कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
करता है तो (उच्यते) ] मनसि = मनोमय चन्द्रलोकको संपद्यते = प्राप्त होता है. स यजुर्भिः = वह यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा; अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्षमें स्थित सोमलोकम् = चन्द्रलोकको; उन्नीयते = ऊपरकी ओर ले जाया जाता है. स सोमलोके = वह चन्द्रलोकमें विभूतिम् = वहाँके ऐश्वर्यका; अनुभय = अनुभव करके' पुनः आवर्तते = पुनः इस लोकमें लौट जाता है ॥ ४ ॥ व्याख्या - यदि साधक दो मात्रावाले ओंकारकी उपासना करता है, अर्थात् उस विराट्रूपवान् परमेश्वरकी भूः और भुवः- इन दो मात्राओंकी अर्थात् स्वर्गलोकतकके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे उन्हींको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करता है तो वह मनोमय चन्द्रलोकको प्राप्त होता है. उसको यजुर्वेदके मन्त्र अन्तरिक्षमे ऊपरकी ओर चन्द्रलोकमे पहुँचा देते हैं। उस विनाशशील स्वर्गलोकमे नाना प्रकारके ऐश्वर्यका उपभोग करके अपनी उपासनाके पुण्यका क्षय हो जानेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाता है। वहाँ उसे अपने पूर्व-कर्मानुसार मनुष्य-शरीर या उससे कोई नीची योनि मिल जाती है ॥ ४ ॥
यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥
पुनः यः = परंतु जो त्रिमात्रेण = तीन मात्राओंवाले. ओम् इति = ओम् रूप, एतेन = इस, अक्षरेण एव = अक्षरके द्वारा ही; एतम् परम् = इस परम पुरुषम् = पुरुषका अभिध्यायीत = निरन्तर ध्यान करता है; सः तेजसि = वह तेजोमय; सूर्ये सम्पन्नः = सूर्यलोकमे जाता है (तथा) यथा पादोदरः = जिस प्रकार सर्प त्वचा विनिर्मुच्यते = केंचुलीसे अलग हो जाता है; एवम् ह वै = ठीक उसी तरह, स. पाप्मना = वह पापोंसे विनिर्मुक्तः = सर्वथा मुक्त हो जाता है सः = (इसके बाद) वह; सामभिः = सामवेदकी श्रुतियोंद्वारा; ब्रह्मलोकम् उन्नीयते = ऊपर ब्रह्मलोकमे ले जाया जाता है, सः एतस्माद् = वह इस, जीव- घनात् = जीवसमुदायरूप; परात् परम् = परतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ, पुरिशयम् = अन्तर्यामी पुरुषम् = परमपुरुष पुरुषोत्तमको, ईक्षते = साक्षात् कर लेता है; तत् एतौ = इस विषयमे ये (अगले), श्लोकौ भवतः = दो श्लोक ( हैं) ॥ ५ ॥
व्याख्या - इस मन्त्रमें 'पुन.' शब्दके प्रयोगसे यह सूचित होता है कि उपर्युक्त कथनके अनुसार इस लोक और स्वर्गलोकतकके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे अपर ब्रह्मको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करनेवाले साधकोंसे विलक्षण साधकका यहाँ वर्णन किया गया है। उपासनाका सर्वोत्तम प्रकार यही है- यह भाव प्रकट करनेके लिये ही इस मन्त्रमे 'यदि' पदका प्रयोग भी नहीं किया गया है' क्योंकि इसमें कोई विकल्प नहीं है। इस मन्त्रमे यह भी स्पष्टरूपसे बतला दिया गया है कि ओंकार उस परब्रह्मका नाम है, इसके द्वारा उस परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना की जाती है। मन्त्रने कहा गया है कि जो कोई साधक इन तीन मात्राओंवाले ओंकारस्वरूप अक्षरद्वारा परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना करता है, वह जैसे सर्प केंचुलीसे अलग हो जाता है-उसी प्रकार सब प्रकारके कर्मबन्धनोंसे छूटकर सर्वथा निर्विकार हो जाता है। उसे सामवेदके मन्त्र तेजोमय सूर्यन-डलमेंते ले जाकर सर्वोपरि ब्रह्मलोकमे पहुँचा देते हैं। वहाँ वह जीव-समुदायरूप चेतनतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ उन परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त हो जाता है, जो सम्पूर्ण जगत्को अपनी शक्तिके किसी एक अंशमे धारण किये हुए हैं और सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं। इसी विषयको स्पष्ट करनेवाले ये दो आगे कहे हुए श्लोक हैं ॥ ५ ॥
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः । क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६ ॥
तिस्रः मात्राः = ओंकारकी तीनों मात्राएँ ('अ', 'उ' तथा 'म ) अन्योन्यसक्ताः = एक दूसरीसे संयुक्त रहकर; प्रयुक्ताः = प्रयुक्त की गयी हों, अनविप्रयुक्ताः = या पृथक्-पृथक् एक-एक ध्येयके चिन्तनमें इनका प्रयोग किया जाय (दोनो प्रकारसे ही वे ); मृत्युमत्यः = मृत्युयुक्त हैं; बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु = बाहर, भीतर और बीचकी. क्रियासु = क्रियाओंमें, सम्यक्प्रयुक्तासु = पूर्णतया इन मात्राओंका प्रयोग किये जानेपर; ज्ञः न कम्पते = उस परमेश्वरको जाननेवाला ज्ञानी विचलित नहीं होता ॥ ६ ॥ व्याख्या - इस मन्त्रमे यह भाव दिखाया गया है कि ओकारवाच्य परब्रह्म परमेश्वरका जो यह जगद्रूप विराट्रूप
४ प्रश्नोपनिषद् * २५७ है अर्थात् जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आता है, यह उसका वास्तविक परम अविनाशी स्वरूप नहीं है, यह परिवर्तन- शील है, अतः इसमें रहनेवाला जीव अमर नहीं होता । वह चाहे ऊँची-से ऊँची योनिको प्राप्त कर ले, परंतु जन्म-मृत्युके चक्रसे नहीं छूटता। इसके एक अङ्ग पृथ्वीलोककी या पृथ्वी और अन्तरिक्ष इन दोनों लोकोंकी अथवा तीनो लोकोंको मिलाकर सम्पूर्ण जगत्की अभिलाषा रखते हुए जो उपासना करता है, जिसका इस जगत्के आत्मरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमकी ओर लक्ष्य नहीं है, वर जो जगत्के बाह्य स्वरूपमें ही आसक्त हो रहा है, वह उन्हें नहीं पाता, अतः बार बार जन्मता-मरता रहता है । उन्हें तो वही साधक पा सकता है, जो अपने शरीरके बाहर, भीतर और शरीरके मध्यस्थान—हृदयदेशमें एव उसके द्वारा की जानेवाली बाहरी, भीतरी और बीचकी समस्त क्रियाओंमे सर्वत्र ओंकारके वाच्यार्थरूप एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तमको व्याप्त समझता है और ओंकारके द्वारा उनकी उपासना करता है—उन्हे पानेकी ही अभिलाषासे ओंकारका जप, स्मरण और चिन्तन करता है, वह ज्ञानी परमात्माको पाकर फिर कभी अपनी स्थितिसे विचलित नही होता ॥ ६ ॥ ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते । तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥ ७ ॥ ऋग्भिः= (एक मात्राकी उपासनासे उपासक ) ऋचाओंद्वारा, एतम् = इस मनुष्यलोकमें ( पहुँचाया जाता है ), यजुर्भिः= ( दूसरा दो मात्राओंकी उपासना करनेवाला ) यजुःश्रुतियोंद्वारा, अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्षमें ( चन्द्रलोकतक पहुँचाया जाता है ), सामभिः= ( पूर्णरूपसे ओंकारकी उपासना करनेवाला ) सामश्रुतियोंद्वारा, तत् = उस ब्रह्मलोकमे ( पहुँचाया जाता है ), यत्=जिसको, कवयः=ज्ञानीजन, वेदयन्ते=जानते हैं, विद्वान्=विवेकशील साधक, ओङ्कारेण एव= केवल ओंकाररूप; आयतनेन = अवलम्बनके द्वारा ही, तम्=उस परब्रह्म पुरुषोत्तमको, अन्वेति=पा लेता है, यत्=जो, तत्= वह; शान्तम् = परम शान्त, अजरम् = जरारहित, अमृतम् = मृत्युरहित, अभयम्=भयरहित, च=और, परम् इति= सर्वश्रेष्ठ है ॥ ७ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें तीसरे, चौथे और पाँचवे मन्त्रोंके भावका सक्षेपमे वर्णन करके ब्राह्मण-ग्रन्थके वाक्योंमें कही हुई बातका समर्थन किया गया है । भाव यह है कि एक मात्रा अर्थात् एक अङ्गको लक्ष्य बनाकर उपासना करनेवाले साधकको ऋग्वेदकी ऋचाएँ मनुष्यलोकमे पहुँचा देती है । दो मात्राकी उपासना करनेवालेकों अर्थात् जगत्के ऊँचे-से-ऊँचे—स्वर्गीय ऐश्वर्यको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करनेवालेको यजुर्वेदके मन्त्र चन्द्रलोकमे ले जाते हैं और जो इन सबमे परिपूर्ण इनके आत्मरूप परमेश्वरकी ओंकारके द्वारा उपासना करता है, उसको सामवेदके मन्त्र उस ब्रह्मलोकमें पहुँचा देते हैं, जिसे ज्ञानीजन जानते हैं । सम्पूर्ण रहस्यको समझनेवाले बुद्धिमान् मनुष्य बाह्य जगत्में आसक्त न होकर ओंकारकी उपासनाद्वारा समस्त जगत्के आत्मरूप उन परब्रह्म परमात्माको पा लेते हैं, जो परम शान्त और सब प्रकारके विकारोंसे रहित हैं, जहाँ न बुढापा है, न मृत्यु है, जो अजर, अमर, निर्भय, सर्वश्रेष्ठ एव परम पुरुषोत्तम हैं ॥ ७ ॥ ॥ पञ्चम प्रश्न ॥ ५ ॥ --------------------*-------------------- प्रश्न अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः —भगवन्हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नम- पृच्छत । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ । तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुम् । स तूष्णीं रथ- । तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥ १ ॥ अथ=फिर; ह एनम् = इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद) से, भारद्वाजः = भरद्वाजपुत्र, सुकेशा=सुकेशाने, पप्रच्छ= पूछा—, भगवन् = भगवन्, कौसल्यः = कोसलदेशीय; राजपुत्रः=राजकुमार; हिरण्यनाभः = हिरण्यनाभने, माम् उपेत्य= मेरे पास आकर, एतम् प्रश्नम् = यह प्रश्न; अपृच्छत = पूछा, भारद्वाज = हे भारद्वाज ! ( क्या तुम ), षोडश- उ० अं० ३३—
