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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

व्याख्या— वे वाणी आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले—'यह प्राण ही अग्निरूप धारण करके तपता है और यही सूर्य है । यही मेघ, इन्द्र और वायु है । यही देव पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है । तथा सत् और असत् एव उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है ॥ ५ ॥

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् । ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६ ॥

रथनाभौ = रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए; अराः इव = अरोंकी भाँति, ऋचः यजूंषि = ऋग्वेदकी सम्पूर्ण ऋचाएँ, यजुर्वेदके मन्त्र (तथा), सामानि = सामवेदके मन्त्र, यज्ञः च = यज्ञ और; ब्रह्म, क्षत्रम् = (यज्ञ करनेवाले) ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग; सर्वम् = ये सब के-सब; प्राणे = (इस) प्राणमें; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित हैं ॥ ६ ॥

व्याख्या— जिस प्रकार रथके पहियेकी नाभिमे लगे हुए अरे नाभिके ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेदकी सब ऋचाएँ, यजुर्वेदके समस्त मन्त्र, सब-का सब सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञादि शुभ कर्म और यज्ञादि शुभ कर्म करनेवाले ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग—ये सब-के सब प्राणके आधारपर ही टिके हुए हैं; सबका आश्रय प्राण ही है ॥ ६ ॥

सम्बन्ध— इस प्रकार प्राणका महत्त्व बतलाकर अब उसकी स्तुति की जाती है—

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे । तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥

प्राण = हे प्राण; [ त्वम् एव = तू ही; ] प्रजापतिः = प्रजापति है; त्वम् एव = तू ही, गर्भे चरसि = गर्भमें विचरता है, प्रतिजायसे = (और तू ही) माता-पिताके अनुरूप होकर जन्म लेता है, तु = निश्चय ही, इमाः = ये सब, प्रजाः = जीव, तुभ्यम् = तुझे; बलिम् हरन्ति = भेंट समर्पण करते हैं, यः = जो तू; प्राणैः प्रतितिष्ठसि = (अपानादि अन्य) प्राणोंके साथ-साथ स्थित हो रहा है ॥ ७ ॥

व्याख्या— हे प्राण ! तू ही प्रजापति (प्राणियोंका ईश्वर) है, तू ही गर्भमें विचरनेवाला और माता-पिताके अनुरूप संतानके रूपमें जन्म लेनेवाला है । ये सब जीव तुझे ही भेंट समर्पण करते हैं । तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीर- में स्थित हो रहा है ॥ ७ ॥

देवानामसि वह्नितमः पितॄणां [ ] स्वधा । ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥

(हे प्राण !) देवानाम् = (तू) देवताओंके लिये; वह्नितमः = उत्तम अग्नि है; पितॄणाम् = पितरोंके लिये; प्रथमा स्वधा = पहली स्वधा है; अथर्वाङ्गिरसाम् = अथर्वाङ्गिरस् आदि, ऋषीणाम् = ऋषियोंके द्वारा; चरितम् = आचरित, सत्यम् = सत्य, असि = है ॥ ८ ॥

व्याख्या— हे प्राण ! तू देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम अग्नि है । पितरोंके लिये पहली स्वधा है । अथर्वाङ्गिरस् आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है ॥ ८ ॥

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता । त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥

प्राण = हे प्राण; त्वम् तेजसा = तू तेजसे (सम्पन्न), इन्द्रः = इन्द्र; रुद्रः = रुद्र (और); परिरक्षिता = रक्षा करनेवाला; असि = है, त्वम् = तू ही; अन्तरिक्षे = अन्तरिक्षमें; चरसि = विचरता है (और); त्वम् = तू ही, ज्योतिषां पतिः = समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी; सूर्यः = सूर्य है ॥ ९ ॥

२४४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—हे प्राण ! तू सब प्रकारके तेज ( शक्तियों) से सम्पन्न, तीनों लोकों का स्वामी इन्द्र है । तू ही प्रलयकालमें सबका सहार करनेवाला रुद्र है और तू ही सबकी भलीभाँति यथायोग्य रक्षा करनेवाला है। तू ही अन्तरिक्षमें (पृथ्वी और स्वर्गके बीचमें) विचरनेवाला वायु है तथा तू ही अग्नि, चन्द्र, तारे आदि समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी सूर्य है ॥९॥ यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः। आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥१०॥ प्राण=हे प्राण, यदा त्वम्=जब तू, अभिवर्षसि=भलीभाँति वर्षा करता है; अथ=उस समय, ते इमाः प्रजाः= तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा, कामाय=यथेष्ट, अन्नम्=अन्न, भविष्यति=उत्पन्न होगा, इति=यह समझकर, आनन्दरूपाः= आनन्दमय; तिष्ठन्ति=हो जाती है ॥ १० ॥ व्याख्या-हे प्राण ! जब तू मेघरूप होकर पृथ्वीलोकमे सब ओर वर्षा करता है, तब तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा 'हमलोगोंके जीवननिर्वाहके लिये यथेष्ट अन्न उत्पन्न होगा'—ऐसी आशा करती हुई आनन्दमे मग्न हो जाती है ॥ १० ॥ व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिंरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥११॥ प्राण=हे प्राण; त्वम्=तू, व्रात्यः=संस्काररहित ( होते हुए भी ), एकर्षिः=एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है ( तथा); वयम्=हमलोग ( तेरे लिये ), आद्यस्य=भोजनको, दातारः=देनेवाले हैं ( और तू), अत्ता=भोक्ता ( खानेवाला ) है; विश्वस्य=समस्त जगतका, सत्पतिः=( तू ही ) श्रेष्ठ स्वामी है, मातरिश्व=हे आकाशमें विचरनेवाले वायुदेव, त्वम्=तू; नः=हमारा, पिता=पिता है ॥ ११ ॥ व्याख्या-हे प्राण ! तू संस्काररहित होकर भी एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। तात्पर्य यह कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है, अतः तुझे संस्कारद्वारा शुद्धिकी आवश्यकता नहीं है, प्रत्युत तू ही सबको पवित्र करनेवाला एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। हमलोग ( सब इन्द्रियाँ और मन आदि ) तेरे लिये नाना प्रकारकी भोजन-सामग्री अर्पण करनेवाले हैं और तू उसे खानेवाला है। तू ही समस्त विश्वका उत्तम स्वामी है । हे आकाशचारी समष्टिवायुरूप प्राण ! तू हमारा पिता है, क्योंकि तुझसे ही हम सबकी उत्पत्ति हुई है ॥ ११ ॥ या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥१२॥ (हे प्राण !) या ते तनूः=जो तेरा स्वरूप, वाचि=वाणीमें, प्रतिष्ठिता च=स्थित है, तथा; या श्रोत्रे=जो श्रोत्रमें, या चक्षुषि च=जो चक्षुमें और, या मनसि=जो मनमें, संतता=व्याप्त है, ताम्=उसको, शिवाम्= कल्याणमय, कुरु=बना ले, मा उत्क्रमीः=( तू ) उत्क्रमण न कर ॥ १२ ॥ व्याख्या-हे प्राण ! जो तेरा स्वरूप वाणी, श्रोत्र, चक्षु आदि समस्त इन्द्रियोंमें और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंमें व्याप्त है, उसे तू कल्याणमय बना ले । अर्थात् तुझमें जो हमें सावधान करनेके लिये आवेग आया है, उसे शान्त कर ले और तू शरीरसे उठकर बाहर न जा । यह हमलोगोंकी प्रार्थना है ॥ १२ ॥ प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥१३॥ इदम्=यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला जगत् (और), यत् त्रिदिवे=जो कुछ स्वर्गलोकमें, प्रतिष्ठितम्=स्थित है; सर्वम्= वह सब-का सब, प्राणस्य=प्राणके; वशे=अधीन है ( हे प्राण ! ), माता पुत्रान् इव=जैसे माता अपने पुत्रोकी रक्षा करती है, उसी प्रकार ( तू हमारी ), रक्षस्व=रक्षा कर, च=तथा; नः श्रीः च=हमें कान्ति और; प्रज्ञाम्=बुद्धि; विधेहि=प्रदान कर, इति=इस प्रकार यह दूसरा प्रश्न समाप्त हुआ ॥ १३ ॥

  • प्रश्नोपनिषद् * २४५ व्याख्या—प्रत्यक्ष दीखनेवाले इस लोकमें जितने भी पदार्थ हैं और जो कुछ स्वर्गमें स्थित हैं, वे सब-के-सब इस प्राणके ही अधीन हैं। यह सोचकर वे इन्द्रियादि देवगण अन्तमें प्राणसे प्रार्थना करते हैं—'हे प्राण ! जिस प्रकार माता अपने पुत्रोंकी रक्षा करती है, उसी प्रकार तू हमारी रक्षा कर तथा तू हमलोगोंको श्री अर्थात् कार्य करनेकी शक्ति और प्रज्ञा (ज्ञान) प्रदान कर।' इस प्रकार इस प्रकरणमें भार्गव ऋषिद्वारा पूछे हुए तीन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए महर्षि पिप्पलादने यह बात समझायी कि समस्त प्राणियोंके शरीरोंको अवकाश देकर बाहर और भीतरसे धारण करनेवाला आकाश-तत्त्व है। साथ ही इस शरीरके अवयवोंकी पूर्ति करनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये चार तत्त्व हैं। दस इन्द्रियाँ और अन्तःकरण— ये इसको प्रकाश देकर क्रियाशील बनानेवाले हैं। इन सबसे श्रेष्ठ प्राण है। अतएव प्राण ही वास्तवमें इस शरीरको धारण करनेवाला है, प्राणके बिना शरीरको धारण करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है। अन्य सब इन्द्रिय आदिमें इसीकी शक्ति अनुस्यूत है, इसीकी शक्ति पाकर वे शरीरको धारण करते हैं। इसी प्रकार प्राणकी श्रेष्ठताका वर्णन छान्दोग्य-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके आरम्भमें और बृहदारण्यक-उपनिषद्के छठे अध्यायके आरम्भमें आया है। इस प्रकरणमें प्राणकी स्तुतिका प्रपञ्च अधिक है ॥ १३ ॥ ॥ द्वितीय प्रश्न समाप्त ॥ २ ॥ 𑁍 तृतीय प्रश्न अथ हैनँ कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥ अथ ह एनम्=उसके बाद इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद) से, कौसल्यः आश्वलायनः=कोसलदेशीय आश्वलायनने, च=भी; पप्रच्छ=पूछा, भगवन्=भगवन्, एषः प्राणः=यह प्राण, कुतः जायते=किससे उत्पन्न होता है, अस्मिन् शरीरे=इस शरीरमें, कथम् आयाति=कैसे आता है, वा आत्मानम्=तथा अपनेको, प्रविभज्य=विभाजित करके, कथम् प्रातिष्ठते=किस प्रकार स्थित होता है, केन उत्क्रमते=किस ढंगसे उत्क्रमण करता—शरीरसे बाहर निकलता है; कथम् बाह्यम्=किस प्रकार बाह्य जगत्को, अभिधत्ते=भलीभाँति धारण करता है (और); कथम् अध्यात्मम्= किस प्रकार मन और इन्द्रिय आदि शरीरके भीतर रहनेवाले जगत्को, इति=यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें आश्वलायन मुनिने महर्षि पिप्पलादसे कुल छः बातें पूछी हैं—(१) जिस प्राणकी महिमा- का आपने वर्णन किया, वह प्राण किससे उत्पन्न होता है ? (२) वह इस मनुष्य-शरीरमें कैसे प्रवेश करता है ? (३) अपनेको विभाजित करके किस प्रकार शरीरमें स्थित रहता है ? (४) एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाते समय पहले शरीरसे किस प्रकार निकलता है ? (५) इस बाह्य (पाञ्चभौतिक) जगत्को किस प्रकार धारण करता है ? तथा (६) मन और इन्द्रिय आदि आध्यात्मिक (आन्तरिक) जगत्को किस प्रकार धारण करता है ? यहाँ प्राणके विषयमें वे ही बातें पूछी गयी हैं, जिनका वर्णन पहले उत्तरमें नहीं आया है और जो पहले प्रश्नके उत्तरको सुनकर ही स्फुरित हुई हैं, इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रश्नोत्तरके समय सुकेशादि छहों ऋषि वहाँ साथ-साथ बैठे सुन रहे थे ॥ १ ॥ तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥ तस्मै सः ह उवाच=उनसे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; अतिप्रश्नान् पृच्छसि=तू बड़े कठिन प्रश्न पूछ रहा है (किन्तु); ब्रह्मिष्ठः असि इति=वेदोंको अच्छी तरह जाननेवाला है, तस्मात्=अतः, अहम्=मैं, ते=तेरे; ब्रवीमि= प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ ॥ २ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें महर्षि पिप्पलादने आश्वलायन मुनिके प्रश्नोंको कठिन बतलाकर उनकी बुद्धिमत्ता और

