कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरता है तो (उच्यते) ] मनसि = मनोमय चन्द्रलोकको संपद्यते = प्राप्त होता है. स यजुर्भिः = वह यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा; अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्षमें स्थित सोमलोकम् = चन्द्रलोकको; उन्नीयते = ऊपरकी ओर ले जाया जाता है. स सोमलोके = वह चन्द्रलोकमें विभूतिम् = वहाँके ऐश्वर्यका; अनुभय = अनुभव करके' पुनः आवर्तते = पुनः इस लोकमें लौट जाता है ॥ ४ ॥ व्याख्या - यदि साधक दो मात्रावाले ओंकारकी उपासना करता है, अर्थात् उस विराट्रूपवान् परमेश्वरकी भूः और भुवः- इन दो मात्राओंकी अर्थात् स्वर्गलोकतकके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे उन्हींको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करता है तो वह मनोमय चन्द्रलोकको प्राप्त होता है. उसको यजुर्वेदके मन्त्र अन्तरिक्षमे ऊपरकी ओर चन्द्रलोकमे पहुँचा देते हैं। उस विनाशशील स्वर्गलोकमे नाना प्रकारके ऐश्वर्यका उपभोग करके अपनी उपासनाके पुण्यका क्षय हो जानेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाता है। वहाँ उसे अपने पूर्व-कर्मानुसार मनुष्य-शरीर या उससे कोई नीची योनि मिल जाती है ॥ ४ ॥
यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥
पुनः यः = परंतु जो त्रिमात्रेण = तीन मात्राओंवाले. ओम् इति = ओम् रूप, एतेन = इस, अक्षरेण एव = अक्षरके द्वारा ही; एतम् परम् = इस परम पुरुषम् = पुरुषका अभिध्यायीत = निरन्तर ध्यान करता है; सः तेजसि = वह तेजोमय; सूर्ये सम्पन्नः = सूर्यलोकमे जाता है (तथा) यथा पादोदरः = जिस प्रकार सर्प त्वचा विनिर्मुच्यते = केंचुलीसे अलग हो जाता है; एवम् ह वै = ठीक उसी तरह, स. पाप्मना = वह पापोंसे विनिर्मुक्तः = सर्वथा मुक्त हो जाता है सः = (इसके बाद) वह; सामभिः = सामवेदकी श्रुतियोंद्वारा; ब्रह्मलोकम् उन्नीयते = ऊपर ब्रह्मलोकमे ले जाया जाता है, सः एतस्माद् = वह इस, जीव- घनात् = जीवसमुदायरूप; परात् परम् = परतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ, पुरिशयम् = अन्तर्यामी पुरुषम् = परमपुरुष पुरुषोत्तमको, ईक्षते = साक्षात् कर लेता है; तत् एतौ = इस विषयमे ये (अगले), श्लोकौ भवतः = दो श्लोक ( हैं) ॥ ५ ॥
व्याख्या - इस मन्त्रमें 'पुन.' शब्दके प्रयोगसे यह सूचित होता है कि उपर्युक्त कथनके अनुसार इस लोक और स्वर्गलोकतकके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे अपर ब्रह्मको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करनेवाले साधकोंसे विलक्षण साधकका यहाँ वर्णन किया गया है। उपासनाका सर्वोत्तम प्रकार यही है- यह भाव प्रकट करनेके लिये ही इस मन्त्रमे 'यदि' पदका प्रयोग भी नहीं किया गया है' क्योंकि इसमें कोई विकल्प नहीं है। इस मन्त्रमे यह भी स्पष्टरूपसे बतला दिया गया है कि ओंकार उस परब्रह्मका नाम है, इसके द्वारा उस परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना की जाती है। मन्त्रने कहा गया है कि जो कोई साधक इन तीन मात्राओंवाले ओंकारस्वरूप अक्षरद्वारा परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना करता है, वह जैसे सर्प केंचुलीसे अलग हो जाता है-उसी प्रकार सब प्रकारके कर्मबन्धनोंसे छूटकर सर्वथा निर्विकार हो जाता है। उसे सामवेदके मन्त्र तेजोमय सूर्यन-डलमेंते ले जाकर सर्वोपरि ब्रह्मलोकमे पहुँचा देते हैं। वहाँ वह जीव-समुदायरूप चेतनतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ उन परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त हो जाता है, जो सम्पूर्ण जगत्को अपनी शक्तिके किसी एक अंशमे धारण किये हुए हैं और सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं। इसी विषयको स्पष्ट करनेवाले ये दो आगे कहे हुए श्लोक हैं ॥ ५ ॥
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः । क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६ ॥
तिस्रः मात्राः = ओंकारकी तीनों मात्राएँ ('अ', 'उ' तथा 'म ) अन्योन्यसक्ताः = एक दूसरीसे संयुक्त रहकर; प्रयुक्ताः = प्रयुक्त की गयी हों, अनविप्रयुक्ताः = या पृथक्-पृथक् एक-एक ध्येयके चिन्तनमें इनका प्रयोग किया जाय (दोनो प्रकारसे ही वे ); मृत्युमत्यः = मृत्युयुक्त हैं; बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु = बाहर, भीतर और बीचकी. क्रियासु = क्रियाओंमें, सम्यक्प्रयुक्तासु = पूर्णतया इन मात्राओंका प्रयोग किये जानेपर; ज्ञः न कम्पते = उस परमेश्वरको जाननेवाला ज्ञानी विचलित नहीं होता ॥ ६ ॥ व्याख्या - इस मन्त्रमे यह भाव दिखाया गया है कि ओकारवाच्य परब्रह्म परमेश्वरका जो यह जगद्रूप विराट्रूप