२५८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * कलम् = सोलह कलाओंवाले, पुरुषम् = पुरुषको, वेत्थ = जानते हो; तम् कुमारम् = (तब) उस राजकुमारसे, अहम् = मैंने, अब्रुवम् = कहा—; अहम् = मैं; इमम् = इसे, न वेद = नहीं जानता, यदि = यदि; अहम् = मैं, इमम् अवेदिषम् = इसे जानता होता (तो), ते = तुझे, कथम् न अवक्ष्यम् इति = क्यों नहीं बताता, एषः वै = वह मनुष्य अवश्य, समूलः = मूलके सहित, परिशुष्यति = सर्वथा सूख जाता है (नष्ट हो जाता है), यः = जो, अनृतम् = झूठ; अभिवदति = बोलता है, तस्मात् = इसलिये (मैं), अनृतम् = झूठ, वक्तुम् = बोलनेमें, न अर्हामि = समर्थ नहीं हूँ, सः = वह राजकुमार (मेरा उत्तर सुनकर), तूष्णीम् = चुपचाप, रथम् = रथपर, आरुह्य = सवार होकर; प्रवव्राज = चला गया, तम् = उसीको, त्वा पृच्छामि = मैं आपसे पूछ रहा हूँ, असौ = वह (सोलह कलाओंवाला), पुरुषः = पुरुष, क इति = कहाँ है ? ॥ १ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें सुकेशा ऋषिने अपनी अल्पज्ञता और सत्य-भाषणका महत्त्व प्रकट करते हुए सोलह कलाओ वाले पुरुषके विषयमे प्रश्न किया है। वे बोले- "भगवन् ! एक बार कोसलदेशका राजकुमार हिरण्यनाभ मेरे पास आया था। उसने मुझसे पूछा-'भारद्वाज ! क्या तुम सोलह कलाओंवाले पुरुषके विषयमे जानते हो ?' मैने उससे स्पष्ट कह दिया- 'भाई ! मै उसे नहीं जानता, जानता होता तो तुम्हें अवश्य बता देता । न बतानेका कोई कारण नहीं है । तुम अपने मनमें यह न समझना कि मैंने बहाना करके तुम्हारे प्रश्नको टाल दिया है, क्योकि मैं झूठ नहीं बोलता । झूठ बोलनेवालेका मूलोच्छेद हो जाता है, वह इस लोकमे या परलोकमें कहीं भी प्रतिष्ठा नहीं पा सकता ।' मेरी इस बातको सुनकर राजकुमार चुपचाप रथपर सवार होकर जैसे आया था, वैसे ही लौट गया। अब मैं आपके द्वारा उसी सोलह कलाओंवाले पुरुषका तत्त्व जानना चाहता हूँ, कृपया आप मुझे बतलायें कि वह कहाँ है और उसका स्वरूप क्या है ?" ॥ १ ॥ तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडश कलाः प्रभवन्तीति ॥ २ ॥ तस्मै = उससे, सः ह = वे सुप्रसिद्ध महर्षि, उवाच = बोले, सोम्य = हे प्रिय !, इह = यहाँ, अन्तःशरीरे = इस शरीरके भीतर, एव = ही, सः = वह, पुरुषः = पुरुष है, यस्मिन् = जिसमे, एताः = ये, षोडश = सोलह, कलाः = कलाएँ; प्रभवन्ति इति = प्रकट होती हैं ॥ २ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें उस सोलह कलाओंवाले पुरुषका सङ्केतमात्र किया गया है । महर्षि पिप्पलाद कहते हैं- 'प्रिय सुकेशा ! जिन परमेश्वरसे सोलह कलाओंका समुदाय सम्पूर्ण जगद्रूप उनका विराट् शरीर उत्पन्न हुआ है, वे ही पुरुष हैं, उनको खोजनेके लिये कहीं अन्यत्र नहीं जाना है, वे हमारे इस शरीरके भीतर ही विराजमान हैं।' भाव यह है कि जब मनुष्यके हृदयमे परमात्माको पानेके लिये उत्कट अभिलाषा जाग्रत् हो जाती है, तब वे उसे वहीं उसके हृदयमे ही मिल जाते हैं ॥ २ ॥ सम्बन्ध-उन परब्रह्म पुरुषोत्तमका तत्त्व समझानेके लिये संक्षेपसे सृष्टिक्रमका वर्णन करते हैं- स ईक्षांचक्रे । कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३ ॥ सः = उसने, ईक्षांचक्रे = विचार किया (कि); कस्मिन् = (शरीरसे) किसके; उत्क्रान्ते = निकल जानेपर; अहम् उत्क्रान्तः = मै (भी) निकला हुआ (-सा), भविष्यामि = हो जाऊँगा; वा = तथा; कस्मिन् प्रतिष्ठिते = किसके स्थित रहनेपर, प्रतिष्ठास्यामि इति = मैं स्थित रहूँगा ॥ ३ ॥ व्याख्या-महासर्गके आदिमें जगत्की रचना करनेवाले परम पुरुष परमेश्वरने विचार किया कि 'मैं जिस ब्रह्माण्डकी रचना करना चाहता हूँ, उसमें एक ऐसा कौन सा तत्त्व डाला जाय कि जिसके न रहनेपर मैं स्वयं भी उसमे न रह सकूँ अर्थात् मेरी सत्ता स्पष्टरूपसे व्यक्त न रहे और जिसके रहनेपर मेरी सत्ता स्पष्ट प्रतीत होती रहे' ॥ ३ ॥ स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च ॥ ४ ॥
- प्रश्नोपनिषद् * २५९ सः = उसने प्राणम् असृजत = ( यह सोचकर सबसे पहले ) प्राणकी रचना की; प्राणात् श्रद्धा = प्राणके बाद श्रद्धाको ( उत्पन्न किया ), खम् वायुः ज्योतिः आपः पृथिवी = ( उसके बाद क्रमशः ) आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी ( ये पाँच महाभूत प्रकट हुए; फिर ); मनः इन्द्रियम् = मन ( अन्तःकरण ) और इन्द्रियसमुदाय ( की उत्पत्ति हुई ), अन्नम् = ( अनन्तर ) अन्न हुआ; अन्नात् = अन्नसे; वीर्यम् = वीर्य ( की रचना हुई, फिर ); तपः = तप; मन्त्राः = नाना प्रकारके मन्त्र; कर्म = नाना प्रकारके कर्म; च लोकाः = और उनके फलरूप भिन्न-भिन्न लोकों ( का निर्माण हुआ ); च = और; लोकेषु = उन लोकोंमें, नाम = नाम ( की रचना हुई ) ॥ ४ ॥ व्याख्या-परब्रह्म परमेश्वरने सर्वप्रथम सबके प्राणरूप सर्वात्मा हिरण्यगर्भको बनाया। उसके बाद शुभकर्ममें प्रवृत्त करानेवाली श्रद्धा अर्थात् आस्तिक-बुद्धिको प्रकट करके फिर क्रमशः शरीरके उपादानभूत आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी-इन पाँच महाभूतोंकी सृष्टि की। इन पाँच महाभूतोंका कार्य ही यह दृश्यमान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है। पाँच महाभूतोंके बाद परमेश्वरने मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार-इन चारोंके समुदायरूप अन्तःकरणको रचा। फिर विषयोंके ज्ञान एव कर्मके लिये पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा पाँच कर्मेन्द्रियोंको उत्पन्न किया, फिर प्राणियोंके शरीरकी स्थितिके लिये अन्नकी और अन्नके परिपाकद्वारा बलकी सृष्टि की। उसके बाद अन्तःकरण और इन्द्रियोंके संयमरूप तपका प्रादुर्भाव किया। उपासनाके लिये भिन्न-भिन्न मन्त्रोंकी कल्पना की। अन्तःकरणके संयोगसे इन्द्रियोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंका निर्माण किया। उनके भिन्न-भिन्न फलरूप लोकोंको बनाया और उन सबके नाम-रूपोंकी रचना की। इस प्रकार सोलह कलाओंसे युक्त इस ब्रह्माण्डकी रचना करके जीवात्माके सहित परमेश्वर स्वयं इसमें प्रविष्ट हो गये; इसीलिये वे सोलह कलाओंवाले पुरुष कहलाते हैं। हमारा यह मनुष्य-शरीर भी ब्रह्माण्डका ही एक छोटा-सा नमूना है, अतः परमेश्वर जिस प्रकार इस सारे ब्रह्माण्डमें हैं, उसी प्रकार हमारे इस शरीरमें भी हैं और इस शरीरमें भी वे सोलह कलाएँ वर्तमान हैं। उन हृदयस्थ परमदेव पुरुषोत्तमको जान लेना ही उस सोलह कलावाले पुरुषको जान लेना है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध-सर्गके आरम्भका वर्णन करके जिन परब्रह्मका लक्ष्य कराया गया, उन्हींका अब प्रलयके वर्णनसे लक्ष्य करते हैं- स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते 'नामरूपे इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५॥ सः = वह ( प्रलयका दृष्टान्त ) इस प्रकार है; यथा = जिस प्रकार; इमाः = ये; नद्यः = नदियाँ, समुद्रायणाः = समुद्रकी ओर लक्ष्य करके जाती, स्यन्दमानाः = ( और ) बहती हुई; समुद्रम् = समुद्रको, प्राप्य = पाकर, अस्तम् गच्छन्ति = ( उसीमें ) विलीन हो जाती हैं; तासाम् नामरूपे = उनके नाम और रूप; भिद्येते = नष्ट हो जाते हैं; समुद्रः इति एवम् = ( फिर ) समुद्र इस एक नामसे ही, प्रोच्यते = पुकारी जाती हैं; एवम् एव = इसी प्रकार; अस्य परिद्रष्टुः = सब ओरसे पूर्णतया देखनेवाले इन परमेश्वरकी, इमाः = ये ( ऊपर बतायी हुई ); षोडश कलाः = सोलह कलाएँ, पुरुषायणाः = जिनका परमाधार और परमगति पुरुष है; पुरुषम् प्राप्य = ( प्रलयकालमें ) परम पुरुष परमात्माको पाकर, अस्तम् गच्छन्ति = ( उन्हींमें) विलीन हो जाती हैं, च = तथा, आसाम् = इन सबके; नामरूपे = ( पृथक्-पृथक् ) नाम और रूप; भिद्येते = नष्ट हो जाते हैं, पुरुषः इति एवम् = फिर 'पुरुष' इस एक नामसे ही, प्रोच्यते = पुकारी जाती हैं; सः = वही; एषः = यह; अकलः = कलारहित ( और ); अमृतः = अमर परमात्मा, भवति = है, तत् = उसके विषयमें; एषः = यह ( अगला ); श्लोकः = श्लोक है ॥ ५ ॥ —जिस प्रकार भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंवाली ये बहुत-सी नदियाँ अपने उद्गमस्थान समुद्रकी ओर दौड़ती हुई समुद्रमें पहुँचकर उसीमें विलीन हो जाती हैं, उनका समुद्रसे पृथक् कोई नाम-रूप नहीं रहता—वे समुद्र ही बन जाती हैं, उसी प्रकार सर्वसाक्षी सबके आत्मरूप परमात्मासे उत्पन्न हुई ये सोलह कलाएँ ( अर्थात् यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ) प्रलयकालमें अपने परमाधार परम पुरुष परमेश्वरमें जाकर उसीमें विलीन हो जाती हैं। फिर इन सबके अलग-अलग नाम-रूप नहीं रहते।
