कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 271, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपस्थमें अपानको स्थापित करता है । उसका काम मल-मूत्रको शरीरके बाहर निकाल देना है, रज-वीर्य और गर्भको बाहर करना भी इसीका काम है । शरीरके मध्य भाग-नाभिमें समानको रखता है । यह समान वायु ही प्राणरूप अग्निमें हवन किये -हुए- उदरमें डाले हुए अन्नको अर्थात् उसके सारको सम्पूर्ण शरीरके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है । उस अन्नके सारभूत रससे ही इस शरीरमें ये सात ज्वालाएँ अर्थात् समस्त विषयोंको प्रकाशित करनेवाले दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाएँ और एक मुख ( रसना )-ये सात द्वार उत्पन्न होते हैं, उस रससे पुष्ट होकर ही ये अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-अब व्यानकी गतिका वर्णन किया जाता है- हृदि ह्येष आत्मा अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रति- शाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्वरति ॥ ६ ॥ एषः हि=यह प्रसिद्ध, आत्मा=जीवात्मा, हृदि=हृदयदेशमें रहता है; अत्र=इस ( हृदय ) में; एतत्=यह; नाडीनाम् एकशतम्=मूलरूपसे एक सौ नाड़ियोंका समुदाय है, तासाम्=उनमेंसे, एकैकस्याम्=एक-एक नाड़ीमें; शतम् शतम्=एक-एक सौ ( शाखाएँ ) हैं ( प्रत्येक शाखा-नाड़ीकी ), द्वासप्ततिः द्वासप्ततिः=बहत्तर-बहत्तर; प्रतिशाखानाडीसहस्राणि=हजार प्रतिशाखा-नाड़ियाँ, भवन्ति=होती हैं आसु=इनमें, व्यानः=व्यानवायु, चरति= विचरण करता है ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस शरीरमें जो हृदयप्रदेश है, जो जीवात्माका निवासस्थान है, उसमें एक सौ मूलभूत नाड़ियाँ हैं, उनमेंसे प्रत्येक नाड़ीकी एक-एक सौ शाखा-नाड़ियाँ हैं और प्रत्येक शाखा-नाड़ीकी बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखा-नाड़ियाँ हैं । इस प्रकार इस शरीरमे कुल बहत्तर करोड़ नाड़ियों हैं, इन सबमें व्यानवायु विचरण करता है ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-अब उदानका स्थान और कार्य बतलाते हैं, साथ ही आश्वलायनके चौथे प्रश्नका उत्तर भी देते हैं- अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७ ॥ अथ=तथा, एकया=जो एक नाड़ी और है, उसके द्वारा, उदानः ऊर्ध्वः=उदान वायु ऊपरकी ओर, [ चरति= विचरता है, ] ( सः) पुण्येन=वह पुण्यकर्मोंके द्वारा, [ मनुष्यम्=मनुष्यको, ] पुण्यम् लोकम्=पुण्यलोकोंमें, नयति= ले जाता है, पापेन=पापकर्मोंके कारण (उसे ), पापम् नयति=पापयोनियोंमें ले जाता है ( तथा ), उभाभ्याम् एव=पाप और पुण्य दोनों प्रकारके कर्मोंद्वारा ( जीवको ), मनुष्यलोकम्=मनुष्य-शरीरमें, [ नयति=ले जाता है ] ॥ ७ ॥ व्याख्या-इन ऊपर बतलायी हुई बहत्तर करोड़ नाड़ियोंसे भिन्न एक नाड़ी और है, जिसको 'सुपुम्णा' कहते हैं, जो हृदयसे निकलकर ऊपर मस्तकमें गयी है । उसके द्वारा उदान वायु शरीरमे ऊपरकी ओर विचरण करता है । ( इस प्रकार आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका समाधान करके अब महर्षि उसके चौथे प्रश्नका उत्तर संक्षेपमें देते हैं-) जो मनुष्य पुण्यशील होता है, जिसके शुभकर्मोंके भोग उदय हो जाते हैं, उसे यह उदान वायु ही अन्य सब प्राण और इन्द्रियोंके सहित वर्तमान शरीरसे निकालकर पुण्यलोकोंमें अर्थात् स्वर्गादि उच्च लोकोंमें ले जाता है । पापकर्म से युक्त मनुष्यको शूकर-कूकर आदि पाप-योनियोंमें और रौरवादि नरकोंमें ले जाता है तथा जो पाप और पुण्य-दोनो प्रकारके कर्मोंका मिश्रित फल भोगनेके लिये अभिमुख हुए रहते हैं, उनको मनुष्य शरीरमें ले जाता है * ॥ ७ ॥ सम्बन्ध-अब दो मन्त्रोंमें आश्वलायनके पाँचवें और छठे प्रश्नका उत्तर देते हुए जीवात्माके प्राण और इन्द्रियोंसहित एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी बात भी स्पष्ट करते हैं-
- एक शरीरसे निकलकर जब मुख्य प्राण उदानको साथ लेकर उसके द्वारा दूसरे शरीरमें जाता है, तब अपने अङ्गभूत समान आदि प्राणोंको तथा इन्द्रिय और मनको तो साथ ले ही जाता है, इन सबका स्वामी जीवात्मा भी उसीके साथ जाता है-यह बात यहाँ कहनी थी, इसीलिये पूर्वमन्त्रमें जीवात्माका स्थान हृदय बतलाया गया है ।