कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२५० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—यहाँ गार्ग्य मुनिने महात्मा पिप्पलादसे पाँच बातें पूछी हैं—(१) गाढ निद्राके समय इस मनुष्य शरीर- में रहनेवाले पूर्वोक्त देवताओंमेंसे कौन-कौन सोते हैं? (२) कौन-कौन जागते रहते हैं? (३) स्वप्न-अवस्थामें इनमेंसे कौन देवता स्वप्नकी घटनाओंको देखता रहता है? (४) निद्रा-अवस्थामे सुखका अनुभव किसको होता है? और (५) ये सब के-सब देवता सर्वभावसे किसमे स्थित हैं अर्थात् किसके आश्रित हैं? इस प्रकार इस प्रश्नमें गार्ग्य मुनिने जीवात्मा और परमात्माका पूरा पूरा तत्त्व पूछ लिया ॥ १ ॥ तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति । ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति । तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिददते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥ तस्मै सः ह उवाच = उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षिने कहा; गार्ग्य यथा = हे गार्ग्य ! जिस प्रकार; अस्तम् गच्छतः = अस्त होते हुए, अर्कस्य मरीचयः = सूर्यकी किरणें; एतस्मिन् तेजोमण्डले = इस तेजोमण्डलमे; सर्वाः एकीभवन्ति = सब की-सब एक हो जाती हैं (फिर); उदयतः ताः = उदय होनेपर वे (सब), पुनः पुनः = पुनः पुनः; प्रचरन्ति = सब ओर फैलती रहती है, ह एवम् वै = ठीक ऐसे ही (निद्राके समय), तत् सर्वम् = वे सब इन्द्रियाँ (भी); परे देवे मनसि = परम देव मनमें, एकीभवति = एक हो जाती हैं, तेन तर्हि एषः पुरुषः = इस कारण उस समय यह जीवात्मा; न शृणोति = न (तो) सुनता है, न पश्यति = न देखता है; न जिघ्रति = न सूंघता है, न रसयते = न स्वाद लेता है; न स्पृशते = न स्पर्श करता है, न अभिददते = न बोलता है, न आदत्ते न आनन्दयते = न ग्रहण करता है, न मैथुनका आनन्द भोगता है, न विसृजते न इयायते = न मल-मूत्रका त्याग करता है और न चलता ही है, स्वपिति इति आचक्षते = उस समय 'वह सो रहा है' यों (लोग) कहते हैं ॥ २ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें महात्मा पिप्पलाद ऋषिने गार्ग्यके पहले प्रश्नका इस प्रकार उत्तर दिया है—'गार्ग्य ! जब सूर्य अस्त होता है, उस समय उसकी सब ओर फैली हुई सम्पूर्ण किरणें जिस प्रकार उस तेजःपुञ्जमे मिलकर एक हो जाती हैं, ठीक उसी प्रकार गाढ निद्राके समय तुम्हारे पूछे हुए सब देवता अर्थात् सब-की-सब इन्द्रियाँ उन सबसे श्रेष्ठ जो मनरूप देव है, उसमें विलीन होकर तद्रूप हो जाती हैं। इसलिये उस समय यह जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न चलता है, न मल मूत्रका त्याग करता है और न मैथुनका सुख ही भोगता है। भाव यह है कि उस समय दर्शों इन्द्रियोंका कार्य सर्वथा बद रहता है। केवल लोग कहते हैं कि इस समय यह पुरुष सो रहा है। * उसके जागनेपर पुनः वे सब इन्द्रियाँ मनसे पृथक् होकर अपना-अपना कार्य करने लगती हैं—ठीक वैसे ही, जिस प्रकार सूर्यके उदय होनेपर उसकी किरणें पुनः सब ओर फैल जाती हैं ॥ २ ॥ सम्बन्ध—अब गार्ग्यके प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर देकर दो मन्त्रोंद्वारा यह भी बतलाते हैं कि सब इन्द्रियोंके लय होनेपर मनकी कैसी स्थिति रहती है— प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥ एतस्मिन् पुरे = इस शरीररूप नगरमें; प्राणाग्नयः एव = पाँच प्राणरूप अग्नियॉ ही, जाग्रति = जागती रहती है; ह
- यहाँ सुषुप्तिकालमें मनका व्यापार चालू रहता है या नहीं, इस विषयमें कुछ नहीं कहा। सब इन्द्रियोंका मनमें विलीन हो जाना तो बताया गया, किंतु मन भी किसीमें विलीन हो जाता है—यह बात नहीं कही गयी । महर्षि पतञ्जलि भी निद्राको चित्तकी एक वृत्ति मानते हैं (पा० यो०)। इससे तो यह जान पड़ता है कि मन विलीन नहीं होता । परंतु अगले मन्त्रमें पञ्चवृत्त्यात्मक प्राणको ही जागनेवाला बताया गया है, मनको नहीं, अत मनका लय होता है या नहीं—यह बात स्पष्ट नहीं होती। पुन चतुर्थ मन्त्रमें मनको यजमान बताकर उसके ब्रह्मलोकमें जानेकी बात कही गयी है। इससे यह कहा जा सकता है कि मनका भी लय हो जाता है।