२४६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तर्कशीलताकी प्रशंसा की है और साथ ही यह भाव भी दिखलाया है कि 'तू जिस ढगसे पूछ रहा है, उसे देखते हुए तो मुझे तेरे प्रश्नोंका उत्तर नहीं देना चाहिये । परतु मै जानता हूँ कि तू तर्कबुद्धिसे नहीं पूछ रहा है, तू श्रद्धालु है, वेदोंमें निष्णात है, अतः मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर दे रहा हूँ' ॥ २ ॥ आत्मन एष प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्छरीरे ॥ ३ ॥ एषः प्राणः = यह प्राण, आत्मनः=परमात्मासे; जायते = उत्पन्न होता है, यथा=जिस प्रकार; एषा छाया= यह छाया, पुरुषे=पुरुषके होनेपर ( ही होती है ), [ तथा =उसी प्रकार; ] एतत् = यह ( प्राण ); एतस्मिन् = इम ( परमात्मा ) के ही; आततम्=आश्रित है ( और ), अस्मिन् शरीरे = इस शरीरमें, मनोकृतेन = मनके किये हुए ( सकल्प ) से; आयाति=आता है ॥ ३ ॥ व्याख्या - यहाँ महर्षि पिप्पलादने क्रमसे आश्वलायन ऋषिके दो प्रश्नोंका उत्तर दिया है । पहले प्रश्नका उत्तर तो यह है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राण परमात्मासे उत्पन्न हुआ है । वह परब्रह्म परमेश्वर ही इसका उपादानकारण है और वही इसकी रचना करनेवाला है, अत इसकी स्थिति उस सर्वात्मा महेश्वरके अधीन - उसीके आश्रित है - ठीक जिस प्रकार किसी मनुष्यकी छाया उसके अधीन रहती है । दूसरे प्रश्नका उत्तर यह है कि यह मनद्वारा किये हुए सङ्कल्पसे किसी शरीरमें प्रवेश करता है । भाव यह कि मरते समय प्राणीके मनमे उसके कर्मानुसार जैसा संकल्प होता है, उसे वैसा ही शरीर मिलता है, अतः प्राणोंका शरीरमें प्रवेश मनके सङ्कल्पसे ही होता है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध - अब आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका उत्तर विस्तारपूर्वक आरम्भ किया जाता है- यथा सम्राडेवाधिकृतान्‌विनियुङ्क्ते एतान्ग्रामानेतान्ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥ यथा = जिस प्रकार, सम्राट् एव = चक्रवर्ती महाराज स्वय ही, एतान् ग्रामान् एतान् ग्रामान् अधितिष्ठस्व = इन गाँवोंमें ( तुम रहो, ) इन गाँवोंमें तुम रहो, इति = इस प्रकार, अधिकृतान् = अधिकारियोंको, विनियुङ्क्ते = अलग-अलग नियुक्त करता है; एवम् एव = इसी प्रकार; एषः प्राणः = यह मुख्य प्राण, इतरान् = दूसरे, प्राणान् = प्राणोंको; पृथक् पृथक् एव = पृथक् पृथक् ही, संनिधत्ते = स्थापित करता है ॥ ४ ॥ व्याख्या - यहाँ महर्षि उदाहरणद्वारा तीसरे प्रश्नका समाधान करते हुए कहते हैं- 'जिस प्रकार भूमण्डलका चक्रवर्ती महाराज भिन्न-भिन्न ग्राम, मण्डल और जनपद आदिमें पृथक्-पृथक् अधिकारियोंकी नियुक्ति करता है और उनका कार्य बाँट देता है, उसी प्रकार यह सर्वश्रेष्ठ प्राण भी अपने अङ्गरूप अपान, व्यान आदि दूसरे प्राणोंको शरीरके पृथक्- पृथक् स्थानोंमें पृथक् पृथक् कार्यके लिये नियुक्त कर देता है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध - अब मुख्य प्राण, अपान ओर समान - इन तीनोंका वासस्थान और कार्य बतलाया जाता है- पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्ताचिषो भवन्ति ॥ ५ ॥ प्राणः =( वह ) प्राण, पायूपस्थे=गुदा और उपस्थमें; अपानम् ( नियुङ्क्ते )=अपानको रखता है, स्वयम्= स्वय, मुखनासिकाभ्याम् = मुख और नासिकाद्वारा ( विचरता हुआ ), चक्षुःश्रोत्रे = नेत्र और श्रोत्रमें, प्रातिष्ठते= स्थित रहता है; तु मध्ये = और शरीरके मध्यभागमें, समानः = समान ( रहता है ); एष हि = यह ( समान वायु ) ही; एतत् हुतम् अन्नम् = इस प्राणाग्निमें हवन किये हुए अन्नको, समम् नयति = समस्त शरीरमे यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है, तस्मात् = उससे; एताः सप्त = ये सात, अर्चिषः = ज्वालाएँ (विषयोंको प्रकाशित करनेवाले ऊपरके द्वार ); भवन्ति = उत्पन्न होती हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या - यह स्वयं तो मुख और नासिकाद्वारा विचरता हुआ नेत्र और श्रोत्रमें स्थित रहता है, तथा गुदा और

उपस्थमें अपानको स्थापित करता है । उसका काम मल-मूत्रको शरीरके बाहर निकाल देना है, रज-वीर्य और गर्भको बाहर करना भी इसीका काम है । शरीरके मध्य भाग-नाभिमें समानको रखता है । यह समान वायु ही प्राणरूप अग्निमें हवन किये -हुए- उदरमें डाले हुए अन्नको अर्थात् उसके सारको सम्पूर्ण शरीरके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है । उस अन्नके सारभूत रससे ही इस शरीरमें ये सात ज्वालाएँ अर्थात् समस्त विषयोंको प्रकाशित करनेवाले दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाएँ और एक मुख ( रसना )-ये सात द्वार उत्पन्न होते हैं, उस रससे पुष्ट होकर ही ये अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-अब व्यानकी गतिका वर्णन किया जाता है- हृदि ह्येष आत्मा अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रति- शाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्वरति ॥ ६ ॥ एषः हि=यह प्रसिद्ध, आत्मा=जीवात्मा, हृदि=हृदयदेशमें रहता है; अत्र=इस ( हृदय ) में; एतत्=यह; नाडीनाम् एकशतम्=मूलरूपसे एक सौ नाड़ियोंका समुदाय है, तासाम्=उनमेंसे, एकैकस्याम्=एक-एक नाड़ीमें; शतम् शतम्=एक-एक सौ ( शाखाएँ ) हैं ( प्रत्येक शाखा-नाड़ीकी ), द्वासप्ततिः द्वासप्ततिः=बहत्तर-बहत्तर; प्रतिशाखानाडीसहस्राणि=हजार प्रतिशाखा-नाड़ियाँ, भवन्ति=होती हैं आसु=इनमें, व्यानः=व्यानवायु, चरति= विचरण करता है ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस शरीरमें जो हृदयप्रदेश है, जो जीवात्माका निवासस्थान है, उसमें एक सौ मूलभूत नाड़ियाँ हैं, उनमेंसे प्रत्येक नाड़ीकी एक-एक सौ शाखा-नाड़ियाँ हैं और प्रत्येक शाखा-नाड़ीकी बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखा-नाड़ियाँ हैं । इस प्रकार इस शरीरमे कुल बहत्तर करोड़ नाड़ियों हैं, इन सबमें व्यानवायु विचरण करता है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-अब उदानका स्थान और कार्य बतलाते हैं, साथ ही आश्वलायनके चौथे प्रश्नका उत्तर भी देते हैं- अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७ ॥ अथ=तथा, एकया=जो एक नाड़ी और है, उसके द्वारा, उदानः ऊर्ध्वः=उदान वायु ऊपरकी ओर, [ चरति= विचरता है, ] ( सः) पुण्येन=वह पुण्यकर्मोंके द्वारा, [ मनुष्यम्=मनुष्यको, ] पुण्यम् लोकम्=पुण्यलोकोंमें, नयति= ले जाता है, पापेन=पापकर्मोंके कारण (उसे ), पापम् नयति=पापयोनियोंमें ले जाता है ( तथा ), उभाभ्याम् एव=पाप और पुण्य दोनों प्रकारके कर्मोंद्वारा ( जीवको ), मनुष्यलोकम्=मनुष्य-शरीरमें, [ नयति=ले जाता है ] ॥ ७ ॥ व्याख्या-इन ऊपर बतलायी हुई बहत्तर करोड़ नाड़ियोंसे भिन्न एक नाड़ी और है, जिसको 'सुपुम्णा' कहते हैं, जो हृदयसे निकलकर ऊपर मस्तकमें गयी है । उसके द्वारा उदान वायु शरीरमे ऊपरकी ओर विचरण करता है । ( इस प्रकार आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका समाधान करके अब महर्षि उसके चौथे प्रश्नका उत्तर संक्षेपमें देते हैं-) जो मनुष्य पुण्यशील होता है, जिसके शुभकर्मोंके भोग उदय हो जाते हैं, उसे यह उदान वायु ही अन्य सब प्राण और इन्द्रियोंके सहित वर्तमान शरीरसे निकालकर पुण्यलोकोंमें अर्थात् स्वर्गादि उच्च लोकोंमें ले जाता है । पापकर्म से युक्त मनुष्यको शूकर-कूकर आदि पाप-योनियोंमें और रौरवादि नरकोंमें ले जाता है तथा जो पाप और पुण्य-दोनो प्रकारके कर्मोंका मिश्रित फल भोगनेके लिये अभिमुख हुए रहते हैं, उनको मनुष्य शरीरमें ले जाता है * ॥ ७ ॥ सम्बन्ध-अब दो मन्त्रोंमें आश्वलायनके पाँचवें और छठे प्रश्नका उत्तर देते हुए जीवात्माके प्राण और इन्द्रियोंसहित एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी बात भी स्पष्ट करते हैं-