२६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * एकमात्र परम पुरुष परमेश्वरके स्वरूपमे ये तदाकार हो जाती हैं। अतः उन्हीके नामसे, उन्हीके वर्णनमे इनका वर्णन होता है, अलग नहीं। उस समय परमात्मामे किसी प्रकारका सङ्कल्प नहीं रहता। अतः वे सब कलाओंसे रहित, अमृतरूप कहे जाते हैं। इस तत्त्वको समझनेवाला मनुष्य भी उन परब्रह्मको प्राप्त होकर अकल और अमर हो जाता है। इस विषयपर आगे कहा जानेवाला मन्त्र है ॥ ५ ॥ अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः । तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ ६ ॥ रथनाभौ=रथ-चक्रकी नाभिके आधारपर; अराः इव=जिस प्रकार अरे स्थित होते हैं (वैसे ही), यस्मिन्= जिसमे; कलाः=(ऊपर बतायी हुई सब) कलाएँ; प्रतिष्ठिताः=सर्वथा स्थित हैं; तम् वेद्यम् पुरुषम्=उस जानने- योग्य (सबके आधारभूत) परम पुरुष परमेश्वरको; वेद=जानना चाहिये; यथा=जिसमे (हे शिष्यगण) वः=तुमलोगोंको; मृत्युः=मृत्यु मा परिव्यथाः इति=दुःख न दे सके ॥ ६ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे सर्वाधार परमेश्वरको जाननेके लिये प्रेरणा करके उसका फल जन्म मृत्युसे रहित हो जाना बताया गया है। महर्षि पिप्पलाद अपने शिष्योसे कहते हैं—'जिस प्रकार रथके पहियेमे लगे रहनेवाले सब अरे उस पहियेके मध्यस्थ नाभिमे प्रविष्ट रहते हैं, उन सबका आधार नाभि है—नाभिके बिना वे टिक ही नहीं सकते, उसी प्रकार ऊपर बतायी हुई प्राण आदि सोलह कलाओके जो आधार हैं, ये सब कलाएँ जिनके आश्रित हैं, जिनमें उत्पन्न होती हैं और जिनमें विलीन हो जाती हैं, वे ही जानने योग्य परब्रह्म परमेश्वर हैं। उन सर्वाधार परमात्माको जानना चाहिये। उन्हें जान लेनेके बाद तुम्हें मौतका डर नहीं रहेगा, फिर मृत्यु तुमको इस जन्म-मृत्युयुक्त ससारमें डालकर दुःखी नहीं कर सकेगी। तुमलोग सदाके लिये अमर हो जाओगे' ॥ ६ ॥ तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद । नातः परमस्तीति ॥ ७ ॥ ह=(तत्पश्चात्) उन प्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने; तान् उवाच=उन सबमे कहा; एतत्=इम; परम् ब्रह्म=परम ब्रह्म को; अहम्=मै; एतावत्=इतना; एव=ही; वेद=जानता हूँ; अतः परम्=इससे पर, (उत्कृष्ट तत्त्व); न=नहीं; अस्ति इति=है ॥७॥ व्याख्या—इतना उपदेश करनेके बाद महर्षि पिप्पलादने परम भाग्यवान् सुकेशा आदि छहों ऋषियोको सम्बोधन करके कहा—'ऋषियो ! इन परब्रह्म परमेश्वरके विषयमें मै इतना ही जानता हूँ। इनसे पर अर्थात् श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है।' मैने तुमलोगोसे उनके विषयमे जो कुछ कहना था, वह कह दिया ॥ ७ ॥ सम्बन्ध—अन्तमें कृतज्ञता प्रकट करते हुए वे शिष्यगण महर्षिको बारवार प्रणाम करते हुए कहते हैं— ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८ ॥ ते=उन छहों ऋषियोंने; तम् अर्चयन्तः=पिप्पलादकी पूजा की (और कहा ); त्वम्=आप; हि=ही; नः=हमारे; पिता=पिता (है); यः=जिन्होंने; अस्माकम्=हमलोगोको; अविद्यायाः परम् पारम्=अविद्याके दूसरे पार; तारयसि इति=पहुँचा दिया है; नमः परमऋषिभ्यः=आप परम ऋषिको नमस्कार है; नमः परमऋषिभ्यः=परम ऋषि- को नमस्कार है ॥ ८ ॥ व्याख्या—इस प्रकार आचार्य पिप्पलादसे ब्रह्मका उपदेश पाकर उन छहों ऋषियोंने पिप्पलादकी पूजा की और कहा—'भगवन् ! आप ही हमारे वास्तविक पिता हैं, जिन्होंने हमें इस ससार-समुद्रके पार पहुँचा दिया। ऐसे गुरुके
पिप्पलादके आश्रममें सुकेशादि मुनि
अङ्गिरस् और शौनक
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- प्रश्नोपनिषद् * २६१ बढ़कर दूसरा कोई हो ही कैसे सकता है। आप परम ऋषि हे, ज्ञानस्वरूप है। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है। अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ ८ ॥ ॥ षष्ठ प्रश्न समाप्त ॥ ६ ॥ ॥ अथर्ववेदीय प्रश्नोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यों अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ प्रश्नोपनिषद्के आरम्भमे दिया जा चुका है।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ मुण्डकोपनिषद् यह उपनिषद् अथर्ववेदकी शौनकी शाखामे है । शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाऽसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ प्रश्नोपनिषद्में दिया जा चुका है । प्रथम मुण्डक प्रथम खण्ड ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥ ‘ॐ’ इस परमेश्वरके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है । इसके द्वारा यहाँ यह सूचित किया गया है कि मनुष्यको प्रत्येक कार्यके आरम्भमें ईश्वरका स्मरण तथा उनके नामका उच्चारण अवश्य करना चाहिये । विश्वस्य कर्ता=सम्पूर्ण जगत्के रचयिता ( और ); भुवनस्य गोप्ता=सब लोकोकी रक्षा करनेवाले, ब्रह्मा= ( चतुर्मुख ) ब्रह्माजी, देवानाम्=सब देवताओंमें, प्रथमः=पहले, सम्बभूव=प्रकट हुए, स'=उन्होंने; ज्येष्ठपुत्राय अथर्वाय=सबसे बड़े पुत्र अथर्वाको, सर्वविद्याप्रतिष्ठाम्=समस्त विद्याओंकी आधारभूता, ब्रह्मविद्याम् प्राह=ब्रह्मविद्याका भलीभाँति उपदेश किया ॥ १ ॥ व्याख्या—सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरसे देवताओंमें सर्वप्रथम ब्रह्मा प्रकट हुए । फिर इन्होंने ही सब देवताओ, महर्षियो और मरीचि आदि प्रजापतियोंको उत्पन्न किया । साथ ही, समस्त लोकोकी रचना भी की तथा उन सबकी रक्षाके सुदृढ नियम आदि बनाये । उनके सबसे बड़े पुत्र महर्षि अथर्वा थे, उन्हींको सबसे पहले ब्रह्माजीने ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था । जिस विद्यासे ब्रह्मके पर और अपर—दोनों स्वरूपोंका पूर्णतया ज्ञान हो, उसे ब्रह्मविद्या कहते है, यह सम्पूर्ण विद्याओंकी आश्रय है ॥ १ ॥ अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भारद्वाजाय सत्यवहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥
- मुण्डकोपनिषद् * २६३ ब्रह्मा=ब्रह्माने, याम्=जिस विद्याका, अथर्वणे=अथर्वाको, प्रवदेत=उपदेश दिया था; ताम् ब्रह्मविद्याम्=वही ब्रह्मविद्या, अथर्वा=अथर्वाने, पुरा=पहले; अङ्गिरे=अङ्गी ऋषिको; उवाच=कही; सः=उन अङ्गी ऋषिने; भारद्वाजाय= भरद्वाज-गोत्री, सत्यवहाय=सत्यवह नामक ऋषिको, प्राह=बतलायी; भारद्वाजः=भारद्वाजने; परावराम्=पहलेवालोंसे पीछेवालोंको प्राप्त हुई उस परम्परागत विद्याको, अङ्गिरसे=अङ्गिरा नामक ऋषिको, [ प्राह=कहा ] ॥ २ ॥ व्याख्या—अथर्वा ऋषिको जो ब्रह्मविद्या ब्रह्मासे मिली थी, वही ब्रह्मविद्या उन्होंने अङ्गी ऋषिको बतलायी और अङ्गीने भरद्वाज-गोत्रमे उत्पन्न सत्यवह नामक ऋषिको कही । भारद्वाज ऋषिने परम्परासे चली आती हुई ब्रह्मके पर और अपर—दोनों स्वरूपोंका ज्ञान करानेवाली इस ब्रह्मविद्याका उपदेश अङ्गिरा नामक ऋषिको दिया ॥ २ ॥ शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥ ह=विख्यात है ( कि ); शौनकः वै=शौनक नामसे प्रसिद्ध मुनिने; महाशालः=जो अति बृहत् विद्यालय (ऋषिकुल) के अधिष्ठाता थे, विधिवत्=शास्त्रविधिके अनुसार; अङ्गिरसम् उपसन्नः=महर्षि अङ्गिराकी शरण ली; (और उनसे ) पप्रच्छ=( विनयपूर्वक ) पूछा; भगवः=भगवन्; नु=निश्चयपूर्वक; कस्मिन् विज्ञाते=किसके जान लिये जानेपर, इदम्=यह; सर्वम्=सब कुछ, विज्ञातम्=जाना हुआ, भवति=हो जाता है; इति=यह ( मेरा प्रश्न है ) ॥ ३ ॥ व्याख्या—शौनक नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि थे, जो बड़े भारी विश्वविद्यालयके अधिष्ठाता थे, पुराणोंके अनुसार उनके ऋषिकुलमे अठासी हजार ऋषि रहते थे । वे उपर्युक्त ब्रह्मविद्याको जाननेके लिये शास्त्रविधिके अनुसार हाथमें समिधा लेकर श्रद्धापूर्वक महर्षि अङ्गिराकी शरणमे आये । उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक महर्षिसे पूछा—'भगवन् ! जिसको भलीभाँति जान लेनेपर यह जो कुछ देखने, सुनने और अनुमान करनेमे आता है, सब-का-सब जान लिया जाता है, वह परम तत्त्व क्या है ? कृपया बतलाइये कि उसे कैसे जाना जाय' ॥ ३ ॥ तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ ४ ॥ तस्मै=उन शौनक मुनिसे, सः ह=वे विख्यात महर्षि अङ्गिरा, उवाच=बोले, ब्रह्मविदः=ब्रह्मको जाननेवाले, इति=इस प्रकार, ह=निश्चयपूर्वक, वदन्ति स्म यत्=कहते आये हैं कि, द्वे विद्ये=दो विद्याएँ, एव=ही, वेदितव्ये=जानने योग्य है, परा=एक परा, च=और, अपरा=दूसरी अपरा, च=भी ॥ ४ ॥ व्याख्या—इस प्रकार शौनकके पूछनेपर महर्षि अङ्गिरा बोले—'शौनक ! ब्रह्मको जाननेवाले महर्षियोंका कहना है कि मनुष्यके लिये जाननेयोग्य दो विद्याएँ हैं—एक तो परा और दूसरी अपरा ॥ ४ ॥ तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिष- मिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥ तत्र=उन दोनोंमेंसे, ऋग्वेदः=ऋग्वेद; यजुर्वेदः=यजुर्वेद, सामवेदः=सामवेद; ( तथा ) अथर्ववेदः=अथर्ववेद, शिक्षा=शिक्षा, कल्पः=कल्प, व्याकरणम्=व्याकरण; निरुक्तम्=निरुक्त, छन्दः=छन्द; ज्योतिषम्=ज्योतिष, इति अपरा=ये ( सब तो ) अपरा विद्या ( के अन्तर्गत हैं ), अथ=तथा, यया=जिससे; तत्=वह, अक्षरम्=अविनाशी परब्रह्म, अधिगम्यते=तत्त्वसे जाना जाता है, [ सा=वह, ] परा=परा विद्या ( है ) ॥ ५ ॥ व्याख्या—उन दोनोंमेंसे जिसके द्वारा इस लोक और परलोकसम्बन्धी भोगों तथा उनकी प्राप्तिके साधनोंका ज्ञान प्राप्त किया जाता है, जिसमें भोगोंकी स्थिति, भोगोंके उपभोग करनेके प्रकार, भोग-सामग्रीकी रचना और उनको उपलब्ध करनेके नाना साधन आदिका वर्णन है, वह तो अपरा विद्या है; जैसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये चारों वेद । इनमें नाना प्रकारके यज्ञोंकी विधिका और उनके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन है । जगत्के सभी पदार्थोंका एव विषयोंका वेदोंमें भलीभाँति वर्णन किया गया है । यह अवश्य है कि इस समय वेदकी सब शाखाएँ उपलब्ध नहीं हैं और
२६४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * उनमें वर्णित विविध विज्ञानसम्बन्धी बातोंको समझनेवाले भी नहीं हैं। वेदोंका पाठ अर्थात् यथार्थ उच्चारण करनेकी विविका उपदेश 'शिक्षा' है। जिसमें यज्ञ-याग आदिकी विधि बतलायी गयी है, उसे 'कल्प' कहते हैं (गृह्यसूत्र आदिकी गणना कल्पमें ही है)। वैदिक और लौकिक शब्दोंके अनुशासनका-प्रकृति प्रत्यय विभागपूर्वक शब्द-साधनकी प्रक्रिया, शब्दार्थ- बोधके प्रकार एवं शब्दप्रयोग आदिके नियमोंके उपदेशका नाम 'व्याकरण' है। वैदिक शब्दोंका जो कोष है, जिसमें अमुक पद अमुक वस्तुका वाचक है-यह बात कारणसहित बतायी गयी है, उसको 'निरुक्त' कहते हैं। वैदिक छन्दों की जाति और भेद बतलानेवाली विद्या 'छन्द' कहलाती है। ग्रह और नक्षत्रोंकी स्थिति, गति और उनके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है-इन सब बातोंपर जिसमें विचार किया गया है, वह 'ज्योतिष' विद्या है। इस प्रकार चार वेद और छः वेदाङ्ग-इन सबका नाम अपरा विद्या है; और जिसके द्वारा परब्रह्म अविनाशी परमात्माका तत्त्वज्ञान होता है, वह परा विद्या है। उसका वर्णन भी वेदाम ही है, अतः उतने अंशको छोड़कर अन्य सब वेद और वेदाङ्गोंको अपरा विद्याके अन्तर्गत समझना चाहिये ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-ऊपर बतलायी हुई परा विद्याके द्वारा जिसका ज्ञान होता है, वह अविनाशी ब्रह्म कसा है-इस जिज्ञासापर कहते हैं- यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥ तत्=वह, यत्=जो, अद्रेश्यम्=जाननेमे न आनेवाला, अग्राह्यम्=पकड़नेम न आनेवाला, अगोत्रम्=गोत्र आदिसे रहित, अवर्णम्=रंग और आकृतिसे रहित; अचक्षुःश्रोत्रम्=नेत्र, कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंमे रहित (ओर) अपाणिपादम्= (और) हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियोंसे (भी) रहित है; [ तथा=तथा; ] तत्=वह यत्= जो, नित्यम्=नित्य; विभुम्= सर्वव्यापी, सर्वगतम्=सबमे फैला हुआ, सुसूक्ष्मम्=अत्यन्त सूक्ष्म (और), अव्ययम्=अविनाशी परब्रह्म है, तत्=उम; भूतयोनिम्=समस्त प्राणियोंके परम कारणको, धीराः=ज्ञानीजन, परिपश्यन्ति=सर्वत्र परिपूर्ण देखते हैं ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें परब्रह्म परमेश्वरके निराकार स्वरूपका वर्णन किया गया है। सारांश यह है कि वे परब्रह्म परमेश्वर ज्ञानेन्द्रियोंद्वारा जाननेमें नहीं आते, न कर्मेन्द्रियोंद्वारा पकड़नेमे ही आते हैं। वे गोत्र आदि उपाधियोसे रहित, तथा ब्राह्मण आदि वर्णगतभेदसे एव रंग और आकृतिसे भी सर्वथा रहित हैं। वे नेत्र, कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंसे और हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियोंमे भी रहित है। तथा वे अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक, अन्तर्यामीरूपसे सबमें फैले हुए और कभी नाश न होनेवाले सर्वथा नित्य हैं। समस्त प्राणियोंके उन परम कारणको ज्ञानीजन सर्वत्र परिपूर्ण देखते हैं ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-वे जगदात्मा परमेश्वर समस्त भूतोंके परम कारण कैसे हैं, सम्पूर्ण जगत् उनसे किस प्रकार उत्पन्न होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं- यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति । यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥ यथा=जिस प्रकार; ऊर्णनाभिः=मकड़ी, सृजते=(जालेको) बनाती है, च=और; गृह्णते=निगल जाती है (तथा), यथा=जिस प्रकार, पृथिव्याम्=पृथ्वीमे, ओषधयः =नाना प्रकारकी ओषधियाँ, सम्भवन्ति=उत्पन्न होती ह ( और ), यथा=जिस प्रकार, सतः पुरुषात्=जीवित मनुष्यसे, केशलोमानि=केश और रोएँ (उत्पन्न होते हे); तथा=उमी प्रकार, अक्षरात्=अविनाशी परब्रह्मसे, इह=यहाँ-इस सृष्टिमे, विश्वम्=सब कुछ, सम्भवति=उत्पन्न होता है ॥ ७ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें तीन दृष्टान्तोंद्वारा यह बात समझायी गयी है कि परब्रह्म परमेश्वर ही इस जड़-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्के निमित्त और उपादान कारण हैं। पहले मकड़ीके दृष्टान्तसे यह बात कही गयी है कि जिस प्रकार मकड़ी अपने पेटमे स्थित जालेको बाहर निकालकर फैलाती है और फिर उसे निगल जाती है, उसी प्रकार वह परब्रह्म परमेश्वर अपने अन्दर सूक्ष्मरूपसे लीन हुए जड-चेतनरूप जगत्को सृष्टिके आरम्भम नाना प्रकारसे उत्पन्न करके फैलाते ह और प्रलय- कालमें पुनः उसे अपनेमे लीन कर लेते हैं (गीता ९। ७-८) । दूसरे उदाहरणसे यह बात समझायी है कि जिस प्रकार
