कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 269, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 269
- प्रश्नोपनिषद् * २४५ व्याख्या—प्रत्यक्ष दीखनेवाले इस लोकमें जितने भी पदार्थ हैं और जो कुछ स्वर्गमें स्थित हैं, वे सब-के-सब इस प्राणके ही अधीन हैं। यह सोचकर वे इन्द्रियादि देवगण अन्तमें प्राणसे प्रार्थना करते हैं—'हे प्राण ! जिस प्रकार माता अपने पुत्रोंकी रक्षा करती है, उसी प्रकार तू हमारी रक्षा कर तथा तू हमलोगोंको श्री अर्थात् कार्य करनेकी शक्ति और प्रज्ञा (ज्ञान) प्रदान कर।' इस प्रकार इस प्रकरणमें भार्गव ऋषिद्वारा पूछे हुए तीन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए महर्षि पिप्पलादने यह बात समझायी कि समस्त प्राणियोंके शरीरोंको अवकाश देकर बाहर और भीतरसे धारण करनेवाला आकाश-तत्त्व है। साथ ही इस शरीरके अवयवोंकी पूर्ति करनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये चार तत्त्व हैं। दस इन्द्रियाँ और अन्तःकरण— ये इसको प्रकाश देकर क्रियाशील बनानेवाले हैं। इन सबसे श्रेष्ठ प्राण है। अतएव प्राण ही वास्तवमें इस शरीरको धारण करनेवाला है, प्राणके बिना शरीरको धारण करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है। अन्य सब इन्द्रिय आदिमें इसीकी शक्ति अनुस्यूत है, इसीकी शक्ति पाकर वे शरीरको धारण करते हैं। इसी प्रकार प्राणकी श्रेष्ठताका वर्णन छान्दोग्य-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके आरम्भमें और बृहदारण्यक-उपनिषद्के छठे अध्यायके आरम्भमें आया है। इस प्रकरणमें प्राणकी स्तुतिका प्रपञ्च अधिक है ॥ १३ ॥ ॥ द्वितीय प्रश्न समाप्त ॥ २ ॥ 𑁍 तृतीय प्रश्न अथ हैनँ कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥ अथ ह एनम्=उसके बाद इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद) से, कौसल्यः आश्वलायनः=कोसलदेशीय आश्वलायनने, च=भी; पप्रच्छ=पूछा, भगवन्=भगवन्, एषः प्राणः=यह प्राण, कुतः जायते=किससे उत्पन्न होता है, अस्मिन् शरीरे=इस शरीरमें, कथम् आयाति=कैसे आता है, वा आत्मानम्=तथा अपनेको, प्रविभज्य=विभाजित करके, कथम् प्रातिष्ठते=किस प्रकार स्थित होता है, केन उत्क्रमते=किस ढंगसे उत्क्रमण करता—शरीरसे बाहर निकलता है; कथम् बाह्यम्=किस प्रकार बाह्य जगत्को, अभिधत्ते=भलीभाँति धारण करता है (और); कथम् अध्यात्मम्= किस प्रकार मन और इन्द्रिय आदि शरीरके भीतर रहनेवाले जगत्को, इति=यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें आश्वलायन मुनिने महर्षि पिप्पलादसे कुल छः बातें पूछी हैं—(१) जिस प्राणकी महिमा- का आपने वर्णन किया, वह प्राण किससे उत्पन्न होता है ? (२) वह इस मनुष्य-शरीरमें कैसे प्रवेश करता है ? (३) अपनेको विभाजित करके किस प्रकार शरीरमें स्थित रहता है ? (४) एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाते समय पहले शरीरसे किस प्रकार निकलता है ? (५) इस बाह्य (पाञ्चभौतिक) जगत्को किस प्रकार धारण करता है ? तथा (६) मन और इन्द्रिय आदि आध्यात्मिक (आन्तरिक) जगत्को किस प्रकार धारण करता है ? यहाँ प्राणके विषयमें वे ही बातें पूछी गयी हैं, जिनका वर्णन पहले उत्तरमें नहीं आया है और जो पहले प्रश्नके उत्तरको सुनकर ही स्फुरित हुई हैं, इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रश्नोत्तरके समय सुकेशादि छहों ऋषि वहाँ साथ-साथ बैठे सुन रहे थे ॥ १ ॥ तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥ तस्मै सः ह उवाच=उनसे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; अतिप्रश्नान् पृच्छसि=तू बड़े कठिन प्रश्न पूछ रहा है (किन्तु); ब्रह्मिष्ठः असि इति=वेदोंको अच्छी तरह जाननेवाला है, तस्मात्=अतः, अहम्=मैं, ते=तेरे; ब्रवीमि= प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ ॥ २ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें महर्षि पिप्पलादने आश्वलायन मुनिके प्रश्नोंको कठिन बतलाकर उनकी बुद्धिमत्ता और