भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 832 में से

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पृष्ठ 282

२५८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * कलम् = सोलह कलाओंवाले, पुरुषम् = पुरुषको, वेत्थ = जानते हो; तम् कुमारम् = (तब) उस राजकुमारसे, अहम् = मैंने, अब्रुवम् = कहा—; अहम् = मैं; इमम् = इसे, न वेद = नहीं जानता, यदि = यदि; अहम् = मैं, इमम् अवेदिषम् = इसे जानता होता (तो), ते = तुझे, कथम् न अवक्ष्यम् इति = क्यों नहीं बताता, एषः वै = वह मनुष्य अवश्य, समूलः = मूलके सहित, परिशुष्यति = सर्वथा सूख जाता है (नष्ट हो जाता है), यः = जो, अनृतम् = झूठ; अभिवदति = बोलता है, तस्मात् = इसलिये (मैं), अनृतम् = झूठ, वक्तुम् = बोलनेमें, न अर्हामि = समर्थ नहीं हूँ, सः = वह राजकुमार (मेरा उत्तर सुनकर), तूष्णीम् = चुपचाप, रथम् = रथपर, आरुह्य = सवार होकर; प्रवव्राज = चला गया, तम् = उसीको, त्वा पृच्छामि = मैं आपसे पूछ रहा हूँ, असौ = वह (सोलह कलाओंवाला), पुरुषः = पुरुष, क इति = कहाँ है ? ॥ १ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें सुकेशा ऋषिने अपनी अल्पज्ञता और सत्य-भाषणका महत्त्व प्रकट करते हुए सोलह कलाओ वाले पुरुषके विषयमे प्रश्न किया है। वे बोले- "भगवन् ! एक बार कोसलदेशका राजकुमार हिरण्यनाभ मेरे पास आया था। उसने मुझसे पूछा-'भारद्वाज ! क्या तुम सोलह कलाओंवाले पुरुषके विषयमे जानते हो ?' मैने उससे स्पष्ट कह दिया- 'भाई ! मै उसे नहीं जानता, जानता होता तो तुम्हें अवश्य बता देता । न बतानेका कोई कारण नहीं है । तुम अपने मनमें यह न समझना कि मैंने बहाना करके तुम्हारे प्रश्नको टाल दिया है, क्योकि मैं झूठ नहीं बोलता । झूठ बोलनेवालेका मूलोच्छेद हो जाता है, वह इस लोकमे या परलोकमें कहीं भी प्रतिष्ठा नहीं पा सकता ।' मेरी इस बातको सुनकर राजकुमार चुपचाप रथपर सवार होकर जैसे आया था, वैसे ही लौट गया। अब मैं आपके द्वारा उसी सोलह कलाओंवाले पुरुषका तत्त्व जानना चाहता हूँ, कृपया आप मुझे बतलायें कि वह कहाँ है और उसका स्वरूप क्या है ?" ॥ १ ॥ तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडश कलाः प्रभवन्तीति ॥ २ ॥ तस्मै = उससे, सः ह = वे सुप्रसिद्ध महर्षि, उवाच = बोले, सोम्य = हे प्रिय !, इह = यहाँ, अन्तःशरीरे = इस शरीरके भीतर, एव = ही, सः = वह, पुरुषः = पुरुष है, यस्मिन् = जिसमे, एताः = ये, षोडश = सोलह, कलाः = कलाएँ; प्रभवन्ति इति = प्रकट होती हैं ॥ २ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें उस सोलह कलाओंवाले पुरुषका सङ्केतमात्र किया गया है । महर्षि पिप्पलाद कहते हैं- 'प्रिय सुकेशा ! जिन परमेश्वरसे सोलह कलाओंका समुदाय सम्पूर्ण जगद्रूप उनका विराट् शरीर उत्पन्न हुआ है, वे ही पुरुष हैं, उनको खोजनेके लिये कहीं अन्यत्र नहीं जाना है, वे हमारे इस शरीरके भीतर ही विराजमान हैं।' भाव यह है कि जब मनुष्यके हृदयमे परमात्माको पानेके लिये उत्कट अभिलाषा जाग्रत् हो जाती है, तब वे उसे वहीं उसके हृदयमे ही मिल जाते हैं ॥ २ ॥ सम्बन्ध-उन परब्रह्म पुरुषोत्तमका तत्त्व समझानेके लिये संक्षेपसे सृष्टिक्रमका वर्णन करते हैं- स ईक्षांचक्रे । कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३ ॥ सः = उसने, ईक्षांचक्रे = विचार किया (कि); कस्मिन् = (शरीरसे) किसके; उत्क्रान्ते = निकल जानेपर; अहम् उत्क्रान्तः = मै (भी) निकला हुआ (-सा), भविष्यामि = हो जाऊँगा; वा = तथा; कस्मिन् प्रतिष्ठिते = किसके स्थित रहनेपर, प्रतिष्ठास्यामि इति = मैं स्थित रहूँगा ॥ ३ ॥ व्याख्या-महासर्गके आदिमें जगत्की रचना करनेवाले परम पुरुष परमेश्वरने विचार किया कि 'मैं जिस ब्रह्माण्डकी रचना करना चाहता हूँ, उसमें एक ऐसा कौन सा तत्त्व डाला जाय कि जिसके न रहनेपर मैं स्वयं भी उसमे न रह सकूँ अर्थात् मेरी सत्ता स्पष्टरूपसे व्यक्त न रहे और जिसके रहनेपर मेरी सत्ता स्पष्ट प्रतीत होती रहे' ॥ ३ ॥ स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च ॥ ४ ॥