- मुण्डकोपनिषद् * २६५ पृथ्वीमें जिस जिस प्रकारकी अन्न, तृण, वृक्ष, लता आदि ओषधियोंके बीज पड़ते हैं, उसी प्रकारकी भिन्न-भिन्न भेदोंवाली ओषधियाँ वहाँ उत्पन्न हो जाती हैं—उसमें पृथ्वीका कोई पक्षपात नहीं है, उसी प्रकार जीवोंके नाना प्रकारके कर्मरूप बीजोंके अनुसार ही भगवान् उनको भिन्न-भिन्न योनियोंमें उत्पन्न करते हैं, अतः उनमें किसी प्रकारकी विषमता और निर्दयताका दोष नहीं है (ब्रह्मसूत्र २ । १ । ३४) । तीसरे मनुष्य-शरीरके उदाहरणसे यह बात समझायी गयी है कि जिस प्रकार मनुष्यके जीवित शरीरसे सर्वथा विलक्षण केश, रोएँ और नख अपने-आप उत्पन्न होते और बढ़ते रहते हैं—उसके लिये उसको कोई कार्य नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार परब्रह्म परमेश्वरसे यह जगत् स्वभावसे ही समयपर उत्पन्न हो जाता है और विस्तारको प्राप्त होता है, इसके लिये भगवान्को कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता । इसीलिये भगवान्ने गीतामें कहा है कि 'मै इस जगत्को बनानेवाला होनेपर भी अकर्ता ही हूँ' (गीता ४ । १३), 'उदासीनकी तरह स्थित रहनेवाले मुझ परमेश्वरको वे कर्म लिप्त नहीं करते' (गीता ९ । १०) इत्यादि ॥ ७ ॥ सम्बन्ध—अब संक्षेपमें जगत्की उत्पत्तिका क्रम बतलाते हैं— तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते । अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥ ब्रह्म=परब्रह्म, तपसा=विज्ञानमय तपसे, चीयते=उपचय (वृद्धि) को प्राप्त होता है, ततः=उससे; अन्नम्= अन्न अभिजायते=उत्पन्न होता है, अन्नात्=अन्नसे (क्रमशः), प्राणः=प्राण, मनः=मन, सत्यम्=सत्य (स्थूलभूत), लोकाः=समस्त लोक (और कर्म), च=तथा, कर्मसु=कर्मोंसे अमृतम्=अवश्यम्भावी सुख-दुःखरूप फल उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥ व्याख्या—जब जगत्की रचनाका समय आता है, उस समय परब्रह्म परमेश्वर अपने संकल्प रूप तपसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं, अर्थात् उनमें विविध रूपोंवाली सृष्टिके निर्माणका सङ्कल्प उठता है। जीवोंके कर्मानुसार उन परब्रह्म पुरुषोत्तममें जो सृष्टिके आदिमें स्फुरणा होती है, वही मानो उनका तप है, उस स्फुरणाके होते ही भगवान्, जो पहले अत्यन्त सूक्ष्मरूपमें रहते हैं, (जिसका वर्णन छठे मन्त्रमें आ चुका है) उसकी अपेक्षा स्थूल हो जाते हैं अर्थात् वे सृष्टिकर्ता ब्रह्माका रूप धारण कर लेते हैं। ब्रह्मासे सब प्राणियोंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाला अन्न उत्पन्न होता है। फिर अन्नसे क्रमशः प्राण, मन, कार्यरूप पाँच महाभूत, समस्त प्राणी और उनके वासस्थान, उनके भिन्न-भिन्न कर्म और उन कर्मोंसे उनका अवश्यम्भावी सुख- दुःखरूप फल—इस प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—अब परमेश्वरकी महिमाका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं— यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ ९ ॥ यः=जो, सर्वज्ञः=सर्वज्ञ (तथा), सर्ववित्=सबको जाननेवाला (है), यस्य=जिसका, ज्ञानमयम्=ज्ञानमय; तपः=तप (है), तस्मात्=उसी परमेश्वरसे, एतत्=यह, ब्रह्म=विराट्स्वरूप जगत्, च=तथा, नाम=नाम, रूपम्= रूप, (और) अन्नम्=भोजन, जायते=उत्पन्न होते हैं ॥ ९ ॥ व्याख्या—वे सम्पूर्ण जगत्के कारणभूत परम पुरुष परमेश्वर साधारणरूपसे तथा विशेषरूपसे भी सबको भलीभाँति जानते हैं; उन परब्रह्मका एकमात्र ज्ञान ही तप है । उन्हें साधारण मनुष्योंकी भाँति जगत्की उत्पत्तिके लिये कष्ट-सहनरूप तप नहीं करना पड़ता । उन सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरके सङ्कल्पमात्रसे ही यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला विराट्स्वरूप जगत् (जिसे अपर ब्रह्म कहते हैं) अपने-आप प्रकट हो जाता है और समस्त प्राणियों तथा लोकोंके नाम, रूप और आहार आदि भी उत्पन्न हो जाते हैं। शौनक ऋषिने यह पूछा था कि 'किसको जाननेसे यह सब कुछ जान लिया जाता है ? इसके उत्तरमें समस्त जगत्के उ० अ० ३४—३५—
२६६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * परम कारण परब्रह्म परमात्मासे जगत्की उत्पत्ति बतलाकर संक्षेपमें यह बात समझायी गयी कि उन सर्वशक्तिमान्, सर्वेश, सबके कर्ता-धर्ता परमेश्वरको जान लेनेपर यह सब कुछ ज्ञात हो जाता है ॥ ९ ॥ ॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय खण्ड सम्बन्ध—पहले खण्डके चौथे मन्त्रमें परा और अपरा—इन दो विद्याओंको जाननेयोग्य बताया था, उनमेंसे अब इस खण्डमें अपरा विद्याका स्वरूप और फल बतलाकर परा विद्याकी जिज्ञासा उत्पन्न की जाती है— तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि । तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥ तत् = वह; एतत् = यह; सत्यम् = सत्य है कि; कवयः = बुद्धिमान् ऋषियोंने; यानि = जिन कर्माणि = कर्मोंको; मन्त्रेषु = वेद-मन्त्रोंमें; अपश्यन् = देखा था; तानि = वे; त्रेतायाम् = तीनो वेदोंमें; बहुधा = बहुत प्रकारसे; संततानि = व्याप्त हैं; सत्यकामाः = हे सत्यको चाहनेवाले मनुष्यो, ( तुमलोग ) तानि = उनको; नियतम् = नियमपूर्वक; आचरथ = अनुष्ठान करो; लोके = इस मनुष्य शरीरमे; वः = तुम्हारे लिये; एषः = यही; सुकृतस्य = शुभ कर्मकी फल प्राप्तिका; पन्थाः = मार्ग है ॥ १ ॥ व्याख्या—यह सर्वथा सत्य है कि बुद्धिमान् महर्षियोंने जिन उन्नतिके साधनरूप यज्ञादि नाना प्रकारके कर्मोंको वेद-मन्त्रोंमे पहले देखा था, वे कर्म ऋक्, यजुः और साम—इन तीनो वेदोंमें बहुत प्रकारसे विस्तारपूर्वक वर्णित हैं ( गीता ४। ३२) । * अतः जागतिक उन्नति चाहनेवाले मनुष्योंको उन्हें भलीभाँति जानकर नियमपूर्वक उन कर्मोंको करते रहना चाहिये। इस मनुष्यशरीरमें यही उन्नतिका सुन्दर मार्ग है। आलस्य और प्रमादमें या भोगोंको भोगनेमे पशुओंकी भाँति जीवन बिता देना मनुष्यशरीरके उपयुक्त नहीं है। यही इस मन्त्रका भाव है ॥ १ ॥ सम्बन्ध—वेदोक्त अनेक प्रकारके कर्मोंमेंसे उपलक्षणरूपसे प्रधान अग्निहोत्ररूप कर्मका वर्णन आरम्भ करते हैं— यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने । तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेत् ॥ २ ॥ यदा हि = जिस समय; हव्यवाहने समिद्धे = हविष्यको देवताओके पास पहुँचानेवाली अग्निके प्रदीप्त हो जानेपर; अर्चिः = (उसमें) ज्वालाएँ; लेलायते = लपलपाने लगती हैं; तदा = उस समय; आज्यभागौ अन्तरेण = आज्यभागके† बीचमें; आहुतीः = अन्य आहुतियोंको; प्रतिपादयेत् = डाले ॥ २ ॥ व्याख्या—अधिकारी मनुष्योंको नित्यप्रति अग्निहोत्र करना चाहिये। जब देवताओंको हविष्य पहुँचानेवाली अग्नि अग्निहोत्रकी वेदीमें भलीभाँति प्रज्वलित हो जाय, उसमेंसे लपटें निकलने लगें, उस समय आज्यभागके स्थानको छोड़कर मध्यमे आहुतियाँ डालनी चाहिये। क्योंकि नित्य अग्निहोत्रमें आज्यभागकी दो आहुतियाँ देनेका नियम नहीं है। इससे यह बात भी समझायी गयी है कि जबतक अग्नि प्रदीप्त न हो, उसमेंसे लपटें न निकलने लगें, तबतक या निकलकर शान्त हो जायें, उस समय अग्निमें आहुति नहीं डालनी चाहिये। अग्निको अच्छी तरह प्रज्वलित करके ही अग्निहोत्र करना चाहिये ॥ २ ॥
- प्रधानरूपसे वेदोंकी संख्या तीन ही मानी गयी है। जहाँ-तहाँ 'वेदत्रयी' आदि नामोंसे ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—इन तीनका ही उल्लेख मिलता है। ऐसे स्थलोंमें चौथे अथर्ववेदको उक्त तीनोंके अन्तर्गत ही मानना चाहिये। † यजुर्वेदके अनुसार प्रजापतिके लिये मौनभावसे एक आहुति और इन्द्रके लिये 'आधार'नामकी दो घृताहुतियाँ देनेके पश्चात् जो अग्नि और सोम देवताओके लिये पृथक्-पृथक् दो आहुतियाँ दी जाती हैं, उनका नाम 'आज्यभाग' है। 'ॐ अग्नये स्वाहा' कहकर उत्तर-पूर्वार्धमें और 'ॐ सोमाय स्वाहा' कहकर दक्षिण-पूर्वार्धमें ये आहुतियाँ डाली जाती हैं, इनके बीचमें शेष आहुतियाँ डालनी चाहिये।
