भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 273
  • प्रश्नोपनिषद् * २४९ संकल्प न आने दे। क्योंकि जीवन अल्प और अनित्य है; न जाने कब अचानक इस शरीरका अन्त हो जाय। यदि उस समय भगवान्‌का चिन्तन न होकर कोई दूसरा सङ्कल्प आ गया तो सदाकी भाँति पुनः चौरासी लाख योनियोंमें भटकना पड़ेगा ॥ १० ॥ सम्बन्ध—अब प्राणविषयक ज्ञानका सांसारिक और पारलौकिक फल बतलाते हैं— य एवं विद्वाञ्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥ यः विद्वान् = जो कोई विद्वान्; एवम् प्राणम् = इस प्रकार प्राण (के रहस्य) को; वेद = जानता है; अस्य = उसकी; प्रजा = सन्तानपरम्परा; न ह हीयते = कदापि नष्ट नहीं होती; अमृतः = (वह) अमर; भवति = हो जाता है; तत् एषः = इस विषयका यह (अगला); श्लोकः = श्लोक (है) ॥ ११ ॥ व्याख्या—जो कोई विद्वान् इस प्रकार इस प्राणके रहस्यको समझ लेता है, प्राणके महत्त्वको समझकर हर प्रकारसे उसे सुरक्षित रखता है, उसकी अवहेलना नहीं करता, उसकी सन्तानपरम्परा कभी नष्ट नहीं होती, क्योंकि उसका वीर्य अमोघ और अद्भुत शक्तिसम्पन्न हो जाता है। और वह यदि उसके आध्यात्मिक रहस्यको समझकर अपने जीवनको सार्थक बना लेता है, एक क्षण भी भगवान्‌के चिन्तनसे शून्य नहीं रहने देता, तो सदाके लिये अमर हो जाता है अर्थात् जन्म-मरणरूप संसारसे मुक्त हो जाता है। इस विषयपर निम्नलिखित ऋचा है ॥ ११ ॥ उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा । अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ १२ ॥ प्राणस्य = प्राणकी; उत्पत्तिम् = उत्पत्ति; आयतिम् = आगम; स्थानम् = स्थान; विभुत्वम् एव = और व्यापकताको भी; च = तथा, (बाह्यम्) एव अध्यात्मम् पञ्चधा च = बाह्य एवं आध्यात्मिक पाँच भेदोंको भी; विज्ञाय = भलीभाँति जानकर; अमृतम् अश्नुते = (मनुष्य) अमृतका अनुभव करता है; विज्ञाय अमृतम् अश्नुते इति = जानकर अमृतका अनुभव करता है (यह पुनरुक्ति प्रश्नकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है) ॥ १२ ॥ व्याख्या—उपर्युक्त विवेचनके अनुसार जो मनुष्य प्राणकी उत्पत्तिको अर्थात् यह जिससे और जिस प्रकार उत्पन्न होता है—इस रहस्यको जानता है, शरीरमें उसके प्रवेश करनेकी प्रक्रियाका तथा इसकी व्यापकताका ज्ञान रखता है तथा जो प्राणकी स्थितिको अर्थात् बाहर और भीतर—कहाँ-कहाँ वह रहता है, इस रहस्यको तथा इसके बाहरी और भीतरी अर्थात् आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाँचों भेदोंके रहस्यको भलीभाँति समझ लेता है, वह अमृतरूप परमानन्दमय परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है तथा उस आनन्दमयके संयोग-सुखका निरन्तर अनुभव करता है ॥ १२ ॥ ॥ तृतीय प्रश्न समाप्त ॥ ३ ॥ —✦— चतुर्थ प्रश्न अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥ अथ = तदनन्तर; ह एनम् = इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद मुनि) से; गार्ग्यः = गर्ग गोत्रमें उत्पन्न; सौर्यायणी पप्रच्छ = सौर्यायणी ऋषिने पूछा; भगवन् = भगवन्; पतस्मिन् पुरुषे = इस] मनुष्य-शरीरमें; कानि स्वपन्ति = कौन- कौन सोते हैं; अस्मिन् कानि = इसमें कौन-कौन; जाग्रति = जागते रहते हैं; एषः कतरः देवः = यह कौन देवता; स्वप्नान् पश्यति = स्वप्नोंको देखता है; एतत् सुखम् = यह सुख; कस्य भवति = किसको होता है; सर्वे = (और) ये सब- के-सब; कस्मिन् = किसमें; नु = निश्चितरूपसे; सम्प्रतिष्ठिताः = सम्पूर्णतया स्थित; भवन्ति इति = रहते हैं, यह (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥ उ० अं० ३२—