कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 275, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 275
- प्रश्नोपनिषद् * २५१ एषः अपानः वै=यह प्रसिद्ध अपान ही, गार्हपत्यः=गार्हपत्य अग्नि है, व्यानः=व्यान, अन्वाहार्यपचनः=अन्वाहार्य पचन- नामक अग्नि (दक्षिणाग्नि) है, गार्हपत्यात् यत् प्रणीयते=गार्हपत्य अग्निसे जो उठाकर ले जायी जाती है (वह), आहवनीयः=आहवनीय अग्नि, प्रणयनात्=प्रणयन (उठाकर ले जाये जाने) के कारण ही, प्राणः=प्राणरूप है ॥ ३ ॥ व्याख्या-उस समय इस मनुष्य-शरीररूप नगरमें पाँच प्राणरूप अग्नियों ही जागती रहती हैं। यह गार्ग्यद्वारा पूछे हुए दूसरे प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर है। यहाँ निद्राको यज्ञका रूप देनेके लिये पाँचों प्राणोंको अग्निरूप बतलाया है। यज्ञमें अग्निकी प्रधानता होती है, इसलिये यहाँ संक्षेपतः प्राणमात्रको अग्निके नामसे कह दिया। परंतु आगे इस यज्ञके रूपकमे किस प्राणवृत्तिकी किसके स्थानमें कल्पना करनी चाहिये, इसका स्पष्टीकरण करते हैं। कहना यह है कि शरीरमें जो प्राणकी अपान- वृत्ति है, यही मानो उस यज्ञकी 'गार्हपत्य' अग्नि है; 'व्यान' दक्षिणाग्नि है; गार्हपत्य अग्निरूप व्यानसे प्राण उठते हैं, इस कारण मुख्य प्राण ही इस यज्ञकी कल्पनामें आहवनीय अग्नि है। क्योंकि यज्ञमें आहवनीय अग्नि गार्हपत्यसे उठाकर लायी जाती है। पहले तीसरे प्रश्नके प्रसङ्गमें भी प्राणको 'अन्नरूप आहुति जिसमें हवन की जाती है' इस व्युत्पत्तिद्वारा आहवनीय अग्नि ही बताया है (३।५) ॥ ३ ॥ यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः । मनो ह वाव यजमानः इष्टफलमेवो- दानः । स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४॥ यत् उच्छ्वासनिःश्वासौ=जो ऊर्ध्वश्वास और अधःश्वास हैं; एतौ=ये दोनों (मानो), आहुती=(अग्निहोत्रकी) दो आहुतियाँ हैं, [एतौ यः=इनको जो, ] समम्=समभावसे (सब ओर), नयति इति सः समानः=पहुँचाता है और इसीलिये जो 'समान' कहलाता है, वही; [होता=हवन करनेवाला ऋत्विक् है, ] ह मनः वाव=यह प्रसिद्ध मन ही; ः=यजमान है, इष्टफलम् एव=अभीष्ट फल ही, उदानः=उदान है, सः एनम्=वह (उदान) ही इस; म् अहः अहः=मनरूप यजमानको प्रतिदिन (निद्राके समय), ब्रह्मं गमयति=ब्रह्मलोकमें भेजता है अर्थात् हृदय गुहामें ले जाता है ॥४॥ व्याख्या-यह जो मुख्य प्राणका श्वास-प्रश्वासके रूपमें शरीरके बाहर निकलना और भीतर लौट जाना है, वही मानो इस यज्ञमें आहुतियाँ पड़ती हैं, इन आहुतियोंद्वारा जो शरीरके पोषक तत्त्व शरीरमें प्रवेश कराये जाते हैं, वे ही हवि हैं। उस हविको समस्त शरीरमें आवश्यकतानुसार समभावसे पहुँचानेका कार्य समान वायुका है, इसलिये उसे समान कहते हैं। वही इस रूपकमें मानो 'होता' अर्थात् हवन करनेवाला ऋत्विक् है। अग्निरूप होनेपर भी आहुतियोंको पहुँचानेका कार्य करनेके कारण इसे 'होता' कहा गया है। पहले बताया हुआ मन ही मानो यजमान है, और उदान वायु ही मानो उस यजमानका अभीष्ट फल है, क्योंकि जिस प्रकार अग्निहोत्र करनेवाले यजमानको उसका अभीष्ट फल उसे अपनी ओर आकर्षित करके कर्मफल भुगतानेके लिये कर्मानुसार स्वर्गादि लोकोंमें ले जाता है, उसी प्रकार यह उदान वायु मनको प्रतिदिन निद्राके समय उसके कर्मफलके भोगस्वरूप ब्रह्मलोकमें-परमात्माके निवासस्थानरूप हृदयगुहामें ले जाता है। वहाँ इस मनके द्वारा जीवात्मा निद्राजनित विश्रामरूप सुखका अनुभव करता है; क्योंकि जीवात्माका निवासस्थान भी वही है। यह बात छठे मन्त्रमें कही है। यहाँ 'ब्रह्म गमयति' से यह बात नहीं समझनी चाहिये कि निद्राजनित सुख ब्रह्मप्राप्तिके सुखकी किसी भी अंशमें समानता कर सकता है; क्योंकि यह तो तामस सुख है और परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिका सुख तीनों गुणोंसे अतीत है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध-अब तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं- अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति । देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥ अत्र स्वप्ने=इस स्वप्न-अवस्थामे, एषः देवः=यह देव (जीवात्मा), महिमानम्=अपनी विभूतिका, अनुभवति=