  • एक शरीरसे निकलकर जब मुख्य प्राण उदानको साथ लेकर उसके द्वारा दूसरे शरीरमें जाता है, तब अपने अङ्गभूत समान आदि प्राणोंको तथा इन्द्रिय और मनको तो साथ ले ही जाता है, इन सबका स्वामी जीवात्मा भी उसीके साथ जाता है-यह बात यहाँ कहनी थी, इसीलिये पूर्वमन्त्रमें जीवात्माका स्थान हृदय बतलाया गया है ।

२४८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥ ह=यह निश्चय है कि, आदित्यः वै=सूर्य ही, बाह्यः प्राणः=बाह्य प्राण है, एष हि=यही; एनम् चाक्षुषम्= इस नेत्रसम्बन्धी, प्राणम्=प्राणपर, अनुगृह्णानः=अनुग्रह करता हुआ, उदयति=उदित होता है, पृथिव्याम्= पृथ्वीमें, या देवता=जो (अपान वायुकी शक्तिरूप) देवता है, सा एषा=वही यह, पुरुषस्य=मनुष्यके, अपानम्= अपान वायुको, अवष्टभ्य=स्थिर किये; [ वर्तते=रहता है, ] अन्तरा=पृथ्वी और स्वर्गके बीच, यत् आकाशः=जो आकाश (अन्तरिक्षलोक) है, सः समानः=वह समान है, वायु व्यानः=वायु ही व्यान है ॥ ८ ॥ व्याख्या-यह निश्चयपूर्वक समझना चाहिये कि सूर्य ही-सबका बाह्य प्राण है। यह मुख्य प्राण सूर्यरूपमे उदय होकर इस शरीरके बाह्य अङ्ग प्रत्यङ्गोंको पुष्ट करता है और नेत्र-इन्द्रियरूप आध्यात्मिक शरीरपर अनुग्रह करता है--उसे देखनेकी शक्ति अर्थात् प्रकाश देता है। पृथ्वीमें जो देवता अर्थात् अपान वायुकी शक्ति है, वह इस मनुष्यके भीतर रहनेवाले अपान वायुको आश्रय देती है-टिकाये रखती है। यह अपान वायुकी शक्ति गुदा और उपस्थ इन्द्रियोंकी सहायक है तथा इनके बाहरी स्थूल आकारको धारण करती है। पृथ्वी और स्वर्गलोकके बीचका जो आकाश है, वही समान वायुका बाह्य स्वरूप है। वह इस शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गोको अवकाश देकर इसकी रक्षा करता है और शरीरके भीतर रहनेवाले समान वायुको विचरनेके लिये शरीरमे अवकाश देता है, इसीकी सहायतामे श्रोत्र-इन्द्रिय शब्द सुन सकती है। आकाशमे विचरने- वाला प्रत्यक्ष वायु ही व्यानका बाह्य स्वरूप है, यह इस शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गोको चेष्टाशील करता है और शान्ति प्रदान करता है, भीतरी व्यान वायुको नाड़ियोंमे सञ्चारित करने तथा त्वचा-इन्द्रियको स्पर्शका ज्ञान करानेमे भी यह सहायक है ॥८॥ तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥९॥ ह तेजः वै=प्रसिद्ध तेज (गर्मी) ही, उदानः=उदान है तस्मात्=इसीलिए, उपशान्ततेजाः=जिसके शरीरका तेज शान्त हो जाता है, वह (जीवात्मा), मनसि=मनमें, सम्पद्यमानैः=विलीन हुई, इन्द्रियैः=इन्द्रियोंके साथ, पुनर्भवम्=पुनर्जन्मको (प्राप्त होता है) ॥ ९ ॥ व्याख्या-सूर्य और अग्निका जो बाहरी तेज अर्थात् उष्णत्व है, वही उदानका बाह्य स्वरूप है। वह शरीरके बाहरी अङ्ग प्रत्यङ्गोंको ठडा नहीं होने देता और शरीरके भीतरकी ऊष्माको भी स्थिर रखता है। जिसके शरीरसे उदान वायु निकल जाता है, उसका शरीर गरम नही रहता । अतः शरीरकी गर्मी शान्त हो जाते ही उसमें रहनेवाला जीवात्मा मनमें विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर उदान वायुके साथ-साथ दूसरे शरीरमे चला जाता है ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-अब आश्वलायनके चौथे प्रश्नमे आयी हुई एक शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरमें या लोकमें प्रवेश करनेकी वातका पुनः स्पष्टीकरण किया जाता है- यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥ एषः=यह (जीवात्मा), यच्चित्तः=जिस सङ्कल्पवाला होता है, तेन=उस सङ्कल्पके साथ, प्राणम्=मुख्य प्राणमें; आयाति=स्थित हो जाता है, प्राणः=मुख्य प्राण, तेजसा युक्तः=तेज (उदान) से युक्त हो, आत्मना सह=मन, इन्द्रियोंसे युक्त*(जीवात्माको), यथासंकल्पितम्=उसके सङ्कल्पानुसार, लोकम्=भिन्न भिन्न लोक अथवा योनिको, नयति=ले जाता है ॥ १० ॥ व्याख्या-मरते समय इस आत्माका जैसा सङ्कल्प होता है, इसका मन अन्तिम क्षणमे जिस भावका चिन्तन करता है (गीता ८। ६), उस सङ्कल्पके सहित मन, इन्द्रियोंको साथ लिये हुए यह मुख्य प्राणमे स्थित हो जाता है। वह मुख्य प्राण उदान वायुसे मिलकर मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्माको उस अन्तिम सङ्कल्पके अनुसार यथायोग्य भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनिमें ले जाता है। अतः मनुष्यको उचित है कि अपने मनमें निरन्तर एक भगवान्‌का ही चिन्तन रक्खे, दूसरा

  • प्रश्नोपनिषद् * २४९ संकल्प न आने दे। क्योंकि जीवन अल्प और अनित्य है; न जाने कब अचानक इस शरीरका अन्त हो जाय। यदि उस समय भगवान्‌का चिन्तन न होकर कोई दूसरा सङ्कल्प आ गया तो सदाकी भाँति पुनः चौरासी लाख योनियोंमें भटकना पड़ेगा ॥ १० ॥ सम्बन्ध—अब प्राणविषयक ज्ञानका सांसारिक और पारलौकिक फल बतलाते हैं— य एवं विद्वाञ्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥ यः विद्वान् = जो कोई विद्वान्; एवम् प्राणम् = इस प्रकार प्राण (के रहस्य) को; वेद = जानता है; अस्य = उसकी; प्रजा = सन्तानपरम्परा; न ह हीयते = कदापि नष्ट नहीं होती; अमृतः = (वह) अमर; भवति = हो जाता है; तत् एषः = इस विषयका यह (अगला); श्लोकः = श्लोक (है) ॥ ११ ॥ व्याख्या—जो कोई विद्वान् इस प्रकार इस प्राणके रहस्यको समझ लेता है, प्राणके महत्त्वको समझकर हर प्रकारसे उसे सुरक्षित रखता है, उसकी अवहेलना नहीं करता, उसकी सन्तानपरम्परा कभी नष्ट नहीं होती, क्योंकि उसका वीर्य अमोघ और अद्भुत शक्तिसम्पन्न हो जाता है। और वह यदि उसके आध्यात्मिक रहस्यको समझकर अपने जीवनको सार्थक बना लेता है, एक क्षण भी भगवान्‌के चिन्तनसे शून्य नहीं रहने देता, तो सदाके लिये अमर हो जाता है अर्थात् जन्म-मरणरूप संसारसे मुक्त हो जाता है। इस विषयपर निम्नलिखित ऋचा है ॥ ११ ॥ उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा । अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ १२ ॥ प्राणस्य = प्राणकी; उत्पत्तिम् = उत्पत्ति; आयतिम् = आगम; स्थानम् = स्थान; विभुत्वम् एव = और व्यापकताको भी; च = तथा, (बाह्यम्) एव अध्यात्मम् पञ्चधा च = बाह्य एवं आध्यात्मिक पाँच भेदोंको भी; विज्ञाय = भलीभाँति जानकर; अमृतम् अश्नुते = (मनुष्य) अमृतका अनुभव करता है; विज्ञाय अमृतम् अश्नुते इति = जानकर अमृतका अनुभव करता है (यह पुनरुक्ति प्रश्नकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है) ॥ १२ ॥ व्याख्या—उपर्युक्त विवेचनके अनुसार जो मनुष्य प्राणकी उत्पत्तिको अर्थात् यह जिससे और जिस प्रकार उत्पन्न होता है—इस रहस्यको जानता है, शरीरमें उसके प्रवेश करनेकी प्रक्रियाका तथा इसकी व्यापकताका ज्ञान रखता है तथा जो प्राणकी स्थितिको अर्थात् बाहर और भीतर—कहाँ-कहाँ वह रहता है, इस रहस्यको तथा इसके बाहरी और भीतरी अर्थात् आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाँचों भेदोंके रहस्यको भलीभाँति समझ लेता है, वह अमृतरूप परमानन्दमय परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है तथा उस आनन्दमयके संयोग-सुखका निरन्तर अनुभव करता है ॥ १२ ॥ ॥ तृतीय प्रश्न समाप्त ॥ ३ ॥ —✦— चतुर्थ प्रश्न अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥ अथ = तदनन्तर; ह एनम् = इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद मुनि) से; गार्ग्यः = गर्ग गोत्रमें उत्पन्न; सौर्यायणी पप्रच्छ = सौर्यायणी ऋषिने पूछा; भगवन् = भगवन्; पतस्मिन् पुरुषे = इस] मनुष्य-शरीरमें; कानि स्वपन्ति = कौन- कौन सोते हैं; अस्मिन् कानि = इसमें कौन-कौन; जाग्रति = जागते रहते हैं; एषः कतरः देवः = यह कौन देवता; स्वप्नान् पश्यति = स्वप्नोंको देखता है; एतत् सुखम् = यह सुख; कस्य भवति = किसको होता है; सर्वे = (और) ये सब- के-सब; कस्मिन् = किसमें; नु = निश्चितरूपसे; सम्प्रतिष्ठिताः = सम्पूर्णतया स्थित; भवन्ति इति = रहते हैं, यह (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥ उ० अं० ३२—

