भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 832 में से

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पृष्ठ 268

२४४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—हे प्राण ! तू सब प्रकारके तेज ( शक्तियों) से सम्पन्न, तीनों लोकों का स्वामी इन्द्र है । तू ही प्रलयकालमें सबका सहार करनेवाला रुद्र है और तू ही सबकी भलीभाँति यथायोग्य रक्षा करनेवाला है। तू ही अन्तरिक्षमें (पृथ्वी और स्वर्गके बीचमें) विचरनेवाला वायु है तथा तू ही अग्नि, चन्द्र, तारे आदि समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी सूर्य है ॥९॥ यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः। आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥१०॥ प्राण=हे प्राण, यदा त्वम्=जब तू, अभिवर्षसि=भलीभाँति वर्षा करता है; अथ=उस समय, ते इमाः प्रजाः= तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा, कामाय=यथेष्ट, अन्नम्=अन्न, भविष्यति=उत्पन्न होगा, इति=यह समझकर, आनन्दरूपाः= आनन्दमय; तिष्ठन्ति=हो जाती है ॥ १० ॥ व्याख्या-हे प्राण ! जब तू मेघरूप होकर पृथ्वीलोकमे सब ओर वर्षा करता है, तब तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा 'हमलोगोंके जीवननिर्वाहके लिये यथेष्ट अन्न उत्पन्न होगा'—ऐसी आशा करती हुई आनन्दमे मग्न हो जाती है ॥ १० ॥ व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिंरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥११॥ प्राण=हे प्राण; त्वम्=तू, व्रात्यः=संस्काररहित ( होते हुए भी ), एकर्षिः=एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है ( तथा); वयम्=हमलोग ( तेरे लिये ), आद्यस्य=भोजनको, दातारः=देनेवाले हैं ( और तू), अत्ता=भोक्ता ( खानेवाला ) है; विश्वस्य=समस्त जगतका, सत्पतिः=( तू ही ) श्रेष्ठ स्वामी है, मातरिश्व=हे आकाशमें विचरनेवाले वायुदेव, त्वम्=तू; नः=हमारा, पिता=पिता है ॥ ११ ॥ व्याख्या-हे प्राण ! तू संस्काररहित होकर भी एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। तात्पर्य यह कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है, अतः तुझे संस्कारद्वारा शुद्धिकी आवश्यकता नहीं है, प्रत्युत तू ही सबको पवित्र करनेवाला एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। हमलोग ( सब इन्द्रियाँ और मन आदि ) तेरे लिये नाना प्रकारकी भोजन-सामग्री अर्पण करनेवाले हैं और तू उसे खानेवाला है। तू ही समस्त विश्वका उत्तम स्वामी है । हे आकाशचारी समष्टिवायुरूप प्राण ! तू हमारा पिता है, क्योंकि तुझसे ही हम सबकी उत्पत्ति हुई है ॥ ११ ॥ या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥१२॥ (हे प्राण !) या ते तनूः=जो तेरा स्वरूप, वाचि=वाणीमें, प्रतिष्ठिता च=स्थित है, तथा; या श्रोत्रे=जो श्रोत्रमें, या चक्षुषि च=जो चक्षुमें और, या मनसि=जो मनमें, संतता=व्याप्त है, ताम्=उसको, शिवाम्= कल्याणमय, कुरु=बना ले, मा उत्क्रमीः=( तू ) उत्क्रमण न कर ॥ १२ ॥ व्याख्या-हे प्राण ! जो तेरा स्वरूप वाणी, श्रोत्र, चक्षु आदि समस्त इन्द्रियोंमें और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंमें व्याप्त है, उसे तू कल्याणमय बना ले । अर्थात् तुझमें जो हमें सावधान करनेके लिये आवेग आया है, उसे शान्त कर ले और तू शरीरसे उठकर बाहर न जा । यह हमलोगोंकी प्रार्थना है ॥ १२ ॥ प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥१३॥ इदम्=यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला जगत् (और), यत् त्रिदिवे=जो कुछ स्वर्गलोकमें, प्रतिष्ठितम्=स्थित है; सर्वम्= वह सब-का सब, प्राणस्य=प्राणके; वशे=अधीन है ( हे प्राण ! ), माता पुत्रान् इव=जैसे माता अपने पुत्रोकी रक्षा करती है, उसी प्रकार ( तू हमारी ), रक्षस्व=रक्षा कर, च=तथा; नः श्रीः च=हमें कान्ति और; प्रज्ञाम्=बुद्धि; विधेहि=प्रदान कर, इति=इस प्रकार यह दूसरा प्रश्न समाप्त हुआ ॥ १३ ॥