भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 832 में से

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पृष्ठ 267

व्याख्या— वे वाणी आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले—'यह प्राण ही अग्निरूप धारण करके तपता है और यही सूर्य है । यही मेघ, इन्द्र और वायु है । यही देव पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है । तथा सत् और असत् एव उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है ॥ ५ ॥

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् । ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६ ॥

रथनाभौ = रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए; अराः इव = अरोंकी भाँति, ऋचः यजूंषि = ऋग्वेदकी सम्पूर्ण ऋचाएँ, यजुर्वेदके मन्त्र (तथा), सामानि = सामवेदके मन्त्र, यज्ञः च = यज्ञ और; ब्रह्म, क्षत्रम् = (यज्ञ करनेवाले) ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग; सर्वम् = ये सब के-सब; प्राणे = (इस) प्राणमें; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित हैं ॥ ६ ॥

व्याख्या— जिस प्रकार रथके पहियेकी नाभिमे लगे हुए अरे नाभिके ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेदकी सब ऋचाएँ, यजुर्वेदके समस्त मन्त्र, सब-का सब सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञादि शुभ कर्म और यज्ञादि शुभ कर्म करनेवाले ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग—ये सब-के सब प्राणके आधारपर ही टिके हुए हैं; सबका आश्रय प्राण ही है ॥ ६ ॥

सम्बन्ध— इस प्रकार प्राणका महत्त्व बतलाकर अब उसकी स्तुति की जाती है—

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे । तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥

प्राण = हे प्राण; [ त्वम् एव = तू ही; ] प्रजापतिः = प्रजापति है; त्वम् एव = तू ही, गर्भे चरसि = गर्भमें विचरता है, प्रतिजायसे = (और तू ही) माता-पिताके अनुरूप होकर जन्म लेता है, तु = निश्चय ही, इमाः = ये सब, प्रजाः = जीव, तुभ्यम् = तुझे; बलिम् हरन्ति = भेंट समर्पण करते हैं, यः = जो तू; प्राणैः प्रतितिष्ठसि = (अपानादि अन्य) प्राणोंके साथ-साथ स्थित हो रहा है ॥ ७ ॥

व्याख्या— हे प्राण ! तू ही प्रजापति (प्राणियोंका ईश्वर) है, तू ही गर्भमें विचरनेवाला और माता-पिताके अनुरूप संतानके रूपमें जन्म लेनेवाला है । ये सब जीव तुझे ही भेंट समर्पण करते हैं । तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीर- में स्थित हो रहा है ॥ ७ ॥

देवानामसि वह्नितमः पितॄणां [ ] स्वधा । ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥

(हे प्राण !) देवानाम् = (तू) देवताओंके लिये; वह्नितमः = उत्तम अग्नि है; पितॄणाम् = पितरोंके लिये; प्रथमा स्वधा = पहली स्वधा है; अथर्वाङ्गिरसाम् = अथर्वाङ्गिरस् आदि, ऋषीणाम् = ऋषियोंके द्वारा; चरितम् = आचरित, सत्यम् = सत्य, असि = है ॥ ८ ॥

व्याख्या— हे प्राण ! तू देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम अग्नि है । पितरोंके लिये पहली स्वधा है । अथर्वाङ्गिरस् आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है ॥ ८ ॥

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता । त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥

प्राण = हे प्राण; त्वम् तेजसा = तू तेजसे (सम्पन्न), इन्द्रः = इन्द्र; रुद्रः = रुद्र (और); परिरक्षिता = रक्षा करनेवाला; असि = है, त्वम् = तू ही; अन्तरिक्षे = अन्तरिक्षमें; चरसि = विचरता है (और); त्वम् = तू ही, ज्योतिषां पतिः = समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी; सूर्यः = सूर्य है ॥ ९ ॥