२५० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—यहाँ गार्ग्य मुनिने महात्मा पिप्पलादसे पाँच बातें पूछी हैं—(१) गाढ निद्राके समय इस मनुष्य शरीर- में रहनेवाले पूर्वोक्त देवताओंमेंसे कौन-कौन सोते हैं? (२) कौन-कौन जागते रहते हैं? (३) स्वप्न-अवस्थामें इनमेंसे कौन देवता स्वप्नकी घटनाओंको देखता रहता है? (४) निद्रा-अवस्थामे सुखका अनुभव किसको होता है? और (५) ये सब के-सब देवता सर्वभावसे किसमे स्थित हैं अर्थात् किसके आश्रित हैं? इस प्रकार इस प्रश्नमें गार्ग्य मुनिने जीवात्मा और परमात्माका पूरा पूरा तत्त्व पूछ लिया ॥ १ ॥ तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति । ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति । तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिददते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥ तस्मै सः ह उवाच = उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षिने कहा; गार्ग्य यथा = हे गार्ग्य ! जिस प्रकार; अस्तम् गच्छतः = अस्त होते हुए, अर्कस्य मरीचयः = सूर्यकी किरणें; एतस्मिन् तेजोमण्डले = इस तेजोमण्डलमे; सर्वाः एकीभवन्ति = सब की-सब एक हो जाती हैं (फिर); उदयतः ताः = उदय होनेपर वे (सब), पुनः पुनः = पुनः पुनः; प्रचरन्ति = सब ओर फैलती रहती है, ह एवम् वै = ठीक ऐसे ही (निद्राके समय), तत् सर्वम् = वे सब इन्द्रियाँ (भी); परे देवे मनसि = परम देव मनमें, एकीभवति = एक हो जाती हैं, तेन तर्हि एषः पुरुषः = इस कारण उस समय यह जीवात्मा; न शृणोति = न (तो) सुनता है, न पश्यति = न देखता है; न जिघ्रति = न सूंघता है, न रसयते = न स्वाद लेता है; न स्पृशते = न स्पर्श करता है, न अभिददते = न बोलता है, न आदत्ते न आनन्दयते = न ग्रहण करता है, न मैथुनका आनन्द भोगता है, न विसृजते न इयायते = न मल-मूत्रका त्याग करता है और न चलता ही है, स्वपिति इति आचक्षते = उस समय 'वह सो रहा है' यों (लोग) कहते हैं ॥ २ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें महात्मा पिप्पलाद ऋषिने गार्ग्यके पहले प्रश्नका इस प्रकार उत्तर दिया है—'गार्ग्य ! जब सूर्य अस्त होता है, उस समय उसकी सब ओर फैली हुई सम्पूर्ण किरणें जिस प्रकार उस तेजःपुञ्जमे मिलकर एक हो जाती हैं, ठीक उसी प्रकार गाढ निद्राके समय तुम्हारे पूछे हुए सब देवता अर्थात् सब-की-सब इन्द्रियाँ उन सबसे श्रेष्ठ जो मनरूप देव है, उसमें विलीन होकर तद्रूप हो जाती हैं। इसलिये उस समय यह जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न चलता है, न मल मूत्रका त्याग करता है और न मैथुनका सुख ही भोगता है। भाव यह है कि उस समय दर्शों इन्द्रियोंका कार्य सर्वथा बद रहता है। केवल लोग कहते हैं कि इस समय यह पुरुष सो रहा है। * उसके जागनेपर पुनः वे सब इन्द्रियाँ मनसे पृथक् होकर अपना-अपना कार्य करने लगती हैं—ठीक वैसे ही, जिस प्रकार सूर्यके उदय होनेपर उसकी किरणें पुनः सब ओर फैल जाती हैं ॥ २ ॥ सम्बन्ध—अब गार्ग्यके प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर देकर दो मन्त्रोंद्वारा यह भी बतलाते हैं कि सब इन्द्रियोंके लय होनेपर मनकी कैसी स्थिति रहती है— प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥ एतस्मिन् पुरे = इस शरीररूप नगरमें; प्राणाग्नयः एव = पाँच प्राणरूप अग्नियॉ ही, जाग्रति = जागती रहती है; ह

  • यहाँ सुषुप्तिकालमें मनका व्यापार चालू रहता है या नहीं, इस विषयमें कुछ नहीं कहा। सब इन्द्रियोंका मनमें विलीन हो जाना तो बताया गया, किंतु मन भी किसीमें विलीन हो जाता है—यह बात नहीं कही गयी । महर्षि पतञ्जलि भी निद्राको चित्तकी एक वृत्ति मानते हैं (पा० यो०)। इससे तो यह जान पड़ता है कि मन विलीन नहीं होता । परंतु अगले मन्त्रमें पञ्चवृत्त्यात्मक प्राणको ही जागनेवाला बताया गया है, मनको नहीं, अत मनका लय होता है या नहीं—यह बात स्पष्ट नहीं होती। पुन चतुर्थ मन्त्रमें मनको यजमान बताकर उसके ब्रह्मलोकमें जानेकी बात कही गयी है। इससे यह कहा जा सकता है कि मनका भी लय हो जाता है।
  • प्रश्नोपनिषद् * २५१ एषः अपानः वै=यह प्रसिद्ध अपान ही, गार्हपत्यः=गार्हपत्य अग्नि है, व्यानः=व्यान, अन्वाहार्यपचनः=अन्वाहार्य पचन- नामक अग्नि (दक्षिणाग्नि) है, गार्हपत्यात् यत् प्रणीयते=गार्हपत्य अग्निसे जो उठाकर ले जायी जाती है (वह), आहवनीयः=आहवनीय अग्नि, प्रणयनात्=प्रणयन (उठाकर ले जाये जाने) के कारण ही, प्राणः=प्राणरूप है ॥ ३ ॥ व्याख्या-उस समय इस मनुष्य-शरीररूप नगरमें पाँच प्राणरूप अग्नियों ही जागती रहती हैं। यह गार्ग्यद्वारा पूछे हुए दूसरे प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर है। यहाँ निद्राको यज्ञका रूप देनेके लिये पाँचों प्राणोंको अग्निरूप बतलाया है। यज्ञमें अग्निकी प्रधानता होती है, इसलिये यहाँ संक्षेपतः प्राणमात्रको अग्निके नामसे कह दिया। परंतु आगे इस यज्ञके रूपकमे किस प्राणवृत्तिकी किसके स्थानमें कल्पना करनी चाहिये, इसका स्पष्टीकरण करते हैं। कहना यह है कि शरीरमें जो प्राणकी अपान- वृत्ति है, यही मानो उस यज्ञकी 'गार्हपत्य' अग्नि है; 'व्यान' दक्षिणाग्नि है; गार्हपत्य अग्निरूप व्यानसे प्राण उठते हैं, इस कारण मुख्य प्राण ही इस यज्ञकी कल्पनामें आहवनीय अग्नि है। क्योंकि यज्ञमें आहवनीय अग्नि गार्हपत्यसे उठाकर लायी जाती है। पहले तीसरे प्रश्नके प्रसङ्गमें भी प्राणको 'अन्नरूप आहुति जिसमें हवन की जाती है' इस व्युत्पत्तिद्वारा आहवनीय अग्नि ही बताया है (३।५) ॥ ३ ॥ यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः । मनो ह वाव यजमानः इष्टफलमेवो- दानः । स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४॥ यत् उच्छ्वासनिःश्वासौ=जो ऊर्ध्वश्वास और अधःश्वास हैं; एतौ=ये दोनों (मानो), आहुती=(अग्निहोत्रकी) दो आहुतियाँ हैं, [एतौ यः=इनको जो, ] समम्=समभावसे (सब ओर), नयति इति सः समानः=पहुँचाता है और इसीलिये जो 'समान' कहलाता है, वही; [होता=हवन करनेवाला ऋत्विक् है, ] ह मनः वाव=यह प्रसिद्ध मन ही; ः=यजमान है, इष्टफलम् एव=अभीष्ट फल ही, उदानः=उदान है, सः एनम्=वह (उदान) ही इस; म् अहः अहः=मनरूप यजमानको प्रतिदिन (निद्राके समय), ब्रह्मं गमयति=ब्रह्मलोकमें भेजता है अर्थात् हृदय गुहामें ले जाता है ॥४॥ व्याख्या-यह जो मुख्य प्राणका श्वास-प्रश्वासके रूपमें शरीरके बाहर निकलना और भीतर लौट जाना है, वही मानो इस यज्ञमें आहुतियाँ पड़ती हैं, इन आहुतियोंद्वारा जो शरीरके पोषक तत्त्व शरीरमें प्रवेश कराये जाते हैं, वे ही हवि हैं। उस हविको समस्त शरीरमें आवश्यकतानुसार समभावसे पहुँचानेका कार्य समान वायुका है, इसलिये उसे समान कहते हैं। वही इस रूपकमें मानो 'होता' अर्थात् हवन करनेवाला ऋत्विक् है। अग्निरूप होनेपर भी आहुतियोंको पहुँचानेका कार्य करनेके कारण इसे 'होता' कहा गया है। पहले बताया हुआ मन ही मानो यजमान है, और उदान वायु ही मानो उस यजमानका अभीष्ट फल है, क्योंकि जिस प्रकार अग्निहोत्र करनेवाले यजमानको उसका अभीष्ट फल उसे अपनी ओर आकर्षित करके कर्मफल भुगतानेके लिये कर्मानुसार स्वर्गादि लोकोंमें ले जाता है, उसी प्रकार यह उदान वायु मनको प्रतिदिन निद्राके समय उसके कर्मफलके भोगस्वरूप ब्रह्मलोकमें-परमात्माके निवासस्थानरूप हृदयगुहामें ले जाता है। वहाँ इस मनके द्वारा जीवात्मा निद्राजनित विश्रामरूप सुखका अनुभव करता है; क्योंकि जीवात्माका निवासस्थान भी वही है। यह बात छठे मन्त्रमें कही है। यहाँ 'ब्रह्म गमयति' से यह बात नहीं समझनी चाहिये कि निद्राजनित सुख ब्रह्मप्राप्तिके सुखकी किसी भी अंशमें समानता कर सकता है; क्योंकि यह तो तामस सुख है और परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिका सुख तीनों गुणोंसे अतीत है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध-अब तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं- अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति । देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥ अत्र स्वप्ने=इस स्वप्न-अवस्थामे, एषः देवः=यह देव (जीवात्मा), महिमानम्=अपनी विभूतिका, अनुभवति=

