कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 832 में से
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२५२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अनुभव करता है: यत् दृष्टम् दृष्टम्=जो बार-बार देखा हुआ है; अनुपश्यति=उसीको बार-बार देखता है; श्रुतम् श्रुतम् एव अर्थम् अनुश्रृणोति=बार-बार सुनी हुई बातोंको ही पुनः-पुनः सुनता है; देशदिगन्तरैः च=नाना देश और दिशाओंमें प्रत्यनुभूतम्=बार-बार अनुभव किये हुए विषयोंको पुनः पुनः=पुनः-पुनः प्रत्यनुभवति=अनुभव करता है (इतना ही नहीं), दृष्टम् च अदृष्टम् च=देखे हुए और न देखे हुएको भी; श्रुतम् च अश्रुतम् च=सुने हुए और न सुने हुएको भी, अनुभूतम् च=अनुभव किये हुए और अननुभूतम् च=अनुभव न किये हुएको भी; सत् च असत् , च=विद्यमान और अविद्यमानको भी ( इस प्रकार ) • सर्वम् पश्यति=सारी घटनाओंको देखता है, (तथा) सर्वः (सन्)= स्वयं सब कुछ बनकर; पश्यति=देखता है ॥ ५ ॥ व्याख्या—गार्ग्य मुनिने जो यह तीसरा प्रश्न किया था कि 'कौन देवता स्वप्नोंको देखता है ?' उसका उत्तर महर्षि पिप्पलाद इस प्रकार देते हैं। इस स्वप्न-अवस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियोंद्वारा अपनी विभूतिका अनुभव करता है। इसका पहले जहाँ कहीं भी जो कुछ बार-बार देखा, सुना और अनुभव किया हुआ है, उसीको यह स्वप्नमें बार-बार देखता, सुनता और अनुभव करता रहता है। परन्तु यह नियम नहीं है कि जाग्रत्-अवस्थामें इसने जिस प्रकार, जिस ढंगसे और जिस जगह जो घटना देखी, सुनी और अनुभव की है, उसी प्रकार यह स्वप्नमें भी अनुभव करता है। अपितु स्वप्नमें जाग्रत्की किसी घटनाका कोई अंश किसी दूसरी घटनाके किसी अंशके साथ मिलकर एक नये ही रूपमें इसके अनुभवमें आता है, अतः कहा जाता है कि स्वप्नकालमें यह देखे और न देखे हुएको भी देखता है, सुने और न सुने हुएको भी सुनता है, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी अनुभव करता है। जो वस्तु वास्तवमें है उसे, और जो नहीं है उसे भी, स्वप्नमें देख लेता है। इस प्रकार स्वप्नमें यह विचित्र ढंगसे सब घटनाओंका बार बार अनुभव करता रहता है, और स्वयं ही सब कुछ बनकर देखता है। उस समय जीवात्माके अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं रहती ॥ ५ ॥ स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्छरीर एतत्सुखं भवति ॥६॥ सः यदा=वह (मन) जब, तेजसा अभिभूतः=तेज (उदान वायु) से अभिभूत, भवति=हो जाता है, * अत्र एषः देवः=इस स्थितिमें यह जीवात्मारूप देवता, स्वप्नान्=स्वप्नोंको, न पश्यति=नहीं देखता, अथ=तथा; तदा=उस समय; एतस्मिन् शरीरे=इस मनुष्य-शरीरमें ( जीवात्माको ), एतत्=इस, सुखम्=सुषुप्तिके सुखका अनुभव, भवति= होता है ॥ ६ ॥ व्याख्या—गार्ग्य मुनिने चौथी बात यह पूछी थी कि 'निद्रामें सुखका अनुभव किसको होता है'? उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं। जब निद्राके समय यह मन उदान वायुके अधीन हो जाता है, अर्थात् जब उदान वायु इस मनको जीवात्माके निवासस्थान हृदयमें पहुँचाकर मोहित कर देता है, उस निद्रा-अवस्था में यह जीवात्मा मनके द्वारा स्वप्नकी घटनाओंको नहीं देखता। उस समय निद्राजनित सुखका अनुभव जीवात्माको ही होता है। इस शरीरमें सुख-दुःखोंको भोगनेवाला प्रत्येक अवस्थामें प्रकृतिस्थ पुरुष अर्थात् जीवात्मा ही है (गीता १३ । २१ ) ॥ ६ ॥ स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ७॥ सः=(पाँचवीं बात जो तुमने पूछी थी) वह (इस प्रकार समझनी चाहिये ), सोम्य=हे प्रिय; यथा=जिस प्रकार; वयांसि=बहुत-से पक्षी ( सायंकालमें), वासोवृक्षम्=अपने निवासरूप वृक्षपर ( आकर ); संप्रतिष्ठन्ते=आरामसे ठहरते हैं ( बसेरा लेते हैं ), ह एवम् वै तत् सर्वम्=ठीक वैसे ही, वे (आगेबताये जानेवाले पृथिवी आदि तत्त्वोंसे लेकर प्राणतक ) सब-के-सब, परे आत्मनि=परमात्मामें, संप्रतिष्ठते=सुखपूर्वक आश्रय पाते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या—गार्ग्य मुनिने जो यह पाँचवीं बात पूछी थी कि 'ये मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और प्राण—सब के-सब किसमे
- पहले तीसरे प्रकरणमें ( ३ । ९-१० ) बतला आये हैं कि उदान वायुका नाम तेज है। इस प्रकरणमें भी कहा गया है कि उदान वायु ही मनको ब्रह्मलोकमें अर्थात् हृदयमें ले जाता है, अत यहाँ तेजसे अभिभूत होनेका अर्थ जीवका उदान वायुसे आक्रान्त हो जाना है—यह बात समझनी चाहिये ।