथा इनके बाहरी स्थूल आकारको धारण करती है। पृथ्वी और स्वर्गलोकके बीचका जो आकाश है, वही समान वायुका बाह्य स्वरूप है। वह इस शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गोको अवकाश देकर इसकी रक्षा करता है और शरीरके भीतर रहनेवाले समान वायुको विचरनेके लिये शरीरमे अवकाश देता है, इसीकी सहायतामे श्रोत्र-इन्द्रिय शब्द सुन सकती है। आकाशमे विचरने- वाला प्रत्यक्ष वायु ही व्यानका बाह्य स्वरूप है, यह इस शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गोको चेष्टाशील करता है और शान्ति प्रदान करता है, भीतरी व्यान वायुको नाड़ियोंमे सञ्चारित करने तथा त्वचा-इन्द्रियको स्पर्शका ज्ञान करानेमे भी यह सहायक है ॥८॥ तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥९॥ ह तेजः वै=प्रसिद्ध तेज (गर्मी) ही, उदानः=उदान है तस्मात्=इसीलिए, उपशान्ततेजाः=जिसके शरीरका तेज शान्त हो जाता है, वह (जीवात्मा), मनसि=मनमें, सम्पद्यमानैः=विलीन हुई, इन्द्रियैः=इन्द्रियोंके साथ, पुनर्भवम्=पुनर्जन्मको (प्राप्त होता है) ॥ ९ ॥ व्याख्या-सूर्य और अग्निका जो बाहरी तेज अर्थात् उष्णत्व है, वही उदानका बाह्य स्वरूप है। वह शरीरके बाहरी अङ्ग प्रत्यङ्गोंको ठडा नहीं होने देता और शरीरके भीतरकी ऊष्माको भी स्थिर रखता है। जिसके शरीरसे उदान वायु निकल जाता है, उसका शरीर गरम नही रहता । अतः शरीरकी गर्मी शान्त हो जाते ही उसमें रहनेवाला जीवात्मा मनमें विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर उदान वायुके साथ-साथ दूसरे शरीरमे चला जाता है ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-अब आश्वलायनके चौथे प्रश्नमे आयी हुई एक शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरमें या लोकमें प्रवेश करनेकी वातका पुनः स्पष्टीकरण किया जाता है- यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥ एषः=यह (जीवात्मा), यच्चित्तः=जिस सङ्कल्पवाला होता है, तेन=उस सङ्कल्पके साथ, प्राणम्=मुख्य प्राणमें; आयाति=स्थित हो जाता है, प्राणः=मुख्य प्राण, तेजसा युक्तः=तेज (उदान) से युक्त हो, आत्मना सह=मन, इन्द्रियोंसे युक्त*(जीवात्माको), यथासंकल्पितम्=उसके सङ्कल्पानुसार, लोकम्=भिन्न भिन्न लोक अथवा योनिको, नयति=ले जाता है ॥ १० ॥ व्याख्या-मरते समय इस आत्माका जैसा सङ्कल्प होता है, इसका मन अन्तिम क्षणमे जिस भावका चिन्तन करता है (गीता ८। ६), उस सङ्कल्पके सहित मन, इन्द्रियोंको साथ लिये हुए यह मुख्य प्राणमे स्थित हो जाता है। वह मुख्य प्राण उदान वायुसे मिलकर मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्माको उस अन्तिम सङ्कल्पके अनुसार यथायोग्य भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनिमें ले जाता है। अतः मनुष्यको उचित है कि अपने मनमें निरन्तर एक भगवान्‌का ही चिन्तन रक्खे, दूसरा