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२५२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अनुभव करता है: यत् दृष्टम् दृष्टम्=जो बार-बार देखा हुआ है; अनुपश्यति=उसीको बार-बार देखता है; श्रुतम् श्रुतम् एव अर्थम् अनुश्रृणोति=बार-बार सुनी हुई बातोंको ही पुनः-पुनः सुनता है; देशदिगन्तरैः च=नाना देश और दिशाओंमें प्रत्यनुभूतम्=बार-बार अनुभव किये हुए विषयोंको पुनः पुनः=पुनः-पुनः प्रत्यनुभवति=अनुभव करता है (इतना ही नहीं), दृष्टम् च अदृष्टम् च=देखे हुए और न देखे हुएको भी; श्रुतम् च अश्रुतम् च=सुने हुए और न सुने हुएको भी, अनुभूतम् च=अनुभव किये हुए और अननुभूतम् च=अनुभव न किये हुएको भी; सत् च असत् , च=विद्यमान और अविद्यमानको भी ( इस प्रकार ) • सर्वम् पश्यति=सारी घटनाओंको देखता है, (तथा) सर्वः (सन्)= स्वयं सब कुछ बनकर; पश्यति=देखता है ॥ ५ ॥ व्याख्या—गार्ग्य मुनिने जो यह तीसरा प्रश्न किया था कि 'कौन देवता स्वप्नोंको देखता है ?' उसका उत्तर महर्षि पिप्पलाद इस प्रकार देते हैं। इस स्वप्न-अवस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियोंद्वारा अपनी विभूतिका अनुभव करता है। इसका पहले जहाँ कहीं भी जो कुछ बार-बार देखा, सुना और अनुभव किया हुआ है, उसीको यह स्वप्नमें बार-बार देखता, सुनता और अनुभव करता रहता है। परन्तु यह नियम नहीं है कि जाग्रत्-अवस्थामें इसने जिस प्रकार, जिस ढंगसे और जिस जगह जो घटना देखी, सुनी और अनुभव की है, उसी प्रकार यह स्वप्नमें भी अनुभव करता है। अपितु स्वप्नमें जाग्रत्की किसी घटनाका कोई अंश किसी दूसरी घटनाके किसी अंशके साथ मिलकर एक नये ही रूपमें इसके अनुभवमें आता है, अतः कहा जाता है कि स्वप्नकालमें यह देखे और न देखे हुएको भी देखता है, सुने और न सुने हुएको भी सुनता है, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी अनुभव करता है। जो वस्तु वास्तवमें है उसे, और जो नहीं है उसे भी, स्वप्नमें देख लेता है। इस प्रकार स्वप्नमें यह विचित्र ढंगसे सब घटनाओंका बार बार अनुभव करता रहता है, और स्वयं ही सब कुछ बनकर देखता है। उस समय जीवात्माके अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं रहती ॥ ५ ॥ स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्छरीर एतत्सुखं भवति ॥६॥ सः यदा=वह (मन) जब, तेजसा अभिभूतः=तेज (उदान वायु) से अभिभूत, भवति=हो जाता है, * अत्र एषः देवः=इस स्थितिमें यह जीवात्मारूप देवता, स्वप्नान्=स्वप्नोंको, न पश्यति=नहीं देखता, अथ=तथा; तदा=उस समय; एतस्मिन् शरीरे=इस मनुष्य-शरीरमें ( जीवात्माको ), एतत्=इस, सुखम्=सुषुप्तिके सुखका अनुभव, भवति= होता है ॥ ६ ॥ व्याख्या—गार्ग्य मुनिने चौथी बात यह पूछी थी कि 'निद्रामें सुखका अनुभव किसको होता है'? उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं। जब निद्राके समय यह मन उदान वायुके अधीन हो जाता है, अर्थात् जब उदान वायु इस मनको जीवात्माके निवासस्थान हृदयमें पहुँचाकर मोहित कर देता है, उस निद्रा-अवस्था में यह जीवात्मा मनके द्वारा स्वप्नकी घटनाओंको नहीं देखता। उस समय निद्राजनित सुखका अनुभव जीवात्माको ही होता है। इस शरीरमें सुख-दुःखोंको भोगनेवाला प्रत्येक अवस्थामें प्रकृतिस्थ पुरुष अर्थात् जीवात्मा ही है (गीता १३ । २१ ) ॥ ६ ॥ स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ७॥ सः=(पाँचवीं बात जो तुमने पूछी थी) वह (इस प्रकार समझनी चाहिये ), सोम्य=हे प्रिय; यथा=जिस प्रकार; वयांसि=बहुत-से पक्षी ( सायंकालमें), वासोवृक्षम्=अपने निवासरूप वृक्षपर ( आकर ); संप्रतिष्ठन्ते=आरामसे ठहरते हैं ( बसेरा लेते हैं ), ह एवम् वै तत् सर्वम्=ठीक वैसे ही, वे (आगेबताये जानेवाले पृथिवी आदि तत्त्वोंसे लेकर प्राणतक ) सब-के-सब, परे आत्मनि=परमात्मामें, संप्रतिष्ठते=सुखपूर्वक आश्रय पाते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या—गार्ग्य मुनिने जो यह पाँचवीं बात पूछी थी कि 'ये मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और प्राण—सब के-सब किसमे

  • पहले तीसरे प्रकरणमें ( ३ । ९-१० ) बतला आये हैं कि उदान वायुका नाम तेज है। इस प्रकरणमें भी कहा गया है कि उदान वायु ही मनको ब्रह्मलोकमें अर्थात् हृदयमें ले जाता है, अत यहाँ तेजसे अभिभूत होनेका अर्थ जीवका उदान वायुसे आक्रान्त हो जाना है—यह बात समझनी चाहिये ।
  • प्रश्नोपनिषद् * २५३ स्थित हैं—किसके आश्रित हैं ?' उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं—'प्यारे गार्ग्य ! आकाशमें उड़नेवाले पक्षिगण जिस प्रकार सायकालमें लौटकर अपने निवासभूत वृक्षपर आरामसे बसेरा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार आगे बतलाये जानेवाले पृथ्वीसे लेकर प्राणतक जितने तत्त्व हैं, वे सब-के-सब परब्रह्म पुरुषोत्तममे, जो कि सबके आत्मा हैं, आश्रय लेते हैं, क्योंकि वही इन सबके परम आश्रय हैं ॥ ७ ॥ पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चा- काशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्च स्पर्शयितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥ ८ ॥ पृथिवी च=पृथिवी और; पृथिवीमात्रा च=उसकी तन्मात्रा (सूक्ष्म गन्ध) भी; आपः च आपोमात्रा च=जल और रसतन्मात्रा भी; तेजः च तेजोमात्रा च=तेज और रूप-तन्मात्रा भी, वायुः च वायुमात्रा च=वायु और स्पर्श- तन्मात्रा भी; आकाशः च आकाशमात्रा च=आकाश और शब्द-तन्मात्रा भी, चक्षुः च द्रष्टव्यम् च=नेत्र-इन्द्रिय और देखनेमें आनेवाली वस्तु भी; श्रोत्रम् च श्रोतव्यम् च=श्रोत्र-इन्द्रिय और सुननेमें आनेवाली वस्तु भी; घ्राणम् च घ्रातव्यम् च=घ्राणेन्द्रिय और सूँघनेमें आनेवाली वस्तु भी; रसः च रसयितव्यम् च=रसना-इन्द्रिय और रसनाके विषय भी; त्वक् च स्पर्शयितव्यम् च=त्वक्-इन्द्रिय और स्पर्शमें आनेवाली वस्तु भी, वाक् च वक्तव्यम् च=वाक्-इन्द्रिय और बोलनेमें आनेवाला शब्द भी, हस्तौ च आदातव्यम् च=दोनों हाथ और पकड़नेमें आनेवाली वस्तु भी, उपस्थः च आनन्दयितव्यम् च=उपस्थ-इन्द्रिय और उसका विषय भी; पायुः च विसर्जयितव्यम् च=गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा परित्यागयोग्य वस्तु भी, पादौ च गन्तव्यम् च=दोनों चरण और गन्तव्य स्थान भी, मनः च मन्तव्यम् च= मन और मननमें आनेवाली वस्तु भी; बुद्धिः च बोद्धव्यम् च=बुद्धि और जाननेमें आनेवाली वस्तु भी, अहङ्कारः च अहंकर्तव्यम् च=अहंकार और उसका विषय भी, चित्तं च चेतयितव्यम् च=चित्त और चिन्तनमें आनेवाली वस्तु भी, तेजः च विद्योतयितव्यम् च=प्रभाव और उसका विषय भी, प्राणः च विधारयितव्यम् च=प्राण और प्राणके द्वारा धारण किये जानेवाले पदार्थ भी (ये सब-के-सब परमात्माके आश्रित हैं) ॥ ८ ॥ —इस मन्त्रमें यह बात कही गयी है कि स्थूल और सूक्ष्म पाँचों महाभूत, दसों इन्द्रियाँ और उनके विषय, चारों प्रकारके अन्तःकरण और उनके विषय तथा पाँच भेदोंवाला प्राण-वायु—सब-के-सब परमात्माके ही आश्रित हैं। कहना यह है कि स्थूल पृथ्वी और उसका कारण गन्ध-तन्मात्रा, स्थूल जल-तत्त्व और उसका कारण रस-तन्मात्रा, स्थूल तेज-तत्त्व और उसका कारण रूप-तन्मात्रा, स्थूल वायु-तत्त्व और उसका कारण स्पर्श-तन्मात्रा, स्थूल आकाश और उसका कारण शब्द-तन्मात्रा—इस प्रकार अपने कारणोंसहित पाँचों भूत तथा नेत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा देखनेमें आनेवाली वस्तुएँ, श्रोत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा जो कुछ सुना जा सकता है वह सब, घ्राणेन्द्रिय और उसके द्वारा सूँघनेमें आनेवाले पदार्थ, रसना-इन्द्रिय और उसके द्वारा आस्वादनमें आनेवाले खट्टे-मीठे आदि सब प्रकारके रस, त्वचा-इन्द्रिय और उसके द्वारा स्पर्श करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, वाक्-इन्द्रिय और उसके द्वारा बोले जानेवाले शब्द, दोनों हाथ और उनके द्वारा पकड़नेमें आनेवाली सब वस्तुएँ, दोनों पैर और उनके गन्तव्य स्थान, उपस्थ-इन्द्रिय और मैथुनका सुख, गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा त्यागा जानेवाला मल, मन और उसके द्वारा मनन करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, बुद्धि और उसके द्वारा जाननेमें आनेवाले सब पदार्थ, अहंकार और उसके विषय, चित्त और चित्तके द्वारा चिन्तनमें आनेवाले पदार्थ, प्रभाव और प्रभावसे प्रभावित् होनेवाले, पाँच वृत्तिवाला प्राण और उसके द्वारा जीवन देकर धारण किये जानेवाले सब शरीर—ये सब-के-सब इनके कारणभूत परमेश्वरके ही आश्रित हैं ॥ ८ ॥ एष हि द्रष्टा श्रोता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ९ ॥

२५४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * एषः=यह जो; द्रष्टा स्प्रष्टा=देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला; श्रोता घ्राता=सुननेवाला, सूँघनेवाला; रसयिता मन्ता=स्वाद लेनेवाला, मनन करनेवाला; बोद्धा कर्ता=जाननेवाला तथा कर्म करनेवाला; विज्ञानात्मा=विज्ञानस्वरूप; पुरुषः=पुरुष (जीवात्मा) है, सः हि=वह भी, अक्षरे=अविनाशी, परे आत्मनि=परमात्मामें; संप्रतिष्ठते=भलीभाँति स्थित है ॥ ९ ॥ व्याख्या—देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, स्वाद लेनेवाला, मनन करनेवाला, जाननेवाला तथा सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनके द्वारा समस्त कर्म करनेवाला जो यह विज्ञानस्वरूप पुरुष—जीवात्मा है, यह भी उन परम अविनाशी सबके आत्मा परब्रह्म पुरुषोत्तममें ही स्थिति पाता है। उन्हें प्राप्त कर लेनेपर ही इसे वास्तविक शान्ति मिलती है, अतः इसके भी परम आश्रय वे परमेश्वर ही हैं ॥ ९ ॥ परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः ॥ १० ॥ ह यः वै=निश्चय ही जो कोई भी; तत् अच्छायम्=उस छायारहित; अशरीरम्=शरीररहित; अलोहितम्= लाल, पीले आदि रंगोंसे रहित, शुभ्रम् अक्षरम्=विशुद्ध अविनाशी पुरुषको, वेदयते=जानता है; सः=वह, परम् अक्षरम् एव=परम अविनाशी परमात्माको ही; प्रतिपद्यते=प्राप्त हो जाता है; सोम्य=हे प्रिय ! यः तु ( एवम् )=जो कोई ऐसा है; सः सर्वज्ञः=वह सर्वज्ञ (और), सर्वः भवति=सर्वरूप हो जाता है, तत् एषः=उस विषयमें यह (अगला); श्लोकः=श्लोक (है) ॥ १० ॥ व्याख्या—यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि जो कोई भी मनुष्य उन छायारहित, शरीररहित, लाल-पीले आदि सब रंगोंसे रहित, विशुद्ध अविनाशी परमात्माको जान लेता है, वह परम अक्षर परमात्माको ही प्राप्त हो जाता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। हे सोम्य ! जो कोई भी ऐसा है, अर्थात् जो भी उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है, वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है। इस विषयमें निम्नलिखित ऋचा है ॥ १० ॥ विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र । तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥११॥ यत्र=जिसमें, प्राणाः=समस्त प्राण (और); भूतानि च=पाँचों भूत तथा, सर्वैः देवैः सह=सम्पूर्ण इन्द्रिय और अन्तःकरणके सहित, विज्ञानात्मा=विज्ञानस्वरूप आत्मा, संप्रतिष्ठन्ति=आश्रय लेते हैं; सोम्य=हे प्रिय ! तत् अक्षरम्= उस अविनाशी परमात्माको, यः तु वेदयते=जो कोई जान लेता है, सः सर्वज्ञः=वह सर्वज्ञ है; सर्वम् एव=(वह) सर्व- स्वरूप परमेश्वरमें, आविवेश=प्रविष्ट हो जाता है, इति=इस प्रकार (इस प्रश्नका उत्तर समाप्त हुआ) ॥ ११ ॥ व्याख्या—सबके परम कारण जिन परमेश्वरका समस्त प्राण और पाँचों महाभूत तथा समस्त इन्द्रियों और अन्तः- करणके सहित स्वयं विज्ञानस्वरूप जीवात्मा—ये सब आश्रय लेते हैं, उन परम अक्षर अविनाशी परमात्माको जो कोई जान लेता है, वह सर्वज्ञ है तथा सर्वरूप परमेश्वरमे प्रविष्ट हो जाता है। इस प्रकार यह चतुर्थ प्रश्न समाप्त हुआ ॥ ११ ॥ ॥ चतुर्थ प्रश्न समाप्त ॥ ४ ॥ पञ्चम प्रश्न अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥ अथ ह एनम्=इसके बाद इन ख्यातनामा महर्षि पिप्पलादसे, शैब्यः सत्यकामः=शिविपुत्र सत्यकामने, पप्रच्छ= पूछा; भगवन्=भगवन्, मनुष्येषु=मनुष्योंमेंसे, सः यः ह वै=वह जो कोई भी, प्रायणान्तम्=मृत्युपर्यन्त, तत् ओंकारम्=

