कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 277, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 277
- प्रश्नोपनिषद् * २५३ स्थित हैं—किसके आश्रित हैं ?' उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं—'प्यारे गार्ग्य ! आकाशमें उड़नेवाले पक्षिगण जिस प्रकार सायकालमें लौटकर अपने निवासभूत वृक्षपर आरामसे बसेरा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार आगे बतलाये जानेवाले पृथ्वीसे लेकर प्राणतक जितने तत्त्व हैं, वे सब-के-सब परब्रह्म पुरुषोत्तममे, जो कि सबके आत्मा हैं, आश्रय लेते हैं, क्योंकि वही इन सबके परम आश्रय हैं ॥ ७ ॥ पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चा- काशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्च स्पर्शयितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥ ८ ॥ पृथिवी च=पृथिवी और; पृथिवीमात्रा च=उसकी तन्मात्रा (सूक्ष्म गन्ध) भी; आपः च आपोमात्रा च=जल और रसतन्मात्रा भी; तेजः च तेजोमात्रा च=तेज और रूप-तन्मात्रा भी, वायुः च वायुमात्रा च=वायु और स्पर्श- तन्मात्रा भी; आकाशः च आकाशमात्रा च=आकाश और शब्द-तन्मात्रा भी, चक्षुः च द्रष्टव्यम् च=नेत्र-इन्द्रिय और देखनेमें आनेवाली वस्तु भी; श्रोत्रम् च श्रोतव्यम् च=श्रोत्र-इन्द्रिय और सुननेमें आनेवाली वस्तु भी; घ्राणम् च घ्रातव्यम् च=घ्राणेन्द्रिय और सूँघनेमें आनेवाली वस्तु भी; रसः च रसयितव्यम् च=रसना-इन्द्रिय और रसनाके विषय भी; त्वक् च स्पर्शयितव्यम् च=त्वक्-इन्द्रिय और स्पर्शमें आनेवाली वस्तु भी, वाक् च वक्तव्यम् च=वाक्-इन्द्रिय और बोलनेमें आनेवाला शब्द भी, हस्तौ च आदातव्यम् च=दोनों हाथ और पकड़नेमें आनेवाली वस्तु भी, उपस्थः च आनन्दयितव्यम् च=उपस्थ-इन्द्रिय और उसका विषय भी; पायुः च विसर्जयितव्यम् च=गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा परित्यागयोग्य वस्तु भी, पादौ च गन्तव्यम् च=दोनों चरण और गन्तव्य स्थान भी, मनः च मन्तव्यम् च= मन और मननमें आनेवाली वस्तु भी; बुद्धिः च बोद्धव्यम् च=बुद्धि और जाननेमें आनेवाली वस्तु भी, अहङ्कारः च अहंकर्तव्यम् च=अहंकार और उसका विषय भी, चित्तं च चेतयितव्यम् च=चित्त और चिन्तनमें आनेवाली वस्तु भी, तेजः च विद्योतयितव्यम् च=प्रभाव और उसका विषय भी, प्राणः च विधारयितव्यम् च=प्राण और प्राणके द्वारा धारण किये जानेवाले पदार्थ भी (ये सब-के-सब परमात्माके आश्रित हैं) ॥ ८ ॥ —इस मन्त्रमें यह बात कही गयी है कि स्थूल और सूक्ष्म पाँचों महाभूत, दसों इन्द्रियाँ और उनके विषय, चारों प्रकारके अन्तःकरण और उनके विषय तथा पाँच भेदोंवाला प्राण-वायु—सब-के-सब परमात्माके ही आश्रित हैं। कहना यह है कि स्थूल पृथ्वी और उसका कारण गन्ध-तन्मात्रा, स्थूल जल-तत्त्व और उसका कारण रस-तन्मात्रा, स्थूल तेज-तत्त्व और उसका कारण रूप-तन्मात्रा, स्थूल वायु-तत्त्व और उसका कारण स्पर्श-तन्मात्रा, स्थूल आकाश और उसका कारण शब्द-तन्मात्रा—इस प्रकार अपने कारणोंसहित पाँचों भूत तथा नेत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा देखनेमें आनेवाली वस्तुएँ, श्रोत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा जो कुछ सुना जा सकता है वह सब, घ्राणेन्द्रिय और उसके द्वारा सूँघनेमें आनेवाले पदार्थ, रसना-इन्द्रिय और उसके द्वारा आस्वादनमें आनेवाले खट्टे-मीठे आदि सब प्रकारके रस, त्वचा-इन्द्रिय और उसके द्वारा स्पर्श करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, वाक्-इन्द्रिय और उसके द्वारा बोले जानेवाले शब्द, दोनों हाथ और उनके द्वारा पकड़नेमें आनेवाली सब वस्तुएँ, दोनों पैर और उनके गन्तव्य स्थान, उपस्थ-इन्द्रिय और मैथुनका सुख, गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा त्यागा जानेवाला मल, मन और उसके द्वारा मनन करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, बुद्धि और उसके द्वारा जाननेमें आनेवाले सब पदार्थ, अहंकार और उसके विषय, चित्त और चित्तके द्वारा चिन्तनमें आनेवाले पदार्थ, प्रभाव और प्रभावसे प्रभावित् होनेवाले, पाँच वृत्तिवाला प्राण और उसके द्वारा जीवन देकर धारण किये जानेवाले सब शरीर—ये सब-के-सब इनके कारणभूत परमेश्वरके ही आश्रित हैं ॥ ८ ॥ एष हि द्रष्टा श्रोता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ९ ॥