भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 270

२४६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तर्कशीलताकी प्रशंसा की है और साथ ही यह भाव भी दिखलाया है कि 'तू जिस ढगसे पूछ रहा है, उसे देखते हुए तो मुझे तेरे प्रश्नोंका उत्तर नहीं देना चाहिये । परतु मै जानता हूँ कि तू तर्कबुद्धिसे नहीं पूछ रहा है, तू श्रद्धालु है, वेदोंमें निष्णात है, अतः मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर दे रहा हूँ' ॥ २ ॥ आत्मन एष प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्छरीरे ॥ ३ ॥ एषः प्राणः = यह प्राण, आत्मनः=परमात्मासे; जायते = उत्पन्न होता है, यथा=जिस प्रकार; एषा छाया= यह छाया, पुरुषे=पुरुषके होनेपर ( ही होती है ), [ तथा =उसी प्रकार; ] एतत् = यह ( प्राण ); एतस्मिन् = इम ( परमात्मा ) के ही; आततम्=आश्रित है ( और ), अस्मिन् शरीरे = इस शरीरमें, मनोकृतेन = मनके किये हुए ( सकल्प ) से; आयाति=आता है ॥ ३ ॥ व्याख्या - यहाँ महर्षि पिप्पलादने क्रमसे आश्वलायन ऋषिके दो प्रश्नोंका उत्तर दिया है । पहले प्रश्नका उत्तर तो यह है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राण परमात्मासे उत्पन्न हुआ है । वह परब्रह्म परमेश्वर ही इसका उपादानकारण है और वही इसकी रचना करनेवाला है, अत इसकी स्थिति उस सर्वात्मा महेश्वरके अधीन - उसीके आश्रित है - ठीक जिस प्रकार किसी मनुष्यकी छाया उसके अधीन रहती है । दूसरे प्रश्नका उत्तर यह है कि यह मनद्वारा किये हुए सङ्कल्पसे किसी शरीरमें प्रवेश करता है । भाव यह कि मरते समय प्राणीके मनमे उसके कर्मानुसार जैसा संकल्प होता है, उसे वैसा ही शरीर मिलता है, अतः प्राणोंका शरीरमें प्रवेश मनके सङ्कल्पसे ही होता है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध - अब आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका उत्तर विस्तारपूर्वक आरम्भ किया जाता है- यथा सम्राडेवाधिकृतान्‌विनियुङ्क्ते एतान्ग्रामानेतान्ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥ यथा = जिस प्रकार, सम्राट् एव = चक्रवर्ती महाराज स्वय ही, एतान् ग्रामान् एतान् ग्रामान् अधितिष्ठस्व = इन गाँवोंमें ( तुम रहो, ) इन गाँवोंमें तुम रहो, इति = इस प्रकार, अधिकृतान् = अधिकारियोंको, विनियुङ्क्ते = अलग-अलग नियुक्त करता है; एवम् एव = इसी प्रकार; एषः प्राणः = यह मुख्य प्राण, इतरान् = दूसरे, प्राणान् = प्राणोंको; पृथक् पृथक् एव = पृथक् पृथक् ही, संनिधत्ते = स्थापित करता है ॥ ४ ॥ व्याख्या - यहाँ महर्षि उदाहरणद्वारा तीसरे प्रश्नका समाधान करते हुए कहते हैं- 'जिस प्रकार भूमण्डलका चक्रवर्ती महाराज भिन्न-भिन्न ग्राम, मण्डल और जनपद आदिमें पृथक्-पृथक् अधिकारियोंकी नियुक्ति करता है और उनका कार्य बाँट देता है, उसी प्रकार यह सर्वश्रेष्ठ प्राण भी अपने अङ्गरूप अपान, व्यान आदि दूसरे प्राणोंको शरीरके पृथक्- पृथक् स्थानोंमें पृथक् पृथक् कार्यके लिये नियुक्त कर देता है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध - अब मुख्य प्राण, अपान ओर समान - इन तीनोंका वासस्थान और कार्य बतलाया जाता है- पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्ताचिषो भवन्ति ॥ ५ ॥ प्राणः =( वह ) प्राण, पायूपस्थे=गुदा और उपस्थमें; अपानम् ( नियुङ्क्ते )=अपानको रखता है, स्वयम्= स्वय, मुखनासिकाभ्याम् = मुख और नासिकाद्वारा ( विचरता हुआ ), चक्षुःश्रोत्रे = नेत्र और श्रोत्रमें, प्रातिष्ठते= स्थित रहता है; तु मध्ये = और शरीरके मध्यभागमें, समानः = समान ( रहता है ); एष हि = यह ( समान वायु ) ही; एतत् हुतम् अन्नम् = इस प्राणाग्निमें हवन किये हुए अन्नको, समम् नयति = समस्त शरीरमे यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है, तस्मात् = उससे; एताः सप्त = ये सात, अर्चिषः = ज्वालाएँ (विषयोंको प्रकाशित करनेवाले ऊपरके द्वार ); भवन्ति = उत्पन्न होती हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या - यह स्वयं तो मुख और नासिकाद्वारा विचरता हुआ नेत्र और श्रोत्रमें स्थित रहता है, तथा गुदा और