उस ओंकारका, अभिध्यायीत=भलीभाँति ध्यान करता है; सः तेन=वह उस उपासनाके बलसे, कतमम्=किस, लोकम्= लोकको; वाव जयति=निस्सन्देह जीत लेता है, इति=यह (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें सत्यकामने ओंकारकी उपासनाके विषयमें प्रश्न किया है। उसने यही जिज्ञासा की है कि जो मनुष्य आजीवन ओंकारकी भलीभाँति उपासना करता है, उसे उस उपासनाके द्वारा कौन-से लोककी प्राप्ति होती है, अर्थात् उसका क्या फल मिलता है ॥ १ ॥ तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः । तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतर- मन्वेति ॥ २ ॥ तस्मै सः ह उवाच=उससे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; सत्यकाम=हे सत्यकाम; एतत् वै=निश्चय ही यह; यत् ओंकारः=जो ओंकार है, परम् ब्रह्म च अपरम् च=(वही) परब्रह्म और अपर ब्रह्म भी है; तस्मात्=इसलिये, विद्वान्= इस प्रकारका ज्ञान रखनेवाला मनुष्य, एतेन एव=इस एक ही; आयतनेन=अवलम्बसे (अर्थात् प्रणवमात्रके चिन्तनसे), एकतरम्=अपर और परब्रह्ममेसे किसी एकका; अन्वेति=(अपनी श्रद्धाके अनुसार) अनुसरण करता है ॥ २ ॥ व्याख्या—इसके उत्तरमे महर्षि पिप्पलाद 'ओम्' इस अक्षरकी उसके लक्ष्यभूत परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ एकता करते हुए कहते हैं—सत्यकाम ! यह जो 'ॐ' है, वह अपने लक्ष्यभूत परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न नहीं है। इसलिये यही परब्रह्म है और यही उन परब्रह्मसे प्रकट हुआ उनका विराट्-स्वरूप—अपर ब्रह्म भी है। केवल इसी एक ओंकारका जप, स्मरण और चिन्तन करके उसके द्वारा अपने इष्टको चाहनेवाला विज्ञानसम्पन्न मनुष्य उसे पा लेता है। भाव यह है कि जो मनुष्य परमेश्वर- के विराट्-स्वरूप—इस जगत्‌के ऐश्वर्यमय किसी भी अङ्गको प्राप्त करनेकी इच्छासे ओंकारकी उपासना करता है, वह अपनी भावनाके अनुसार विराट्-स्वरूप परमेश्वरके किसी एक अङ्गको प्राप्त करता है और जो इसके अन्तर्यामी आत्मा पूर्ण ब्रह्म पुरुषोत्तमको लक्ष्य बनाकर उनको पानेके लिये निष्कामभावसे इसकी उपासना करता है, वह परब्रह्म पुरुषोत्तमको पा लेता है। यही बात अगले मन्त्रोंमें भी स्पष्ट की गयी है ॥ २ ॥ स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते । तमृचो मनुष्यलोक- मुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥ ३ ॥ सः यदि=वह उपासक यदि; एकमात्रम्=एक मात्रासे युक्त ओंकारका; अभिध्यायीत=भलीभाँति ध्यान करे तो, सः तेन एव=वह उस उपासनासे ही, संवेदितः=अपने ध्येयकी ओर प्रेरित किया हुआ, तूर्णम् एव=शीघ्र ही; जगत्याम्= पृथ्वीमे, अभिसंपद्यते=उत्पन्न हो जाता है; तम् ऋचः=उसको ऋग्वेदकी ऋचाएँ, मनुष्यलोकम्=मनुष्य-शरीर, उपनयन्ते=प्राप्त करा देती हैं, तत्र सः=वहाँ वह उपासक, तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नः=तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न होकर; महिमानम्=महिमाका; अनुभवति=अनुभव करता है ॥ ३ ॥ व्याख्या—ओंकारका चिन्तन करनेवाला मनुष्य यदि विराट् परमेश्वरके भूः, भुवः और स्वः—इन तीनो रूपोंमेसे भूलोकके ऐश्वर्यमें आसक्त होकर उसकी प्राप्तिके लिये ओंकारकी उपासना करता है तो वह मरनेके बाद अपने प्रापणीय ऐश्वर्य- की ओर प्रेरित होकर तत्काल पृथ्वीलोकमें आ जाता है। ॐकारकी पहली मात्रा ऋग्वेदस्वरूपा है, उसका पृथ्वीलोकसे सम्बन्ध है; अतः उसके चिन्तनसे साधकको ऋग्वेदकी ऋचाएँ पुनः मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट करा देती हैं। वह उस नवीन मनुष्य- जन्ममें तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न उत्तम आचरणोंवाला श्रेष्ठ मनुष्य बनकर उपयुक्त ऐश्वर्यका उपभोग करता है। अर्थात् उसे नीची योनियोंमें नहीं भटकना पड़ता, वह मरनेके बाद मनुष्य होकर पुनः शुभ कर्म करनेमें समर्थ हो जाता है और वहाँ नाना प्रकारके सुखोंका उपभोग करता है ॥ ३ ॥ अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४ ॥ अथ यदि=परन्तु यदि; द्विमात्रेण=दो मात्राओंसे युक्त (ओंकारका);

करता है तो (उच्यते) ] मनसि = मनोमय चन्द्रलोकको संपद्यते = प्राप्त होता है. स यजुर्भिः = वह यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा; अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्षमें स्थित सोमलोकम् = चन्द्रलोकको; उन्नीयते = ऊपरकी ओर ले जाया जाता है. स सोमलोके = वह चन्द्रलोकमें विभूतिम् = वहाँके ऐश्वर्यका; अनुभय = अनुभव करके' पुनः आवर्तते = पुनः इस लोकमें लौट जाता है ॥ ४ ॥ व्याख्या - यदि साधक दो मात्रावाले ओंकारकी उपासना करता है, अर्थात् उस विराट्रूपवान् परमेश्वरकी भूः और भुवः- इन दो मात्राओंकी अर्थात् स्वर्गलोकतकके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे उन्हींको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करता है तो वह मनोमय चन्द्रलोकको प्राप्त होता है. उसको यजुर्वेदके मन्त्र अन्तरिक्षमे ऊपरकी ओर चन्द्रलोकमे पहुँचा देते हैं। उस विनाशशील स्वर्गलोकमे नाना प्रकारके ऐश्वर्यका उपभोग करके अपनी उपासनाके पुण्यका क्षय हो जानेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाता है। वहाँ उसे अपने पूर्व-कर्मानुसार मनुष्य-शरीर या उससे कोई नीची योनि मिल जाती है ॥ ४ ॥

यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥

पुनः यः = परंतु जो त्रिमात्रेण = तीन मात्राओंवाले. ओम् इति = ओम् रूप, एतेन = इस, अक्षरेण एव = अक्षरके द्वारा ही; एतम् परम् = इस परम पुरुषम् = पुरुषका अभिध्यायीत = निरन्तर ध्यान करता है; सः तेजसि = वह तेजोमय; सूर्ये सम्पन्नः = सूर्यलोकमे जाता है (तथा) यथा पादोदरः = जिस प्रकार सर्प त्वचा विनिर्मुच्यते = केंचुलीसे अलग हो जाता है; एवम् ह वै = ठीक उसी तरह, स. पाप्मना = वह पापोंसे विनिर्मुक्तः = सर्वथा मुक्त हो जाता है सः = (इसके बाद) वह; सामभिः = सामवेदकी श्रुतियोंद्वारा; ब्रह्मलोकम् उन्नीयते = ऊपर ब्रह्मलोकमे ले जाया जाता है, सः एतस्माद् = वह इस, जीव- घनात् = जीवसमुदायरूप; परात् परम् = परतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ, पुरिशयम् = अन्तर्यामी पुरुषम् = परमपुरुष पुरुषोत्तमको, ईक्षते = साक्षात् कर लेता है; तत् एतौ = इस विषयमे ये (अगले), श्लोकौ भवतः = दो श्लोक ( हैं) ॥ ५ ॥

व्याख्या - इस मन्त्रमें 'पुन.' शब्दके प्रयोगसे यह सूचित होता है कि उपर्युक्त कथनके अनुसार इस लोक और स्वर्गलोकतकके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे अपर ब्रह्मको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करनेवाले साधकोंसे विलक्षण साधकका यहाँ वर्णन किया गया है। उपासनाका सर्वोत्तम प्रकार यही है- यह भाव प्रकट करनेके लिये ही इस मन्त्रमे 'यदि' पदका प्रयोग भी नहीं किया गया है' क्योंकि इसमें कोई विकल्प नहीं है। इस मन्त्रमे यह भी स्पष्टरूपसे बतला दिया गया है कि ओंकार उस परब्रह्मका नाम है, इसके द्वारा उस परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना की जाती है। मन्त्रने कहा गया है कि जो कोई साधक इन तीन मात्राओंवाले ओंकारस्वरूप अक्षरद्वारा परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना करता है, वह जैसे सर्प केंचुलीसे अलग हो जाता है-उसी प्रकार सब प्रकारके कर्मबन्धनोंसे छूटकर सर्वथा निर्विकार हो जाता है। उसे सामवेदके मन्त्र तेजोमय सूर्यन-डलमेंते ले जाकर सर्वोपरि ब्रह्मलोकमे पहुँचा देते हैं। वहाँ वह जीव-समुदायरूप चेतनतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ उन परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त हो जाता है, जो सम्पूर्ण जगत्को अपनी शक्तिके किसी एक अंशमे धारण किये हुए हैं और सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं। इसी विषयको स्पष्ट करनेवाले ये दो आगे कहे हुए श्लोक हैं ॥ ५ ॥

तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः । क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६ ॥

तिस्रः मात्राः = ओंकारकी तीनों मात्राएँ ('अ', 'उ' तथा 'म ) अन्योन्यसक्ताः = एक दूसरीसे संयुक्त रहकर; प्रयुक्ताः = प्रयुक्त की गयी हों, अनविप्रयुक्ताः = या पृथक्-पृथक् एक-एक ध्येयके चिन्तनमें इनका प्रयोग किया जाय (दोनो प्रकारसे ही वे ); मृत्युमत्यः = मृत्युयुक्त हैं; बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु = बाहर, भीतर और बीचकी. क्रियासु = क्रियाओंमें, सम्यक्प्रयुक्तासु = पूर्णतया इन मात्राओंका प्रयोग किये जानेपर; ज्ञः न कम्पते = उस परमेश्वरको जाननेवाला ज्ञानी विचलित नहीं होता ॥ ६ ॥ व्याख्या - इस मन्त्रमे यह भाव दिखाया गया है कि ओकारवाच्य परब्रह्म परमेश्वरका जो यह जगद्रूप विराट्रूप

४ प्रश्नोपनिषद् * २५७ है अर्थात् जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आता है, यह उसका वास्तविक परम अविनाशी स्वरूप नहीं है, यह परिवर्तन- शील है, अतः इसमें रहनेवाला जीव अमर नहीं होता । वह चाहे ऊँची-से ऊँची योनिको प्राप्त कर ले, परंतु जन्म-मृत्युके चक्रसे नहीं छूटता। इसके एक अङ्ग पृथ्वीलोककी या पृथ्वी और अन्तरिक्ष इन दोनों लोकोंकी अथवा तीनो लोकोंको मिलाकर सम्पूर्ण जगत्की अभिलाषा रखते हुए जो उपासना करता है, जिसका इस जगत्के आत्मरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमकी ओर लक्ष्य नहीं है, वर जो जगत्के बाह्य स्वरूपमें ही आसक्त हो रहा है, वह उन्हें नहीं पाता, अतः बार बार जन्मता-मरता रहता है । उन्हें तो वही साधक पा सकता है, जो अपने शरीरके बाहर, भीतर और शरीरके मध्यस्थान—हृदयदेशमें एव उसके द्वारा की जानेवाली बाहरी, भीतरी और बीचकी समस्त क्रियाओंमे सर्वत्र ओंकारके वाच्यार्थरूप एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तमको व्याप्त समझता है और ओंकारके द्वारा उनकी उपासना करता है—उन्हे पानेकी ही अभिलाषासे ओंकारका जप, स्मरण और चिन्तन करता है, वह ज्ञानी परमात्माको पाकर फिर कभी अपनी स्थितिसे विचलित नही होता ॥ ६ ॥ ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते । तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥ ७ ॥ ऋग्भिः= (एक मात्राकी उपासनासे उपासक ) ऋचाओंद्वारा, एतम् = इस मनुष्यलोकमें ( पहुँचाया जाता है ), यजुर्भिः= ( दूसरा दो मात्राओंकी उपासना करनेवाला ) यजुःश्रुतियोंद्वारा, अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्षमें ( चन्द्रलोकतक पहुँचाया जाता है ), सामभिः= ( पूर्णरूपसे ओंकारकी उपासना करनेवाला ) सामश्रुतियोंद्वारा, तत् = उस ब्रह्मलोकमे ( पहुँचाया जाता है ), यत्=जिसको, कवयः=ज्ञानीजन, वेदयन्ते=जानते हैं, विद्वान्=विवेकशील साधक, ओङ्कारेण एव= केवल ओंकाररूप; आयतनेन = अवलम्बनके द्वारा ही, तम्=उस परब्रह्म पुरुषोत्तमको, अन्वेति=पा लेता है, यत्=जो, तत्= वह; शान्तम् = परम शान्त, अजरम् = जरारहित, अमृतम् = मृत्युरहित, अभयम्=भयरहित, च=और, परम् इति= सर्वश्रेष्ठ है ॥ ७ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें तीसरे, चौथे और पाँचवे मन्त्रोंके भावका सक्षेपमे वर्णन करके ब्राह्मण-ग्रन्थके वाक्योंमें कही हुई बातका समर्थन किया गया है । भाव यह है कि एक मात्रा अर्थात् एक अङ्गको लक्ष्य बनाकर उपासना करनेवाले साधकको ऋग्वेदकी ऋचाएँ मनुष्यलोकमे पहुँचा देती है । दो मात्राकी उपासना करनेवालेकों अर्थात् जगत्के ऊँचे-से-ऊँचे—स्वर्गीय ऐश्वर्यको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करनेवालेको यजुर्वेदके मन्त्र चन्द्रलोकमे ले जाते हैं और जो इन सबमे परिपूर्ण इनके आत्मरूप परमेश्वरकी ओंकारके द्वारा उपासना करता है, उसको सामवेदके मन्त्र उस ब्रह्मलोकमें पहुँचा देते हैं, जिसे ज्ञानीजन जानते हैं । सम्पूर्ण रहस्यको समझनेवाले बुद्धिमान् मनुष्य बाह्य जगत्में आसक्त न होकर ओंकारकी उपासनाद्वारा समस्त जगत्के आत्मरूप उन परब्रह्म परमात्माको पा लेते हैं, जो परम शान्त और सब प्रकारके विकारोंसे रहित हैं, जहाँ न बुढापा है, न मृत्यु है, जो अजर, अमर, निर्भय, सर्वश्रेष्ठ एव परम पुरुषोत्तम हैं ॥ ७ ॥ ॥ पञ्चम प्रश्न ॥ ५ ॥ --------------------*-------------------- प्रश्न अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः —भगवन्हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नम- पृच्छत । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ । तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुम् । स तूष्णीं रथ- । तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥ १ ॥ अथ=फिर; ह एनम् = इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद) से, भारद्वाजः = भरद्वाजपुत्र, सुकेशा=सुकेशाने, पप्रच्छ= पूछा—, भगवन् = भगवन्, कौसल्यः = कोसलदेशीय; राजपुत्रः=राजकुमार; हिरण्यनाभः = हिरण्यनाभने, माम् उपेत्य= मेरे पास आकर, एतम् प्रश्नम् = यह प्रश्न; अपृच्छत = पूछा, भारद्वाज = हे भारद्वाज ! ( क्या तुम ), षोडश- उ० अं० ३३—

२५८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * कलम् = सोलह कलाओंवाले, पुरुषम् = पुरुषको, वेत्थ = जानते हो; तम् कुमारम् = (तब) उस राजकुमारसे, अहम् = मैंने, अब्रुवम् = कहा—; अहम् = मैं; इमम् = इसे, न वेद = नहीं जानता, यदि = यदि; अहम् = मैं, इमम् अवेदिषम् = इसे जानता होता (तो), ते = तुझे, कथम् न अवक्ष्यम् इति = क्यों नहीं बताता, एषः वै = वह मनुष्य अवश्य, समूलः = मूलके सहित, परिशुष्यति = सर्वथा सूख जाता है (नष्ट हो जाता है), यः = जो, अनृतम् = झूठ; अभिवदति = बोलता है, तस्मात् = इसलिये (मैं), अनृतम् = झूठ, वक्तुम् = बोलनेमें, न अर्हामि = समर्थ नहीं हूँ, सः = वह राजकुमार (मेरा उत्तर सुनकर), तूष्णीम् = चुपचाप, रथम् = रथपर, आरुह्य = सवार होकर; प्रवव्राज = चला गया, तम् = उसीको, त्वा पृच्छामि = मैं आपसे पूछ रहा हूँ, असौ = वह (सोलह कलाओंवाला), पुरुषः = पुरुष, क इति = कहाँ है ? ॥ १ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें सुकेशा ऋषिने अपनी अल्पज्ञता और सत्य-भाषणका महत्त्व प्रकट करते हुए सोलह कलाओ वाले पुरुषके विषयमे प्रश्न किया है। वे बोले- "भगवन् ! एक बार कोसलदेशका राजकुमार हिरण्यनाभ मेरे पास आया था। उसने मुझसे पूछा-'भारद्वाज ! क्या तुम सोलह कलाओंवाले पुरुषके विषयमे जानते हो ?' मैने उससे स्पष्ट कह दिया- 'भाई ! मै उसे नहीं जानता, जानता होता तो तुम्हें अवश्य बता देता । न बतानेका कोई कारण नहीं है । तुम अपने मनमें यह न समझना कि मैंने बहाना करके तुम्हारे प्रश्नको टाल दिया है, क्योकि मैं झूठ नहीं बोलता । झूठ बोलनेवालेका मूलोच्छेद हो जाता है, वह इस लोकमे या परलोकमें कहीं भी प्रतिष्ठा नहीं पा सकता ।' मेरी इस बातको सुनकर राजकुमार चुपचाप रथपर सवार होकर जैसे आया था, वैसे ही लौट गया। अब मैं आपके द्वारा उसी सोलह कलाओंवाले पुरुषका तत्त्व जानना चाहता हूँ, कृपया आप मुझे बतलायें कि वह कहाँ है और उसका स्वरूप क्या है ?" ॥ १ ॥ तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडश कलाः प्रभवन्तीति ॥ २ ॥ तस्मै = उससे, सः ह = वे सुप्रसिद्ध महर्षि, उवाच = बोले, सोम्य = हे प्रिय !, इह = यहाँ, अन्तःशरीरे = इस शरीरके भीतर, एव = ही, सः = वह, पुरुषः = पुरुष है, यस्मिन् = जिसमे, एताः = ये, षोडश = सोलह, कलाः = कलाएँ; प्रभवन्ति इति = प्रकट होती हैं ॥ २ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें उस सोलह कलाओंवाले पुरुषका सङ्केतमात्र किया गया है । महर्षि पिप्पलाद कहते हैं- 'प्रिय सुकेशा ! जिन परमेश्वरसे सोलह कलाओंका समुदाय सम्पूर्ण जगद्रूप उनका विराट् शरीर उत्पन्न हुआ है, वे ही पुरुष हैं, उनको खोजनेके लिये कहीं अन्यत्र नहीं जाना है, वे हमारे इस शरीरके भीतर ही विराजमान हैं।' भाव यह है कि जब मनुष्यके हृदयमे परमात्माको पानेके लिये उत्कट अभिलाषा जाग्रत् हो जाती है, तब वे उसे वहीं उसके हृदयमे ही मिल जाते हैं ॥ २ ॥ सम्बन्ध-उन परब्रह्म पुरुषोत्तमका तत्त्व समझानेके लिये संक्षेपसे सृष्टिक्रमका वर्णन करते हैं- स ईक्षांचक्रे । कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३ ॥ सः = उसने, ईक्षांचक्रे = विचार किया (कि); कस्मिन् = (शरीरसे) किसके; उत्क्रान्ते = निकल जानेपर; अहम् उत्क्रान्तः = मै (भी) निकला हुआ (-सा), भविष्यामि = हो जाऊँगा; वा = तथा; कस्मिन् प्रतिष्ठिते = किसके स्थित रहनेपर, प्रतिष्ठास्यामि इति = मैं स्थित रहूँगा ॥ ३ ॥ व्याख्या-महासर्गके आदिमें जगत्की रचना करनेवाले परम पुरुष परमेश्वरने विचार किया कि 'मैं जिस ब्रह्माण्डकी रचना करना चाहता हूँ, उसमें एक ऐसा कौन सा तत्त्व डाला जाय कि जिसके न रहनेपर मैं स्वयं भी उसमे न रह सकूँ अर्थात् मेरी सत्ता स्पष्टरूपसे व्यक्त न रहे और जिसके रहनेपर मेरी सत्ता स्पष्ट प्रतीत होती रहे' ॥ ३ ॥ स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च ॥ ४ ॥