- मुण्डकोपनिषद् * २६७ सम्बन्ध—नित्य अग्निहोत्र करनेवाले मनुष्यको उसके साथ-साथ और क्या-क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं— यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासमचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च। अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ ३ ॥ यस्य = जिसका, अग्निहोत्रम् = अग्निहोत्र, अदर्शम् = दर्शनामक यज्ञसे रहित है, अपौर्णमासम् = पौर्णमास नामक यज्ञसे रहित है, अचातुर्मास्यम् = चातुर्मास्यनामक यज्ञसे रहित है, अनाग्रयणम् = आग्रयण कर्मसे रहित है; च = तथा, अतिथिवर्जितम् = जिसमें अतिथि-सत्कार नहीं किया जाता, अहुतम् = जिसमें समयपर आहुति नहीं दी जाती, अवैश्वदेवम् = जो बलिवैश्वदेवनामक कर्मसे रहित है, (तथा) अविधिना हुतम् = जिसमें शास्त्र-विधिकी अवहेलना करके हवन किया गया है, ऐसा अग्निहोत्र, तस्य = उस अग्निहोत्रीके, आसप्तमान् = सातो, लोकान् = पुण्य लोकोंका; हिनस्ति = नाश कर देता है ॥ ३ ॥ व्याख्या—नित्य अग्निहोत्र करनेवाला मनुष्य यदि दर्श* और पौर्णमासयज्ञ† नहीं करता या चातुर्मास्य यज्ञ‡ नहीं करता अथवा शरद् और वसन्त ऋतुओंमें की जानेवाली नवीन अन्नकी इष्टिरूप आग्रयण यज्ञ नहीं करता, यदि उसकी यज्ञशालामें अतिथियोंका विधिपूर्वक सत्कार नहीं किया जाता, या वह नित्य अग्निहोत्रमें ठीक समयपर और शास्त्रविधिके अनुसार हवन नहीं करता एव बलिवैश्वदेव-कर्म नहीं करता, तो उस अग्निहोत्र करनेवाले मनुष्यके सातो लोकोंको वह अङ्गहीन अग्निहोत्र नष्ट कर देता है। अर्थात् उस यज्ञके द्वारा उसे मिलनेवाले जो पृथ्वीलोकसे लेकर सत्यलोकतक सातों लोकोंमें प्राप्त होने योग्य भोग हैं, उनसे वह वञ्चित रह जाता है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—दूसरे मन्त्रमें यह बात कही गयी थी कि जब अग्निमें लपटें निकलने लगें, तब आहुति देनी चाहिये, अतः अब उन लपटोंके प्रकार-भेद और नाम बतलाते हैं— काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥ या = जो, काली = काली, कराली = कराली, च = तथा, मनोजवा = मनोजवा, च = और; सुलोहिता = सुलोहिता; च = तथा, सुधूम्रवर्णा = सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी = स्फुलिङ्गिनी, च = तथा, विश्वरुची देवी = विश्वरुची देवी, इति = ये (अग्निकी), सप्त = सात; लेलायमानाः = लपलपाती हुई, जिह्वाः = जिह्वाएँ हैं ॥ ४ ॥ व्याख्या—काली—काले रंगवाली, कराली—अति उग्र (जिसमें आग लग जानेका डर रहता है), मनोजवा—मन- की भाँति अत्यन्त चञ्चल, सुलोहिता—सुन्दर लाली लिये हुए, सुधूम्रवर्णा—सुन्दर धूएँके-से रंगवाली, स्फुलिङ्गिनी— चिनगारियोंवाली तथा विश्वरुची देवी—सब ओरसे प्रकाशित, देदीप्यमान—इस प्रकार ये सात तरहकी लपटें मानो अग्निदेवकी हविको ग्रहण करनेके लिये लपलपाती हुई सात जिह्वाएं हैं। अतः जब इस प्रकार अग्निदेवता आहुतिरूप भोजन ग्रहण करनेके लिये तैयार हों, उसी समय भोजनरूप आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये; अन्यथा अप्रज्वलित अथवा बुझी हुई अग्निमे दी हुई आहुति राखमें मिलकर व्यर्थ नष्ट हो जाती है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे प्रदीप्त अग्निमें नियमपूर्वक नित्यप्रति हवन करनेका फल बतलाते हैं— एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् । तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥ यः च = जो कोई भी अग्निहोत्री, एतेषु भ्राजमानेषु = इन देदीप्यमान ज्वालाओंमें, यथाकालम् = ठीक समयपर;
- प्रत्येक अमावास्याको की जानेवाली इष्टि। † प्रत्येक पूर्णिमाको की जानेवाली इष्टि। ‡ चार महीनोंमें पूरा होनेवाला एक श्रौत यागविशेष।
२६८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * चरते = अग्निहोत्र करता है; तम् = उस अग्निहोत्रीको, हि = निश्चय ही, आददायन् = अपने साथ लेकर, एताः = ये; आहुतयः = आहुतियाँ, सूर्यस्य = सूर्यकी, रश्मय [भूत्वा] = किरणें (बनकर); नयन्ति = (वहाँ) पहुँचा देती हैं; यत्र = जहाँ, देवानाम् = देवताओंका एकः = एकमात्र, पतिः = स्वामी (इन्द्र), अधिवास = निवास करता है ॥ ५ ॥ व्याख्या—जो कोई भी साधक पूर्वमन्त्रमे बतलायी हुई सात प्रकारकी लपटोंसे युक्त भलीभाँति प्रज्वलित अग्निमें ठीक समयपर शास्त्रविधिके अनुसार नित्यप्रति आहुति देकर अग्निहोत्र करता है, उसे मरणकालमे अपने साथ लेकर ये आहुतियाँ सूर्यकी किरणें बनकर वहाँ पहुँचा देती हैं, जहाँ देवताओंका एकमात्र स्वामी इन्द्र निवास करता है। तात्पर्य यह कि अग्निहोत्र स्वर्गके सुखोंकी प्राप्तिका अमोघ उपाय है ॥ ५ ॥ सम्बन्ध—किस प्रकार ये आहुतिया सूर्य-किरणोंद्वारा यजमानको इन्द्रलोकमे ले जाती हैं—ऐसा जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति । प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६ ॥ सुवर्चसः = (वे) देदीप्यमान, आहुतयः = आहुतियाँ, एहि एहि = आओ, आओ; एषः = यह, वः = तुम्हारे, सुकृतः = शुभ कमौसे प्राप्त पुण्यः = पवित्र ब्रह्मलोकः = ब्रह्मलोक (स्वर्ग) है इति = इस प्रकारकी, प्रियाम् = प्रिय, वाचम् = वाणी; अभिवदन्त्यः = बार-बार कहती हुई (और), अर्चयन्त्यः = उसका आदर सत्कार करती हुईं तम् = उस यजमानम् = यजमानको, सूर्यस्य = सूर्यकी रश्मिभिः = रश्मियोंद्वारा, वहन्ति = ले जाती हैं ॥ ६ ॥ व्याख्या—उन प्रदीप्त ज्वालाओंमे दी हुई आहुतियाँ सूर्यकी किरणोंके रूपमे परिणत होकर मरणकालमे उस साधक- से कहती हैं—'आओ, आओ, यह तुम्हारे शुभ कर्मका फलस्वरूप ब्रह्मलोक अर्थात् भोगरूप सुखोंको भोगनेका स्थान स्वर्ग- लोक है।' इस प्रकारकी प्रिय वाणी बार-बार कहती हुई आदर-सत्कारपूर्वक उसे सूर्यकी किरणोंके मार्गसे ले जाकर स्वर्गलोकमें पहुँचा देती हैं। यहाँ स्वर्गको ब्रह्मलोक कहनेका यह भाव मालूम होता है कि स्वर्गके अधिपति इन्द्र भी भगवान्के ही अपर स्वरूप हैं, अतः प्रकारान्तरसे ब्रह्म ही हैं ॥ ६ ॥ सम्बन्ध—अब सांसारिक भोगोंमें वैराग्यकी और परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा उत्पन्न करनेके लिये उपर्युक्त स्वर्गलोकके साधनरूप यज्ञादि सकाम कर्म और उनके फलस्वरूप लौकिक एवं पारलौकिक भोगोंकी तुच्छता बतलाते हैं— प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म । एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥ ७ ॥ हि = निश्चय ही, एते = ये यज्ञरूपाः = यज्ञरूप, अष्टादश प्लवाः = अठारह नौकाएँ, अदृढाः = अदृढ (अस्थिर) हैं; येषु = जिनमें, अवरम् = नीची श्रेणीका, कर्म = उपासनारहित सकाम कर्म, उक्तम् = बताया गया है, ये = जो, मूढाः = मूर्ख, एतत् [एव] = यही, श्रेयः = कल्याणका मार्ग है (यों मानकर), अभिनन्दन्ति = इसकी प्रशंसा करते हैं, ते = वे, पुन. अपि = बारबार, एव = निःसंदेह, जरामृत्युम् = वृद्धावस्था और मृत्युको, यन्ति = प्राप्त होते रहते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे यज्ञको नौकाका रूप दिया गया है और उनकी संख्या अठारह बतलायी गयी है; इससे अनुमान होता है कि नित्य, दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य आदि भेदोंसे यज्ञके अठारह प्रधान भेद होते हैं। कहना यह है कि जिनमे उपासनारहित सकाम कर्मोंका वर्णन है, ऐसी ये यज्ञरूप अठारह नौकाएँ हैं, जो कि दृढ़ नहीं हैं। इनके द्वारा संसार- समुद्रसे पार होना तो दूर रहा, इस लोकके वर्तमान दुःखरूप छोटी सी नदीसे पार होकर स्वर्गतक पहुँचनेमे भी संदेह है, क्योंकि तीसरे मन्त्रके वर्णनानुसार किसी भी अङ्गकी कमी रह जानेपर वे साधकको स्वर्गमें नहीं पहुँचा सकतीं, बीचमें ही छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। इसलिये ये अदृढ अर्थात् अस्थिर हैं। इस रहस्यको न समझकर जो मूर्खलोग इन सकाम कर्मोंको ही कल्याणका उपाय समझकर—इनके ही फलको परम सुख मानकर इनकी प्रशंसा करते रहते हैं, उन्हे निःसंदेह बारम्बार वृद्धावस्था और मरणके दुःख भोगने पड़ते हैं ॥ ७ ॥ सम्बन्ध—वे किस प्रकार दुःख भोगते हैं, इसका स्पष्टीकरण करते हैं—
- मुण्डकोपनिषद् * २६९ अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयंधीराः पण्डितं मन्यमानाः । जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ८ ॥ अविद्यायाम् अन्तरे=अविद्याके भीतर, वर्तमानाः=स्थित होकर (भी), स्वयंधीराः=अपने-आप बुद्धिमान् बनने- वाले (और), पण्डितम् मन्यमानाः=अपनेको विद्वान् माननेवाले; मूढाः=वे मूर्खलोग; जङ्घन्यमानाः=बार-बार आघात (कष्ट) सहन करते हुए; परियन्ति=(ठीक वैसे ही) भटकते रहते हैं, यथा=जैसे, अन्धेन एव= अन्धेके द्वारा ही, नीयमानाः=चलाये जानेवाले, अन्धाः=अंधे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर बीचमें ही इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते रहते हैं) ॥ ८ ॥ व्याख्या—जब अन्धे मनुष्यको मार्ग दिखलानेवाला भी अन्धा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थान- पर नहीं पहुँच पाता, बीचमे ही ठोकरें खाता भटकता है और काँटे-कंकड़ोंसे बिंधकर या गहरे गढ्ढे आदिमें गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है, वैसे ही उस मूर्खको भी पशु, पक्षी, कीट पतग आदि विविध दु खपूर्ण योनियोंमें एव नरकादिमें प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पडता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझता है, विद्या-बुद्धिके मिथ्याभिमानमे शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करता और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंको भोग करनेमें तथा उनके उपार्जनमे ही निरन्तर सलग्न रहकर मनुष्यजीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करता रहता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—वे लोग बारवार दुःखोंमें पडकर भी चेतते क्यों नहीं, कल्याणके लिये चेष्टा क्यों नहीं करते, इस जिज्ञासापर कहते हैं— अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः । यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ ९ ॥ बालाः=वे मूर्खलोग, अविद्यायाम्=उपासनारहित सकाम कर्मोंमें, बहुधा=बहुत प्रकारमे, वर्तमानाः=वर्तते हुए, वयम्=हम, कृतार्थाः=कृतार्थ हो गये, इति अभिमन्यन्ति=ऐसा अभिमान कर लेते हैं, यत्=क्योंकि, कर्मिणः=वे सकाम कर्म करनेवाले लोग, रागात्=विषयोंकी आसक्तिके कारण, न प्रवेदयन्ति=कल्याणके मार्गको नहीं जान पाते; तेन=इस कारण, आतुराः=बार-बार दुःखसे आतुर हो, क्षीणलोकाः=पुण्योपार्जित लोकोंसे हटाये जाकर, च्यवन्ते=नीचे गिर जाते हैं ॥ ९ ॥ व्याख्या—पूर्वमन्त्रमें कहे हुए प्रकारसे जो इस लोक और परलोकके भोगोंकी प्राप्तिके लिये सासारिक उन्नतिके साधनरूप नाना प्रकारके सकाम कर्मोंमें ही बहुत प्रकारसे लगे रहते ह, वे अविद्यामें निमग्न अज्ञानी मनुष्य समझते हैं कि 'हमन अपन क र्तव्यका पालन कर लिया।' उन सासारिक कर्मामे लगे हुए मनुष्योंकी भोगोंमें अत्यन्त आसक्ति होती है, इस कारण वे सासारिक उन्नतिके सिवा कल्याणकी ओर दृष्टि ही नहीं डालते । उन्हें इस बातका पता ही नहीं रहता कि परमानन्दके समुद्र कोई परमात्मा हैं और मनुष्य उन्हें पा सकता है। इसलिये वे उन परमेश्वरकी प्राप्तिके लिये चेष्टा न करके बार-बार दुखी होते रहते हैं और पुण्यकमोंका फल पूरा होनेपर वे स्वर्गादि लोकोंसे नीचे गिर जाते हैं ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातको ही और भी स्पष्ट करते हैं— इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥१०॥ इष्टापूर्तम्=इष्ट और पूर्त* (सकाम) कर्मोंको ही, वरिष्ठम्=श्रेष्ठ, मन्यमानाः=माननेवाले, प्रमूढाः=अत्यन्त मूर्खलोग, अन्यत्=उससे भिन्न, श्रेयः=वास्तविक श्रेयको, न वेदयन्ते=नहीं जानते, ते=वे, सुकृते=पुण्यकर्मोंके
- यज्ञ-यागादि श्रौत कर्मोंको 'इष्ट' तथा बावली, कुआँ खुदवाना और बगाचे लगाना आदि स्मृनिविहित कर्मोंको 'पूर्त' कहते हैं।
फलस्वरूप, नाकस्य पृष्ठे = स्वर्गके उच्चतम स्थानमे, अनुभूत्वा = ( जाकर श्रेष्ठ कर्मोंके फलस्वरूप ) वहाँके भोगोंका अनुभव करके, इमम् लोकम् = इस मनुष्यलोकमें, वा = अथवा, हीनतरम् = इससे भी अत्यन्त हीन योनियोंमे; विशन्ति = प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥ व्याख्या—वे अतिशय मूर्ख भोगासक्त मनुष्य इष्ट और पूर्तको अर्थात् वेद और स्मृति आदि शास्त्रोंमे सांसारिक सुखोंकी प्राप्तिके जितने भी साधन बताये गये हैं, उन्हींको सर्वश्रेष्ठ कल्याण-साधन मानते हैं । इसलिये उनसे भिन्न अर्थात् परमेश्वरका भजन, ध्यान और निष्कामभावसे कर्तव्यपालन करना एवं परमपुरुष परमात्माको जाननेके लिये तीव्र जिज्ञासापूर्वक चेष्टा करना आदि जितने भी परम कल्याणके साधन हैं, उन्हें वे नहीं जानते, उन कल्याण-साधनोंकी ओर लक्ष्य- तक नहीं करते । अतः वे अपने पुण्यकर्मोंके फलरूप स्वर्गलोकतकके सुखोंको भोगकर पुण्य क्षय होनेपर पुनः इस मनुष्यलोकमें अथवा इससे भी नीची शूकर कूकर, कीट पतङ्ग आदि योनियोमे या रौरवादि घोर नरकोंमे चले जाते हैं। (गीता ९। २० २१) ॥ १० ॥
सम्बन्ध—ऊपर बतलाये हुए सांसारिक भोगोंसे विरक्त मनुष्यकि आचार-व्यवहार और उनके फलका वर्णन करते हैं— तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः । सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥११॥
हि = किन्तु, ये = जो, अरण्ये [स्थिताः]=वनमे रहनेवाले, शान्ताः = शान्त स्वभाववाले; विद्वांसः = विद्वान्, भैक्ष्यचर्याम् चरन्तः = तथा भिक्षाके लिये विचरनेवाले, तपःश्रद्धे = मयमरूप तप तथा श्रद्धाका; उपवसन्ति = सेवन करते हैं, ते = वे, विरजाः = रजोगुणरहित, सूर्यद्वारेण = सूर्यके मार्गसे, [तत्र] प्रयान्ति = वहाँ चले जाते हैं, यत्र हि = जहाँपर; सः = वह, अमृतः = जन्म-मृत्युसे रहित, अव्ययात्मा = नित्य, अविनाशी, पुरुषः = परम पुरुष (रहता है) ॥ ११ ॥
व्याख्या—उपर्युक्त भोगासक्त मनुष्योंसे जो सर्वथा भिन्न हैं, मनुष्यशरीरका महत्त्व समझ लेनेके कारण जिनके अन्तःकरणमे परमात्माका तत्त्व जाननेकी और परमेश्वरको प्राप्त करनेकी इच्छा जग उठी है, वे चाहे वनमें निवास करनेवाले वानप्रस्थ हों, शान्त स्वभाववाले विद्वान् सदाचारी गृहस्थ हों या भिक्षासे निर्वाह करनेवाले ब्रह्मचारी अथवा सन्यासी हों, वे तो निरन्तर तप और श्रद्धाका ही सेवन किया करते हैं, अर्थात् अपने-अपने वर्ण, आश्रम तथा परिस्थितिके अनुसार जिस समय जो कर्तव्य होता है, उसका शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार बिना किसी प्रकारकी कामनाके पालन करते रहते हैं और सयमपूर्वक शम-दमादि साधनोंसे सम्पन्न होकर परम श्रद्धाके साथ परमेश्वरको जानने और प्राप्त करनेके साधनोमे लगे रहते हैं। इसलिये तम और रजोगुणके विकारोंसे सर्वथा शून्य निर्मल सत्त्वगुणमें स्थित वे सज्जन सूर्यलोकमें होते हुए वहाँ चले जाते हैं, जहाँ उनके परम प्राप्य अमृतरूप नित्य अविनाशी परमपुरुष पुरुषोत्तम निवास करते ह ॥ ११ ॥
सम्बन्ध—उन परब्रह्म परमेश्वरको जानने और प्राप्त करनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं— परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥१२॥
कर्मचितान् = कर्मसे प्राप्त किये जानेवाले, लोकान् परीक्ष्य = लोकोंकी परीक्षा करके, ब्राह्मणः = ब्राह्मण, निर्वेदम् = वैराग्यको, आयात् = प्राप्त हो जाय (यह समझ ले कि), कृतेन = किये जानेवाले सकाम कर्मोंसे, अकृतः = स्वतःसिद्ध नित्य परमेश्वर, न अस्ति = नहीं मिल सकता, सः = वह, तद्विज्ञानार्थम् = उस परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये; समित्पाणिः = हाथमें समिधा लेकर, श्रोत्रियम् = वेदको भलीभाँति जाननेवाले (ओर), ब्रह्मनिष्ठम् = परब्रह्म परमात्मामे स्थित, गुरुम् = गुरुके पास, एव = ही; अभिगच्छेत् = विनयपूर्वक जाय ॥ १२ ॥
व्याख्या—अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको पहले बतलाये हुए सकाम कर्मकि फलस्वरूप इस लोक और परलोकके
- मुण्डकोपनिषद् * २७१ समस्त सांसारिक सुखोंकी भलीभाँति परीक्षा करके अर्थात् विवेकपूर्वक उनकी अनित्यता और दुःखरूपताको समझकर सब प्रकारके भोगोंसे सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिये। यह निश्चय कर लेना चाहिये कि कर्तापनके अभिमानपूर्वक सकामभावसे किये जानेवाले कर्म अनित्य फलको देनेवाले तथा स्वय भी अनित्य हैं। अतः जो सर्वथा अकृत है अर्थात् क्रियासाध्य नहीं है, ऐसे नित्य परमेश्वरकी प्राप्ति वे नहीं करा सकते। यह सोचकर उस जिज्ञासुको परमात्माका वास्तविक तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेके लिये हाथमें समिधा लेकर श्रद्धा और विनयभावके सहित ऐसे सद्गुरुकी शरणमें जाना चाहिये, जो वेदोंके रहस्यको भलीभाँति जानते हों और परब्रह्म परमात्मामे स्थित हों ॥ १२ ॥ सम्बन्ध—ऊपर बतलाये हुए लक्षणोंवाला कोई शिष्य यदि गुरुके पास आ जाय तो गुरुको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं— तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक्प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥१३॥ सः=वह; विद्वान्=ज्ञानी महात्मा; उपसन्नाय=शरणमें आये हुए, सम्यक्प्रशान्तचित्ताय=पूर्णतया शान्त- चित्तवाले; शमान्विताय=मन और इन्द्रियोंपर विजय पाये हुए; तस्मै=उस शिष्यको, ताम् ब्रह्मविद्याम्=उस ब्रह्मविद्याका; तत्त्वतः=तत्त्व-विवेचनपूर्वक, प्रोवाच=भलीभाँति उपदेश करे, येन [सः]=जिससे वह शिष्य; अक्षरम्=अविनाशी; सत्यम्=नित्य, पुरुषम्=परमपुरुषको, वेद=जान ले ॥ १३ ॥ व्याख्या—उन श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महात्माको भी चाहिये कि अपनी शरणमें आये हुए ऐसे शिष्यको, जिसका चित्त पूर्णतया शान्त—निश्चल हो चुका हो, सांसारिक भोगोंमें सर्वथा वैराग्य हो जानेके कारण जिसके चित्तमें किसी प्रकारकी चिन्ता, व्याकुलता या विकार नहीं रह गये हों, जिसने अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमें कर लिया हो, उस ब्रह्मविद्याका तत्त्व-विवेचनपूर्वक भलीभाँति समझाकर उपदेश करे, जिससे वह शिष्य नित्य अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम का ज्ञान प्राप्त कर सके ॥ १३ ॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ ॥ प्रथम मुण्डक समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय मुण्डक प्रथम खण्ड सम्बन्ध-प्रथम मुण्डकके द्वितीय खण्डमें अपर विद्याका स्वरूप और फल बतलाया तथा उससे तुच्छता दिखाते हुए उससे विरक्त होनेकी बात कहकर परविद्या प्राप्त करनेके लिये सद्गुरुकी शरणमें जानेको कहा। अब परविद्याका वर्णन करनेके लिये प्रकरण आरम्भ करते हैं- तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥ सोम्य = हे प्रिय !, तत् = वह, सत्यम् = सत्य, एतत् = यह है, यथा = जिस प्रकार, सुदीप्तात् पावकात् = प्रज्वलित अग्निमेंसे; सरूपाः = उसीके समान रूपवाली, सहस्रशः = हजारों; विस्फुलिङ्गाः = चिनगारियाँ, प्रभवन्ते = नाना प्रकारसे प्रकट होती हैं; तथा = उसी प्रकार, अक्षरात् = अविनाशी ब्रह्मसे, विविधाः = नाना प्रकारके, भावा = भाव; प्रजायन्ते = उत्पन्न होते हैं, च = और, तत्र एव = उसीमें, अपियन्ति = विलीन हो जाते हैं* ॥ १ ॥ व्याख्या-महर्षि अङ्गिरा कहते हैं-प्रिय शौनक ! मैंने तुमको पहले परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए (पूर्व प्रकरणके पहले खण्डमें छठे मन्त्रसे नवेंतक) जो रहस्य बतलाया था, वह सर्वथा सत्य है, अब उसीको पुनः समझाता हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्निमेंसे उसीके जैसे रूप-रंगवाली हजारों चिनगारियाँ चारों ओर निकलती हैं, उसी प्रकार परमपुरुष अविनाशी ब्रह्मसे सृष्टिकालमें नाना प्रकारके भाव-मूर्त-अमूर्त पदार्थ उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें पुनः उन्हींमें लीन हो जाते हैं। यहाँ भावोंके प्रकट होनेकी बात समझानेके लिये ही अग्नि और चिनगारियोंका दृष्टान्त दिया गया है। उनके विलीन होनेकी बात दृष्टान्तसे स्पष्ट नहीं होती ॥ १ ॥ सम्बन्ध-जिन परब्रह्म अविनाशी पुरुषोत्तमसे यह जगत् उत्पन्न होकर पुन' उन्हींमें विलीन हो जाना है, वे स्वयं कैसे हैं-इस जिज्ञासापर कहते हैं- दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥ २ ॥ हि = निश्चय ही, दिव्यः = दिव्य, पुरुषः = पूर्णपुरुष; अमूर्तः = आकाररहित, सबाह्याभ्यन्तर. हि = समस्त जगत्के बाहर और भीतर भी व्याप्त, अज. = जन्मादि विकारोंसे अतीत, अप्राणः = प्राणरहित, अमनाः = मनरहित; हि = होनेके कारण, शुभ्र = सर्वथा विशुद्ध है (तथा), हि = इसीलिये, अक्षरात् = अविनाशी जीवात्मासे, परतः परः = अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ २ ॥ व्याख्या-वे दिव्य पुरुष परमात्मा निःसन्देह आकाररहित और समस्त जगत्के बाहर एव भीतर भी परिपूर्ण हैं। वे जन्म आदि विकारोंसे रहित, सर्वथा विशुद्ध है, क्योंकि उनके न तो प्राण हैं, न इन्द्रियाँ हैं और न मन ही है। वे इन सबके बिना ही सब कुछ-करनेमे समर्थ हैं, इसीलिये वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अविनाशी जीवात्मासे अत्यन्त श्रेष्ठ- सर्वथा उत्तम हैं ॥ २ ॥ सम्बन्ध-उपर्युक्त लक्षणोंवाले निराकार परमेश्वरसे यह साकार जगत् किस प्रकार उत्पन्न हो जाता है, इस जिज्ञासापर उनकी सर्वशक्तिमत्ताका वर्णन करते हैं-
- प्रथम मुण्डकके प्रथम खण्डके सातवें मन्त्रमें मकड़ी, पृथ्वी और मनुष्य-शरीरके दृष्टान्तसे जो बात कही थी, वही बात इस मन्त्रमें अग्निके दृष्टान्तसे समझायी गयी है ।
- मुण्डकोपनिषद् * २७३ एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥ एतस्मात् = इसी परमेश्वरसे, प्राणः = प्राण, जायते = उत्पन्न होता है ( तथा ), मनः = मन ( अन्तःकरण ), सर्वेन्द्रियाणि = समस्त इन्द्रियाँ, खम् = आकाश, वायुः = वायु, ज्योतिः = तेज, आपः = जल, च = और, विश्वस्य धारिणी = सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली, पृथिवी = पृथ्वी ( ये सब उत्पन्न होते हैं ) ॥ ३ ॥ व्याख्या—यद्यपि वे परब्रह्म पुरुषोत्तम निराकार और मन, इन्द्रिय आदि करण-समुदायसे सर्वथा रहित हैं, तथापि सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। इन सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमसे ही सृष्टिकालमें प्राण, मन ( अन्तःकरण ) और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ तथा आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँचो महाभूत, सब के सब उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—इस प्रकार संक्षेपमें परमेश्वरसे सूक्ष्म तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार बतलाकर अब इस जगत्में भगवान्का विराट्रूप देखनेका प्रकार बतलाते हैं— अग्निमूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥ अस्य = इस परमेश्वरका, अग्निः = अग्नि, मूर्धा = मस्तक है, चन्द्रसूर्यौ = चन्द्रमा और सूर्य, चक्षुषी = दोनों नेत्र हैं, दिशः = सब दिशाएँ, श्रोत्रे = दोनों कान हैं, च = और, विवृताः वेदाः = प्रकट वेद, वाक् = वाणी हैं ( तथा ), वायुः प्राणः = वायु प्राण है, विश्वम् हृदयम् = जगत् हृदय है, पद्भ्याम् = इसके दोनो पैरोंसे, पृथिवी = पृथ्वी उत्पन्न हुई है, एषः हि = यही, सर्वभूतान्तरात्मा = समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है ॥ ४ ॥ व्याख्या—दूसरे मन्त्रमें जिन परमेश्वरके निराकार स्वरूपका वर्णन किया गया है, उन्हीं परब्रह्मका यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला जगत् विराट्रूप है। इन विराट्स্বরূপ परमेश्वरका अग्नि अर्थात् द्युलोक ही मानो मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं, समस्त दिशाएँ कान हैं, नाना छन्द और ऋचाओंके रूपमें विस्तृत चारो वेद वाणी हैं, वायु प्राण है, सम्पूर्ण चराचर जगत् हृदय है, पृथ्वी मानो उनके पैर है। यही परब्रह्म परमेश्वर समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी परमात्मा हैं ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—उन परमात्मासे इस चराचर जगत्की उत्पत्ति किस क्रमसे होती है, इस जिज्ञासापर प्रकारान्तरसे जगत्की उत्पत्ति- का क्रम बतलाते हैं— तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात्पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् । पुमान्रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात्सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥ तस्मात् = उससे ही, अग्निः = अग्निदेव प्रकट हुआ, यस्य समिधः = जिसकी समिधा, सूर्यः = सूर्य है, ( उस अग्निसे सोम उत्पन्न हुआ ) सोमात् = सोमसे, पर्जन्यः = मेघ उत्पन्न हुए (और मेघोंसे वर्षाद्वारा ), पृथिव्याम् = पृथ्वीमें, ओषधयः = नाना प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न हुईं, रेतः = ( ओषधियोंके भक्षणसे उत्पन्न हुए ) वीर्यको, पुमान् = पुरुष, योषितायाम् = स्त्रीमे सिञ्चति = सिंचन करता है ( जिससे सतान उत्पन्न होती है ), [ एवम् = इस प्रकार, ] पुरुषात् = उस परम पुरुषसे ही, बह्वीः प्रजाः = नाना प्रकारके जीव, सम्प्रसूताः = नियमपूर्वक उत्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या—जब जब परमेश्वरसे यह जगत् उत्पन्न होता है, तब-तब सदैव एक प्रकारसे ही होता हो—ऐसा नियम नहीं है। वे जब जैसा सङ्कल्प करते हैं, उसी प्रकार उसी क्रमसे जगत् उत्पन्न हो जाता है। इसी भावको प्रकट करनेके लिये यहाँ प्रकारान्तरसे सृष्टिकी उत्पत्ति बतलायी गयी है। मन्त्रका सारांश यह है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमसे सर्वप्रथम तो उनकी अचिन्त्य शक्तिका एक अंश अद्भुत अग्नितत्त्व उत्पन्न हुआ, जिसकी समिधा ( इन्धन ) सूर्य है, अर्थात् जो सूर्यबिम्बके रूपमें