कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 281, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४ प्रश्नोपनिषद् * २५७ है अर्थात् जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आता है, यह उसका वास्तविक परम अविनाशी स्वरूप नहीं है, यह परिवर्तन- शील है, अतः इसमें रहनेवाला जीव अमर नहीं होता । वह चाहे ऊँची-से ऊँची योनिको प्राप्त कर ले, परंतु जन्म-मृत्युके चक्रसे नहीं छूटता। इसके एक अङ्ग पृथ्वीलोककी या पृथ्वी और अन्तरिक्ष इन दोनों लोकोंकी अथवा तीनो लोकोंको मिलाकर सम्पूर्ण जगत्की अभिलाषा रखते हुए जो उपासना करता है, जिसका इस जगत्के आत्मरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमकी ओर लक्ष्य नहीं है, वर जो जगत्के बाह्य स्वरूपमें ही आसक्त हो रहा है, वह उन्हें नहीं पाता, अतः बार बार जन्मता-मरता रहता है । उन्हें तो वही साधक पा सकता है, जो अपने शरीरके बाहर, भीतर और शरीरके मध्यस्थान—हृदयदेशमें एव उसके द्वारा की जानेवाली बाहरी, भीतरी और बीचकी समस्त क्रियाओंमे सर्वत्र ओंकारके वाच्यार्थरूप एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तमको व्याप्त समझता है और ओंकारके द्वारा उनकी उपासना करता है—उन्हे पानेकी ही अभिलाषासे ओंकारका जप, स्मरण और चिन्तन करता है, वह ज्ञानी परमात्माको पाकर फिर कभी अपनी स्थितिसे विचलित नही होता ॥ ६ ॥ ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते । तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥ ७ ॥ ऋग्भिः= (एक मात्राकी उपासनासे उपासक ) ऋचाओंद्वारा, एतम् = इस मनुष्यलोकमें ( पहुँचाया जाता है ), यजुर्भिः= ( दूसरा दो मात्राओंकी उपासना करनेवाला ) यजुःश्रुतियोंद्वारा, अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्षमें ( चन्द्रलोकतक पहुँचाया जाता है ), सामभिः= ( पूर्णरूपसे ओंकारकी उपासना करनेवाला ) सामश्रुतियोंद्वारा, तत् = उस ब्रह्मलोकमे ( पहुँचाया जाता है ), यत्=जिसको, कवयः=ज्ञानीजन, वेदयन्ते=जानते हैं, विद्वान्=विवेकशील साधक, ओङ्कारेण एव= केवल ओंकाररूप; आयतनेन = अवलम्बनके द्वारा ही, तम्=उस परब्रह्म पुरुषोत्तमको, अन्वेति=पा लेता है, यत्=जो, तत्= वह; शान्तम् = परम शान्त, अजरम् = जरारहित, अमृतम् = मृत्युरहित, अभयम्=भयरहित, च=और, परम् इति= सर्वश्रेष्ठ है ॥ ७ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें तीसरे, चौथे और पाँचवे मन्त्रोंके भावका सक्षेपमे वर्णन करके ब्राह्मण-ग्रन्थके वाक्योंमें कही हुई बातका समर्थन किया गया है । भाव यह है कि एक मात्रा अर्थात् एक अङ्गको लक्ष्य बनाकर उपासना करनेवाले साधकको ऋग्वेदकी ऋचाएँ मनुष्यलोकमे पहुँचा देती है । दो मात्राकी उपासना करनेवालेकों अर्थात् जगत्के ऊँचे-से-ऊँचे—स्वर्गीय ऐश्वर्यको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करनेवालेको यजुर्वेदके मन्त्र चन्द्रलोकमे ले जाते हैं और जो इन सबमे परिपूर्ण इनके आत्मरूप परमेश्वरकी ओंकारके द्वारा उपासना करता है, उसको सामवेदके मन्त्र उस ब्रह्मलोकमें पहुँचा देते हैं, जिसे ज्ञानीजन जानते हैं । सम्पूर्ण रहस्यको समझनेवाले बुद्धिमान् मनुष्य बाह्य जगत्में आसक्त न होकर ओंकारकी उपासनाद्वारा समस्त जगत्के आत्मरूप उन परब्रह्म परमात्माको पा लेते हैं, जो परम शान्त और सब प्रकारके विकारोंसे रहित हैं, जहाँ न बुढापा है, न मृत्यु है, जो अजर, अमर, निर्भय, सर्वश्रेष्ठ एव परम पुरुषोत्तम हैं ॥ ७ ॥ ॥ पञ्चम प्रश्न ॥ ५ ॥ --------------------*-------------------- प्रश्न अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः —भगवन्हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नम- पृच्छत । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ । तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुम् । स तूष्णीं रथ- । तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥ १ ॥ अथ=फिर; ह एनम् = इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद) से, भारद्वाजः = भरद्वाजपुत्र, सुकेशा=सुकेशाने, पप्रच्छ= पूछा—, भगवन् = भगवन्, कौसल्यः = कोसलदेशीय; राजपुत्रः=राजकुमार; हिरण्यनाभः = हिरण्यनाभने, माम् उपेत्य= मेरे पास आकर, एतम् प्रश्नम् = यह प्रश्न; अपृच्छत = पूछा, भारद्वाज = हे भारद्वाज ! ( क्या तुम ), षोडश- उ० अं० ३३—