कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 279, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस ओंकारका, अभिध्यायीत=भलीभाँति ध्यान करता है; सः तेन=वह उस उपासनाके बलसे, कतमम्=किस, लोकम्= लोकको; वाव जयति=निस्सन्देह जीत लेता है, इति=यह (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें सत्यकामने ओंकारकी उपासनाके विषयमें प्रश्न किया है। उसने यही जिज्ञासा की है कि जो मनुष्य आजीवन ओंकारकी भलीभाँति उपासना करता है, उसे उस उपासनाके द्वारा कौन-से लोककी प्राप्ति होती है, अर्थात् उसका क्या फल मिलता है ॥ १ ॥ तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः । तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतर- मन्वेति ॥ २ ॥ तस्मै सः ह उवाच=उससे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; सत्यकाम=हे सत्यकाम; एतत् वै=निश्चय ही यह; यत् ओंकारः=जो ओंकार है, परम् ब्रह्म च अपरम् च=(वही) परब्रह्म और अपर ब्रह्म भी है; तस्मात्=इसलिये, विद्वान्= इस प्रकारका ज्ञान रखनेवाला मनुष्य, एतेन एव=इस एक ही; आयतनेन=अवलम्बसे (अर्थात् प्रणवमात्रके चिन्तनसे), एकतरम्=अपर और परब्रह्ममेसे किसी एकका; अन्वेति=(अपनी श्रद्धाके अनुसार) अनुसरण करता है ॥ २ ॥ व्याख्या—इसके उत्तरमे महर्षि पिप्पलाद 'ओम्' इस अक्षरकी उसके लक्ष्यभूत परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ एकता करते हुए कहते हैं—सत्यकाम ! यह जो 'ॐ' है, वह अपने लक्ष्यभूत परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न नहीं है। इसलिये यही परब्रह्म है और यही उन परब्रह्मसे प्रकट हुआ उनका विराट्-स्वरूप—अपर ब्रह्म भी है। केवल इसी एक ओंकारका जप, स्मरण और चिन्तन करके उसके द्वारा अपने इष्टको चाहनेवाला विज्ञानसम्पन्न मनुष्य उसे पा लेता है। भाव यह है कि जो मनुष्य परमेश्वर- के विराट्-स्वरूप—इस जगत्के ऐश्वर्यमय किसी भी अङ्गको प्राप्त करनेकी इच्छासे ओंकारकी उपासना करता है, वह अपनी भावनाके अनुसार विराट्-स्वरूप परमेश्वरके किसी एक अङ्गको प्राप्त करता है और जो इसके अन्तर्यामी आत्मा पूर्ण ब्रह्म पुरुषोत्तमको लक्ष्य बनाकर उनको पानेके लिये निष्कामभावसे इसकी उपासना करता है, वह परब्रह्म पुरुषोत्तमको पा लेता है। यही बात अगले मन्त्रोंमें भी स्पष्ट की गयी है ॥ २ ॥ स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते । तमृचो मनुष्यलोक- मुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥ ३ ॥ सः यदि=वह उपासक यदि; एकमात्रम्=एक मात्रासे युक्त ओंकारका; अभिध्यायीत=भलीभाँति ध्यान करे तो, सः तेन एव=वह उस उपासनासे ही, संवेदितः=अपने ध्येयकी ओर प्रेरित किया हुआ, तूर्णम् एव=शीघ्र ही; जगत्याम्= पृथ्वीमे, अभिसंपद्यते=उत्पन्न हो जाता है; तम् ऋचः=उसको ऋग्वेदकी ऋचाएँ, मनुष्यलोकम्=मनुष्य-शरीर, उपनयन्ते=प्राप्त करा देती हैं, तत्र सः=वहाँ वह उपासक, तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नः=तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न होकर; महिमानम्=महिमाका; अनुभवति=अनुभव करता है ॥ ३ ॥ व्याख्या—ओंकारका चिन्तन करनेवाला मनुष्य यदि विराट् परमेश्वरके भूः, भुवः और स्वः—इन तीनो रूपोंमेसे भूलोकके ऐश्वर्यमें आसक्त होकर उसकी प्राप्तिके लिये ओंकारकी उपासना करता है तो वह मरनेके बाद अपने प्रापणीय ऐश्वर्य- की ओर प्रेरित होकर तत्काल पृथ्वीलोकमें आ जाता है। ॐकारकी पहली मात्रा ऋग्वेदस्वरूपा है, उसका पृथ्वीलोकसे सम्बन्ध है; अतः उसके चिन्तनसे साधकको ऋग्वेदकी ऋचाएँ पुनः मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट करा देती हैं। वह उस नवीन मनुष्य- जन्ममें तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न उत्तम आचरणोंवाला श्रेष्ठ मनुष्य बनकर उपयुक्त ऐश्वर्यका उपभोग करता है। अर्थात् उसे नीची योनियोंमें नहीं भटकना पड़ता, वह मरनेके बाद मनुष्य होकर पुनः शुभ कर्म करनेमें समर्थ हो जाता है और वहाँ नाना प्रकारके सुखोंका उपभोग करता है ॥ ३ ॥ अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४ ॥ अथ यदि=परन्तु यदि; द्विमात्रेण=दो मात्राओंसे युक्त (ओंकारका);