  • प्रश्नोपनिषद् * २५९ सः = उसने प्राणम् असृजत = ( यह सोचकर सबसे पहले ) प्राणकी रचना की; प्राणात् श्रद्धा = प्राणके बाद श्रद्धाको ( उत्पन्न किया ), खम् वायुः ज्योतिः आपः पृथिवी = ( उसके बाद क्रमशः ) आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी ( ये पाँच महाभूत प्रकट हुए; फिर ); मनः इन्द्रियम् = मन ( अन्तःकरण ) और इन्द्रियसमुदाय ( की उत्पत्ति हुई ), अन्नम् = ( अनन्तर ) अन्न हुआ; अन्नात् = अन्नसे; वीर्यम् = वीर्य ( की रचना हुई, फिर ); तपः = तप; मन्त्राः = नाना प्रकारके मन्त्र; कर्म = नाना प्रकारके कर्म; च लोकाः = और उनके फलरूप भिन्न-भिन्न लोकों ( का निर्माण हुआ ); च = और; लोकेषु = उन लोकोंमें, नाम = नाम ( की रचना हुई ) ॥ ४ ॥ व्याख्या-परब्रह्म परमेश्वरने सर्वप्रथम सबके प्राणरूप सर्वात्मा हिरण्यगर्भको बनाया। उसके बाद शुभकर्ममें प्रवृत्त करानेवाली श्रद्धा अर्थात् आस्तिक-बुद्धिको प्रकट करके फिर क्रमशः शरीरके उपादानभूत आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी-इन पाँच महाभूतोंकी सृष्टि की। इन पाँच महाभूतोंका कार्य ही यह दृश्यमान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है। पाँच महाभूतोंके बाद परमेश्वरने मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार-इन चारोंके समुदायरूप अन्तःकरणको रचा। फिर विषयोंके ज्ञान एव कर्मके लिये पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा पाँच कर्मेन्द्रियोंको उत्पन्न किया, फिर प्राणियोंके शरीरकी स्थितिके लिये अन्नकी और अन्नके परिपाकद्वारा बलकी सृष्टि की। उसके बाद अन्तःकरण और इन्द्रियोंके संयमरूप तपका प्रादुर्भाव किया। उपासनाके लिये भिन्न-भिन्न मन्त्रोंकी कल्पना की। अन्तःकरणके संयोगसे इन्द्रियोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंका निर्माण किया। उनके भिन्न-भिन्न फलरूप लोकोंको बनाया और उन सबके नाम-रूपोंकी रचना की। इस प्रकार सोलह कलाओंसे युक्त इस ब्रह्माण्डकी रचना करके जीवात्माके सहित परमेश्वर स्वयं इसमें प्रविष्ट हो गये; इसीलिये वे सोलह कलाओंवाले पुरुष कहलाते हैं। हमारा यह मनुष्य-शरीर भी ब्रह्माण्डका ही एक छोटा-सा नमूना है, अतः परमेश्वर जिस प्रकार इस सारे ब्रह्माण्डमें हैं, उसी प्रकार हमारे इस शरीरमें भी हैं और इस शरीरमें भी वे सोलह कलाएँ वर्तमान हैं। उन हृदयस्थ परमदेव पुरुषोत्तमको जान लेना ही उस सोलह कलावाले पुरुषको जान लेना है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध-सर्गके आरम्भका वर्णन करके जिन परब्रह्मका लक्ष्य कराया गया, उन्हींका अब प्रलयके वर्णनसे लक्ष्य करते हैं- स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते 'नामरूपे इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५॥ सः = वह ( प्रलयका दृष्टान्त ) इस प्रकार है; यथा = जिस प्रकार; इमाः = ये; नद्यः = नदियाँ, समुद्रायणाः = समुद्रकी ओर लक्ष्य करके जाती, स्यन्दमानाः = ( और ) बहती हुई; समुद्रम् = समुद्रको, प्राप्य = पाकर, अस्तम् गच्छन्ति = ( उसीमें ) विलीन हो जाती हैं; तासाम् नामरूपे = उनके नाम और रूप; भिद्येते = नष्ट हो जाते हैं; समुद्रः इति एवम् = ( फिर ) समुद्र इस एक नामसे ही, प्रोच्यते = पुकारी जाती हैं; एवम् एव = इसी प्रकार; अस्य परिद्रष्टुः = सब ओरसे पूर्णतया देखनेवाले इन परमेश्वरकी, इमाः = ये ( ऊपर बतायी हुई ); षोडश कलाः = सोलह कलाएँ, पुरुषायणाः = जिनका परमाधार और परमगति पुरुष है; पुरुषम् प्राप्य = ( प्रलयकालमें ) परम पुरुष परमात्माको पाकर, अस्तम् गच्छन्ति = ( उन्हींमें) विलीन हो जाती हैं, च = तथा, आसाम् = इन सबके; नामरूपे = ( पृथक्-पृथक् ) नाम और रूप; भिद्येते = नष्ट हो जाते हैं, पुरुषः इति एवम् = फिर 'पुरुष' इस एक नामसे ही, प्रोच्यते = पुकारी जाती हैं; सः = वही; एषः = यह; अकलः = कलारहित ( और ); अमृतः = अमर परमात्मा, भवति = है, तत् = उसके विषयमें; एषः = यह ( अगला ); श्लोकः = श्लोक है ॥ ५ ॥ —जिस प्रकार भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंवाली ये बहुत-सी नदियाँ अपने उद्गमस्थान समुद्रकी ओर दौड़ती हुई समुद्रमें पहुँचकर उसीमें विलीन हो जाती हैं, उनका समुद्रसे पृथक् कोई नाम-रूप नहीं रहता—वे समुद्र ही बन जाती हैं, उसी प्रकार सर्वसाक्षी सबके आत्मरूप परमात्मासे उत्पन्न हुई ये सोलह कलाएँ ( अर्थात् यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ) प्रलयकालमें अपने परमाधार परम पुरुष परमेश्वरमें जाकर उसीमें विलीन हो जाती हैं। फिर इन सबके अलग-अलग नाम-रूप नहीं रहते।

२६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * एकमात्र परम पुरुष परमेश्वरके स्वरूपमे ये तदाकार हो जाती हैं। अतः उन्हीके नामसे, उन्हीके वर्णनमे इनका वर्णन होता है, अलग नहीं। उस समय परमात्मामे किसी प्रकारका सङ्कल्प नहीं रहता। अतः वे सब कलाओंसे रहित, अमृतरूप कहे जाते हैं। इस तत्त्वको समझनेवाला मनुष्य भी उन परब्रह्मको प्राप्त होकर अकल और अमर हो जाता है। इस विषयपर आगे कहा जानेवाला मन्त्र है ॥ ५ ॥ अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः । तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ ६ ॥ रथनाभौ=रथ-चक्रकी नाभिके आधारपर; अराः इव=जिस प्रकार अरे स्थित होते हैं (वैसे ही), यस्मिन्= जिसमे; कलाः=(ऊपर बतायी हुई सब) कलाएँ; प्रतिष्ठिताः=सर्वथा स्थित हैं; तम् वेद्यम् पुरुषम्=उस जानने- योग्य (सबके आधारभूत) परम पुरुष परमेश्वरको; वेद=जानना चाहिये; यथा=जिसमे (हे शिष्यगण) वः=तुमलोगोंको; मृत्युः=मृत्यु मा परिव्यथाः इति=दुःख न दे सके ॥ ६ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे सर्वाधार परमेश्वरको जाननेके लिये प्रेरणा करके उसका फल जन्म मृत्युसे रहित हो जाना बताया गया है। महर्षि पिप्पलाद अपने शिष्योसे कहते हैं—'जिस प्रकार रथके पहियेमे लगे रहनेवाले सब अरे उस पहियेके मध्यस्थ नाभिमे प्रविष्ट रहते हैं, उन सबका आधार नाभि है—नाभिके बिना वे टिक ही नहीं सकते, उसी प्रकार ऊपर बतायी हुई प्राण आदि सोलह कलाओके जो आधार हैं, ये सब कलाएँ जिनके आश्रित हैं, जिनमें उत्पन्न होती हैं और जिनमें विलीन हो जाती हैं, वे ही जानने योग्य परब्रह्म परमेश्वर हैं। उन सर्वाधार परमात्माको जानना चाहिये। उन्हें जान लेनेके बाद तुम्हें मौतका डर नहीं रहेगा, फिर मृत्यु तुमको इस जन्म-मृत्युयुक्त ससारमें डालकर दुःखी नहीं कर सकेगी। तुमलोग सदाके लिये अमर हो जाओगे' ॥ ६ ॥ तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद । नातः परमस्तीति ॥ ७ ॥ ह=(तत्पश्चात्) उन प्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने; तान् उवाच=उन सबमे कहा; एतत्=इम; परम् ब्रह्म=परम ब्रह्म को; अहम्=मै; एतावत्=इतना; एव=ही; वेद=जानता हूँ; अतः परम्=इससे पर, (उत्कृष्ट तत्त्व); न=नहीं; अस्ति इति=है ॥७॥ व्याख्या—इतना उपदेश करनेके बाद महर्षि पिप्पलादने परम भाग्यवान् सुकेशा आदि छहों ऋषियोको सम्बोधन करके कहा—'ऋषियो ! इन परब्रह्म परमेश्वरके विषयमें मै इतना ही जानता हूँ। इनसे पर अर्थात् श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है।' मैने तुमलोगोसे उनके विषयमे जो कुछ कहना था, वह कह दिया ॥ ७ ॥ सम्बन्ध—अन्तमें कृतज्ञता प्रकट करते हुए वे शिष्यगण महर्षिको बारवार प्रणाम करते हुए कहते हैं— ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८ ॥ ते=उन छहों ऋषियोंने; तम् अर्चयन्तः=पिप्पलादकी पूजा की (और कहा ); त्वम्=आप; हि=ही; नः=हमारे; पिता=पिता (है); यः=जिन्होंने; अस्माकम्=हमलोगोको; अविद्यायाः परम् पारम्=अविद्याके दूसरे पार; तारयसि इति=पहुँचा दिया है; नमः परमऋषिभ्यः=आप परम ऋषिको नमस्कार है; नमः परमऋषिभ्यः=परम ऋषि- को नमस्कार है ॥ ८ ॥ व्याख्या—इस प्रकार आचार्य पिप्पलादसे ब्रह्मका उपदेश पाकर उन छहों ऋषियोंने पिप्पलादकी पूजा की और कहा—'भगवन् ! आप ही हमारे वास्तविक पिता हैं, जिन्होंने हमें इस ससार-समुद्रके पार पहुँचा दिया। ऐसे गुरुके

पिप्पलादके आश्रममें सुकेशादि मुनि

अङ्गिरस् और शौनक

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