कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 278, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * एषः=यह जो; द्रष्टा स्प्रष्टा=देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला; श्रोता घ्राता=सुननेवाला, सूँघनेवाला; रसयिता मन्ता=स्वाद लेनेवाला, मनन करनेवाला; बोद्धा कर्ता=जाननेवाला तथा कर्म करनेवाला; विज्ञानात्मा=विज्ञानस्वरूप; पुरुषः=पुरुष (जीवात्मा) है, सः हि=वह भी, अक्षरे=अविनाशी, परे आत्मनि=परमात्मामें; संप्रतिष्ठते=भलीभाँति स्थित है ॥ ९ ॥ व्याख्या—देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, स्वाद लेनेवाला, मनन करनेवाला, जाननेवाला तथा सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनके द्वारा समस्त कर्म करनेवाला जो यह विज्ञानस्वरूप पुरुष—जीवात्मा है, यह भी उन परम अविनाशी सबके आत्मा परब्रह्म पुरुषोत्तममें ही स्थिति पाता है। उन्हें प्राप्त कर लेनेपर ही इसे वास्तविक शान्ति मिलती है, अतः इसके भी परम आश्रय वे परमेश्वर ही हैं ॥ ९ ॥ परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः ॥ १० ॥ ह यः वै=निश्चय ही जो कोई भी; तत् अच्छायम्=उस छायारहित; अशरीरम्=शरीररहित; अलोहितम्= लाल, पीले आदि रंगोंसे रहित, शुभ्रम् अक्षरम्=विशुद्ध अविनाशी पुरुषको, वेदयते=जानता है; सः=वह, परम् अक्षरम् एव=परम अविनाशी परमात्माको ही; प्रतिपद्यते=प्राप्त हो जाता है; सोम्य=हे प्रिय ! यः तु ( एवम् )=जो कोई ऐसा है; सः सर्वज्ञः=वह सर्वज्ञ (और), सर्वः भवति=सर्वरूप हो जाता है, तत् एषः=उस विषयमें यह (अगला); श्लोकः=श्लोक (है) ॥ १० ॥ व्याख्या—यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि जो कोई भी मनुष्य उन छायारहित, शरीररहित, लाल-पीले आदि सब रंगोंसे रहित, विशुद्ध अविनाशी परमात्माको जान लेता है, वह परम अक्षर परमात्माको ही प्राप्त हो जाता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। हे सोम्य ! जो कोई भी ऐसा है, अर्थात् जो भी उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है, वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है। इस विषयमें निम्नलिखित ऋचा है ॥ १० ॥ विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र । तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥११॥ यत्र=जिसमें, प्राणाः=समस्त प्राण (और); भूतानि च=पाँचों भूत तथा, सर्वैः देवैः सह=सम्पूर्ण इन्द्रिय और अन्तःकरणके सहित, विज्ञानात्मा=विज्ञानस्वरूप आत्मा, संप्रतिष्ठन्ति=आश्रय लेते हैं; सोम्य=हे प्रिय ! तत् अक्षरम्= उस अविनाशी परमात्माको, यः तु वेदयते=जो कोई जान लेता है, सः सर्वज्ञः=वह सर्वज्ञ है; सर्वम् एव=(वह) सर्व- स्वरूप परमेश्वरमें, आविवेश=प्रविष्ट हो जाता है, इति=इस प्रकार (इस प्रश्नका उत्तर समाप्त हुआ) ॥ ११ ॥ व्याख्या—सबके परम कारण जिन परमेश्वरका समस्त प्राण और पाँचों महाभूत तथा समस्त इन्द्रियों और अन्तः- करणके सहित स्वयं विज्ञानस्वरूप जीवात्मा—ये सब आश्रय लेते हैं, उन परम अक्षर अविनाशी परमात्माको जो कोई जान लेता है, वह सर्वज्ञ है तथा सर्वरूप परमेश्वरमे प्रविष्ट हो जाता है। इस प्रकार यह चतुर्थ प्रश्न समाप्त हुआ ॥ ११ ॥ ॥ चतुर्थ प्रश्न समाप्त ॥ ४ ॥ पञ्चम प्रश्न अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥ अथ ह एनम्=इसके बाद इन ख्यातनामा महर्षि पिप्पलादसे, शैब्यः सत्यकामः=शिविपुत्र सत्यकामने, पप्रच्छ= पूछा; भगवन्=भगवन्, मनुष्येषु=मनुष्योंमेंसे, सः यः ह वै=वह जो कोई भी, प्रायणान्तम्=मृत्युपर्यन्त, तत् ओंकारम्=