भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 272

२४८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥ ह=यह निश्चय है कि, आदित्यः वै=सूर्य ही, बाह्यः प्राणः=बाह्य प्राण है, एष हि=यही; एनम् चाक्षुषम्= इस नेत्रसम्बन्धी, प्राणम्=प्राणपर, अनुगृह्णानः=अनुग्रह करता हुआ, उदयति=उदित होता है, पृथिव्याम्= पृथ्वीमें, या देवता=जो (अपान वायुकी शक्तिरूप) देवता है, सा एषा=वही यह, पुरुषस्य=मनुष्यके, अपानम्= अपान वायुको, अवष्टभ्य=स्थिर किये; [ वर्तते=रहता है, ] अन्तरा=पृथ्वी और स्वर्गके बीच, यत् आकाशः=जो आकाश (अन्तरिक्षलोक) है, सः समानः=वह समान है, वायु व्यानः=वायु ही व्यान है ॥ ८ ॥ व्याख्या-यह निश्चयपूर्वक समझना चाहिये कि सूर्य ही-सबका बाह्य प्राण है। यह मुख्य प्राण सूर्यरूपमे उदय होकर इस शरीरके बाह्य अङ्ग प्रत्यङ्गोंको पुष्ट करता है और नेत्र-इन्द्रियरूप आध्यात्मिक शरीरपर अनुग्रह करता है--उसे देखनेकी शक्ति अर्थात् प्रकाश देता है। पृथ्वीमें जो देवता अर्थात् अपान वायुकी शक्ति है, वह इस मनुष्यके भीतर रहनेवाले अपान वायुको आश्रय देती है-टिकाये रखती है। यह अपान वायुकी शक्ति गुदा और उपस्थ इन्द्रियोंकी सहायक है तथा इनके बाहरी स्थूल आकारको धारण करती है। पृथ्वी और स्वर्गलोकके बीचका जो आकाश है, वही समान वायुका बाह्य स्वरूप है। वह इस शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गोको अवकाश देकर इसकी रक्षा करता है और शरीरके भीतर रहनेवाले समान वायुको विचरनेके लिये शरीरमे अवकाश देता है, इसीकी सहायतामे श्रोत्र-इन्द्रिय शब्द सुन सकती है। आकाशमे विचरने- वाला प्रत्यक्ष वायु ही व्यानका बाह्य स्वरूप है, यह इस शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गोको चेष्टाशील करता है और शान्ति प्रदान करता है, भीतरी व्यान वायुको नाड़ियोंमे सञ्चारित करने तथा त्वचा-इन्द्रियको स्पर्शका ज्ञान करानेमे भी यह सहायक है ॥८॥ तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥९॥ ह तेजः वै=प्रसिद्ध तेज (गर्मी) ही, उदानः=उदान है तस्मात्=इसीलिए, उपशान्ततेजाः=जिसके शरीरका तेज शान्त हो जाता है, वह (जीवात्मा), मनसि=मनमें, सम्पद्यमानैः=विलीन हुई, इन्द्रियैः=इन्द्रियोंके साथ, पुनर्भवम्=पुनर्जन्मको (प्राप्त होता है) ॥ ९ ॥ व्याख्या-सूर्य और अग्निका जो बाहरी तेज अर्थात् उष्णत्व है, वही उदानका बाह्य स्वरूप है। वह शरीरके बाहरी अङ्ग प्रत्यङ्गोंको ठडा नहीं होने देता और शरीरके भीतरकी ऊष्माको भी स्थिर रखता है। जिसके शरीरसे उदान वायु निकल जाता है, उसका शरीर गरम नही रहता । अतः शरीरकी गर्मी शान्त हो जाते ही उसमें रहनेवाला जीवात्मा मनमें विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर उदान वायुके साथ-साथ दूसरे शरीरमे चला जाता है ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-अब आश्वलायनके चौथे प्रश्नमे आयी हुई एक शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरमें या लोकमें प्रवेश करनेकी वातका पुनः स्पष्टीकरण किया जाता है- यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥ एषः=यह (जीवात्मा), यच्चित्तः=जिस सङ्कल्पवाला होता है, तेन=उस सङ्कल्पके साथ, प्राणम्=मुख्य प्राणमें; आयाति=स्थित हो जाता है, प्राणः=मुख्य प्राण, तेजसा युक्तः=तेज (उदान) से युक्त हो, आत्मना सह=मन, इन्द्रियोंसे युक्त*(जीवात्माको), यथासंकल्पितम्=उसके सङ्कल्पानुसार, लोकम्=भिन्न भिन्न लोक अथवा योनिको, नयति=ले जाता है ॥ १० ॥ व्याख्या-मरते समय इस आत्माका जैसा सङ्कल्प होता है, इसका मन अन्तिम क्षणमे जिस भावका चिन्तन करता है (गीता ८। ६), उस सङ्कल्पके सहित मन, इन्द्रियोंको साथ लिये हुए यह मुख्य प्राणमे स्थित हो जाता है। वह मुख्य प्राण उदान वायुसे मिलकर मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्माको उस अन्तिम सङ्कल्पके अनुसार यथायोग्य भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनिमें ले जाता है। अतः मनुष्यको उचित है कि अपने मनमें निरन्तर एक भगवान्‌का ही चिन्तन रक्खे, दूसरा